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बुधवार, 17 जुलाई 2013

क्या सुबह सुबह हनुमान चालीसा नहीं पढ़ना चाहिए?

अभी परसों ही दिल्ली प्रवासी बहन ज्योत्स्ना(ज्योति )  ने मुझे फोन कर एक अजब सवाल सामने रख दिया . पहले तो यह पूछा कि "प्रात नाम जो लेई हमारा ता दिन ताहि न मिलै अहारा" कहाँ का प्रसंग है .अब मैं मानस का कोई व्यास तो हूँ नहीं कि हर पंक्ति हर दोहा प्रसंग सहित मुझे याद रहे फिर भी सहज बोध से  बता दिया कि सुन्दरकाण्ड का होना चाहिए और हनुमान या अंगद द्वारा कहा होना चाहिए . मगर प्रसंग याद नहीं आ रहा था जबकि यह अर्धाली मुझे बचपन से याद थी ..लगता है उम्र प्रभावी होती जा रही है .संयोगवश मैं नेट पर था तो तुरत फुरत ढूंढ  लिया -यह प्रसंग लंका में प्रवेश करते ही विभीषण हनुमान संवाद का है . हनुमान एक अलग ढंग का घर देखते हैं जहाँ विभीषण का वास है -वे आश्चर्यचकित होते हैं कि राक्षसों के बीच यहाँ कौन से सज्जन का निवास हो सकता है -लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।। फिर शुरू हुए विभीषण -हनुमान संवाद में आगे हनुमान द्वारा होता कही गयी उक्त अर्धाली भी मिल गयी जिसका अर्थ है जो प्रातः  बन्दर (का)  नाम ले लेता है उसे उस दिन भोजन नसीब नहीं होता . मैंने झट से ज्योत्स्ना को प्रसंग बता दिया -थैंक्स अंतर्जाल! ज्योत्स्ना ने कहा कि मैंने तो बहुत खोजा नहीं मिला तो मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया कि यह बड़ा भाई होने का फर्क  है? मगर अब बड़े भाई की मुसीबत होने वाले थी ...ज्योत्स्ना का दूसरा प्रश्न असहज करने वाला था ..

सवाल था तो क्या सुबह हनुमान चालीसा नहीं पढना चाहिए ? अब मुझे पूरा प्रसंग देखना पड़ गया ..आप भी देखिये न… तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।। दोनों रामभक्तों में जान पहचान कुशल क्षेम के बाद यह संवाद हुआ . विभीषण ने कहा कि मैं तो जन्म से ही अभागा हूँ ...मेरा तो यह राक्षस का अधम शरीर ही है और मन में भी प्रभु के पद कमल के प्रति प्रीति नहीं उपजती, आज आप जैसे संत ह्रदय से भेंट हुयी है तो यह तो हरि की कृपा ही है . हनुमान को यह भान हुआ कि विभीषण में अपने राक्षस रूप को को लेकर हीन भावना है . तो उन्होंने खुद अपना उदाहरण देकर उन्हें वाक् चातुर्य से संतुष्ट किया -अब मैं ही कौन सा कुलीन हूँ विभीषण ? और एक बन्दर के रूप में मैं भी तो सब तरह से,तन मन से हीन ही हूँ ..और लोक श्रुति तो यह भी है कि अगर कोई सुबह हमारा नाम(बन्दर का नाम)  ले ले तो उसे दिन भर आहार नहीं मिलेगा!
यहाँ हनुमान की प्रत्युत्पन्न बुद्धि और वाक् चातुर्य स्पष्ट दीखती  है ....विभीषण को हीन भावना से उबारने के लिए उन्होंने खुद अपने बन्दर रूप का उदाहरण दिया और प्रकारांतर से यह कह गए कि तन मन योनि से कोई फर्क नहीं पड़ता अगर प्रभु राम की कृपा हो जाय .प्रभु कृपा से अधम भी पुण्यात्मा बन जाय -मेरा ही देखिये जो कुछ भी मैं हूँ वह प्रभु कृपा से ही हूँ नहीं तो एक बन्दर की क्या औकात थी? "अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर" ...
 प्रभु राम की कृपा जिस पर हो जाय ..अपावन कौए पर हो गयी तो वे महाज्ञानी पावन काकभुशुण्डी बन गए . और मधुर वचन भी बोलने लग गए ..."मधुर वचन बोलेउ तब कागा :-) ....तो सब कुछ प्रभु की कृपा पर ही निर्भर है . अब जिस पर प्रभु की कृपा हो तो उसका नाम तो हर वक्त लिया जा  सकता है .सुबह शाम ..वह तो प्रातः स्मरणीय है और उस पर हनुमान का नाम जो राम के सबसे बड़े भक्त है . ज्योत्स्ना शायद यह पोस्ट तुम्हे संतुष्ट कर सके ...... अन्य मित्रगण भी अपना मंतव्य व्यक्त करेगें तो मुझे अच्छा लगेगा ..जय श्रीराम! 

रविवार, 2 जून 2013

जीवन की गुणवत्ता

मनुष्य कैसा जीवन जी रहा है और उसे कैसा जीवन जीना चाहिए इस प्रश्न का जवाब धर्म और दार्शनिकता के नज़रिए से दिया जाता रहा है . और भी कई नज़रिए हो सकते हैं . धर्म की बात करें तो जीवन के चार मूल लक्ष्यों/ पुरुषार्थ की कसौटी पर मानव जीवन की सफलता असफलता आंकी जाती रही है -ये हैं धर्म ,अर्थ काम और मोक्ष . इनका उचित अर्जन ही मनुष्य के जीवन की सफलता मानी गयी है . इनमें भी मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है मगर राहत की बात है की मोक्ष की धारणा काल्पनिक ही है . चार्वाक ने कहा कि मृत्यु ही मोक्ष है -और इस अवधारणा की समझ को सरल कर दिया . महात्मा बुद्ध की माने तो मानव जीवन के मूल में दुःख ही दुःख है और मनुष्य के जीवन का बड़ा अभीष्ट सुख की प्राप्ति है .जब जीवन दुःख भरा है तो निश्चित ही मृत्यु मोक्ष से कम नहीं . कवी ने भी कहा है निर्भय स्वागत करो मृत्यु का यह है एक विश्राम स्थल .यहाँ कवि जीवन की आपाधपी और कष्ट की अनुभूति को ही उजागर कर रहा है .
यह युग विज्ञान और प्रौद्योगिकी द्वारा सजाया संवारा जा रहा है . आज प्रौद्योगिकी ने मनुष्य की सुख सुविधा के कितने ही इंतजाम किये हैं . आज अल्प काल मृत्यु के मामले बहुत घट गए हैं मनुष्य की सामान्य आयु बढी है . कई रोग बढे हैं तो कई लाईलाज रहे रोगों पर नियंत्रण भी कर लिया गया है ,बड़ी माता और तावन जैसी बीमारियाँ छू मंतर होगई हैं . प्रसव मृत्यु दर काफी कम हुयी है . यात्राएं आसान हो गयी हैं .दो जून का भोजन एक बड़ी आबादी को उपलब्ध है . अगर सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था को हम सही कर पाए तो विज्ञान और प्रौद्योगिकी हमारे जीवन को और भी सुखमय कर देगी .. हो सकता है रामराज्य का हमारा चिर कालिक स्वप्न भी साकार हो जाय -अल्प मृत्यु नहिं कवनऊ पीरा सब सुन्दर सब बिरुज शरीरा ....मगर शायद हम सुख का एक सीमित अर्थ लगा लेते हैं -भौतिक सुख सुविधा को ही हम सुख मान लेते हैं! आध्यात्मविदों की बात हमें यहाँ सच लगती है कि सुख कहीं बाहर नहीं वह तो भीतर हैं अंतर्मन में है -उसकी खोज बाहर नहीं भीतर होनी चाहिए! और यह पूरा विषय ही आध्यात्म का हो जाता है ,
तो क्या बेशुमार धन दौलत ही सुख का आधार है . जाहिर तौर पर तो यही लगता है . मगर मैंने देखा है कि गाँठ के पूरे कितने लोग छदम बाबाओं पीरों की शरण में जा जैसे तैसे कमाए धन को लुटाते रहते हैं .पक्के अन्धविश्वासी हैं . हर पल डरते रहते हैं कि उनका वैभव कहीं भरभरा न जाए . क्या यह सुखपूर्ण जीवन है ?. हमारे पुरखों ने कितने ही सुनहले नियम बनाये हैं जिन पर चल कर हम भले ही सुखद कम मगर एक सार्थक जीवन जी सकते हैं . मगर अब वे नियम कहीं खो गए जल्दी मिलते नहीं .कोई पूछता भी नहीं . सार्थक जीवन के जो कुछ मूल मन्त्र थे उनमें दया ,परोपकार ,सत्य के प्रति आग्रह आदि थे. और ये मूल्य हैं . किसी विद्वान ने कहा है कि उपलब्धियों से भरे जीवन की अपेक्षा हमें गुणवत्ता पूर्ण जीवन को ज्यादा तरजीह देना चाहिए . पर यह जीवन की गुणवत्ता कैसे बढ़ायी जाय?
मेरे मन में यह प्रश्न कौंधता रहा है। और दैनंदिन जीवन में मिलने वाले लोगों को देख समझ कर तो यह बात बड़ी शिद्दत से महसूस होती है कि जीवन जो बहुत दीर्घकालिक नहीं होता और फिर भी हम एक अंधी दौड़ लगाये हुए हैं में गुणवत्ता का समावेश कैसे हो सके ....आपके कुछ विचार हो तो साझा करें -हम उन विचारों को अगली पोस्ट में संश्लेषित कर प्रस्तुत कर सकेगें . आप भौतिक समृद्धि के अलावा जीवन में किन और चीजों को वरीयता देगें या दे रहे हैं ? आप खुद के जीवन को कितना सार्थक मानते हैं ? आपने कोई ऐसा काम अब तक किया है जिसकी कोई उत्तरजीविता हो? यानी जिसे लोग याद कर सकें? और नहीं तो कब करेगें समय तो पंख लगाये उड़ता ही जा रहा है ?क्या हमें खुद का जीवन जीना ही भारी लग रहा है? क्या हम सचमुच इतना असहाय हो गए हैं ? इस भूलभुलैया से निकलना मुश्किल सा हो गया है ?आपके लिए ये प्रश्न उत्तर देने में सहायक हो सकते हैं!

शनिवार, 4 मई 2013

भरत, भौंरा और चम्पे का फूल

भरत त्यागी हैं ,वैरागी भी हैं . राम को वापस लेने के लिए जब वे प्रयाग पहुंचते हैं तो भारद्वाज ऋषि उनका  आवाभगत करते हैं . हो सकता है भरत  के उसी सेवा सत्कार से हिन्दी का यह आवाभगत शब्द महिमामंडित हुआ हो -आवाभगत अर्थात भगत आये जिसमें उनकी सेवा सुश्रुषा का भाव अंतर्निहित है . वैसे इस शब्द के उद्भव पर किसी वैयाकरण की व्याख्या अपेक्षित है . भारद्वाज जी जान ही  रहे थे कि भरत राम के वियोग में अत्यंत व्यथित हैं ,उद्विग्न हैं तो उनका मन बहलाने को वे बहुविध प्रयास करते हैं। छप्पन भोग  के उपरान्त आंनंद और आराम के तमाम साजो सामान और यहाँ तक कि गणिकाएं वनिताएँ भी उन्हें मुहैया होती हैं . मगर भरत पूरी तरह उदासीन ही रहते हैं .
रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी।।
स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा।।

दो0-संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।।
तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।215।।(अयोध्याकाण्ड ) 

( बसंत  ऋतु  की त्रिविध समीर बह रही है .सभी प्रकार की सुख सुविधा - धर्म अर्थ काम मोक्ष के  चारो पदार्थ उपलब्ध है -माला चन्दन स्त्री आदि भोगों की उपलब्धता से लोग हर्षित विस्मित है , मगर भरत रूपी चकवे  के लिए इन  सभी चकई रूपी सामग्री से कोई लगाव नहीं है भले ही इन्हें मुनि ने एक पिंजरे में रात भर रखने का प्रयास किया और सुबह हो गयी .)
मगर आज की पोस्ट का मुख्य हेतु यह नहीं है . भारत वापस जब अयोध्या लौट आते हैं तब भी वीतराग ही रहते हैं . तुलसी प्रकृति के भी पारखी कवि हैं -उनका प्रकृति निरीक्षण अद्भुत हैं -वीतरागी भरत की तुलना वे भौरे से करते हैं और यही मेरी दुविधा का प्रश्न लम्बे समय से बना रहा -तुलसी कहते हैं -
तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा चंचरीक जिमि चम्पक बागा ..अर्थात विरागी भरत राम विहीन अयोध्या में वैसे ही रहते हैं जैसे चंपा जैसे सुगन्धित पुष्प के बाग़ में भौरा .....बस यही बात मेरे मन में खटक जाती थी .....भौरा क्या चंपा के फूल से आकर्षित नहीं होता ? हिमांशु जी ने भी ऐसी ही व्याख्या अपने चंपा के फूल की पोस्ट पर की है -"खिलने वाला यह फूल भौंरे को मनमानी नहीं करने देता । झट से झिझक जाती है भ्रमर वृत्ति - अनोखा है यह पुष्प । यह अकेला ऐसा पुष्प होना चाहिये जिसकी उत्कट गंध के कारण भौंरे इनके पास नहीं जाते । बाबा तुलसी को भी यह बात रिझा गयी थी, और यही कारण है कि अयोध्या में राम के बिना भरत का अयोध्या के प्रति राग वैसा ही था - जैसे भौरा चंपक के बाग में हो । सर्वत्र बिखरा हुआ ऐश्वर्य (सुगंध), पर किसी काम का नहीं" .अब पता नहीं हिमांशु जी ने यह विचित्र भ्रमर व्यवहार खुद देखा है या नहीं -मैंने भी नहीं देखा मगर जिज्ञासा हमेशा बनी रही कि क्या सचमुच भौरे को चंपा के पुष्पों से परहेज है . वर्षों से मानस की इस अर्धाली ने मुझे व्यग्र कर रखा था .

 मदार पुष्प पर भौरा

अब यहाँ राबर्ट्सगंज में यह गुत्थी अचानक ही सुलझती नज़र आयी .एक दिन मैंने सुबह सुबह ही देखा कि मदार के   (Calotropis) समूहों पर भौरे झुण्ड के झुंड मंडरा रहे हैं -तो इन्हें चंपा नहीं मदार के पुष्प पसंद हैं . मगर क्यों ? क्या मदार के पुष्पों में परागण -निषेचन इन्ही भौरों से ही संभव हो पाता है? और यह मदार और भ्रमर सम्बन्ध इसलिए ही प्रगाढ़ बन गया हो ? कोई वनस्पति विज्ञानी क्या इस भ्रमर व्यवहार पर प्रकाश डालेगा ? एक साहित्यकार ने तो अपना प्रेक्षण पूरा किया मगर वैज्ञानिक विश्लेषण तो विज्ञानियों के जिम्मे है . इसी पोस्ट में तुलसी के ऊपर उद्धृत दोहे में चकवा चकई का उद्धरण दिया गया है . और यह साहित्यिक मान्यता है कि यह पक्षी युग्म -नर मादा रात में बिछड़ जाते हैं और इसलिए एक दूसरे  को ढूँढने की बोली लगाते रहते हैं। तुलसी ने भारद्वाज मुनि द्वारा भरत  के सेवा सत्कार में इसी साहित्यिक सत्य का उद्घाटन किया है कि संपत्ति सुख साधन रूपी चकई और भरत रूपी चकवे को भारद्वाज ऋषि द्वारा एक पिंजरे में बंद कर देने के बावजूद  भी उनमें संयोग नहीं हो पाया और सुबह हो गयी ... चकवे चकई के इस अभिशप्त  रात्रिकालीन वियोग का क्या कोई वैज्ञानिक विवेचन भी है ? इस पर कभी फिर चर्चा होगी .

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

पात्रता की पहचान

यह हम सभी को पता है कि प्राचीन काल में ऋषि मुनि बिना शिक्षार्थी की पात्रता की अच्छी भली जांच परख किये उन्हें स्वीकार नहीं करते थे .कई पौराणिक कहानियां इस बात को बड़े ही रोचक तरीके से प्रस्तुत करती हैं . जैसे कर्ण और परशुराम की कहानी को ही ले लीजिये जो कुछ यूं है (साभार विकिपीडिया) -"कर्ण की रुचि अपने पिता अधिरथ के समान रथ चलाने कि बजाय युद्धकला में अधिक थी। कर्ण और उसके पिता अधिरथ आचार्य द्रोण से मिले जो उस समय युद्धकला के सर्वश्रेष्ठ आचार्यों में से एक थे। द्रोणाचार्य उस समय कुरु राजकुमारों को शिक्षा दिया करते थे। उन्होने कर्ण को शिक्षा देने से मना कर दिया क्योंकि कर्ण एक सारथी पुत्र था, और द्रोण केवल क्षत्रियों को ही शिक्षा दिया करते थे। द्रोणाचार्य की असहमति के उपरान्त कर्ण ने परशुराम से सम्पर्क किया जो कि केवल ब्राह्मणों को ही शिक्षा दिया करते थे। कर्ण ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम से शिक्षा का आग्रह किया। परशुराम ने कर्ण का आग्रह स्वीकार किया और कर्ण को अपने समान ही युद्धकला और धनुर्विद्या में निष्णात किया ............ कर्ण की शिक्षा अपने अन्तिम चरण पर थी। एक दोपहर की बात है, गुरु परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर विश्राम कर रहे थे। कुछ देर बाद कहीं से एक जंगली कीड़ा आया और उसकी दूसरी जंघा पर काट कर घाव बनाने लगा। गुरु का विश्राम भंग ना हो इसलिए कर्ण असहनीय पीड़ा को सहता रहा। कुछ देर में गुरुजी की निद्रा टूटी, और उन्होनें देखा की कर्ण की जांघ से बहुत खून बह रहा है। उन्होनें कहा कि केवल किसी क्षत्रिय में ही इतनी सहनशीलता हो सकती है कि वह बिच्छु डंक को सह ले, और परशुरामजी ने तपबल से सब जान लिया और  कर्ण के   मिथ्या भाषण के कारण उसे श्राप दिया कि जब भी कर्ण को उनकी दी हुई शिक्षा की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, उस दिन वह उसके काम नहीं आएगी। और यही हुआ युद्ध के समय ऐन वक्त कर्ण का पहिया जमीन में जा  धंसा और वह उसे निकालने में वह ऐसा बेसुध हुआ कि अर्जुन ने सहज ही उसे मार गिराया .

यह कथा यह बताती है कि शिक्षा दीक्षा के मामले में प्राचीन गुरु लोग पात्रता का बहुत ध्यान देते थे और अक्सर यह भी होता था शिष्य को अपना सम्पूर्ण ज्ञान न देकर कुछ अपने पास ही रखते थे ...इन कथाओं का मर्म यही है कि अगर पात्र व्यक्ति का चयन शिक्षा दीक्षा के लिए सही न हुआ तो ऐसा गलत चयनित व्यक्ति प्राप्त दीक्षा का दुरूपयोग कर सकता है  ,खुद अपने ही गुरु के लिए भस्मासुर बन सकता है और खुद अपना नाम बदनाम करने के साथ ही गुरु का नाम भी डुबो सकता था . ऐसा नहीं है कि ऐसी पुराकथाएँ केवल भारत भूमि की हैं . ये चतुर्दिक विश्व की बोध कथायें हैं , ली फाक के प्रसिद्ध कामिक्स श्रृखला मैन्ड्रेक में मैन्ड्रेक का एक जुड़वा दुष्ट भाई भी है जिसने  मैन्ड्रेक के साथ ही साथ गुरु थेरान से शिक्षा पायी ...मगर जहाँ मैन्ड्रेक गुरु से प्राप्त अपनी जादुई शक्तियों से एक समाजसेवी बना वहीं उसका जुड़वा भाई मानवता का दुश्मन बन बैठा और अपने गुरु के लिए भी कष्टकारी बन गया ..गुरु थेरान उसकी पात्रता की जांच में चूक गए ...
आज तो बड़ी विषम स्थति है -पात्रता का चयन बड़ा ही मुश्किल हो गया है .फलतः अकादमीय क्षेत्रों में चेला ही गुरु का कान काट ले रहा है . राजनीति में जिस सीढी से नौसिखिये नेता ऊपर जा पहुंचते हैं उसी को नीचे फेंक देते हैं . पहलवान अपने ही गुरु को धोखे से धूल चटा  दे  रहे हैं . अब परशुराम सी शक्ति तो आज बिचारे गुरुओं में रही नहीं कि अपने पथभ्रष्ट शिष्य को शापित कर सकें ..मगर आजके गुरुओं को पुराने गुरुओं की इस परम्परा को कदापि नहीं भूलना चाहिए कि दीक्षा देने के लिए पात्रता को वे अवश्य देखें -अन्यथा उनका शिष्य उनका ही कान काट खायेगा या नाम डुबो के छोड़ेगा .... अब यह भोगा यथार्थ मुझ जैसे गरीब गुरु से बेहतर कौन अनुभव कर सकता है :-(

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

बरषा बिगत सरद रितु आई!(मानस प्रसंग -10)

आज जब मैंने सुबह सुबह फेसबुक पर सोनभद्र के गरम मौसम के बारे में  एक अपडेट किया तो मित्रों ने अपने अपने सूबे के मौसम के हालात बयां करना शुरू किया,  दिनेश राय द्विवेदी जी की तुरत फुरत यह टिप्पणी आयी-" वर्षा विदाई ले रही है, सूर्य पूरे तेज के साथ अपनी किरणें बिखेर रहा है। फिर से गर्मी महसूस होने लगी है। संतोष की बात ये है कि अब सूरज की ड्यूटी 12 घंटों से कम की रह गई है। कुछ दिनों बाद आतप बिखेरने वाला यही सूरज सुबह सुबह प्राण फूंकने वाला लगने लगेगा।"यह टिप्पणी पढ़ कर मुझे मानस के शरद ऋतु वर्णन की याद आ गयी. मेरा शरद पूर्व मानस पारायण तो पूरा हो चुका है और समय समय पर मैं यहाँ भी मानस प्रवचन यथा बुद्धि करता रहा हूँ मगर बनारस से स्थानान्तरण के बाद जीवन चर्या काफी बदल गयी है . अंतर्जाल समय में भारी कटौती हुयी है . मैंने ढूँढा तो यहाँ मानस वर्णित शरद ऋतु का मूल  पाठ भावार्थ सहित मिल गया,कुछ चुनिन्दा चौपाईयां यहाँ भावार्थ सहित साभार उधृत कर रहा हूँ -

बरषा बिगत सरद रितु आई। लछमन देखहु परम सुहाई
फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई
हे लक्ष्मण! देखो, वर्षा बीत गई और परम सुंदर शरद् ऋतु आ गई। फूले हुए कास से सारी पृथ्वी छा गई। मानो वर्षा ऋतु ने (कास रूपी सफेद बालों के रूप में) अपना बुढ़ापा प्रकट किया है. ( मैं सोनभद्र के पिपरी क्षेत्र में कुछ दिनों पहले गया था वहां इन दिनों कास खूब फूले हुए हैं और एक बहुत बड़ा इलाका ऐसा लगता है जैसे जमीन पर सफ़ेद बादलो के झुण्ड आ बसे हों .कास पर गिरिजेश राव का यह लेख  पठनीय है. 
शरद ऋतु पर   जी के अवधिया जी की यह पोस्ट भी पठनीय है !

                                                               शरद ऋतु में कास, (Saccharum spontaneum)

उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहिं सोषइ संतोषा
सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा
अगस्त्य के तारे ने उदय होकर मार्ग के जल को सोख लिया, जैसे संतोष लोभ को सोख लेता है। नदियों और तालाबों का निर्मल जल ऐसी शोभा पा रहा है जैसे मद और मोह से रहित संतों का हृदय!
रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी
जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए
नदी और तालाबों का जल धीरे-धीरे सूख रहा है। जैसे ज्ञानी (विवेकी) पुरुष ममता का त्याग करते हैं। शरद ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गए। जैसे समय पाकर सुंदर सुकृत आ सकते हैं। (पुण्य प्रकट हो जाते हैं).
पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी॥
जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना
न कीचड़ है न धूल? इससे धरती (निर्मल होकर) ऐसी शोभा दे रही है जैसे नीतिनिपुण राजा की करनी! जल के कम हो जाने से मछलियाँ व्याकुल हो रही हैं, जैसे मूर्ख (विवेक शून्य) कुटुम्बी (गृहस्थ) धन के बिना व्याकुल होता है
बिनु घन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा॥
कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक भाव भगति जिमि मोरी
बिना बादलों का निर्मल आकाश ऐसा शोभित हो रहा है जैसे भगवद्भक्त सब आशाओं को छोड़कर सुशोभित होते हैं। कहीं-कहीं (विरले ही स्थानों में) शरद् ऋतु की थोड़ी-थोड़ी वर्षा हो रही है। जैसे कोई विरले ही मेरी भक्ति पाते हैं.
सुखी मीन जहं नीर अगाधा।जिमि हरि सरन न एकऊ बाधा 
फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा
जो मछलियाँ अथाह जल में हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्री हरि के शरण में चले जाने पर एक भी बाधा नहीं रहती। कमलों के फूलने से तालाब कैसी शोभा दे रहा है, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होने पर शोभित होता है. 
गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा
चक्रबाक मन दुख निसि पेखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी
भौंरे अनुपम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं तथा पक्षियों के नाना प्रकार के सुंदर शब्द हो रहे हैं। रात्रि देखकर चकवे के मन में वैसे ही दुःख हो रहा है, जैसे दूसरे की संपत्ति देखकर दुष्ट को होता है.
चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकर द्रोही
सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई
पपीहा रट लगाए है, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्री शंकरजी का द्रोही सुख नहीं पाता (सुख के लिए झीखता रहता है) शरद् ऋतु के ताप को रात के समय चंद्रमा हर लेता है, जैसे संतों के दर्शन से पाप दूर हो जाते हैं.
जय श्रीराम! 


मंगलवार, 17 जुलाई 2012

नारी सब दुखों की खान है -बोले सियावर रामजी! (मानस प्रसंग, 6)


सबसे पहले यह निवेदन और दावात्याग: प्रस्तुत लेख एक खुला हुआ नारी विमर्श है और मेरा अपना कोई पूर्वाग्रह पोस्ट-कंटेंट के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। विषय पर मेरी अपनी समझ और व्याख्याएं हैं। मगर यहां मैं उनसे निरपेक्ष रहकर मानस के नारी विमर्श को जस का तस प्रस्तुत कर रहा हूं।मेरे मित्रगण खासकर महिला ब्लॉगर और मित्र इसी परिप्रेक्ष्य में इस पोस्ट को देखेगें/देखेगीं! हां विवेचन में अपने मनोभाव भी व्यक्त कर सकूंगा अगर कोई स्वस्थ बातचीत-विवेचन होता है तभी! पोस्ट लम्बी हो गयी है अतः दो भागों में आएगी...आज अरण्यकाण्ड पूरा हुआ। एक ख़ास प्रसंग है यहां . सीता की खोज में राम वन-वन भटकते हुए आगे बढ़ रहे हैं। एक सुरम्य सी जगह रुकते हैं। विराम करते हैं। मुनिजन, देवता गण आते हैं। स्तुति गान करते हैं। नारद भी आते हैं। सुअवसर जानकर एक सवाल पूछते हैं –

तब बिबाह मैं चाहऊँ कीन्हा केहिं कारण प्रभु करहि न दीन्हा...

प्रभु! मैं जब विवाह करना चाहता था तब आपने मुझे क्यों नहीं करने दिया? नारद को एक कसक थी...सो पूछ ही लिया...मोह में उनकी बड़ी फजीहत हुई थी। उन्हें अपने कामजेता होने का घमंड हो गया था और विश्वमोहिनी के स्वयंवर का सारा माया जाल उनके इसी दर्प को तोड़ने के लिए रचित हुआ था। कथा आपको पता ही है। भगवान राम ही अब उन्हें इत्मीनान से बताते हैं कि उन्हें उस समय विवाह करने से हठात खुद उन्होंने ही रोकने का यत्न क्यों किया था। यह प्रसंग मानस में नारी विमर्श का एक अनूठा प्रसंग है। श्री राम कहते हैं –


काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।
सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।।
जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी।।
काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका।।
दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई।।
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा।।
पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई।।
पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी।।
बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना।।
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।। 


उन लोगों को जिन्हें अवधी पढ़ने समझने में असुविधा है, अर्थ भी बताते चलते हैं - संसार में काम क्रोध लोभ और मद मनुष्य के मोह के बड़े कारण हैं। मगर उनमें भी स्वयं माया रूपा नारी तो अत्यंत दारुण और दुखद है। हे मुनि, पुराण और श्रुतियों तक में यही कहा गया है कि मोह रूपी वन के लिए नारी बसंत ऋतु के समान है। अर्थात् सभी मोहों को बढ़ाने वाली है। और जप तप नियम रूपी जलाशय के लिए तो वह ग्रीष्म ऋतु बन कर इन गुणों को सोख लेती है। मगर काम क्रोध मद और डाह रूपी मेढकों के लिए नारी वर्षा ऋतु बनकर हर्षित कर देती है। और बुरी वासनाओं के कुमुदों के लिए तो यह सदैव सुख देने वाली शरद ऋतु बन जाती है। और सभी तरह के धर्मं कर्म रूपी कमलों के समूह के लिए नारी हिम (ऋतु) बन कर उन्हें क्षय कर देती है। ममता मोह रूपी जवास (के वन) को तो नारी शिशिर ऋतु बनकर हराभरा करती है। पाप रूपी उल्लू समूहों के लिए नारी घनी अंधेरी सुखभरी रात है जो उनके बढ़ने में सहायक है। और तो और बुद्धि बल शील और सत्य रूपी मछलियों के लिए यह बंसी (मछली पकड़ने का कांटा) बन जाती है।

हे मुनिवर युवती स्त्री सभी अवगुणों की मूल,पीड़ा देने वाली और दुखों की खान है और इसीलिए मैंने आपको विवाह करने से रोका थाअब जैसे मुनि और ज्ञानी जनों के लिए नारी सानिध्य ही पूर्णतया प्रतिबंधित हो!

मानस का यह प्रसंग निर्विवाद रूप से संतकवि के निजी भोगे हुए अनुभव और नारी विषयक तत्कालीन अद्यावधि ज्ञान का निचोड़ था जो किसी और के मुंह से नहीं स्वयं श्रीराम के मुंह से संत कवि द्वारा कहलाया गया। हमारे धर्मग्रंथों, आर्षग्रंथों में नारी को ज्ञान और तपस्या का एक विरोधी कारक बताया जाता रहा है जबकि यह भी सत्य है कि अनेक संदर्भ ग्रन्थ वैदिक -उपनिषदीय काल की नारियों को परम विदुषी और वेदों के ज्ञाता भी घोषित करते हैं।

मेरा असमंजस यही है - क्या कालान्तर में कतिपय कारणों, जिनकी पहचान की जा सकती है, के चलते नारी की यथोक्त स्थिति विद्वत मानस में बनती गयी। क्या सनातनी ब्राह्मणों ने बुद्ध विहारों में नारी स्वच्छंदता से उपजे व्यभिचार और ज्ञान मार्गियों के अधोपतन से कोई सबक लिया था? मानस में नारी विमर्श के इस स्वरुप को देखकर मैं हतप्रभ हूं। लिहाजा मैंने पूर्व कांडों का भी एक सिंहावलोकन किया। दरअसल बालकाण्ड से ही नारी का ऐसा रूप स्थापित होता दीखता है।

शेष अगले भाग में...


मंगलवार, 3 जुलाई 2012

गुरु वंदना ऐसी भी!(मानस प्रसंग-5)


आज गुरु पूर्णिमा है। गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक सुअवसर। मानस अवगाहन के वक्त मुझे संत कवि तुलसी द्वारा की गयी गुरु वंदना बहुत प्रभावित करती है। आइये आज आप भी मेरे साथ इस अनुपम भाव बोध से जुड़िये।

बंदऊं गुरु पद पदुम परागा सुरुचि सुवास सरस अनुरागा
अमिय मूरिमय चूरन चारू शमन सकल भव रुज परिवारू

तुलसी मानस की चौपाइयों की शुरुआत ही गुरु की वंदना से करते हैं। गुरु के प्रति उनके असीम समर्पण भाव को इन पंक्तियों में देखा जा सकता है - वे गुरु के कमलवत चरणों में नत हैं और उनसे निकलने वाले पराग की सुगंध सहज ही मन में अनुराग उत्पन्न करती है - मतलब यहां चरण धूलि की तुलना सुवासित पराग से की गयी है और इसी पग धूलि को ही तमाम रोगों के निवारण के लिए अमृत-चूर्ण कहा गया है। गुरु के प्रति तुलसी का यह समर्पण सम्मान भाव इस महाकवि के प्रति श्रद्धा से भर देता है!

वह आगे कहते हैं –


सुकृति शम्भु तन विमल विभूति मंजुल मंगल मोद प्रसूति
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी किये तिलक गुण गन बस करनी

अर्थात् वही गुरु पद रज शिव जी के शरीर पर लिपटी विभूति के समान है जो सुन्दर, कल्याणकारी और आनन्द देने वाली है और अपने भक्त के मन रूपी दर्पण पर आयी मलिनता को दूर करती है तथा इससे तिलक कर लेने पर वह गुणों के समूह को वश में करने वाली है। तुलसी गुरु चरण वंदना में भाव विभोर होकर कहते हैं कि उनके चरण नख मणियों के वे प्रकाश पुंज हैं जिनका स्मरण मात्र ही ह्रदय में ज्ञान का प्रकाश ला देता है। मन के मोह जनित अंधकार को दूर करने वाल है। मगर यह ज्ञान की ज्योति गुरु की कृपा से ही भाग्यशालियों को प्राप्य है।

श्रीगुर पद नख मनिगन ज्योती सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती
दलन मोह तम सो सप्रकासू बड़े भाग उर आवई जासू

वह आगे कहते हैं -

उघरहिं विमल बिलोचन ही के मिटहिं दोष दुःख भव रजनी के

अर्थात मणि सरीखे गुरु पद नखों की ज्योति के हृदय को आलोकित करते ही ज्ञान के चक्षु खुल जाते हैं और मोहमाया और संसारिकता रूपी रात्रि के कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। गुरु के प्रति अपने इसी श्रद्धा-समर्पण और उनकी अक्षुण कृपा के आह्वान के साथ ही तुलसी राम चरित मानस का प्रारम्भ करते हैं -

गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन नयन अमिय दृग दोष विभंजन
तेहिं कर बिमल बिबेक बिलोचन बरनऊँ राम चरित भव मोचन

अर्थात गुरु के पद रज के अंजन से नेत्रों के सभी विकारों को दूर करते हुए अपने निर्मल हुए विवेक रूपी नेत्रों से राम चरित का अवलोकन करके संसार रूपी बंधन से मुक्ति देने वाली रामकथा का वर्णन करता हूं।

आज गुरु पूर्णिमा के अवसर पर संत कवि की गुरु के प्रति असीम समर्पण के प्रसंग का उल्लेख मुझे समीचीन लगा सो आपसे साझा किया...आप सभी को गुरु पूर्णिमा की बहुत शुभकामनाएं!

रविवार, 1 जुलाई 2012

जौं न होत जग जनम भरत को....(मानस प्रसंग 4)


रामचरित मानस एक आदर्श परिवार, समाज और व्यवस्था की रूप रेखा सामने रखता है -जिसे 'रामराज्य' का संबोधन दिया जाता है। यद्यपि यह रामराज्य कई विवेचकों के लिए यूटोपिया का पर्याय बना है। मध्ययुगीन संत कवि तुलसी का प्रादुर्भाव तब होता है जब घोर तार्किकता और निःसंगता की तूती बोल रही थी और कबीर का उद्धत घोष - कबीरा खड़ा बाज़ार में लिए लुआठीहाथ जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ लोगों को घर बार से बाहर निकालने का आह्वान दे रहा था - तुलसी ऐसे में टूटते परिवार और खंडित आस्था के मंडन को अवतरित होते हैं। आज मानस में एक भाई के रूप में भरत के चरित्र चित्रण के कुछ अंश आपके सामने रखना चाहता हूं। 

राम के वन गमन और पिता के मृत्यु से भरत बिखर से गए हैं - राज्याभिषेक को दुत्कार देते हैं और चल पड़ते हैं राम को मनाने। वह आगे, सारी प्रजा पीछे पीछे...लोग बाग अनुरोध करते हैं -पैदल नहीं रथ पर चलिए आप। तो वे जवाब देते हैं - 

सिर भर जाऊं उचित अस मोरा

सबतें सेवक धरमु कठोरा
वह कहते हैं कि इसी मार्ग से राम पैदल गए हैं तो मेरे लिए तो उचित यह है कि मैं सिर के बल जाऊं क्योंकि सेवक का धर्म बड़ा कठोर होता है। यहां भरत खुद को राम का भाई नहीं सेवक मानते हैं। यह है विनयशीलता, विनम्रता का उदाहरण और सेवक के आचरण की एक सीख। पावों में छाले/झलके पड़ जाते हैं मगर वह आगे बढ़ते जाते हैं। प्रयाग के संगम (त्रिवेणी ) तक आ पहुंचते हैं। थकी प्रजा, परिवार, माताओं के विश्राम के लिए पड़ाव डलवा देते हैं। यहां सभी श्रम-थकान को दूर करने और पुण्यलाभ के लिए त्रिवेणी स्नान करते हैं। भरत का विक्षोभित मन युमना और गंगा की लहरों को देख कुछ शांत होता है। और फिर प्रयाग के पुण्य प्रताप-सकल कामप्रद तीरथराऊ, बेदबिदित जग प्रगट प्रभाऊ से मन में सहसा एक विचार आता है कि अपनी मनोकामना प्रयाग के इस प्रसिद्ध त्रिवेणी तीर्थ पर क्यों न प्रगट कर दूं। वह विनयावनत हो उठते हैं। तीर्थराज त्रिवेणी के सामने कह पड़ते हैं - 
मांगऊं भीख त्यागि निज धरमू 
आरत काह न करई कुकर्मू 
हे तीर्थराज मैं अपना क्षत्रिय धर्म त्याग कर आपसे भीख मांगता हूं - आखिर दुखी-आर्त व्यक्ति कौन सा कुकर्म नहीं करता (यहां बुभिक्षितम किम न करोति पापं का कितना प्रांजल भाव आया है ) ...और मांग है -
अर्थ न धरम न काम रूचि गति न चहऊं निरबान 
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन
मुझे किसी भी पुरुषार्थ –धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की बिल्कुल भी चाह नहीं है। बस जन्म-जन्म में मेरा राम जी के चरणों में प्रेम हो यही वरदान, दूसरा कुछ नहीं, मांगता हूं।
भारद्वाज ऋषि से भी यहीं मुलाकात होती है। उन्हें पहले से ही सब कुछ पता रहता है। वह देखते हैं भरत ही नहीं उनकी पूरी प्रजा बहुत क्लांत, दुखी है। अपने तपोबल से वे सब वैभव सृजित कर देते हैं –
रितु बसंत बह त्रिविध बयारी सब कहं सुलभ पदारथ चारी
स्रक चन्दन बनितादिक भोगा देखि हरष बिसमय सब लोगा 
मानो बसंत ऋतु ही आ गयी हो। शीतल मंद सुगंध वाली हवा बहने लगी। यही नहीं भोग के सब पदार्थ सुलभ हो गए...उर्वशियां, माला (वेणी की माला ) चन्दन आदि भोगों को देख लोग विस्मित भी हैं तो उदास भी - वे उदास राम के वियोग के कारण हैं। प्रजा की छोड़िये मगर अपना चरित्र नायक इन सबसे तटस्थ ही रहता है –
सम्पति चकई भरतु चक मुनि आयसु खेलवार 
तेहि निसि आश्रम पिजरां राखे भा भिनुसार 
काव्य-मान्यता है कि चकवा चकई रात में विरक्त हो रहते हैं। यहां तक कि बहेलिये द्वारा एक ही पिजरे में बंद करने के बाद भी दोनों में संयोग नहीं होता। उसी तरह भारद्वाज मुनि के सारे सुख सुविधा के ताम-झाम के बाद भी भरत का मन उन सब भोगों से विरत ही रहा और सुबह हो गई। राम के बजाय उनका मन कहां रमने वाला था?
संतकवि सच ही कहते हैं - 
जौं न होत जग जनम भरत को
सकल धरम धुर धरनि धरत को ...
अगर भरत का जन्म न होता तो आखिर धरती पर धर्म के चक्र का धारण कौन करता ?
भरत का चरित्र हर परिवार समाज के लिए एक उदाहरण है। जय श्रीराम!

रविवार, 24 जून 2012

कथा जारी है ....(मानस प्रसंग -3)


कथा जारी है ....राजा दशरथ का देहान्त हो चुका है, भरत आ चुके हैं। सारी दुर्दशा और दुर्व्यवस्था की जड़ अपनी मां को फटकार चुके हैं। बिना राम के वह राजगद्दी लेकर क्या करेंगे? कौशल्या के सामने बहुत ही कातर होकर वह कहते हैं, 'मां, ये जो कुछ हुआ उसमें मेरी तनिक भी सम्मति नहीं है'। मुनि वशिष्ठ भरत को बहुत समझाते हैं कि पिता की आज्ञा, राजकाज तथा प्रजा की देखभाल के लिए आपको राजगद्दी संभाल लेनी चाहिए। मगर सोचवश भरत को यह बात अनुचित लगती है। उन्हें तो दुहरा आघात लगा है। राम का विछोह और पिता की मृत्यु...बड़े आहत हैं वह। अब वशिष्ठ उन्हें समझाते हैं जो बड़ा ही विचारोत्तेजक प्रसंग हैं। इस प्रसंग में अध्यात्म का जहां गूढ़ भाव है वही लोकाचार, जीवन दर्शन के अनमोल सूत्र भी हैं। कुछ आपके साथ साझा करना चाहता हूं। यद्यपि रामकथा पर कुछ भी टीका टिप्पणी मेरे बूते की बात नहीं है और न ही इस विषय की मेरी लेशमात्र की विशेषज्ञता ही है। मगर पूरे प्रसंग को पढ़ने पर जो भाव मन में उमड़ते हैं उन्हीं को आपसे बांटना चाहता हूं।

वशिष्ठ भरत को सोच निमग्न देखते हैं। खुद भी प्रत्यक्षतः और दुखी हो जाते हैं। मगर ज्ञानी हैं। एक ज्ञानी की तटस्थता भी उनमें है। एक बड़े पते की सीख देते हैं -

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।

हे भरत, भावी (भवितव्यता) प्रबल है। मनुष्य तो मात्र एक निमित्त भर है। उसके हाथ में कुछ नहीं है। परिस्थितियों पर उसका वश नहीं है - हानि-लाभ, जीवन-मृत्यु, यश-अपयश, यह विधाता के हाथ में ही है। जब इन पर तुम्हारा कोई वश नहीं ही नहीं तो फिर सोच क्यों? लगता है संतकवि की यह सूझ  गीता के 11वें अध्याय के इस सूत्रवाक्य से प्रेरित है - कृष्ण कहते हैं, अर्जुन तुम भले ही धनुर्विद्या में निष्णात हो मगर हो तो तुम निमित्त मात्र ही ...तुम्हारे वश में कुछ भी नहीं है, कर्ताधर्ता तो कोई और है...हां धनुष उठा लेने पर तुम्हें कार्य का श्रेय अवश्य मिल जाएगा।

यह जीवन दर्शन का वह सूत्र है जो आज के तमाम उद्विग्न व्यथित लोगों को राह सुझा सकता है। हम नाहक ही चिंतामग्न हो जाते हैं, दुश्चिंताओं से घिर जाते हैं। जब हमारे हाथ में कुछ है ही नहीं तो फिर किस बात की चिंता? करने वाला तो कोई और है, एक अदृश्य शक्ति। प्रत्येक परिस्थिति में मनुष्य को तटस्थ भाव, विरक्ति भाव से ही रहना चाहिए। यह हमारे आर्ष ग्रथों का एक प्रमुख विचार है। बहरहाल विषयांतर न हो जाए, इसलिए फिर लौटते हैं भरत की दशा पर...उन्हें वशिष्ठ फिर समझाते हैं।

वशिष्ठ कहते हैं - भरत, राजा दशरथ तो वैसे भी सोच करने के योग्य नहीं हैं - सोच जोगु दशरथ नृप नाहीं...तो फिर सोच के योग्य कौन है? वह तमाम उदाहरण देते हैं कि किसकी स्थिति सोचनीय है। पूरा प्रसंग संतकवि की विचारशीलता का अद्भुत उदाहरण है -

सोचिय विप्र जो वेद विहीना तज निज धरम विषय लयलीना
सोचिय नृपति जो नीति न जाना जेहिं न प्रजा प्रिय प्रान समाना
सोचिय बयसु कृपन धनवानू जो न अतिथि सिव भगति सुजानू
सोचिय सूद्र विप्र अवमानी मुखर मानप्रिय ज्ञान गुमानी

वह ब्राह्मण सोचनीय है जो ज्ञानी नहीँ है। मात्र ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने से ही ब्राह्मण की पात्रता नहीँ हो जाती। संतकवि बालकाण्ड के शुरू में ही स्पष्ट कर चुके हैं कि 'बंदऊ प्रथम महीसुर चरना मोहजनित संशय सब हरना" कौन सा ब्राह्मण वन्दनीय है? जो मोह से उत्पन्न होने वाले सभी संशयों को दूर करने की क्षमता रखता हो। वह ब्राह्मण जो ज्ञानी नहीँ है और अपने इस ज्ञान धर्म को छोड़कर विषयों में आसक्त हो रहता है, वह सोचनीय है। वह राजा सोचनीय है जो नीति नहीँ जानता और जिसे प्रजा प्राणों सी प्यारी नहीँ है। और वह धनवान सोचनीय है जो कंजूस है जो अतिथि सत्कार और शिव भक्ति में रमा नहीँ है। वह संस्कारहीन मूढ़ व्यक्ति सोचनीय है जो ज्ञानियों का अपमान करता है और वाचाल है। मान-बड़ाई चाहता है और अपने ज्ञान का घमंड रखता है। यहां भी शूद्र के अर्थबोध के बारे में "जन्मना जायते शूद्रः संस्कारेत द्विज उच्यते" को ध्यान में रखना होगा।

आगे भी वशिष्ठ बताते हैं कि कैसे वह गृहस्थ सोच के योग्य है जो मोह में पड़कर कर्ममार्ग का त्याग कर देता है और किस तरह वह संन्यासी सोचनीय है जो दुनिया के प्रपंच में पड़कर ज्ञान-वैराग्य से हीन हो गया है। सोच तो उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना कारण क्रोध करने वाला है, माता-पिता गुरु और भाई बंधुओं के साथ विरोध रखने वाला है। और वह सोचनीय है जो अपने ही उदर पोषण करने में लगा रहता है, निर्दयी है, दूसरों का अनिष्ट करता है। वशिष्ठ भरत को सांत्वना देते हुए कहते हैं कि हे भरत, राजा दशरथ तो किसी भांति सोचनीय नहीँ हैं अर्थात् वह उक्त श्रेणी के लोगों में नहीँ आते।

सोचनीय नहिं कोशल राऊ भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ...ऐसा राजा न अब तक हुआ और न कभी होगा ही...उनके गुणों को तो चौदह लोकों में सभी जानते हैं।

मानस का यह प्रसंग जहां अध्यात्म के गूढ़ दर्शन को आम आदमी के सामने प्रत्यक्ष करता है वहीं लोक जीवन के कतिपय श्रेष्ठ आचरण को भी एक रूपक के जरिये प्रस्तुत करता है।

अब आगे किसी और प्रसंग के साथ भेट होगी...जय श्रीराम!

शुक्रवार, 22 जून 2012

अब राम को कौन बताए कि वे कहां रहें? (मानस प्रसंग -2)


मानस पारायण चल रहा है...राम वन गमन का प्रसंग पूरा होने का नाम ही नहीं ले रहा। दुःख का समय कहां जल्दी बीतता है! सुख तो मानो पंख लगाकर उड़ चलता है और दुःख अंगद का पांव बन टाले नहीं टलता। यह पूरी गर्मी मानस के वन गमन को समर्पित हो गयी है। राम महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में आ पहुंचे हैं। लम्बा वनवास काटना है तो एक निरापद जगह की तलाश में हैं। वन गमन के पिता के आदेश की पूरी कथा बताकर वे वाल्मीकि से सहसा ही पूछ बैठते हैं - मुनिवर वह जगह बताइये जहां मैं सीता और लक्ष्मण के साथ कुछ समय व्यतीत कर सकूं। वाल्मीकि सुन कर मुस्करा पड़ते हैं। सकल ब्रह्माण्ड का स्वामी, सर्वव्यापी का यह मासूम प्रश्न वाल्मीकि को मानो निःशब्द कर देता है - अब वे क्या उत्तर दें?  कौन सी जगह उन्हें बता दी जाये जहां वे न रहते हों - बहुत दुविधाजनक जनक सवाल है। राम तो कण कण में व्याप्त हैं - कोई जगह उनसे अछूती रह गयी हो तो न बताई जाये। वाल्मीकि साधु साधु कह पड़ते हैं - सहज सरल सुनि रघुबर बानी साधु साधु बोले मुनि ग्यानी...

आखिर वाल्मीकि कह ही पड़ते हैं कि हे राम मुझे यह कहने में भी संकोच हो रहा है मगर जहां आप न हों वह स्थान तो बता दीजिये ताकि मैं चलकर वही स्थान आपको दिखा दूं? यह पूरा प्रसंग, यह संवाद ही बहुत रोचक बन गया है। राम वन गमन की भीषण ग्रीष्म सरीखी यात्रा में मानो यह एक छायादार पड़ाव हो... राम का आग्रह था तो वाल्मीकि को जवाब देना ही था। उनका जवाब इतना विवेकपूर्ण और प्रत्युत्पन्न मति का सुन्दर उदाहरण है कि सोचा आपसे साझा कर लूं। राम वाल्मीकि संवाद के कुछ अंश यूं हैं -

एक पल को तो राम ऋषिवर की यह बात सुन सकुचा गए - कहीं मेरी लीला का भेद न सभी आश्रमवासियों पर खुल जाये। मगर फिर ऋषिवर ने बात संभाल ली। वह विस्तार से बताने लगे कि राम कहां रहो...वे कई ठांव बताते हैं। राम तुम उन श्रवण रंध्रों में जाकर रहो जिन्हें रामकथा बहुत प्रिय है। आप भक्तों के ह्रदय में बस सकते हैं। आप गुरु देवता और ब्राह्मणों का सम्मान करने वालों के मन में जाकर रहिये...और भी जगह हैं जहां आप रह सकते हैं -

काम कोह मद मान न मोहा लोभ न छोभ न राग न द्रोहा
जिनके कपट दंभ नहीं माया तिन्ह के ह्रदय बसहु रघुराया

अर्थात जो काम क्रोध मद अभिमान मोह लोभ क्षोभ राग-द्वेष कपट दंभ और माया से रहित हैं, क्यों न आप उनके ह्रदय में निवास करें? जो दिन रात आपके सदैव शरणागत हैं आप उन के मन में जाकर रहिये...

जे हरषहिं पर सम्पति देखी दुखित होहिं पर बिपति विशेषी
जिनहिं राम तुम प्रानपियारे तिनके मन शुभ सदन तुम्हारे

हे राम आप जिन्हें प्राणों से प्रिय हैं और जो दूसरो की संपत्ति देखकर हर्षित होते हों और दूसरे के दुःख को देखकर दुखी, आपके लिए उनके मन शुभ निवास स्थान हैं।

जाति पांति धनु धरम बड़ाई प्रिय परिवार सदन सुखदाई
सब तजि रहहुँ तुम्हहि उर लाई तेहिं के ह्रदय रहहु रघुराई

जो जाति पांति धन धरम बड़ाई और प्यारे परिवार और सुख देने वाले घर को त्याग  आपमें ही मन लगाए बैठा हो, आप क्यों न उनके ह्रदय में रहें...

अब लीला पुरुष असमंजस में हैं। उन्हें तो अपने लीला के लिए एक जगह चाहिए। मुनि हैं कि उन्हें सर्वव्यापी बनाए रखने पर ही अड़े हुए हैं। आखिर ऋषिवर राम की दुविधा का एक हल निकाल ही लेते हैं -

चित्रकूट गिरि करहुं निवासू तहं तुम्हार सब भांति सुपासू

हर तरह की सुविधा लिए चित्रकूट पर्वत आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। आप वहां जाकर अपनी लीला का विस्तार कीजिये प्रभु! और श्रीराम के पग चित्रकूट की ओर बढ़ चलते हैं...जय श्रीराम!

गुरुवार, 7 जून 2012

ग्रीषम दुसह राम वन गमनू ....(मानस प्रसंग-१)


प्रत्येक  वर्ष मेरा एक बार मानस पारायण हो ही जाता है। अमूमन यह जाड़े में होता है और आराम से पढ़ते हुए मुझे तकरीबन 4 महीने बीतते हैं- कारण थोड़ा-थोड़ा और सस्वर पढता हूं। सस्वर इसलिए कि बिना श्रोता भले ही घर का वह कोई अकेला सदस्य ही क्यों न हो मुझे मानस पाठ नहीं सुहाता। पिता जी बचपन से ही कहते थे और बहुत सच कहते थे कि रामचरित मानस की चौपाईयां कई रागों में गाई जा सकती हैं और मैंने इसे अपने कालांतर जीवन में देखा, सुना और परखा। मैं भी उपहास की परवाह किये बिना चौपाईयों को गाने के प्रयोग करता रहता हूं और आनन्दित होता हूं। इस मामले में दूसरों की रुचि-अरुचि की मुझे परवाह नहीं रहती। ...और कहते हैं न घी का लडडू टेढ़-मेढ़ भी चलता है तो मानस की चौपाईयां भी ऐसी ही हैं। चाहे उन्हें आल्हा सरीखा गाईये या सोहर लचारी के तर्ज पर, आनंद घनानंद में कोई कमी नहीं। मगर इस बार व्यतिक्रम कुछ ऐसा हुआ कि जाड़े के बजाय इस बार मानस पाठ का सिलसिला रामनवमीं से शुरू हुआ और अब जाकर राम वन गमन तक आ पाए हैं।


कितनी ही बार मानस पढ़ा-सुना है और जीवन के इस पड़ाव पर कितनी ही मोहभंगता, तटस्थता, निःसंगता क्यों न हुई हो, किन्तु राम वन गमन का हेतु और प्रसंग हर बार रुला जाता है। सस्वर पढ़ते हुए गला रुध जाता है, आंखें भर आती हैं और श्रोताओं को भुलावा देने के तमाम कोशिशों के बाद भी उन्हें मेरी मनःस्थिति का भान हो ही जाता है। मगर उनकी भी तो स्थिति कमोबेश वही रहती है- कौन किस पर हंसे? :) 



इस बार राम वन गमन का प्रसंग भीषण गर्मी में आ पड़ा है और दुसह दुःख की अब दुहरी मार आ पड़ी है। और दुर्संयोग ही कहिये मानस का राम गमन प्रकरण भी मृगशिरा नक्षत्र के भीषण आतप के समय ही आया है। शायद इसलिए मानस पाठ/आत्मानुशीलन मेरे पुरनियों द्वारा जाड़े में ही किया जाता था, ताकि संभवतः राम वन गमन का पाठ गर्मी में न पड़ जाये और दोनों के दुखद संयोग की दुहरी पीड़ा पाठक/श्रोता को न झेलनी पड़े। क्या इसलिए ही तमाम अनुष्ठानों और धार्मिक कार्य-आयोजनों के कतिपय विधि-विधान बनाए गए हैं। रामायण और राम चरित मानस के भी नवाह्न पारायण/मास पारायण की व्यवस्था इसलिए ही तो नहीं है? जिससे संकल्प/कार्य निर्विघ्न पूरे हो जायें। अब बिना इस ध्यान के इस बार हम भीषण गर्मी में उतना ही वेदनापूर्ण राम वन गमन का प्रसंग झेल रहे हैं।



पता नहीं अब के वास्तुविद या भवन शिल्पी घरों/भवनों में कोप कक्ष का प्रावधान करते हैं या नहीं (मैंने तो कहीं देखा नहीं) राजा दशरथ की अयोध्या में तो एक पूरा कोप भवन ही था और कैकेयी के पहले और बाद में भी शायद ही उसका कोई उपयोग/दुरूपयोग हुआ हो। कोपभवन की अवधारणा बहुत विलासिता भरी लगती हैं और यह मानिनी नायिका के श्रृंगार पक्ष से ही जुड़ा एक तामझाम लगता है। अब यह भी कोई कम नखरा है कि रूठने की बात सीधे तौर पर न कहकर कोपभवन में चले जाना और खुद के मान मनौवल की भूमिका तैयार कर देना। यह श्रृंगारिकता का ही एक पहलू लगता है। मगर सीधे-साधे सज्जन सहृदय राजा दशरथ यहीं तो गच्चा खा गए बिचारे और उनके इस गफलत से उनकी जान पर बन आयी। मुझे अक्सर लगता है राजा दशरथ एक सीधे-सादे पुरुष का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनमें हम और आप भी अपना अक्स देख सकते हैं। मगर कैकेयी उतनी ही दुष्ट, धूर्त/चालाक नारी का प्रतिनिधित्व करती है। राजा दशरथ की मासूमियत तो देखिये कि जब वे बहुत अनुनय के साथ कैकेयी से उसकी नाराजगी का सबब पूछते हैं और उसे हाथ से स्नेहिल स्पर्श करते हैं तो वह उनके हाथ को झटक देती है मगर उसकी यह झटकन राजा को काम-कौतुक लगता है- तुलसी कहते हैं:



जद्यपि नीति निपुण नरनाहू नारि चरित जलनिधि अवगाहू (यद्यपि राजा नीति में निपुण हैं मगर कैकेयी सरीखी नारी का चरित्र अथाह समुद्र है) खुद का अनुभव भी यही बताता है कि यह एक कालजयी सत्य है मात्र एक काव्य सत्य नहीं :) 



कोपभवन में ही राम के वन गमन की प्रस्तावना लिखी जा रही है। राजा बेबस निरीह श्रीहीन होते जा रहे हैं। कैकेयी के सामने अधमरे हो उठते हैं, कितना बिचारगी भाव से कहते हैं- भरत के राज्याभिषेक में उन्हें कोई ऐतराज नहीं मगर राम को वन मत जाने को कहो। कैकेयी को पूरा आभास है कि राम के वियोग में दशरथ प्राण त्याग देगें मगर वैधव्य की कीमत पर भी वह अपनी जिद नहीं छोड़ती। राम आते हैं उनका मन वन गमन की बात सुनते ही बल्लियों उछल पड़ता है। राजा मरणासन्न हो चुके हैं। उनकी ओर से राम सहज सहर्ष वन जाने की हामी भर लेते हैं। ये वही राम हैं जिन्हें राज्याभिषेक की खबर सुन कर यह संताप हो रहा था कि आखिर बड़े भाई के ही राज्याभिषेक का नियम क्यों है? राम क्यों न जन जीवन में समादृत और पूज्यनीय हों?



राजा दशरथ कैकेयी को सबसे अधिक मानते थे। कौशल्या को तो उन्होंने उपेक्षित ही रखा इसके बावजूद कि वे राम की मां बनी। उन्हें जिस तरह उनकी सबसे प्रिय रानी कैकेयी ने ही दंश दिया, उनकी जानलेवा बनी इसकी मिसाल विश्व साहित्य में भले ही अन्यत्र कम हो मगर शायद लोक जीवन में कैकेयी चरित्र के ऐसे मामले कम नहीं हैं जहां दशरथ सरीखे सहज सरल इंसानों को कैकेयी सरीखी प्रवृत्तियों का शिकार आये दिन न बनना होता हो और इसलिए ही यह बहु उद्धृत कहावत भी आम हो गयी- त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यम देवो न जानति कुतो मनुष्यः। और यह निश्चय ही कैकेयी की प्रवृत्ति पर ही लक्षित कहावत है- नहीं तो एक नारी सीता भी हैं जिन्होंने सभी ऐश्वर्य वैभव को तिलांजलि देकर पति के साथ वनगमन का मार्ग चुना, उर्मिला हैं जिन्होंने बिना प्रतिकार अकारण ही पति का लम्बा वियोग सहा।



आज के प्रसंग में सीता को राम वन न जाने की सलाह दे रहे हैं और इसके पक्ष में कई तर्क दे रहे हैं मगर सीता कहां मानने वाली हैं। सीता कोई कैकेयी थोड़े ही हैं। चरित्र का कितना बड़ा अंतर है यह। एक नारी अपने जीवन संगी की मौत का कारण बन जाती है तो दूसरी उसके लिए खुद का जीवन त्याग करने को तत्पर है। बाकी कोई प्रसंग फिर कभी। जय श्रीराम!

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

माया युद्ध -पुराणकार की अद्भुत सोच!


भारत ने अंतर महाद्वीपीय मिसाइल अग्नि-5  के प्रक्षेपण के साथ ही सैन्य क्षमता के लिहाज से पूरी दुनिया में एक गौरवभरा मुकाम हासिल कर लिया है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक एंटी मिसाइल की भी मारक क्षमता लिए हुए है - यानी दुश्मन की मिसाइल को लक्ष्य पर पहुंचने के पहले ही उसे  मार्ग में ही नष्ट करने की क्षमता...एक ऐसे युद्ध में पारंगत होने की क्षमता जिसका रोमांचपूर्ण विवरण हमें महाभारत और रामायण की युद्ध कथाओं में देखने को मिलता है. आज जब टेक्नोलॉजी का विकास हो गया है तो हम अपने पुराणकारों द्वारा कल्पित के कितने ही युद्ध तकनीकों को साकार कर रहे हैं. दैत्यों द्वारा संधान किये कितने ही आयुध, अस्त्र शस्त्र वायुमार्ग में ही देवताओं द्वारा विनष्ट कर दिए जाते थे...आज की गाईडेड  मिसाइल्स और एंटी बैलिस्टिक मिसाइल्स हमारी उसी पौराणिक सोच का साक्षात नमूना है .

हमारे पुराण युद्ध के अनेक कला कौशलों, अनेक तरह के आयुध-अस्त्र शस्त्र के रोमांचपूर्ण विवरणों से भरे पड़े हैं. आज के सैन्य सुरक्षा वैज्ञानिक उनसे कई सूझें ले सकते हैं. कृष्ण का सुदर्शन चक्र गाइडेड मिसाइल की ही तरह तो काम करता है - दुश्मन का काम तमाम किया फिर वापस अपने स्वामी के पास. भगवान राम के बाण दुश्मन का बाल बांका करके वापस अपने तरकश में आ जाते थे. यह अस्त्र शस्त्रों के उपयोग-प्रबंध की कितनी उपयुक्त सूझ है। कम खर्च बाला नशी...मतलब कम ही अस्त्र में किला फतह। अम्बार लगाने की जरुरत नहीं। कम ही अस्त्र हों पर अचूक और कारगर हों!कितने दूर की कौड़ी ले आये थे पुराणकार...आज जब हमारे पास प्रौद्योगिकी है तो हम उन विचारों को मूर्त रूप दे रहे हैं. मगर अभी भी हम पुराणों में वर्णित अनेक युद्ध कौशल और अस्त्र शस्त्रों को अमली जामा नहीं पहना पाए हैं।यद्यपि आज हमारे पास ब्रह्मास्त्र या नारायणास्त्र के आधुनिक स्वरुप- नाभकीय बम मौजूद हैं, जिनके इस्तेमाल से कुछ उसी तरह का दृश्य साकार हो उठता है जैसा पुराणों में दर्शित है -भीषण चमक ,आवाज ,भूकंप और पल भर में सब कुछ स्वाहा .मगर एसे भीषण और दुर्धर्ष आयुधों के आम इस्तेमाल पर तब भी प्रतिबन्ध थे -उनका महज मन मौज के रूप में इस्तेमाल वर्जित था - बस बेहद अपरिहार्य दशा में वे चलाए जा सकते थे...एक बड़ी रोचक कथा इस बारे में महाभारत में मौजूद है -आइए, संक्षेप में फिर उसकी स्मृति ताजा कर लें...

महाभारत के सौप्तिक पर्व में अश्वत्थामा के एक क्रूर कर्म का उल्लेख है कि किस तरह उसने द्रौपदी के पुत्रों की नृशंस हत्या कर दी थी। दुर्योधन की अंतिम इच्छा को पूरा करने के चक्कर में उसने भ्रम वश पांचों पांडवों का सर काटने के बजाय मुंह ढंक कर सोये उनके बच्चों का सर काट लिया था। और यह दुष्कृत्य करके वह गंगा के किनारे एक निर्जन स्थल पर छुपा था। मर्माहत और क्रोध की ज्वाला से भरे पांडवों ने उसके वध का निश्चय किया। मगर यह इतना आसान नहीं था। उसके पास ब्रह्मास्त्र था. जो डर था वही हुआ। अस्त्र शस्त्र से लैस ललकारते हुए पांडवों को अपनी ओर आते देख मृत्युभय से उसने ब्रह्मास्त्र चला ही तो दिया। पांडवों के तारणहार श्री कृष्ण ने तत्काल ब्रह्मास्त्र की काट की युक्ति सुझाई, "ब्रह्मास्त्र के कोप से बचने के लिए सब आत्म समर्पण की मुद्रा में आ जाएं। रथों से उतर पड़ें और अर्जुन तुम ब्रह्मास्त्र की काट के लिए ब्रह्मास्त्र का ही संधान करो।" अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र चला दिया। प्रलयंकारी दृश्य उपस्थित हो गया। अग्नि की विशाल ज्वालाएं निकलने लगीं, आसमान से उल्कापात आरम्भ हो गया। प्रचंड वायु चल पड़ी...धरती डोलने लगी...हाहाकार मच गया...पर्वत गिरने लगे...नदियां बाहर उमड़ पडीं...यह भीषण दृश्य देख महर्षि व्यास और नारद तत्क्षण वहां उपस्थित हुए और जवाबदेही चाही कि, " प्राणी मात्र के अस्तित्व को नष्ट करने की क्षमता वाले इन महान अनिष्टकारी अस्त्रों का प्रयोग क्यों किया गया?" अर्जुन विनम्र हुए और अपने ब्रह्मास्त्र को वापस बुलाने का यत्न इस आशंका के साथ किया कि तब तो अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र हमें ख़त्म कर देगा।" उन्होंने कहा कि उन्हें अपने बचाव में ब्रह्मास्त्र का संधान करना पड़ा क्योकि अश्वत्थामा ने इसे पहले ही चला दिया था...अन्ततोगत्वा अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र का प्रभाव उत्तरा के गर्भ पर पड़ा। मगर कृष्ण की महिमा से उत्तरा के गर्भ की रक्षा हुई और राजा परीक्षित जन्मे।यह दृष्टांत भयंकर अनिष्टकारी आयुधों के जवाब में प्रति संहारक आयुध के इस्तेमाल की अपरिहार्यता का संकेत करता है। राहत की बात है कि अब भारत भी ऐसे प्रति संहारक अस्त्रों की क्षमता से युक्त है।
माया युद्ध?

हमारे पुराणों में वर्णित अभी कई युद्ध कला कौशल हमारे  लिए प्रेरणा के स्रोत ही हैं, जैसे मय दानव और मेघनाथ के द्वारा संचालित माया युद्ध जिसमें भीषण की युद्ध की प्रतीति भर थी और डर कर दुश्मन आत्म समर्पण के लिए मजबूर हो जाता था। कैसी युद्ध रणनीति थी वह जहां कोई वास्तविक हानि नहीं थी...बस ऐसे भयावह दृश्य होते थे कि प्रतिपक्षी दहशत में आ जाता था - मेघनाथ ने जब माया का विस्तार किया तो राम की सेना ने एक नहीं अनेक मेघनाथ देखे। राम और लक्ष्मण को मृत देखा। यह आभासी युद्ध तब ही ख़त्म हुआ जब राम ने अपने मायारोधी बाणों से उनका प्रभाव ख़त्म कर दिया। ऐसे माया-मायावी युद्ध की तकनीक क्या कभी विकसित हो सकेगी। यह टेक्नॉलजी और सैन्य आयुध विशेषज्ञों के लिए एक चुनौती है।

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

शिव बारात सज रही है!

आज तो बम बम बोल रही है काशी....शिवरात्रि पर काशी  शिवमय हो जाती है ..शिव बारात सज रही है ...बरात क्या है चित्र विचित्र दृश्यों का संयोग है -एक बूढा बैल पकड़ा गया है,लोग उस पर भयावह से लग रहे बाल शिव को बैठाने के उपक्रम में हैं ...बैल बिदक रहा है ..लोग उसे संभाले हुए है ..दर्शक दूर से नमस्कार कर रहे हैं ..कहीं बैल बिदक गया तो किसी के थामें न थमेगा ..मेरे मन में भी दहशत है इसलिए एक सुरक्षित कोना ढूंढ लिया है ..बारात सज बज रही है ...यह भी कोई बरात है?


बैल तो बिदक गया अश्वारूढ़ हुए शिव बाबा -शिव बरात का एक दृश्य 

अजब गजब स्वांग भरे हैं बाराती -कोई नंगा ,कोई अधनंगा ,कोई लूला कोई लंगड़ा ,कोई अँधा कोई काना ...और भूत पिशाचों की तो एक अलग टोली है -खुद शिव मुंड माला पहने हैं ,अधनंगे हैं ,भभूत लपेटे हैं ,गले का जिन्दा फुफकारता नाग  है,विषदंत न भी टूटा  हो तो भी विषकंठी पर विष का प्रभाव कहाँ? अजब गजब बरात.. बस चलने को उद्यत है ...यह कैसा दृश्य है? ..कोई बरात ऐसी भी हो सकती है भला? हजारो हजार साल से शिव की बरात ऐसी ही निकलती आयी है -कहीं यह हजारो हजार विपन्न, अभाव ग्रस्त प्रवंचित भारतीयों का एक सांकेतिक चित्रण तो नहीं? क्या हुआ हम गरीब हैं ,बुभुक्षित हैं मगर उत्सवप्रेमी हम भी हैं -क्या हम मानव नहीं ? हमें क्या खुशियाँ मनाने का हक़ नहीं? हम जैसे हैं वैसे ही अपनी खुशियों का इज़हार करेगें! शिव की यह बरात मन में कई तरह के भावों को संचारित कर रही है -यह भी लग रहा है कि शिव  भी कुछ कम मौजी और किलोल -कौतुकी नहीं हैं -ऐसी बरात उनकी परिहास प्रियता का नमूना तो नहीं?

लोकमन के जितने करीब शिव हैं उतना  कृष्ण भी नहीं ...जन जन में रचे बसे हैं शिव ...न जाने कितने लोक गीत और लोक कथाएं भोले को लेकर प्रचलित हैं ..कहते हैं अपने नंदी पर ही पार्वती को भी बिठाए  हुए     (जबकि पार्वती का   वाहन अलग है ) भोले बाबा गाँव गिरावं घूमते रहते हैं- लोगों का दुखदर्द बांटते रहते हैं ...भला ऐसे दयालु दंपत्ति से लोगों का लगाव क्यों न हो ..भारत की नारियां तो शिव के प्रति पूरी समर्पित हैं ...शिव पूजा के प्रति उनमें विशेष उमंग और उछाह रहता है .....वर्षा ऋतु का एक पर्व है ललही छठ-यह औरतों का ही पर्व है जहां  वे इकट्ठी होकर शिव पार्वती के अन्तरंग पलों का भी चटखारे लेकर बयां करती हैं -इस शिव पार्टी में पुरुषों का जाना निषेधित है ..ऐसी पार्टी में एक बच्चे के रूप सम्मलित  मैंने जो कथायें सुनी है कि बस उनका स्मरण मात्र होठों पर मुस्कान बिखेर रहा है ...एक आम भारतीय नारी का शिव से इतना अपनापा है कि बस कुछ मत पूछिए ..शिव   खुद उनके स्वामी की प्रतीति हैं  ... शिव भोले भले हैं मगर  रसिक भी कम नहीं ..बस दिखने में ही बौरहे बकलंठ हैं, अन्दर से बड़े गहरे हैं ...उन्हें हल्के में लेना भारी पड़ सकता है ....वे कड़े योगी हैं तो बड़े भोगी भी हैं ..
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आदि देव हैं शिव ....विद्वानों के बीच उनके आर्य अनार्य होने की बहस छिड़ जाती हैं ..मैं तो यही मानता हूँ की वे मानव की चेतना की अनुपम अभिव्यक्ति हैं -उनकी संकल्पना खुद हमारी अभिलाषाओं ,आकांक्षाओं ,दुर्बलताओं ,विपन्नताओं ,प्रवंचनाओं की ही देन है -इसलिए ही तो हम उन्हें अपने इतना करीब पाते हैं -हर किसी ने शिव को अपने अपने रंग में गढ़ा है -विद्वानों को  जहाँ वे 'नमामीशमीशान निर्वाण रूपं .....' लगते हैं तो एक तांत्रिक को वे भस्मावेष्ठित  कपाल कुंडल युक्त अघोरी दिखते हैं ..नर्तक -गायक उन्हें इस विद्या के अधिष्ठाता  मानते हैं तो किसी योद्धा को वे तांडव मुद्रा की प्रतीति कराते हैं ....कालांतर में सबने उन्हें अपना बनाया  है ,वे क्या सर्वहारा क्या समृद्धिवान सभी के चहेते देव हैं ....लोकमानस ने उनके साथ खुद को इतना जोड़ लिया है ,इतनी कथायें रच डाली हैं कि वे आम भारतीय में सदियों से ऐसे गुथे हुए हैं कि आगे भी कितनी सदियाँ क्यों न बीत जाएँ जनमानस शिवत्व से विलग नहीं हो सकता .....

योगी तो ऐसे कि उनके ध्यान भंग करने के लिए  कामदेव को अपनी जान की बाजी लगाने पडी ..मगर आसक्त भाव भी ऐसा की दक्ष यज्ञ के पश्चात मृत सती का शरीर लिए छः माह व्यथित विकल घूमते रहे ....मृत विगलित शरीर जगह जगह गिरता रहा -जो पुण्य स्थान बनते गए ...बनारस के एक घाट पर मणि कुंतल के साथ कान गिरा तो वह  मणिकर्णिका कहलाया -जो मोक्ष "श्रोतम श्रुतैनैव ' से नसीब था वह मणियुक्त पार्वती के कर्ण अवशेष अनुप्राणित स्थल के जीवित ही नहीं मृत्योपरांत भी  संस्पर्श मात्र से ही सर्व सुलभ है -आज  हिन्दुओं का अंतिम संस्कार के रूप में यहीं शव दाह की परम्परा है ---कामरूप कामाख्या में सती का एक कामांग  गिरा तो  जन श्रुति चल पडी कि पूरब की महिलाओं में जादू का आकर्षण है -यहाँ अकारण ही पूरब की बूढ़ी दादियाँ और स्त्रियाँ अपने बच्चों /पतियों को असम/बंगाल के सौन्दर्य से  बच के रहने की चेतावनी नहीं देतीं ....

बिना पार्वती के संस्पर्श -साथ के शिव भी शव रूप ही हैं ....वे शिव तो शिवा के संयोग से ही हैं ....एक भक्त ने वामांग में  पार्वती को बैठे देख हठ कर लिया कि वह केवल शिव रूप का ही अर्चन चाहता है तो शिव खुद अर्धनारीश्वर बन गए ...उस मूरख को कहाँ पता था कि वे अलग है ही कहाँ?  वे तो शब्द और अर्थ की भांति जुटे हुए हैं ....वागर्थाविव संपृक्तौ ...पार्वती परमेश्वरौ .....शिव की बारात नगर की गलियों को गुलजार कर रही है -बच्चे बूढों सभी के आकर्षण का केंद्र बनी हुयी है ....चारो और हंसी और ठिठोली का माहौल है .....भला ऐसी भी कोई बारात होती है ....जस दुलहा तस बनी बराता....

इस संसार में जो कुछ भी मनोरम है, सौष्ठव और सामंजस्य लिए है विभिन्न विरूपताओं में भी संतुलन बनाए हैं  वही शिव है -आप सभी का शिव पार्वती मंगल  करें-यही कामना है !  

शनिवार, 25 जून 2011

बहुत बलवती है मनुष्य की आशा

मनुष्य मूलतः एक आशावादी प्राणी है ...निराशा उसका स्थायी भाव नहीं है....सब कुछ ख़त्म होने के बाद भी उसकी आँखों में भविष्य की चमक/झलक  देखी जा सकती है ..विवेकानंद ने एक बार कहा था कि अगर तुम्हारा सब कुछ ख़त्म हो गया है तो देखो भविष्य  अभी भी तुम्हारे  पास है ,अक्षत और सुरक्षित! मनुष्य की आशावादिता ही उसकी वह थाती है जिससे वह आज धरती पर सर्वजेता बना हुआ है .करोडो वर्ष के विकास की यात्रा में उसकी इसी आशावादिता और जिजीविषा ने दीगर पशुओं से उसे बढ़त दिलाई है...यह भी प्रकृति के अनेक चमत्कारों में से एक है कि मनुष्य का दिमाग ख़ास तौर पर आशावादिता के लिए 'प्रोग्राम्ड' है -नए वैज्ञानिक अध्ययन  तो यही खुलासा करते हैं

मनुष्य की प्रबल आशावादिता का एक उदाहरण महाभारत से है जो भले ही एक मिथक हो मगर  मनुष्य की मूल सोच का एक उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत करता  है ...  महाभारत का युद्ध अंतिम दौर में था ..कौरवों के धुरंधर सेनापति पराजित/हत  हो चुके थे..ऐसे में अंतिम सेनापति के रूप में दुर्योधन ने अपने सारथी शल्य को ही रण भूमि में सेनापति बनाकर भेजा ...संजय यह दृश्य देखकर किंचित उपहासात्मक लहजे में  धृतराष्ट्र से कहते हैं ,'राजन ,देखिये तो मनुष्य की आशा कितनी बलवान है कि अब शल्य पांडवों को जीतने चला है ..' कहाँ भीष्म और द्रोण जैसे महायोद्धा और कहाँ एक अदना सा  सारथि शल्य ...भले ही कौरवों की पराजय हुयी मगर दुर्योधन की जीतने की आशा तो अंतिम घड़ी तक बनी रही ...ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण भारतीय पुराण इतिहास में देखे जा सकते हैं ...



भारतीय जीवन दर्शन तो आशावादिता से भरा ही हुआ है -भले ही यह सच है कि उसमें बहुत सा घोर अतार्किक आशावाद है . हमारे अधिकाँश साहित्य सुखांत है ...अगर मनुष्य का मस्तिष्क ऐसा न होता तो प्रायः पूरी प्रजाति ही थक हार कर बैठ जाती...कोई प्रयास ही न करती ...कोई उद्यम ही न करती ....मगर केवल आशावादिता ही पर्याप्त नहीं है उस दिशा में प्रयत्न भी किये जाने चाहिए -ज्ञान विज्ञान के अकूत भारतीय वांगमय बार बार यह बताते रहे हैं  ..गीता तो मनुष्य के कर्म को ही प्रधान मानती है ...भगवान में आस्था भी मनुष्य की  आशावादिता का ही एक रूप है ...सब कुछ ख़त्म हो गया है मगर एक सर्व शक्तिमान तो है जो सब कुछ ठीक कर देगा ..इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में ठीक कर देगा ...फिर चिंता की क्या बात ...संतोष रखिये... होयिहें वही जो राम रचि राखा .... कुतर्क मत करो ईश्वर पर भरोसा रखो ...यह प्रबल आशावादिता नहीं तो और क्या है ?  और यह आशावाद भले ही अतार्किक हो मनुष्य जाति का परचम बुलंद रखने में इसका बड़ा योगदान रहा है ...

कभी कभी सोचता हूँ मेरे जैसे वे सभी लोग कितना बदनसीब हैं जिनके पास आस्था का कोई ऐसा आधार नहीं है.जो नास्तिक हैं ,अज्ञेयवादी हैं ..ईश्वर जैसी सत्ता में जिनका विश्वास नहीं है ...जीवन की कतिपय बड़ी विपदाओं के समय उत्पन्न   निराशा के समय इनके पास खुद अपनी इच्छाशक्ति के  अलावा  आशा और विश्वास का कोई अतिरिक्त आधार नहीं होता ....कितने अकेले और असहाय से नहीं हो जाते हैं ऐसे लोग? तमाम अन्यायों और दुश्वारियों का मुकाबला इन्हें खुद अपने दम पर करना होता है ..इनके मस्तिष्क के अग्र  गोलार्ध में स्थित आशावादी केंद्र ही ऐसे में उनकी मदद करता होगा! 

रहीम का एक दोहा याद आ रहा है-रहिमन चुप हो बैठिये देख दिनन का फेर ,जब अइहें नीक दिन बनत लगिहें देर ...यह हमारा आशावाद ही तो है जो कवियों की वाणी बन गया है ...एक शायर ने मौत के वजूद की भी अनदेखी कर दी ..कहा -मौत से आप नाहक परीशां है आप जिन्दा कहाँ है जो मर जायेगें :) लीजिये जनाब यहाँ तो मौत को भी हंसी मजाक समझ लिया गया ...

..तो मित्रों ,आशा ही जीवन है और निराशा है मृत्यु  और यही है मूलमंत्र मनुष्य के जीवन की सार्थकता का ....





मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की सुन्दरता

जगज्जनिनी माँ सीता के सौन्दर्य के बारे में तुलसी कहते हैं -सब उपमा कवि रहे जुठारी केहिं पट तरों बिदेह कुमारी ..मतलब अनिर्वचनीय सौन्दर्य है माँ सीता का ...मगर राम का  सौन्दर्य भी तो कुछ कमतर नहीं हैं ...वनगमन के समय जो उन्हें देखने से रह गया ऐसे नगर ,ग्राम्यवासी अपने भाग्य को कोसते हैं.....मगर एक मजे की बात है कि आदि कवि वाल्मीकि जहाँ सीता के सौन्दर्य वर्णन को लेकर मुखर नहीं हैं वहीं वे राम के सौन्दर्य का बखान करने में मगन हो रहते हैं ...जहां सीता के सौन्दर्य की बात हुयी भी है उसे आदि कवि ने सीता जी के मुंह से ही कहलवाया है ..खुद मुखर नहीं हैं!मात्र युद्ध काण्ड के ४८ वें सर्ग  में दुःख संतप्त  सीता  अपने रूप का खुद वर्णन करती हैं .......मगर उनके दैन्य दारुण प्रसंग में सौन्दर्यबोध तिरोहित सा हो उठ्ता है ...जबकि   नारी सौन्दर्य के सभी उत्कृष्ट प्रतिमान सीता द्वारा स्वयं के रूप वर्णन  में सहज ही आ जाते हैं ..लेकिन आज यह प्रसंग नहीं ..आज तो रूप राशि पुरुषोत्तम राम का ही सौन्दर्य  वर्णन ...

राम के सौन्दर्य वर्णन में वाल्मीकि बहुत मुखर हैं -वे उनके शारीरिक सौष्ठव का वर्णन करते अघाते नहीं ....बालकाण्ड में उनकी दैहिक विशेषता के लिए   -महाहनु ,आजानबाहु ,पीनवीक्षा  जैसे विशेषण देते हैं  और सुन्दर काण्ड के ३५ वें सर्ग में राम की रूपराशि का वे दूत हनुमान के माध्यम से विस्तृत वर्णन करते हैं(श्लोक संख्या ८ से २२ तक ) ...



त्रिस्थिरस्त्रिप्रलम्बश्च  त्रिसमस्त्रिपु चोन्नतः 
त्रिताम्रस्त्रिपु च स्निग्धो गंभीरस्त्रिषु नित्यशः 
त्रिवली मांस्त्रयंवतः ......................सुन्दरकाण्ड ३५/१७-१८

इस श्लोक में पुरुषोत्तम राम के तीन अंगों के कई जोड़ों (त्रिगात्र )  -उरु ,मणिबंध, मुष्टि ;पुनःभौह ,अंडकोष तथा बाहु ,नाभि ,कुक्षि तथा छाती और फिर  केश ,जबड़े के साथ ही आँख का  कोना ,हाथ और पैर के तलवे ,पादरेखा,केश तथा  लिंगमणि की विशेषताएं इंगित करते हैं  .....अनन्तर उनके उदर और गले में तीन वलियाँ थीं ...स्तनचूचुक  निम्न थे ..आदि आदि ..उनका शरीर सुन्दरता ,सुडौलपन  और बनावट में अप्रतिम था ....इस अलौकिक सौन्दर्य सुषमा  के दर्शन सुख से लाभान्वित कोई भी उनके ओझल  हो जाने पर भी अपने मन को उस चुम्बकीय आकर्षण से मुक्त नहीं कर पाता था ..जिसने राम को न देखा और जिसे राम ने न देखा हो वह लोकनिंदा का पात्र  होता था ...यश्यम रामं न पश्येतु यं च रामो न पश्यति ,निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते.. (वाल्मीकि रामायण ,२/१७/१३-१४ )

माना जाता है की राम की दैहिक संपदा और शील lके वाल्मीकि -  वर्णन से ही साहित्य जगत में नायक के गुणों का बोध हो सका ...नाटयशास्त्र   ज्ञानी  भरत द्वारा वर्णित  नायक के श्रेष्ठ आठ गुण  -शोभा,विलास ,माधुर्य, गाम्भीर्य ,स्थैर्य ,तेज .ललित तथा औदार्य का निरूपण राम के गुणों के ही विश्लेषण से ही रूपायित हो पाए हैं . ठीक वैसे ही  जैसे वाल्मीकि रामायण के विश्लेषण से संस्कृत साहित्य में महाकाव्य की अवधारणा विकसित हुई लगती है.... राम के शील -व्यक्तित्व के   निरूपण पर तो सैकड़ों ग्रन्थ उपलब्ध हैं ....किमाधिकम? 

रामनवमी पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं ! 

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

मकर संक्रांति का पुण्य काल है ,आईये कुछ कथा वार्ता हो जाय!

मकर संक्रांति का पुण्य काल है ,आईये कुछ ज्ञान ध्यान की बात हो जाय -कुछ कथा वार्ता हो जाय.गोस्वामी तुलसीदास जी राम कथा के उदगम और उसके महात्म्य की बात करते हुए बालकाण्ड में जो लिखते हैं आईये आपको सुनाते हैं =जब तक मन  लगे सुनिए नहीं तो जो रुचे वही कीजिये ...मैं तो इन दिनों 'मानस' रस में ही सराबोर हो रहा हूँ .अल्पना जी की दी गयी टिप्स के अनुसार प्रवचन   यहाँ से डाउनलोड भी किया जा सकता है!

शनिवार, 26 जून 2010

अभी अभी बाबा भोलेनाथ की आरती से लौटा हूँ !

अब अनुज से क्या डाह मगर कभी कभी गिरिजेश जी के आलस्य से जबरदस्त ईर्ष्या हो उठती है ...सारा आलस्य अपने में स्थित   और स्थिर किये वे बाकी हम निरीह संसारियों को लास्य (ता) के नर्तन में   झोक दिए हैं ...अब देखिये न कल सुबह दस बजे से निरंतर राजकीय  कामों में लगे होकर एक फील्ड विजिट और जांच पड़ताल से उबर कर रात साढ़े बारह बजे जब घर लौटा तो  मेरे पास कुल डेढ़ घंटे का आराम का समय बचा था  ..क्योंकि उसके बाद अपने दो लंगोटिया मित्रों  ..एक अमेरिका से आये डॉ प्रदीप सिंह और दूसरे सुल्तानपुरी डॉ.आर. ऐ. वर्मा को सपरिवार बाबा विश्वनाथ की  मंगला आरती में शरीक कराना  था ....सो एक घंटे सो भी लिया और फिर तैयार हो गया ड्यूटी के लिए ....घर से निकल कर रेडिसन होटल से मैंने मित्रों को लिया और बाबा के दरबार में अल्लसुबह हाजिरी लगा दी ....सुबह के पौने तीन बजे थे ....बाबा भोले नाथ की मंगला  आरती शुरू हो चुकी थी ....सुबहे बनारस का नैसर्गिक आनंद और तिस पर बाबा की मंगला आरती ....क्या कहिये ..इस आनंद का वर्णन  शब्दों में तो हो ही नहीं सकता ....

बताता चलूँ कि बाबा भोलेनाथ की चौबीस पहरों में कई आरतियाँ होती हैं ....सबसे पहली आरती होती है मंगला आरती ...सर्वतो भद्र कामना से बाबा का प्रातःकालीन अभिषेक पूरे  बाजे गाजे और बधाई गान के साथ होती है और उसके बाद मंदिर आम दर्शनार्थियों के लिए खुल जाता है ...आरती देखने के लिए प्रति व्यक्ति २०१ रुपये का टिकट है ...फिर साढ़े ग्यारह बजे बाबा की भोग आरती होती है ...उनका भोग लगता है जो दर्शनार्थियों में बटता है . बाबा के भोग तृप्ति के बाद चराचर में भला अतृप्त कौन रह सकता है ....मुझे सबसे भव्य ,खूबसूरत आरती सप्तर्षियों द्वारा शाम ढलते ही की जाने वाली सप्तर्षि   आरती  लगती है ..जिसकी  भव्यता और श्रृंगार अलौकिक है ....और सौन्दर्यबोध की ऐसी आकंठ तृप्ति कि मत कुछ पूछिए ..इसके पश्चात एक और श्रृंगार आरती और रात ११ बजे शयन आरती के बाद मंदिर कपाट बंद हो जाते हैं मंगला आरती के लिए ..
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 आप भी प्रात दर्शन कीजिये बाबा विश्वनाथ जी के ...
तो आज हम मंगला आरती से सीधे लौटकर आपसे रूबरू हो गए हैं ...साढ़े चार बजे लौटा हूँ और अब इस समय साढ़े पांच बज रहे हैं ....नीद आँखों से कोसो दूर है और साढ़े आठ बजे फिर दोस्तों के साथ नाश्ता करना मुक़र्रर हुआ है ...अब मैं गिरिजेश  जी (गिरिजा +ईश ) से डाह न भी करुँ तो आखिर कैसे ....? मगर वे बहुत भोले हैं इसका तनिक भी माख न रखेगें !
गिरिजेश जी और प्रिय बेनामी के अनुरोध पर कबाडखाना पर पंडित पद्म भूषण छन्नूलाल  मिश्र जी के सुर  में तुलसीदास कृत और मुझे भी बहुत प्रिय स्तुति का लिंक यह है ,आप भी जरूर सुनिए ...

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