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शुक्रवार, 15 जून 2012

ग़ज़ल गायकी के लीजेंड का यूँ चले जाना...


यह तब की बात है जब मैं एक स्नातक छात्र था .यानी १९७६ के आस पास .मेरे चाचा जी उन्ही दिनों फेलोशिप पर जर्मनी जा रहे थे तो एक पैनासोनिक का टेप रिकार्डर घर पर दे गए जिसे उन्होंने दिल्ली में खरीदा था .उन दिनों टेपरिकार्डर गाँव के लिए एक अजूबा था .अब टेपरिकार्डर जैसा आवाज का एक अजूबा और नया 'बाईस्कोप' मिल जाय तो फिर क्या कहना ..गवईं लोगों की आवाजें टेप की जातीं और फिर उनको सुना देने पर वे भौचक रह जाते ..रेडिओ एक कोने में उपेक्षित हो गया और टेप रिकार्डर की करामातें चल पडीं ..उन्ही दिनों पिता जी मेहदी हसन की चंद चुनिन्दा ग़ज़लों का पालीडोर कंपनी का ओरिजिनल कैसेट घर ले आये थे ..और दिन रात वह बजता था .....मैं उससे बेफिक्र था .मुझे मेहदी हसन के बारे में कुछ पता नहीं था ..
पिता जी ने सबसे पहले इस अजीम शख्सियत और पाकिस्तानी फनकार से मेरा परिचय कराया था ..पकिस्तान में कुछ अच्छा भी हो सकता है उसकी यह पहली मिसाल थी ...पिता जी ने कहा कि देखो मेहदी हसन कितने अलग अंदाज़ में दिले नादां तुझे हुआ क्या है गाते हैं. मैंने मिर्ज़ा ग़ालिब की यह ग़ज़ल दूसरे फनकारों को गाते हुए सुनी थी .मेहदी हसन की आवाज़ में यह बिलकुल अलग क्लासिकी तरीके से गाई हुयी लगी .....और सच बताऊँ पहली बार तो ख़राब सा लगा मेहदी साहब से यह ग़ज़ल सुनना ..मगर ज्यों ज्यों सुनता गया ..उसकी तासीर गहन होती गई और आज तो यह ग़ज़ल किसी और की गाई अच्छी ही नहीं लगती ..
आगे तो मेहदी साहब जैसे जीवन का एक हिस्सा ही बनते गए .. जैसे एक मजेदार  याद है जब मैं मुम्बई में दो सालाना विभागीय ट्रेनिंग पर था तो वहां पहली बार सांख्यिकी पर एक पूरे पेपर की तैयारी करनी थी ..मुझे सांख्यिकी के सिद्धांत मेहदी हसन साहब की ग़ज़लों की तासीर लिए लगते थे ...और मैंने उनकी ऐसी ब्लेंडिंग तैयार की कि उधर सांख्यिकी के  कोई चैप्टर पर पढाई चलती तो उस्ताद की कोई न कोई ग़ज़ल पार्श्व में बजती रहती थी और साथी मुझे इनका दीवाना सिरफिरा क्या क्या न कहते थे -आखिर में जब नतीजा आया तो सैद्धांतिक सांख्यिकी में मुझे सर्वोच्च स्थान मिला था ..आप भी यह फार्मूला अपना सकते हैं :)

मेहदी हसन सरीखे फनकार को सुनने समझने पसंद करने का एक प्रोटोकोल है .उनकी आवाज़ और अंदाज़ तथा हुनर की बारीकियों को पसंद करने के लिए उनकी गायकी में तनिक समय जाया करना होगा ..उसे शुरू शुरू में पेशेंस के साथ / सकून से सुनना होगा -यह एक सीखने का सबब है .एक क्लास है जहां आपको मन लगाना है .आप पायेगें धीरे धीरे आप इनकी गायकी में रूचि लेने लगे हैं और फिर यह तासीर बढ़ती ही जायेगी ...मेहदी हसन को पसंद करने के लिए पहले आपके मस्तिष्क के कुछ तंतुओं को संवेदित होना होगा अगर वह इलाका पूरी तरह निष्क्रिय ही न हो गया हो .. :) और इसमें शुरुआती समय लग सकता है .मगर फिर आपको इसकी तलब लगनी शुरू हो जायेगी ...दुनिया में कितने ही नशे हैं उसमें एक प्यारा सा नशा है ग़ज़लों का और उसमें भी अगर आप मेहदी हसन को पसंद करते हैं तो आप एक अलग क्लास के व्यक्ति हैं . उनसा दूजा कोई नहीं है . दुनिया का बड़ा सा बड़ा ग़ज़ल गायक मेहदी हसन को शीश झुकाता रहा है .वे ग़ज़ल गायिकी के लीजेंड बन गए .

एक और बात है जो मेहदी हसन की गायकी के करीब हमें ला सकती है .यह है दिल का साफ़ होना ,बिना छक्का पंजा के और चालाक दुनियादारी से दूर होना ..वे भी ऐसे ही थे निष्कपट ,सहज सरल और विनम्र ...हर वक्त दुनियादारी में डूबे व्यक्ति के लिए कहाँ शेरो सुखन और वह भी मेहदी हसन की गायकी? इसके लिए निष्कपटता तो मानों एक अनिवार्य शर्त है ..मैंने खुद पाया है जिन्हें मेहदी हसन पसंद हैं वे बहुत सीधे सरल लोग हैं और एक ख़ास तरह की संवेदनशीलता लिए हुए हैं . यह एक अलग सा विशिष्ट ग्रुप ही है जिसे आप मेहदी हसन फैन ग्रुप कह सकते हैं .

वह पहला कैसेट जिसने मुझे इस अजीम हस्ती से मिलाया था 
मुझे ३६ साल पहले घर में आये उस कैसेट जो आज भी मेरे संग्रह का एक नायब आईटम है की एक एक ग़ज़ल के हर्फ़ दर हर्फ़ याद हैं ..उनके साथ जिए जीवन के कितने ख़ास पल छिन भी जैसे तरोताजा से हैं . चाहे खुशी के पल हों या गम के ये गज़लें मुझे एक सा आनंदित करती रहीं हैं .....दिल की बात लबों पर लाकर अब तक हम दुःख सहते हैं ...अर्जे नियाज़ इश्क के काबिल नहीं रहा .....मग्घन बात पहेली जैसी .....दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है ......क्यूं दामने हस्ती तक बढ़ने दिया हाथों को ....और भूली बिसरी चंद उमीदें चंद फ़साने याद आये .....यह आख़िरी वाली तो जब भी सुनता हूँ पूरा अतीत ही मानों सामने आ साकार हो उठता है ...इसके बाद की तो उनकी कितनी और गज़लें आयीं और दिल दिमाग पर कब्ज़ा करती चली गयीं .....
रंजिश ही सही .... मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो......बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी ......गुलों में रंग भरे ....इन सभी की एक सूची नजरिया वाले ब्लॉगर ने भी दी है -वे भी मेहदी साहब के दीवाने रहे हैं .....तीन दशकों के एक लम्बे साथ के बाद मेहदी हसन साहब का जाना दुखी कर गया है मगर तसल्ली यही है कि उनकी गज़लें उनकी दिलकश आवाज़ आज भी हमारी एक बेशकीमती धरोहर है .....ऐसी शख्सियतें कहाँ फ़ना होती है वह तो हमारे अहसासों हमारी चेतना में मानो पैबस्त रहती है जैसे बस गर्दन झुकाई और देख ली सूरत यार की .....अमर हैं मेहदी हसन साहब!

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

बनारस की एक सुबह बेहया यादों के नाम

कुछ यादें सचमुच कितनी बेहया होती हैं कि जितनी बार भी उनसे पीछा छुडाओ वे बार बार गले आ  पड़ती हैं.अब भला ये कोई बात हुयी बनारस की अल्लसुबह रामनाम जपने के बजाय बेहूदी बेशर्म यादें सर चढ़ के बोलने लगीं ...अभी अभी फेसबुक पर अपनी यह व्यथा दर्ज कर उनसे पीछा छुड़ाना चाहा मगर वे हैं कि जाने का नाम नहीं ले रहीं तो सोचा उन्हें ब्लॉग कर दूं तो शायद ब्लाक हो जाएँ ....फेसबुक पर लिखा -

बहुत दिनों से नहीं आयी है तुम्हारी याद 
हम तुम्हे भूल गएँ हो ऐसा भी नहीं .....
मगर कोई भुलाए न भूले,बुलाये न बने तब? 
तब तो ...
याद में तेरी जहां को भूलता जाता हूँ मैं 
भूलने वाले कभी तुझको भी याद आता हूँ मैं ? 
या फिर बकौल बशीर बद्र ...
अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जाएगा 
जिसने तुझे भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो ...
उफ़ ये सुबह रामनाम के बजाय किस बेवफा की याद हो आयी :( 
 मगर ये वाली याद सचमुच बड़ी बेशर्म टाईप वाली है ....मुझे चिढ इस बात की है कि ये सुबह सुबह ही क्यों कोबरा के फन  की तरह उठ आती  है? ..और वह भी सुबहे बनारस में ...तोबा.. तोबा...सुना है ऐसी यादें अक्सर शाम को आती हैं और जिन्दगी  तक के खात्में का अंदेशा दे जाती है ...अजब मरहलों से गुज़र रहे हैं दीदाओ दिल ...सहर की आस तो है ज़िंदगी की आस नहीं ...

दिलासा देने वाली बात बस इतनी है कि कोई एक अकेला मैं ही नहीं कितने ही बेहतरीन शख्सियतें ,शायर या सहरियार इन यादों में मुब्तिला होते रहे हैं और उनसे पीछा छुड़ाने के जुगाड़ में ताज़िंदगी लगे रहे हैं  ..और कुछ बेमिसाल कह गए, लिख गए....मगर अपनी तो इतनी कूवत भी नहीं ...कि उन यादों का कुछ ऐसा इस्तेमाल कर पाऊँ...उनसे तो बस पीछा छूट जाए अब ....किसी के पास कोई मेमरी इरेज़र जैसी कोई जुगत है भाई तो बताओ न ....अब मुश्किलें हद के पार हो रही हैं .....यह तो कुछ ऐसा लफडा हो गया लगता है कि रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा.......और ये भी ......गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहें,ख़याल मेरे दिल को सुबह-ओ-शाम किस का था......

 कुछ दोस्त मेरी इस हालत से इत्तेफाक करेगें और कोई रास्ता बतायेगें जिससे मेरी और बनारसी सुबहें बर्बाद न होने पायें....

शनिवार, 14 जनवरी 2012

मेहदी हसन साहब ..उनसा कोई नहीं है!

मेहदी हसन साहब आई सी यू में भर्ती किये गए हैं ,उनके दुश्मनों की तबीयत नासाज है ..हम उनके भारतीय प्रशंसक ,दीवाने ये दुआ करते हैं कि वे जल्दी ठीक हों और फिर अपनी आवाज का जादू बिखरने के लिए हमारी नज़रों के सामने हों ....यह खुशी की बात है कि भारत सरकार ने उनके यहाँ इलाज के लिए वीजा की पहल शुरू कर दी है .... समकालीन ग़ज़ल गायकी के सिरमौर हैं मेहदी हसन साहब ..उनसा कोई नहीं है सारी दुनिया में और अगरचे इस सारे ब्रह्माण्ड में भी कहीं दीगर भी ग़ज़ल गायकी और ग़ज़ल गायक हों तो भी मेहंदी हसन साहब की बराबरी नहीं ..अभी तो आप भी उनकी यह ग़ज़ल सुनिए ....और उनके शीघ्र स्वास्थ्य की कामना  कीजिये ...


मंगलवार, 8 नवंबर 2011

मेरे पसंदीदा शेर -सेशन 4

कई  सेशन पहले भी हो चुके हैं  ..कुछ बीते अफ़साने फिर से याद आने लगे हैं और हम भूले बिसरे चंद शेर फिर से गुनगुनाने लगे हैं ..मुलाहिजा फरमाएं ...
न जाने क्यों तेरा मिलकर बिछड़ना याद आता है 
मैं रो  पड़ता हूँ जब  गुज़रा ज़माना याद  आता  है 
नहीं  भूला  हूँ  अब  तक  तुझे  ऐ  भूलने  वाले 
बता तुझको भी क्या मेरा फ़साना याद आता है 
तेरी तस्वीर को बस देखते ही बेवफा मुझको 
मुझे वो प्यार का मौसम सुहाना याद आता है 
न कर गम मेरी बरबादियों का भूलकर इशरत 
मुझे अब भी तेरी कसमों का खाना याद आता है 
(इशरत अंसारी ) 
अब आईये एक और शेड में चलें ...
कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को 
न जाने कैसे खबर हो गयी ज़माने को 
सुना है गैर की महफ़िल में तुम न जाओगे 
कहो  तो  आज  सजा  दूं  गरीबखाने  को 
दुआ बहार की माँगी तो इतने फूल मिले 
कहीं  जगह  न  रही मेरे आशियाने  को 
दबाके कब्र में सब चल दिए दुआ न सलाम 
ज़रा  सी  देर  में  क्या  हो  गया  ज़माने को
(मुन्नी बेगम ने गाया है किसका है पता हो तो बताएं )  
और अब यह भी ......
अशआर  मेरे  यूँ  तो  ज़माने के लिए  हैं 
कुछ शेर फकत उनको सुनाने के लिए हैं 
आँखों में जो भर लेगें तो काँटों से चुभेगें 
ये ज़ख्म तो पलकों पे सजाने के लिए हैं 
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें 
कुछ दर्द कलेजें  से  लगाने  के लिए  हैं 
ये  इल्म  का  सौदा  ये रिसाले ये किताबें 
एक शख्स की यादों को भुलाने के लिए हैं 
इस  सेशन में बस इतना ही .... शेरो सुखन के अगले सेशन में फिर मुलाकात होगी ...जाते जाते यह बात फिर कि महीन भावों की अदायगी का जो जज्बा और ताकत उर्दू जुबान में है वह शायद दुनिया की किसी भी लैंग्वेज में नहीं है .....इसलिए थोडा उर्दू की शेरो शायरी का आनन्द उठाईये और इस जीवन को तनिक तो भावनाओं से लबरेज कीजिये .....
और मेरी बहुत प्रिय गायिका मुन्नी बेगम जिनसे कभी क्रश तक हुआ था उनकी आवाज में यह भी सुन लीजिये ...

रविवार, 1 मई 2011

कुछ गजल वजल हो जाय ......(लाईटर मूड में)

मुझसे किसी ने कल या परसों पूछा कि क्या  मैं गजल वजल भी लिखता हूँ ..मेरा जवाब अक्सर यही होता है नहीं और यह बिलकुल सच जवाब है ...मैं जिस शुष्क और असंवेदनशील माहौल में काम करता हूँ वहां ऐसी रचनात्मकता के लिए कोई जगह नहीं है .बल्कि उल्टे लोग ऐसी सृजनात्मक प्रवृत्तियों को उपहास की नजर से देखते हैं - जैसे  गजल वजल लिखना कोई नामर्दगी का काम हो ..हमारा परिवेश ऐसे ही लोगों से भरा पूरा है ...अगर आपकी ऐसी कोई चित्त वृत्ति है तो आप तुरंत हलके में ले लिए जायेंगे  -और अगर कहीं अपने ऐसे हुनर के चलते आप कोई ठीक ठाक रोजगार पाने से रह गए तो फिर तो उपहास की धार और तेज हो जाती है -'देखो तो पढ़े फारसी बेचें तेल' ...

समाज का जब ऐसा हाल है तो रचनाधर्मिता का दुर्दिन तो है ही ....अब कैसे कोई कविता गजल लिखता रहे और लिखकर भी इस तंत्र में तना रहे ..मैंने कई बड़े ही प्रतिभाशाली उच्च पदों पर आसीन अफसरों को देखा है जिन्होंने शुरुआत में तो अपनी सहज रचनाधर्मिता बनाये रखी मगर बाद के नौकरी के दिनों में उन्होंने रचनात्मकता से ऐसा मुंह मोड़ा कि फिर मुड़  कर नहीं देखा ..सरस्वती सिर धुनती रह गयीं!एक बहुत ही ओजस्वी रचनाकार जिनकी साहित्य जगत में तूती बोलती थी -पी सी एस आफीसर बनने के बाद धीरे धीरे अपने इस शौक का दामन छोड़ते गए और करीब पचीस बरसों बाद जब एक जिले में डी.एम् .बन कर आये तो मैंने उनकी कुछ पुरानी कवितायेँ सार्वजानिक रूप से पढ़ दीं -मुझ पर नाराज हो गए, अलग ले जाकर बोले कि मैंने अपनी उस पुरानी जिन्दगी को अलविदा कह दिया है -यहाँ मेरी पोल मत खोलो, लोग हलके में लेने लगेगें -मैं हतप्रभ रह गया ...ऐसे ही एक आई ये यस  हैं (वैसे ये तबका अब  कम रचनाधर्मी होता है) जो कभी लिख लिख कर मुझे अपने शेर भेजते थे अब शेरो शायरी का नाम भी नहीं लेते ....आज एक बहुत ऊँचे ओहदे को सुशोभित कर रहे हैं ....कभी मिलने पर शेरो सुखन और मौसिकी की बात छेड़ो तो किसी सोच में डूब जाते हैं .कितना दुखद है हमारा परिवेश अब इन सहज मानवीय वृत्तियों का विरोधी बन बैठा है ...या शायद  हमेशा से विरोधी रहा है ...

ऐसे में मेरे जैसा अदना सा मुलाजिम कोई गजल लिखता भी तो कैसे ...? ये हुनर आया ही नहीं ,हाँ कुछ लेख वेख पर जरुर हाथ आजमा लेता रहा क्योकि ऐसी सृजनशीलता छुपाई जा सकती है मगर कविता और शेरो शायरी का शौक इश्क और मुश्क की तरह  छुपता नहीं, फ़रिया जाता है और अक्सर फजीहत का बायस बन जाता  है हुक्मरानों और निजाम के बीच ...अब कहाँ रहे वे गुणग्राही लोग और हुनर की कद्र करने वाले राजा महराजा ...अब तो हालत यह है कि 'कद्रदानों की तबीयत का अजब हाल है आज ,बुलबुलों की ये हसरत के वे उल्लू न हुए..' ....

बात मैंने शुरू की थी उस मित्र के सवाल से -उन्होंने जिद पकड़ ली ..आपने लिखा जरुर होगा .मैं मान ही नहीं सकता/सकती-अब कुछ आग्रहों को टाला भी नहीं जा सकता तो मैंने अपने कई ट्रांसफरों   के दौरान चिद्दी चिद्दी होती डायरी के एक पुराने पन्ने से यह गजल उन्हें समर्पित कर दी .आप भी मुलाहिजा फरमाएं ....

मुझसे आखिर क्या खता हो गयी 

निगाहें उनकी जो खफा हो गयीं 
चाहत में न थी मेरे कोई कमी 
आशनाई उनकी  फ़ना  हो गयी 
या  कोई रकाबत का है ये  सितम 
उल्फत जो उनकी  बदनुमा हो गयी 
निभाते रहेगें हम रस्मे  वफ़ा 
गर जुदाई उनसे फिर भी हो गयी 



यह तब की है जब मैं बी एस सी कर रहा था -गुनी जन टालरेट कर लेगें ऐसी गुजारिश है और  मात्रा भाव आदि का दोष हो तो ठीक भी कर देगें यह भी अनुरोध  है .मैं इस रचना  को यहाँ  देते हुए बहुत सकुचाया और अब शर्मा भी रहा हूँ ...गुनी जन क्या कहेगें!इत्ती घटिया रचना ..हा हा ..मित्रजन तो वाह वाही करेगें ही,मित्रता में कोई दोष देखता है भला? उम्मीद तो पारखियों से है और आज के दिन तो मैं यह भी न लिख पाऊँ!


इस रचना को कुछ यूं इम्प्रोवायिज किया है ब्लागजगत के हर दिल अजीज हरफनमौला सतीश सक्सेना साहब ने ..मुलाहजा फरमाएं -
मुझको आखिर बताएं खता क्या हुई
क्यों तुम्हारी निगाहें बदल सी गयी !
चाहतों में न आई, मेरे कुछ कमी
आशनाई क्यों तेरी फ़ना हो गयी !

यह कैसी रकाबत,यह कैसा सितम है
क्यों उल्फत,तेरी बदनुमा हो गयी है?
निभाते रहेंगे, यह रस्मे वफ़ा हम !
जुदाई तेरी गर, नसीब बन गयी है ! 

शुक्रिया सतीश भाई! ....

.

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

शेरो शायरी की मेरी पसंद ..

पिछली पोस्ट से आरम्भ हुई 'त्रयी ' ने दिमाग पर इतना जोर डाला कि मन  हो आया   आपसे कुछ हल्का फुल्का ही फिलहाल साझा कर लिया जाय .इन दिनों ब्लॉग जगत में शेरो शायरी की बहार आई हुई है -ताज्जुब होता है कि लोग बाग़ इतना उम्दा लिख कैसे लेते हैं ,अकस्मात इच्छा हो आती है कि कलम या की बोर्ड को संभाले उन उँगलियों को चूम लूं जिन्होंने किन्ही होठों को चूम न पाने की अपनी कशमकश को इतनी ख़ूबसूरती से कागज़ या ब्लॉग पृष्ठ पर उतार दिया है ....हम भी याददाश्त की गलियों में गोते लगाने लग जाते हैं ...अब आज के नव युवा के बारे में कोई सर्वेक्षण हुआ हो तो हम नहीं जानते मगर बीते ज़माने के  एक गवई बेसऊर ,किशोरावस्था की दहलीज पर पड़े उस शख्स की दास्तान हम आपको जरूर सुना सकते हैं जिसे हम उम्र कितने ही दूसरे दोस्तों के साथ शेरो शायरी में अचानक रूचि हो आई थी ....

हाई स्कूल के नतीजे निकलने वाले थे...दिल की धडकन बढ़ती जा रही थी ..अब सारा समय तो गुल गपाड़ा में ,शेरो शायरी का मतलब जानने में बीत गया था तो परिणाम होना क्या था ..मगर फेल होने पर  ठुकाई /जग थुकाई का ख़याल आते ही डर के मारे उस किशोर  के  शरीर के रोयें रोयें  सिहर उठते थे-घबराहट और बेचैनी के उसी अलाम  में उसने यह  मैडेन शेर लिखा  और उसके बाद फिर उसकी कलम हारे हुए अर्जुन की गांडीव बन गयी,फिर सध न सकी   -हर्फ़ हर्फ़ याद है उसे वो पहला और आख़िरी स्वरचित  शेर -
दिल जानने को बेचैन है आखिर 
क्या होगा नतीजा मेरे इम्तिहाँ का 
बहरहाल हजरत पास तो हो गए मगर शायरी का असर अंकतालिका पर पड़ चुका था ...और अब तो शेरो शायरी  को लेकर एक अजीब सा प्रतिशोधात्मक भाव भी उनके  मन में आ गया था ..सारे के सारे पढ़ डालूँगा .अब या तो ये  रहेगी मन  में या इसका काम तमाम ही कर  देगें हमेशा के लिए  .उन्होंने  हिंद पाकेट बुक्स की ग़ालिब की शायरी पर एक पेपर बैक मंगा ही ली ...अब मियाँ का मुंह और मसूर की दाल ...शेरो सुखन की पहली ही चुनौती ग़ालिब से मिली और मियां चारो खाने चित ..चले थे शायरी की मय्यत उठाने ..खीझ में बिना समझे ग़ालिब के कई शेर ही रट डाले -मतलब आज तक पता नहीं ...(कोई हमदर्द बताएगें क्या ?कुछ गलती हुई हो तो वह भी सुधार देगें ...अब याददाश्त ही तो है जो कहते हैं बड़ी बुरी दोस्त होती है एन  वक्त पर साथ छोड़ देती है ... )
इशरते  कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना 
दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना 

इन आबलो के पाँव से घबरा गया हूँ मैं 
जी खुश हुआ है राह को पुरखार देख कर
उस पूरे दीवान में बस नीचे का एक यही शेर जनाब के कुछ  समझ में आया,इसमें वाईज साहब कौन हैं यह तो आज तक समझने में  लगे हैं ..ग़ालिब के कोई दोस्त  -वोस्त रहे होंगे ...
ग़ालिब बुरा न मान   जो वाईज बुरा कहे 
ऐसा भी कोई है सब अच्छा कहे जिसे 
 जनाब को जल्दी ही लग गया कि शेरो शायरी  को  प्यार और  ख़ुलूस से ही हासिल किया जा सकता है ...दोस्तों ने भी समझाया कि  मियां ग़ालिब के अलावा और भी सुखनवर है इस दुनिया में ..और लाकर दीगर शायरों के कुछ नायाब किताबे भी सामने रख दी ...उन्हें पढ़ते हुए लगता था कि कोई अज्ञात नाम के अजीम शायर हो चुके हैं जो इतने उम्दा शेर लिखते हैं मगर आज तक यह समझ में नहीं आया कि फिर वे खुद का नाम  अज्ञात क्यों लिखते थे..शायद बदनामी का डर रहा होगा उन्हें ..अब देखिये न यह कैसा शेर है उनका -
अंगडाई ले भी न पाए थे वे उठा के हाथ 
देखा मुझे तो मुस्कुरा के छोड़ दिए हाथ 
और यह भी कि 
अभी नादाँ हो खो दोगे कहीं दिल मेरा 
तुम्हारे लिए ही  रखा है ले लेना जवां होकर 
अब नीचे वाले वाले शेर को पढ़ पढ़ के जनाब मुतमईन हो जाते थे जबकि उनका एक होशियार साथी समझाता रहता था -अरे इनका चक्कर तुम नहीं जानते ,ये बस बहानेबाजी है ,ये दिल वो किसी और को देने के फिराक में हैं  बस तुम्हे उल्लू बन रहे हो ...और बात सच ही निकली ...आज वो मोहतरमा खुद भी कई शेरो शायरियों की  जन्मदाता होकर ये भी भूल गयीं कि उनका वो दीवाना कबका जवां हो चुका है ...उन्ही दिनों के कुछ और शेर सुनाकर यह सेशन यही समाप्त करते हैं ---मगर यह अफसाना तो अभी शुरू ही हुआ है ......
एक वो आलम था कि खुदा को खुदा न कह सका 
इक  ये आलम है कि हर बुत को खुदा कहते हैं ..

याद में तेरी जहां को भूलता जाता हूँ मैं 
भूलने वाले कभी तुझको भी याद आता हूँ मैं


मिलते हैं फिर ....

रविवार, 1 अगस्त 2010

.....अब आप भी प्रेम की रूहानी यादों में तनिक खो जाईये तो बात बनें!

इन दिनों छोटे भैया गिरिजेश जी एक अमर प्रेम कथा की प्रस्तावना कर चुके हैं ..दूसरा  अंक तक आते ही मेरी हिम्मत छूट गयी ..मैंने कॉपते होंठों और लरजते लफ्जों मे उनसे कह दिया कि मैं तो भैया आगे नहीं पढ़ नहीं पाऊंगा क्योंकि खुद का जख्म अभी हरा  है -प्रेम जीवन की यादगार अनुभूतियों में से है -नए शोध भी कहते हैं बाकी बहुत कुछ भूल जाय प्रेम पगी /प्रेम में परिपाक हुई अनुभूतियाँ मृत्यु शैया तक भी नहीं भूलतीं /छूटती ..वे जीवन को अनुप्राणित करने वाली एक पुनर्नवीय सतत  ऊर्जा बन पल पल कदमताल करती चलती रहती हैं ...बहरहाल ....

 प्रेम की उसी रूहानी  अनुभूति को अभिव्यक्त करती गुलाम अली की दो गजलें आपकी सेवा में आज प्रस्तुत हैं -मैं हूँ तो मेहंदी हसन का फैन मगर गुलाम अली की गायी  कुछ गजलें भी बेखुदी के आलम में पहुंचा देती हैं -एक बानगी -इस गजल को किसने लिखा है कोई बताएगें क्या ?

वो कभी मिल जायं तो क्या कीजिये 
रात दिन सूरत को देखा कीजिये
चांदनी रातों में इक इक फूल को
बेखुदी कहती है सजदा कीजिये
जो तमन्ना बर न आये ,उम्र भर
उम्र भर उसकी तमन्ना कीजिये
इश्क  की रंगीनियों में डूबकर
चांदनी रातों में रोया कीजिये
हम ही उसके इश्क के काबिल ना थे
क्यों किसी जालिम का शिकवा कीजिये

इसे यहाँ जरूर जरूर  सुन भी लीजिये ..अब गुलाम अली की ही गायी एक और गजल -नासिर काजमी की 
पूरी यह गजल यूं है -
दिल में इक लहर सी उठी है अभी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी
शोर बरपा है खान-ए दिल में
कोई दीवार सी गिरी है अभी
भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी
याद के बेनिशाँ जज़ीरों से
तेरी आवाज़ आरही है अभी
शहर की बेचिराग गलियों में
ज़िन्दगी मुझ को ढूंढती है अभी
सो गए लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी
तुम तो यारो अभी से उठ बैठे
शहर में रात जगती है अभी
वक़्त अच्छा भी आयेगा नासिर
ग़म न कर ज़िन्दगी पड़ी है अभी
 अब आप भी प्रेम की रूहानी यादों में तनिक खो जाईये तो बात बनें !
 
 
 

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