अभिव्यक्ति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अभिव्यक्ति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 12 सितंबर 2015

विकास के आयाम : सपने और यथार्थ! (सोनभद्र संगोष्ठी )

सोनभद्र जिले का हेडक्वार्टर राबर्टसगंज अपनी कस्बाई सांस्कृतिक विरासत  के बावजूद मानवीय सृजनात्मकता और बौद्धिकता से ओत  प्रोत रहा है।  इन दिनों यहाँ एक बौद्धिक विमर्श के नए चलन का सूत्रपात हुआ है जिसके अंतर्गत प्रति माह किसी विषय पर चर्चा और विचार विनिमय होता है। विगत चर्चा उत्तर आधुनिकता और परामानववाद पर केंद्रित थी।  आज (१२ सितम्बर ,२०१५ )  कलमकार संघ द्वारा  आयोजित संगोष्ठी  का विषय था- विकास के आयाम : सपने और यथार्थ. इस विषय पर राबर्ट्सगंज के जाने माने बुद्धिजीवियों, विचारकों -लेखकों  ने अपने विचार व्यक्त किये.

श्री अजय सिंह जो यहाँ जिला आपूर्ति अधिकारी(डी एस ओ ) हैं ने विषय की प्रस्तावना की। उन्होंने जुमले की तरह इस्तेमाल हो रहे शब्द -विकास के कई निहितार्थों को उकेरा। आर्थात कैसा विकास ,किसका विकास, विकास की परिभाषा क्या हो?  उन्होंने विकास के हानि लाभ के पहलुओं को रेखांकित किया और कहा हमें यह देखना होगा कि कहीं ऐसा न हो कि हम विकास से  पाएं कम और गवाएं ज्यादा। मतलब कहीं लाभ हानि से कमतर होकर न रह जाए।  


श्री रामप्रसाद यादव ने संचालन  की जिम्मेदारी उठाई और संविधान के मूल उद्येश्यों के तहत विकास के लक्ष्य को सामने रखा।  उन्होंने कहा कि हमें बहुमंजिली इमारतों , ऊंची चिमनियों, हाईवेज ,मेट्रो , स्मार्ट सिटी और बिना  पानी के सूखते खेतों ,बेरोजगारी , अशिक्षा ,भुखमरी और कुपोषण आदि मानवीय विभीषिकाओं के  विरोधाभास  के मध्य विकास का सही मार्ग तय करना होगा। दीपक केसरवानी  ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए औद्योगीकरण से उपजते सकंटों  और सोनभद्र के रिहंद जलाशय से उत्पन्न विस्थापन और प्रदूषण की त्रासदी की ओर ध्यान दिलाया।  

 प्रखर चिंतक विचारक रामनाथ शिवेंद्र के  बीज वक्तव्य में उनकी कई चिंताएं अभिव्यक्त हुईं। उनके अनुसार पश्चिम का अन्धानुकरण करना हमारी विवशता है. सपनों और यथार्थ में बड़ी दूरी है।  और वाह्य आक्रमणों से अधिक खतरा भीतर से है।  उन्होंने आह्वान किया कि हमें अपने विकास के मानक तय करने होंगें।  हर खेत को पानी हर हाथ को काम। क्म लागत से अधिक उत्पादन।  विकास की धारा में मानवीय संवेदनाएं तिरोहित न हों। 
राजनीतिक चिंतक और विचारक अजय शेखर ने विकास के मानकों के पुनर्निर्धारण की जरुरत बतायी। उन्होंने कहा कि हमने विकास के मॉडल में सांस्कृतिक मानकों को नहीं लिया।  मनुष्य विकास के केंद्र में है तो फिर मनुष्यता के अवयवों को भी विकास के मॉडल में समाहित होने चाहिए।  विकास के मौजूदा स्वरुप में कमियां उभर कर दिख रहीं है -आज विकास भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है।  हेराफेरी ,चोरी, लूट  और व्यभिचार विकास के आनुषंगिक पहलू बन गए हैं -क्या यही विकास हमें चाहिए? उन्होंने तेजी से नष्ट हो रहे पर्यावरण का उल्लेख किया।  वनौषधियों के विलोपन का हवाला दिया।  ऐसा विकलांग विकास भला कैसे स्वीकार्य होगा? 


अमरनाथ अजेय ने अंग्रेजों की कुटिल नीतियों -फूट डालो राज्य करो से आरम्भ हुए अलगाव ,बिखराव की  स्थितियों को विकास का रोड़ा माना और स्पष्ट किया कि जब तक आर्थिक आधार पर सभी को स्वतन्त्रता नहीं मिलती सही अर्थों में विकास संभव नहीं है। शिक्षक ओमप्रकाश त्रिपाठी ने भारत में विकास के पंचवर्षीय अभियानों का जिक्र करते हुए औद्योगिक विकास के एक आपत्तिजनक पहलू को उजागर किया जिसमें हमारे सांस्कृतिक मूल्य तिरोहित होते गए हैं. एक बाहरी भौतिकता का आकर्षक आवरण है जिसके पीछे मनुष्य का निरंतर चारित्रिक ह्रास हो रहा है।  हमारा विकास पश्चिम का अंधानुकरण है।  हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं।  हमें वस्तुतः अपने जीवन मूल्यों और अध्यात्म के साथ कदमताल करता विकास का मॉडल चाहिए। 

कवि जगदीश पंथी जी के सम्बोधन का सारभूत विकास की राह में वैयक्तिक और समूहगत टूटन, विखंडन और विश्वसनीयता के संकट से उपजते त्रासद स्थितियों का जिक्र रहा।  जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो फिर क्या कैसा विकास होगा? 

गीता के अनन्य प्रेमी प्रेमनाथ चौबे ने विकास मार्ग के कतिपय प्रतिरोधों की चर्चा की।  जहाँ अन्धविश्वास हो , छुआछूत और भूत प्रेत टोना का बोलबाला हो वहां विकास का भला कैसा स्वरुप फलित होगा? उनका मानना था कि विकास के लिए एक राष्ट्रीय सोच जरूरी है। जापान का उदाहरण देकर उन्होंने स्पष्ट किया कि विकास के लिए राष्ट्रीय सोच होना जरूरी है. यह भी दुहराया कि बिना समानता ,स्वतंत्रता और बंधुत्व के विकास का सही स्वरुप सामने नहीं आ पायेगा।बिखराव में कैसा विकास? उन्होंने विकास को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुकूल और अनुरूप होने की शर्त रखी. उनके शब्दों में विकास अभी भी एक सपना है। 

भौतिकी के प्रोफ़ेसर रहे पारसनाथ मिश्र ने कहा कि दरअसल मनुष्य के जीवन के जो आयाम हैं वही विकास के भी आयाम हैं. कपडा रोटी और मकान की आधारभूत जरूरतें विकास के स्वरुप को नियत करती हैं।  भूख है तो अन्न चाहिए , अन्न उत्पादन होगा तो उसके संरक्षण और वितरण की श्रृंखला विकास के सोपानों को तय करेगी. वैसे ही हमारे लिए अनेक जरूरी उत्पाद वस्त्र ,आवास, शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य विकास के पैमानों को तय करते हैं।  किन्तु आज जो विकास हो रहा है उसने जितना दिया उससे ज्यादा हमसे छीन  लिया है।  उन्होंने हल बैल से मंगल यात्रा तक के विकास में वैज्ञानिक दृष्टि की अपरिहार्यता पर विशेष बल दिया।  नित नए अनुसंधान की जरुरत बतायी।  उनकी चिंता यह भी रही कि आज हमारी निष्ठायें विभाजित हैं , आस्थाओं और आचरण  के अलग अलग पड़ाव हैं।  किन्तु हमें अपनी पहचान नहीं खोनी  है। विकास के किसी भी मॉडल में भारतीयता अक्षुण रहे.हम अनुकरणीय बने  न कि अनुकरणकर्ता। 

अपने तक़रीर में चन्द्रभान शर्मा बहुत आशावादी दिखे।  उनका कहना था कि हमारे मनीषियों ने विकास का जो प्लान तैयार किया  वह उचित है और आलोचना किया जाना उचित नहीं है।  हमारी अनेकता और विभिन्नताओं के बावजूद विकास होना दिख रहा है।  आज फटेहाल लोग कमतर हुए हैं।  सपने धरातल पर धीरे धीरे उत्तर तो रहे हैं। धैर्य रखना होगा।  

संगोष्ठी के अध्यक्ष शिवधारी शरण राय ने समस्त विचारों के निचोड़ के रूप में अपना अभिमत दिया कि विकास हो किन्तु विनाश की कीमत पर नहीं।  भारत सदैव मौलिक चिंतन का उद्गम रहा है ,वैज्ञानिक बर्नियर यहाँ  ज्ञान और परमार्थ की खोज में आया था।  हमारे कई शाश्वत मूल्य विकास के विभिन्न स्वरूपों में समाहित हों यही अभीष्ट है।  

संगोष्ठी आत्मीय माहौल में संपन्न हुई और प्रतिभागियों में  एक नए उत्तरदायित्व बोध का सबब बनी. यह पुरजोर मांग रही कि ऐसे समूह चिंतन और अभिव्यक्ति का सिलसिला चलता रहे।  आगामी संगोष्ठी की प्रतीक्षा सभी को है। 

 

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

आओ भामाशाहों आओ -हिन्दी ब्लागिंग को उबारो!

जब हिन्दी ब्लॉगों का एक दशक पहले आगाज  हुआ था तो कहा गया था कि अभिव्यक्ति  के  एक युगांतरकारी माध्यम का आगमन हो गया है। अब न तो संपादकों की  कैंची  का डर था और न कही कोई रोक टोक।बेख़ौफ़ बयानी का एक चुंबकीय आमंत्रण था। यह वह दौर था जब कंप्यूटर की शिक्षा लेकर युवाओं की एक फ़ौज अंतर्जाल की नयी संभावनाओं को तलाश रही थी। जाहिर है उनमें से  अधिकांश का सृजनात्मक लेखन से कोई  लेना देना नहीं था और न  कोई अनुभव ।  फिर भी उन्होंने अंतर्जाल पर हिन्दी लेखन की अलख जगाई और उसमें से कुछ तो रातो रात अच्छे लेखक के रूप में सन्नाम भी हो गए। यह समय (2003 -२००७ ) हिन्दी ब्लॉग लेखन का प्रस्फुटन  काल था।

हिन्दी  ब्लॉग जगत में इसके बाद साहित्यिक और सृजनात्मक प्रतिभाओं की पैठ हुई और लगने लगा कि हिन्दी ब्लागिंग के रूप में अभिव्यक्ति का एक नया युग आ गया है जो पारम्परिक मीडिया को धता बताकर रहेगा। और हिन्दी ब्लागिंग की यह धमक और ठसक आगे के कई सालों तक बनी रही। और इस माध्यम/विधा की खिलाफत भी हिन्दी के पारम्परिक खुर्राट और खेमेबाज साहित्यकारों  /संपादको की ओर से शुरू हो गयी गई -उन्हें अचानक अपने विस्थापन  का खतरा भी दिखाई देने  लग  गया था।  मजे की बात यह कि वे ब्लॉग बैठकियों में मुख्य अतिथि की हैसियत से  बुलाये जाते और मंच पर ही इस माध्यम की खिल्ली उड़ा आते। आत्ममुग्ध ब्लागर  ऐठ में उनकी बातों को तवज्जो नहीं देते। यह  हिन्दी  ब्लॉग जगत का पुष्पन -पल्लवन काल(2007 - 2010 था। 

ठीक इसके बाद ब्लॉग जगत का वह हाहाकारी स्वर्णकाल आया जिससे प्रतिभाओं का अजस्र  बहाव यहाँ देखा गया ।  एक से एक सच्चे प्रतिभाशाली , आत्ममुग्ध और स्वनामधन्य महानुभाव अवतरित हुए जिन्हे  ब्लागजगत  के अब तक पुरायट कहे जा रहे ब्लागरों ने सीख दी , संरक्षण दिया और दुर्भाग्य से हिन्दी ब्लागजगत में भी पारम्परिक साहित्य की अनेक दुष्प्रवृत्तियों का यहीं से आरम्भ शुरू हुआ। खेमे बने ,'मठ' बने और मठाधीश बने।  जाति  बिरादरी के नाम पर गोलबंदी शुरू  हुयी। कई  मगरूर ब्लॉगर आये। कई बेशऊर भी आये।  किसी ने मखमली माहौल बनाया तो किसी ने इस्पाती ताकत दिखाई। व्यर्थ के लड़ाई झगड़े बहस मुहाबिसे और रोज की चख चख ।  सृजन गायब होने लगा -रगड़ घषड़ की ऊष्मा ही ज्यादा फ़ैली।  लोगों ने देख सुन लेने की धमकियां  भी दी लीं. 

भारत का अब तक न जाने कहाँ  सोया नारीत्व भी  अचानक जाग दहाड़ें मारने लग गया  .ब्लागरों की पुरुष महिला कैटेगरी  का क्लीवेज भी साफ ज़ाहिर हो चला।  स्वाभाविक था रचनाशील सौम्यता अब परदे के पीछे जा पहुँची थी।  हिन्दी ब्लागजगत का मोहभंग काल अब शुरू हो चला था।  कुछ का ऐसा मोहभंग हुआ कि उन्होंने मुद्रण माध्यम का दामन थाम लिया -जिसे वे कभी  पानी पी पीकर कोसते थे।  कुछ ने तो यहाँ तम्बू उखड़ने के अंदेशे से  झटपट इस माध्यम  का लांचिंग पैड की तरह इस्तेमाल कर प्रकाशकों से  मिल मिला पैसे वैसे दे दिलाकर किताबें छपवाईं  और बिकवानी शुरू कर दीं।  

हिन्दी ब्लागजगत का अवसान काल  अब आसन्न था। दशेक काल में सब कुछ हो हवा गया।  उत्थान पतन सब।  अभी भी लोग कहते  हैं, नहीं नहीं ब्लॉग अब भी खूब लिखे पढ़े जा रहे हैं -मगर पाठक हैं कहाँ  भाई? हिन्दी के अन्तरजालीय पाठकों को हमने संस्कारित ही तो नहीं  किया -यहाँ तो सब  ब्लॉगर लेखक ही हैं -ब्लॉग पाठकों का टोटा है -उनकी कोई जमात नहीं, जत्था नहीं। यहाँ ब्लॉगर ही लेखक है और खुद  वही पाठक भी । अलग से पाठक वर्ग गायब है।  पाठकों को ललचाये  जाए बिना हिन्दी जगत के दिन बहुरने से रहे। तब तक शायद हम ब्लॉगर अल्पसंख्यकों को हाथ पर हाथ बैठे रहना होगा।  इस माध्यम को भी अब प्रायोजकों  प्रश्रयदाताओं की ही  तलाश है -आओ भामाशाहों आओ -हिन्दी ब्लागिंग को उबारो ! 

 

सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

हिन्दी ब्लॉगों की अस्मिता का सवाल!

अभी कल ही नए ब्लॉग संग्राहक ब्लॉग सेतु के संचालक केवल राम जी ने अपने फेसबुक वाल पर मेरे ब्लॉग क्वचिदन्यतोपि का हेडर लगा कर मित्रों से इस नाम पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी थी। अभी कोई प्रतिक्रिया आयी भी न थी कि सहसा मैंने उसे देख लिया और थोड़ा असहज हो गया। क्योकि एक तो यह शब्द लोगों की जुबान पर सहजता से चढ़ता नहीं है दूसरे अब यह पुराने ज़माने का ब्लॉग हो गया -लोग याद भी काहें रखें। मुझे केवल राम जी की सदाशयता पर किंचित भी संदेह नहीं है फिर मुझे यह भी डर लगा कि कहीं कोई टिप्पणी न आने से मेरी बेइज्जती न खराब हो जाय -लोग कहें कि ई लो देखो बड़े बनते हैं बड़का ब्लॉगर और आज कोई पूछने वाला भी नहीं है -अब हम लाख कहते कि भाई मैं कोई गुजरा वक्त भी नहीं जो आ न सकूँ मगर कोई काहें को मानता। कई मित्रगण तो आज भी गाहे बगाहे मेरी खिंचाई पर ही लगे रहते हैं। अब लोगों को मौका न मिले यही सोचकर मैंने जल्दी से वहां एक झेंपी हुयी टिप्पणी चिपका ही तो दी। अब यह पोस्ट टिप्पणी विहीन तो नहीं रहेगी। शर्मनाक स्थिति से कुछ तो राहत मिलेगी।

बहरहाल कुछ समय बाद ही वहां ब्लॉग शिरोमणि अनूप शुक्ल जी का आगमन हो गया और उन्होंने मेरे सम्मान की कुछ रक्षा कर दी -क्वचिदन्यतोपि के अर्थादि को लेकर मेरे ब्लॉग पोस्ट वहां लगाए -यह अनूप जी की विशिष्ट विशेषता है -ब्लॉग के आदि(म) पुरुषों में से हैं वें और ब्लॉग साहित्य की कालजीविता के लिए प्राणपण से जुटे रहते हैं -दोस्त दुश्मन में कोई भेद किये बिना। और महानुभाव ब्लॉगों के चलते फिरते इनसाइक्लोपीडिया भी हैं अलग। वे इस माध्यम/विधा को आगे ले चलने को सदैव तत्पर रहते हैं। मुझे आश्चर्य है कि उनके इस महनीय योगदान के बाद भी देश के नामी गिरामी पुरस्कार देऊ संस्थायें उन तक क्यों नहीं पहुँच रहीं। अब तो मुझे लगता है अनूप जी को खुद एक बड़का पुरस्कार घोषित कर देना चाहिए -कम से कम बीस पच्चीस हजार का -इतना वेतन तो पाते हैं वे अब कोई लाख सवा लाख रूपये मासिक तो जरूर ही. ऐसे और कई महानुभाव हैं नाम नहीं ले सकता क्योकि उनसे इतनी स्वच्छंदता नहीं ले सकता जितनी अनूप जी से मगर आह्वान है कि वे भी आगे आएं और एक फंड स्थापित किया जाय जो अच्छे युवा ब्लागरों को पुरस्कृत कर सके। मैं भी अकिंचन योगदान दे सकता हूँ। अपने सतीश सक्सेना जी भी इस पुनीत कार्य में पीछे न रहगें!

अब वक्त यही है कि पहली पीढ़ी के ब्लॉगर आएं और इस माध्यम/विधा को प्रोत्साहित करने को अपनी टेंट ढीली करें ताकि ब्लागिंग का टेंट फिर मजबूती से गड जाए। मैं उन मन को बहलाने वाले विचारों से कतई सहमत नहीं हूँ कि आज भी ब्लागिंग की रौनक कायम है, ब्ला ब्ला ब्ला। अब समय है हम अपना आर्थिक योगदान भी सुनिश्चित करें अन्यथा हिन्दी ब्लागिंग पर उमड़ते संकट को देखा जा सकता है। मुद्रण माध्यम में छपास का मोह और फेसबुक इसे ले डूबने वाला है। तो ब्लागिंग के अग्रदूतों का आह्वान है कि वे इस संकट की बेला में कोई ठोस आर्थिक प्रस्ताव लेकर आएं और हम सब मिल बैठ कर उसे कार्यान्वित करें -एक ख़ास ब्लॉग बैठकी इस काज के लिए भी आहूत की जा सकती है। आप सभी के विचार आमंत्रित हैं -खुदगर्जी से तनिक आगे बढ़ें और ब्लॉग बहुजन हिताय कोई ठोस काम करें!

अंतर्जाल ने हमें मौका दिया अपने परिचय के वितान को विस्तारित करने का -आज हम चंद वर्षों में ही कितने परिचय समृद्ध हो चुके हैं। चिर ऋणी हैं अंतर्जाल के जिसने कितने ही सुदूर क्षेत्र और रुचियों के लोगों को एक साथ ही ला खड़ा नहीं किया, आजीवन प्रगाढ़ संबंधों की नींव भी रख दी। हाँ इस मौके पर कुछ मित्र मुझे शिद्दत से याद आ रहे हैं जो अंतर्जाल से छिटक कर दुनिया की भीड़ में खो गए हैं -मगर कोई बात नहीं -कोई तो मजबूरी रही होगी वार्ना यूं ही कोई बेवफा नहीं होता। हाँ अगर उन तक भी यह बात संदेशवाहकों या समकालीन नारदों के जरिये पहुंचे तो उनका भी स्वागत है अगर वे जुड़ना चाहें इस मुहिम में! अज्ञात रहकर भी लोग यथायोगय गुप्तदान कर सकते हैं।

केवल राम जी, आप से बस इतना ही कहना कि आप की युक्ति कामयाब रही। गांडीव उठवा दिया आपने और अनूप जी आपको भी शुक्रिया कि क्वचिदन्यतोपि के बंद करने की (मिथ्या ) घोषणा करके आपने मुझे प्रतिवाद करने को उकसा दिया। मगर मेरे प्रस्ताव पर ध्यान जरूर दीजिये और मित्रगण भी अपने विचार यहाँ प्रगट करें और कुछ दान दक्षिणा दे सकते हों तो सलज्ज /निर्लज्ज होकर कहें भी -क्योकि यह हिन्दी ब्लॉगों की अस्मिता का सवाल है।

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

पारम्परिक मीडिया बनाम सोशल मीडिया: नए आयाम, नई चुनौतियां! ( परिप्रेक्ष्य: हिन्दी दिवस)


मानव के विकास में उसके शिकारी जीवन के आदि हुंकरणों से शुरू हुई अभिव्यक्ति की महायात्रा के भाषाई पड़ावों का अध्ययन बहुत रोचक है। मनुष्य ने संवाद की दिशा में संकेतों/शिकारों ,हाव भाव(gestures ) का सहारा लेते हुए भाषिक संवाद की भी जो क्षमता विकसित की वह समूचे जीव जगत की अनूठी घटना है। एक सामजिक प्राणी के रूप में भाषाई ईजाद ने बोलियों वाक्यों की संरचना मार्ग प्रशस्त किया और मनुष्य आपसी संवाद समन्वय से विकास की एक अनन्य मिसाल कायम कायम की। अब उसके पास भावों के आदिम प्रगटन की भाव भंगिमाओं और अभिव्यक्ति के शैल चित्रीय या भोजपत्रीय माध्यमों के अलावा एक तेजी से विकसित हो रही भाषा का भी सहारा था जिसमें विश्व के प्राचीनतम वैदिक साहित्य की वाचिक और श्रुति परम्परा से आरम्भ होकर आज के डिजिटल मीडिया तक का इतिहास समाहित है। वाचिक / श्रुति परम्पराओं से आगे लेखन और मुद्रण तक का इतिहास सहज ही ज्ञेय है। मुद्रण माध्यमों ने जहां समाचार पत्र पत्रिकाओं,पुस्तको के जरिये जन संवाद का नया अध्याय शुरू किया वहां प्रसारण माध्यमों में दृश्य और श्रव्य दोनों तरीकों का खूब विकास हुआ -सिनेमा और आकाशवाणी ने जन संवाद की नई मिसालें कायम की। मीडिया के इन विविध रूपों से आम समाज पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर तरह तरह आशंकाएं भी उठती रही हैं।
मीडिया और जन मानस

मीडिया के बारे में अक्सर यह बात कही जाती रही है कि वह जन विचारों को प्रभावित कर सकती है और समूह 'ब्रेन वाश' करने में भी सक्षम है। यहाँ तक कि विचारों को भी एक केंद्रीय कंट्रोल /कमांड के जरिये संचालित और नियमित भी किया सकता है. इन कथानकों पर कई कई साइंस फिक्शन फ़िल्में और उपन्यास आधारित हैं जो जनमानस और मीडिया के पारस्परिक अंतर्सबंधों की विविध संभावनाएं प्रगट करते हैं। जार्ज आर्वेल ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास 1 9 8 4 में 'बिग बास इज वाचिंग यू' जैसे दहशत भरे तकनीकी दुरूपयोग की ओर इशारा किया था। विगत डेढ़ दशक से नई मीडिया -डिजिटल मीडिया का वर्चस्व दिन दूनी रात चौगुनी दर बढ़ा है जिसकी ऑफशूट है -सोशल मीडिया। सोशल मीडिया कम्प्यूटर क्रान्ति की देन है। डिजटल दुनिया का एक नया जिन! अब सोशल मीडिया की लोक गम्यता क्या क्या गुल खिला रही है यह छुपा नहीं है. खाड़ी देशों की सद्य संपन्न जन क्रांतियाँ गवाह हैं। अभी संपन्न सामान्य निर्वाचन में भी सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल हुआ है। जिसके जन प्रभावोत्पादकता के मुद्दे पर बहस अभी भी जारी है।

चिट्ठे और सोशल मीडिया

अंतर्जाल पर जब हिन्दी ब्लॉगों का प्रादुर्भाव कोई एक दशक पहले नियमित तौर पर शुरू हुआ तो लगा अभिव्यक्ति के नए पर उग गए हैं। सृजनशीलता और अभिव्यक्ति जो अभी तक 'क्रूर' संपादकों के रहमोकरम पर थी सहसा एक नयी आजादी पा गयी थी। कोई क़तर ब्योंत नहीं -अपना लिखा खुद छापो। अंतर्जाल ने लेखनी को बिना लगाम के घोड़े सा सरपट दौड़ा दिया। खुद लेखक खुद संपादक और खुद प्रकाशक। लगा कि अभिव्यक्ति की यह 'न भूतो न भविष्यति' किस्म की आजादी है। अब संपादकों के कठोर अनुशासन से रचनाधर्मिता मुक्त हो चली थी ,लगने लगा। किन्तु आरंभिक सुखानुभूति के बाद जल्दी ही कंटेंट की क्वालिटी का सवाल उठने लगा. हर वह व्यक्ति जो कम्प्यूटर का ऐ बी सी भी जान गया पिंगल शास्त्री वैयाकरण बन बैठने का मुगालता पाल बैठा। नतीजतन 'सिर धुन गिरा लॉग पछताना' जैसी स्थिति बन आई. ब्लॉग को साहित्य मान बैठने का भ्रम टूटने लगा है -यह एक माध्यम भर है या फिर साहित्य की एक विधा इस विषय पर भी काफी बहस मुबाहिसे हो चुके।

क्या हिन्दी ब्लॉगों के अवसान की बेला आ गई ?

लगता है हिन्दी ब्लॉगों का अवसान आ पहुंचा है? -उनकी पठनीयता गिरी है -कई पुराने मशहूर ब्लॉगों के डेरे तम्बू उखड चुके हैं -वहां अब कोई झाँकने तक नहीं जाता। हाँ यह जरूर हुआ कि कई रचनाकारों को ब्लॉग और फेसबुक के चलते पारम्परिक मुद्रण मीडिया में पहचान मिली और उन्होंने इस नए मीडिया को लांचिंग पैड की तरह इस्तेमाल किया। किन्तु अंतर्जाल पर अपने चुटीले कार्टूनों से ब्लॉग जगत में विशिष्ट पहचान बनाने वाले काजल कुमार का कहना है कि "ब्‍लॉग और सोशल मीडि‍या आज भी अत्‍यंत सशक्‍त माध्‍यम हें. आज भी तथाकथि‍त ग्‍लैमर वाला मीडि‍या, ब्‍लॉगों और सोशल मीडि‍या की ख़बरों के बि‍ना जी नहीं पा रहा है. जब कुछ घटता है तो लोग उसी समय नवीनतम जानकारी के लि‍ए सोशल मीडि‍या पर लॉगइन करते हैं क्‍योंकि‍ यह त्‍वरि‍त है.बात बस इतनी सी है कि‍ जो लोग अख़बारों/पत्रि‍काओं में छप नहीं पा रहे थे उनके लि‍ए ब्‍लॉग एक नई हवा का झोंका लाया, ब्‍लॉगिंग को उन्‍होंने स्‍प्रिंगबोर्ड की तरह प्रयोग कि‍या और फि‍र वे यहां-वहां छपने लगे. उनकी मनोकामना पूर्ण हुई. दूसरे, आत्‍मश्‍लाघापीड़ि‍तों ने परस्‍पर-प्रशंसा के लि‍ए अपने-अपने गुट बना लि‍ए और मि‍ल-बांट कर आपस में छप और पढ़ रहे हैं. यह स्‍टॉक एक्‍सचेंज की ऑटोकरेक्‍शन जैसा है. इन सबसे, बहुत ज्‍यादा कुछ अंतर नहीं आने वाला... ब्‍लॉगिंग की अपनी जगह है बरसाती मेढक आते-जाते ही रहते हैं." अखबार भी जन मानस में पैठ बनाये हुए हैं। हाँ व्यापक रीडरशिप पाने के लिए कई मीडिया समूह अब अंतर्जाल पर भी जाकर अपना वर्चस्व बना लिए हैं।

डिजिटल डिवाईड

अंतर्जाल की सुविधा सहूलियत कितनो के पास है ? यह सवाल मौजू है। कितने लोगों के पास कम्प्यूटर और कनेक्टिविटी है ? बिजली की क्या उपलब्धता है -यही वे कारण हैं जिनसे यह आशंका बलवती हुयी की तकनीकी संचार से दो तरह की दुनिया वजूद में आ रही है -एक जिसके पास अंतर्जाल तक की पहुँच है और एक जिसके लिए अभी भी अंतर्जाल एक स्वप्न है -समाज में विषमता की एक नयी खाईं गहराती नज़र आ रही है -और जन सुविधाओं का आबंटन भी कहीं इस डिजिटल डिवाईड पर आधारित न हो जाय ? वह प्रौद्योगिकी ही क्या जो जन सुलभ और बहुजन सुखाय बहुजन हिताय न हो ? ये सारे सवाल आज विचार मंथन के मुद्दे बने हुए हैं। यह सही है कि पारम्परिक मीडिया भी ऐसी सम्भावनाओं की आहट पाकर अब अपने को अंतर्जालीय संस्कृति की ओर मोड़ रहा है मगर यह भी सच है कि अंतर्जाल तक अभी भी जान सामान्य की पहुँच नहीं हो पायी है। मगर सोशल मीडिया ने एक संचार क्रान्ति का बिगुल जरूर फूँक दिया है!

फेसबुक का बढ़ता वर्चस्व

फेसबुक पर आबाद होने वाले ब्लागरों की संख्या काफी ज्यादा हो चुकी है .वे भी जो कभी पानी पी पी कर फेसबुक को कोसते और उसकी सीमाओं को रेखांकित करते रहते थे अब फेसबुक पर विराजमान ही नहीं काफी सक्रिय हो चले हैं और ब्लागिंग को खुद हाशिये पर डाल चुके हैं .तथापि उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता क्योकि यह 'मानवीय भूल ' बहुत स्वाभाविक थी और वे इस डिजिटल मीडिया की अन्तर्निहित संभावनाओं को आंक नहीं पाए थे जबकि इस विषय पर कई बार मित्र ब्लागरों का ध्यान आकर्षित किया गया था। आज भी यह बल देकर कहा जा सकता कि कि फेसबुक में ब्लागिंग से ज्यादा फीचर्स हैं और यह ब्लागिंग की तुलना में काफी बेहतर है .बहुत ही यूजर फ्रेंडली है . अदने से मोबाईल से एक्सेस किया जा सकता है .भीड़ भाड़ ,पैदल रास्ते ,बस ट्राम ट्रेन ,डायनिंग -लिविंग रूम से टायलेट तक आप फेसबुक पर संवाद कर सकते हैं . ज़ाहिर है यह सबसे तेज संवाद माध्यम बन चुका है . महज तुरंता विचार ही नहीं आप बाकायदा पूरा विचारशील आलेख लिख सकते हैं और गंभीर विचार विमर्श भी यहाँ कर सकते हैं। आसानी से कोई भी फोटो अपडेट कर सकते हैं . वीडियो और पोडकास्ट कर सकते हैं . ब्लॉगर मित्र तो इसे अपने ब्लॉग पोस्ट को भी हाईलायिट करने के लिए काफी पहले से यूज कर रहे हैं . वे पिछड़े हैं जो ब्लागिंग तक ही सिमटे हैं!

नाम अनेक काम एक 
दरअसल ब्लागिंग या सोशल नेटवर्क साईट्स -फेसबुक ,ट्विटर आदि सभी वैकल्पिक मीडिया/सोशल मीडिया /नई मीडिया /डिजिटल मीडिया (नाम अनेक काम एक ) की छतरी में आते हैं और मुद्रण माध्यम की तुलना में आधुनिक और बहुआयामी हो चले हैं .मुझे हैरत है कि लोग यहाँ आकर फिर उसी 'मुग़ल कालीन' युग में क्यूंकर लौट रहे हैं . मुद्रण माध्यमों की पहुँच इतनी सीमित हो चली है कि एक शहर के अखबार /रिसाले में क्या छपता है दूसरे शहर वाला तक नहीं जानता . मतलब मुद्रण माध्यम हद दर्जे तक सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गए हैं . मजे की बात देखिये जो मुद्रण माध्यम में अपनी समझ के अनुसार कोई बड़ा तीर मार ले रहे हैं वे उसे भी फेसबुक पर डालने से नहीं चूकते!

पैसा कमाना एक आनुषंगिक उपलब्धि हो सकती है मगर वह हमारे सामाजिक सरोकार को भला कैसे धता बता सकता है? हम ब्लागिंग या डिजिटल मीडिया में क्या केवल चंद रुपयों की मोह में आये थे? जो अब यहाँ नहीं पूरा हुआ तो मुद्रण माध्यम की ओर वापस लौट लिए?या फिर डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए किया और फिर इसे भुनाने मुद्रण माध्यम की ओर लौट चले जैसा कि दिनेश जी ने कहा ? मुफ्तखोर मुद्रण मीडिया तो अब खुद डिजिटल मीडिया के भरोसे पल रहा है -यहाँ से हमारी सामग्री बिना पूछे पाछे उठाकर छाप रहा है। आह्वान है कि इस डिजिटल मीडिया को छोड़कर कहीं न जाएँ . आज का और आने वाले कल का मीडिया यही है, यही है!

सोशल मीडिया की अनेक नेटवर्किंग साईट या फिर ब्लॉग अपने कंटेंट/ फीड की नेट वर्किंग के चलते एक प्रमुख सोशल मीडियम बन कर उभरा है . यहाँ कोई ख़ास प्रतिबन्ध नहीं है या बिल्कुल भी प्रतिबन्ध नहीं है .किन्तु यही खतरे की सुगबुगाहट है .....इसके दुरूपयोग की संभावनाएं हैं -साईबर आतंकवाद की भयावनी संभावनाएं हैं .जिसकी एक बानगी अभी हम बड़ी संख्या में शहरों से लोगों के असम पलायन के रूप में देख चुके हैं -एक दहशतनाक मंजर! ...ऐसी अफवाहें और भी संगठित रूप से किसी भी मसले को लेकर फिर फैलाई जा सकती है -सारे देश में अफरा तफरी का माहौल बन सकता है -यह साईबर आतंकवाद की एक छोटी सी मिसाल है ,झलक है .हमें सावधान रहना है .

इंटेलिजेंट मशीनें
तकनीक के दुरूपयोग को भयावह दानव का मिथकीय रूप दिया जा सकता है ...इस अर्थ में तकनीक को हमेशा चेरी की ही भूमिका में रहने को नियमित करना होगा ,कभी भी स्वामिनी न बने वह ..(जेंडर सहिष्णु लोग इसे स्वामी या दास शब्द के रूप में कृपया गृहीत कर लें) ..और अब तो स्मार्ट प्रौद्योगिकी वाली इंटेलिजेंट मशीनें भी आ धमकने वाली हैं जिसके पास खुद अपने सोचने समझने की क्षमता होगी -आगे चल कर इनमें संवेदना भी आ टपकेगी ...तब तो इन पर नियंत्रण और भी मुश्किल होगा -दूरदर्शी विज्ञान कथाकारों ने ऐसी भयावहता को पहले ही भांप लिया था ...इसाक आजिमोव ने इसलिए ही बुद्धिमान मशीनों पर लगाम कसने का जुगत लगाया था अपने थ्री ला आफ रोबोटिक्स के जरिये -जिसका लुब्बे लुआब यह कि कोई मशीन मानवता को नुकसान नहीं पहुंचा सकती ..मनुष्य के आदेश का उल्लंघन भी कर सकती है अगर मानवता का नुकसान होता है तो ....वैज्ञानिक ऐसी युक्तियों पर काम कर रहे हैं जिससे मशीनें बुद्धिमान तो बनें मगर मनुष्यता की दुश्मन न बने ....ऐसे नियंत्रण जरुरी हैं खासकर आनेवाली बुद्धिमान मशीनों के लिए .मगर आज भी जो मशीनें हैं ,अंतर्जाल प्रौद्योगिकी की कई प्राविधि -सुविधाएं हैं उन पर भी एक विवेकपूर्ण नियंत्रण तो होना ही चाहिए -मगर यह हम पर ही निर्भर हैं -हम इसका सदुपयोग करते हैं या दुरूपयोग!


आज सोशल मीडिया अपने शुरुआती स्वरुप यानी निजी संपर्क /अभिव्यक्ति से ऊपर आ सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ चुका है .आज कितने ही सामुदायिक ब्लॉग हैं और विषयाधारित ब्लॉग हैं -साहित्य ,संगीत ,निबंध, कविता ,इतिहास ,विज्ञान, तकनीक आदि आदि के रूप में ब्लागों/फेसबुक आदि का इन्द्रधनुषी सौन्दर्य निखार पा रहा है .....मानवीय अभिव्यक्ति उद्दाम उदात्त हो उठी है ....मानव सर्जना विविधता में मुखरित हो उठी है ... मगर एक बात मैं ख़ास तौर जोर देकर कहना चाहता हूँ -ब्लॉग मात्र अभिव्यक्ति के माध्यम भर नहीं रह गए हैं अब यह अभिव्यक्ति के एक खूबसूरत और सशक्त विधा के रूप में भी पहचाने जाने की दरख्वास्त भी करते हैं.

माध्यम या विधा
विधाओं के अपने पहचान के लक्षण होते हैं -जैसे कहानी का अंत अप्रत्याशित हो ,ख़बरों का शीर्षक अपनी और खींचता हो ,प्रेम कथाओं में प्रेम पसरा पड़ा हो ....सस्पेंस कथाओं में द्वैध भाव हो ,कहानी(शार्ट स्टोरी ) एक बैठक में खत्म होने जैसी हो ....आदि आदि ..तो ऐसे ही सोशल मीडिया में लेखन की विशेषताओं की भी पहचान और इन्गिति होनी चाहिए --क्या हो ब्लॉग विधा के पहचान के लक्षण ? ? -हम इस पर चर्चा कर सकते हैं -जैसे ब्लॉग पोस्ट ज्यादा लम्बी न हों ,ब्रेविटी इज द सोल आफ विट ....गागर में सागर भरने की विधा हो ब्लॉग ...कुछ लोग लम्बी लम्बी कवितायें ,निबंध ब्लागों पर डाल रहे हैं -कितने लोग पढ़ते हैं? -इसलिए कितने ही नामधारी साहित्यकार यहाँ असफल हो रहे हैं क्योकि उनकी पुरानी हथौटी लम्बे लेखों विमर्शों की है ....एक बार शुरू करेगें तो कथ्य का समापन और क़यामत एक ही समय आये ऐसा जज्बा होता है उनका :-) माईक पकड़ेगें तो छोड़ेगें नहीं..
निष्पत्ति
सोशल मीडिया का लेखन ऐसी ही कुशलता की मांग करता है कि कम शब्दों में अपनी बात सामने रखें ....और यह अभ्यास से सम्भव है ..अनावश्यक विस्तार की गुंजाईश इस विधा में नहीं है .... लेखक की लेखकीय कुशलता का लिटमस टेस्ट है सोशल मीडिया में लेखन ...ट्विटर तो १४० कैरेक्टर सीमा में ही अपनी बात कहने की इजाजत देता है ......किसी ने कहा था यहाँ तो मीडिया और मेसेज का भेद ही मिट गया है ..यहाँ मीडिया ही मेसेज है ...

ब्लॉग भी एक ही पोस्ट में लम्बे चौड़े अफ़साने सुनाने का माध्यम /विधा नहीं है ....हाँ जरुरी लगे तो श्रृंखलाबद्ध कर दीजिये पोस्ट को ...मुश्किल यही है ब्लागिंग के तकनीक के सिद्धहस्त जिनकी संख्या बहुत अधिक है यहाँ ,इसे बस माध्यम समझ बैठने की भूल कर बैठे हैं ....जबकि यह एक विधा के रूप में अपार पोटेंशियल लिए है हम इसकी अनदेखी कर रहे हैं .....आज ब्लागों के विधागत स्वरुप को निखारने का वक्त आ गया है ......हाऊ टू मेक अ ब्लॉग से कम जरुरी नहीं है यह जानना कि हाऊ टू राईट अ ब्लॉग? ....

रविवार, 15 जून 2014

क्या पुरुष को बस यही चाहिए?


एक ही धरती एक ही कालावधि मगर लोगों की सोच और रुचियाँ अलग अलग देशों में कितनी भिन्न हैं और हैरत में डालने वाली हैं . क्या सही है और क्या गलत यह भी पूरी तरह सापेक्षिक है . आज फेसबुक दोस्त शालिनी श्रीवास्तव ने एक लिंक साझा किया . यह मामला है एक पश्चिमी दुनिया में पली बढ़ी युवती का जिन्हे सेक्स की लत  है और वे इसकी खुले आम जिक्र भी करती हैं -पब्लिक डोमेन में उन्होंने एक आर्टिकल प्रकाशित किया है. और अपने सेक्स अभिरुचियों और झुकावों का ईमानदारी से जिक्र भी किया है. इस लेख की चर्चा अन्यत्र जगहों पर इसकी बेबाकी और ईमानदार स्वीकृतियों के चलते है। आप को पूरा आलेख पढ़ने के लिए ऊपर के  अंग्रेजी लिंक पर जाना होगा मगर मैं हिन्दी प्रेमियों के लिए यहाँ कुछ उद्धरण देना चाहता हूँ.

क्रिस्टीन व्हेलेन  ४० वर्ष की मोटी महिला हैं। एक रिलेशन में थीं जो दस वर्षों चला मगर टूट गया। अब उन्हें सेक्स की सनक सवार हो गयी - अपने सर्किल के किसी मित्र, जान पहचान वाले  के साथ सोने को तैयार। और यह सिलसिला चल पड़ा. उन्होंने अपने अनुभवों को समेट कर यह प्रकाश डाला है कि आखिर पुरुष चाहते क्या हैं? और इससे भी बढ़कर कि उनकी खुद की क्या ख्वाहिश होती  है . उनके सेक्स संबंधियों में कई आयु वर्ग के लोग हैं. टीनएजर्स भी . उनकी स्वीकारोक्ति को कुछ आलोचकों ने वर्ष २०१४ का एक बड़ा खुलासा माना है.

मोहतरमा क्रिस्टीन व्हेलेन ने खुद के बारे में बताया है कि वे बहुत इंटेलिजेंट हैं ,मनोविनोदी हैं ,कभी कभार स्टाइलिश ,अपने बारे में बेफिक्र और वास्तव में बहुत अच्छी हैं। वे कहती हैं कि आकर्षण एक निजी मामला है और उनमें वह बहुत कुछ नहीं है जो बहुतों के लिए उन्हें आकर्षक बनाए। उनकी अपनी सेक्स अभिरुचियाँ /वितृष्णायें हैं और इसलिए और लोगों के समान व्यवहार से भी उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता ।क्रिस्टीन ने अपने एक दीवाने से पूछा कि उसे एक थुलथुल चालीस वर्षीय महिला में आखिर क्या आकर्षक लगा? जवाब था क्रिस्टीन तुम्हारा जबर्दस्त आत्मविश्वास ! कांफिडेंस इज सेक्सी! 

मैंने यह क्रिस्टीन कथा एक सनसनी पोस्ट के लिए ही नहीं की है . यह भारतीय समाज के सेक्स वर्जना को  सापेक्ष रखने और उस पर खुली चर्चा के लिए पोस्ट किया है मैंने . बहुत से लोग तुरंत क्रिस्टीन को वैश्या कह देगें -काल गर्ल कहेगें! मगर उसके निर्भीक आत्मकथन, स्पष्टवादिता को तवज्जो नहीं देगें .हमारा कल्चर इतनी स्वच्छंदता को अनुमति नहीं देता बल्कि सेक्स को पाप की सीमा तक यहाँ घृणित समझा जाता है -एक उचित स्थिति कहीं बीच में है . है ना ?

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

आप चल रहे हैं न वर्धा?

वर्धा में महात्मा गांधी हिन्दी विश्वविद्यालय के तत्वावधान में ब्लागिंग पर एक और सेमीनार ( 2 0 -2 1 सितम्बर, 2013) का बिगुल बज चुका है। ब्लागरों से मौलिक और अभिनव विषयों के प्रस्ताव मांगे गए हैं जिन्हें एक कमेटी के सामने रखा जायेगा और उसी आधार पर प्रतिभागियों का चयन होगा . ऐसा इसलिए किया गया है क्योकि प्रतिभागियों के चयन को लेकर प्रायः हो हल्ला मचता रहा है। मुझे कोई आश्चर्य नहीं कि अब प्रतिभागियों की संख्या में बड़ी गिरावट आ जायेगी . लोग ऐसे मामलों में यहाँ प्रायः गंभीर नहीं है -सब चाहते हैं उन्हें बस ससम्मान आमंत्रित कर लिया जाय और किसी सत्र में कुर्सी आफर कर दी जाय . किसी भी सेमीनार आयोजन के नियम कायदे होते हैं . यहीं नहीं, पूरी दुनिया में ऐसा है -मगर हिन्दी के ब्लागर ऐसे किसी अनुशासन को नहीं मानते हैं . जाहिर है अभी भी इस सेमीनार के संयोजक सिद्धार्थ जी के पास ठोस प्रस्तावों की कमी होगी .

मुझे लगता है ऐसे आयोजनों में हम जैसे पुरायटों और गुरु घंटालों के बजाय नई पीढी के प्रतिभावान ब्लागरों को भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए . उन्हें सीखने की जरुरत ज्यादा है -उनमें विचार परिवर्तन , दृष्टिकोण शैथिल्य की गुंजायश भी ज्यादा है . उनके पूर्वाग्रहों को उपयुक्त परिवेश से दूर करने की संभावनाएं और इस तरह दृष्टिकोण को व्यापक फलक देने के अवसर अधिक हैं . मेरी यह पोस्ट उन्ही के लिए है . अनुरोध सभी से है कि कृपया इस पोस्ट की चर्चा अपने संपर्क के नए ब्लागरों से जरुर करें . और अगर आपके यहाँ पांच वर्ष से अधिक का समय हो चुका है तो खुद के  बजाय किसी नए संभावनाशील ब्लॉगर को सेमीनार में जाने को ज्यादा प्रोत्साहित करें . मैंने कुछ नए ब्लागरों से बात की है . मगर यह इतना आसान भी नहीं है . नए ब्लागरों का भी अपना एक एट्टीच्यूड होता है और पुरानी पीढी के प्रति उनकी कई वाजिब शंकाएं और अविश्वास होते हैं . और उन्हें मदद भी चाहिए . गाईडेंस भी चाहिए .
नए ब्लागरों तक अगर मेरी बात पहुँच जाए यो सबसे पहले वे इसकी परवाह किये कि उनका प्रस्ताव सेमीनार के लिए स्वीकृत हो पायेगा या नहीं अपना स्लीपर श्रेणी का रिजर्वेशन तो  करा ही लें -क्योंकि अब समय बहुत कम बचा है . अगर उनका प्रस्ताव सम्मिलित हो भी गया तो बहुत संभव है उन्हें जाने का टिकट ही न मिल पाए . और न हुआ तो स्लीपर क्लास के टिकट कैंसिल कराने में कोई ज्यादा आर्थिक नुक्सान नहीं है . अगर उनके पास कनफर्म्ड टिकट है तो प्रस्ताव स्वीकृत होने पर बल्ले बल्ले. कभी भी किसी सेमीनार में जाने का मकसद कुछ सीखना होना चाहिए न कि विचार आरोपण . यह संकल्प लेकर ही जाना चाहिए .

अब सवाल है कि विषय प्रस्ताव क्या हो? बहुत से विषय हैं . मगर आपको तो कुछ मौलिक सोचना है .हिन्दी ब्लागिंग की यात्रा कथा दशक पुरानी हो चुकी है . हम पुरायटों को लगता है कि जो उत्साह शुरू में था अब उसकी तुलना में ब्लागिंग में आधा उत्साह भी नहीं रहा . तो क्या हिन्दी ब्लागिंग चुक चुकी है? साहित्य के लोग पहले ही इस विधा का उपहास उड़ा रहे थे! क्या उनकी फब्तियां सच हो रही हैं? क्या सचमुच ब्लागिंग दोयम दर्जे का साहित्य है या यह साहित्य है ही नहीं? या यह कोई विधा ही नहीं है बस एक माध्यम भर है? क्या पारम्परिक साहित्य की विधाओं के लिए ब्लागिंग में कोई स्कोप नहीं है? मगर लगता तो ऐसा नहीं है -कवितायें तो यहाँ खूब फल फूल रही हैं . मैंने पिछले दिनों बहुत अच्छी कवितायें पढी हैं . मगर ज्यादातर कूड़ा करकट ही हैं यह बात भी सही है . मगर ऐसे आकलन का नजरिया भी सापेक्ष / विषयनिष्ठता लिए हो सकता है. .
तकनीक की ब्लागिंग/ब्लागिंग की तकनीक और अन्यान्य विषयों पर कंटेंट आधारित पोस्ट में आपकी अभिरुचि क्या है? आपको ब्लागिंग में क्या समस्यायें दिखती हैं? क्या ब्लागिंग सचमुच अभिव्यक्ति का एक खुला माध्यम है? इस पर नियंत्रण होना चाहिए क्या ? अगर हाँ तो उस नियंत्रण की सीमाए क्या होनी चाहिए? क्या आप इसे एक सशक्त वैकल्पिक मीडिया के रूप में उभरता देख रहे हैं या फिर यह हाशिये पर ही रह जाएगी? वैयक्तिक अभिव्यक्ति बनाम सामूहिक अभिव्यक्ति में आप इसे किस रूप में अधिक समाजोपयोगी पाते हैं -ब्लागिंग के सामजिक सरोकार क्या हो सकते हैं? यह किस तरह समाज के किन किन पहलुओं को लाभान्वित कर सकता है . यह क्या पारम्परिक मीडिया की कभी बराबरी कर पायेगा ? उनके सामने सीना ठोक खड़ा  हो सकेगा? क्या यह नागरिक पत्रकारिता के रूप में सशक्त बन पायेगा? ब्लागिंग को कैसे करियर के रूप में विकसित किया जा सकता है?युवाओं के सामने करियर  एक बड़ा प्रश्न है? क्या इस रचनात्मक विधा को अर्थोपाजन से जोड़ कर देखा भी जाना चाहिए?
क्या कहा आपको इनमें से कोई सवाल रुचिकर नहीं लग रहा है? तो अपना कोई अभिनव प्रस्ताव दीजिये न? हाँ ऊपर तो एक झलक भर है -वस्तुतः ब्लागिंग का फलक अभी भी बहुत कुछ अनदेखा /वर्जिन ही है!बहुत संभावनाएं हैं! कोई भी पहलू आपको प्रेरित कर सकता है और आप अपना प्रस्ताव भेज सकते हैं। बाकी विवरण यहाँ  और यहाँ देख ही सकते हैं! अगर अभी भी आपको कोई विषय समझ में नहीं आया तो शायद आप अभी ऐसे किसी सेमिनार में प्रतिभाग के योग्य नहीं हुए! और यह पोस्ट आपको कुछ भी प्रोत्साहित कर गयी है तो स्वागत है आपका ! आपसे वर्धा में मुलाक़ात होगी अगर चयन समिति ने मेरे भेजे विषय को अनुमोदित कर दिया . मैंने अपना विषय प्रस्ताव पहले ही भेज दिया है - ब्लागिंग: माध्यम बनाम विधा और साईंस ब्लागिंग पर भी एक दो दिन में एक प्रस्ताव भेजने वाला हूँ ! मतलब जाने की सम्भावना को अपनी ओर से दुगुनी कर चुका हूँ! बाकी आयोजकों की मर्जी!

मंगलवार, 25 जून 2013

वे पिछड़े हैं जो ब्लागिंग तक ही सिमटे हैं!

अभी पिछले दिनों जब मैंने फेसबुक पर एक अपडेट किया तो अनुमान नहीं था कि उसका एक खौफनाक  परिणाम सामने आ जाएगा .अविनाश वाचस्पति जी को लगा कि वह अपडेट मैंने उन पर किया है और उन्होंने अपने ब्लाग्स को हमेशा के लिए ब्लाक कर दिया और मात्र फेसबुक पर बने रहने की घोषणा कर डाली। पहले तो आप मेरे उस अपडेट को पढ़ लें और चाहें तो एक नज़र आई टिप्पणियों पर भी डाल लें। वह कमेन्ट यूं था " एक हिन्दी ब्लॉगर ने डिजिटल मीडिया से शोहरत हासिल की और इस टटकी शोहरत को अब प्रिंट मीडिया में कैश कर रहे हैं -मजे की बात यह कि प्रिंट मीडिया में अपने छपे आलेखों को फिर से डिजिटल मीडिया में मित्रों से साझा कर रहे हैं मानो यह धौंस देना चाह रहे हों कि देखो तुम लोग लल्लू ही बने रहे और मैं कहाँ से कहाँ पहुँच गया ....ये उनकी आत्म विस्मृति के दिन हैं -एक दिन लौट के आना यहीं है! वैसे दोस्तों की मेहरबानी से अभी पूरी तौर से यहाँ से गए भी नहीं हैं ! बूझिये कौन ?"
दिनेश द्विवेदी जी ने अपनी प्रतिक्रिया यूं व्यक्त की थी -"ब्लागिंग में बहुत तरह के लोग आए और आते रहेंगे। बहुत वे भी हैं जो सरोकार और प्रतिबद्धता का अर्थ नहीं समझते। बहुत लोग हैं जिन के लिए अपना नाम चित्र अंतर्जाल पर लिखा, अखबार में छपा देखना और मौका लगे तो दो-चार सौ रुपए रोज बना लेना ही सरोकार और प्रतिबद्धता है। आप तो ब्लागरों की कहते हैं। अखबारों के कथित कालमों के कलमघिस्सू बनने के लिए बहुत से अच्छे  कलमकार बरबाद हो चुके हैं......जिस दिन ब्लागिंग का झण्डा एडियाँ उचका उचका कर ऊँचा किया जा रहा था। हम तब भी जानते थे कि एडियाँ उचकाने वाले जल्दी ही ब्लागिंग से भाग सकते हैं। वैसे भी वे ब्लागिंग के जरिए किताबों अखबारों की दुनिया में प्रवेश कर रहे थे। उद्देश्य तो किताबों और अखबारों की दुनिया ही था। जो लोग अपने ब्लागों के अखबारों में छपे अंश को ऑस्कर की तरह अपने ही ब्लाग पर लगा रहे थे उन से भी यही अपेक्षा थी और है। क्यों कि उन के साध्य का साधन ब्लागिंग बन रही थी।"
पता नहीं आप मित्रों में से कौन अभी भी फेसबुक पर आबाद नहीं हुआ है मगर फेसबुक पर आबाद होने वाले ब्लागरों की संख्या काफी ज्यादा हो चुकी है .वे भी जो कभी पानी  पी पी कर फेसबुक को कोसते और उसकी सीमाओं को रेखांकित करते रहते थे अब फेसबुक पर विराजमान ही नहीं काफी सक्रिय हो चले हैं और ब्लागिंग को खुद हाशिये पर डाल चुके हैं .तथापि मैं उन्हें दोष नहीं देता क्योकि यह 'मानवीय भूल ' बहुत स्वाभाविक थी और वे इस डिजिटल मीडिया की अन्तर्निहित संभावनाओं को  आंक नहीं पाए थे जबकि मैंने इस विषय पर कई बार मित्र ब्लागरों का  ध्यान आकर्षित किया था। आज भी मैं यह बल देकर कहता हूँ कि फेसबुक में ब्लागिंग से ज्यादा फीचर्स हैं और यह ब्लागिंग की तुलना में काफी बेहतर है .बहुत ही यूजर फ्रेंडली है . अदने से मोबाईल से एक्सेस किया जा सकता है .भीड़ भाड़ ,पैदल रास्ते ,बस ट्राम ट्रेन ,डायनिंग -लिविंग रूम से टायलेट तक आप फेसबुक पर संवाद कर सकते हैं . ज़ाहिर है यह सबसे तेज संवाद  माध्यम बन चुका है . महज तुरंता विचार ही नहीं आप बाकायदा पूरा विचारशील आलेख लिख  सकते हैं और गंभीर विचार विमर्श भी यहाँ कर सकते हैं। आसानी से कोई भी फोटो अपडेट कर सकते हैं . वीडियो और पोडकास्ट कर सकते हैं . ब्लॉगर मित्र तो इसे अपने ब्लॉग पोस्ट को भी हाईलायिट करने के लिए काफी पहले से यूज कर रहे हैं .यह पोस्ट भी वहां दिखेगी ही ....

सचमुच फेसबुक की अब ब्लॉग से कोई तुलना ही नहीं रह गयी है .यह अलग बात है कि मुझ जैसे कई ब्लॉगर अभी भी अपने आब्सेसन के चलते ब्लागिंग का दामन थामे  हुए हैं -अब जैसे मुझे तो अभी भी किसी के लौट कर आने का शिद्दत से इंतज़ार है -जिससे यहीं पहली मुलाक़ात हुयी थी तो यह मेरे लिए मुक़द्दस जगहं है -मैं कयामत तक उनका यहीं इंतज़ार करूँगा! अब अनूप शुकुल वगैरह यहाँ क्यों टिके हुए हैं यह तो वही जानें अन्यथा अब इस पुराने शुराने माध्यम में रखा ही क्या रह गया है। वे पिछड़े हैं जो ब्लागिंग तक ही सिमटे हैं! 

बहरहाल यह  हेतु नहीं था इस पोस्ट का ..मैं एक दूसरी बात कहने आया था। दरअसल ब्लागिंग या सोशल नेटवर्क साईट्स -फेसबुक ,ट्विटर आदि सभी वैकल्पिक मीडिया/सोशल मीडिया /नई मीडिया /डिजिटल मीडिया (नाम अनेक काम एक ) की छतरी में आते हैं और मुद्रण माध्यम की तुलना में आधुनिक और बहुआयामी हो चले हैं   .मुझे हैरत है कि लोग यहाँ आकर फिर उसी 'मुग़ल कालीन' युग में क्यूंकर  लौट रहे हैं . मुद्रण माध्यमों की पहुँच इतनी सीमित हो चली है कि एक शहर के अखबार /रिसाले में क्या छपता है दूसरे शहर वाला तक नहीं जानता . मतलब मुद्रण माध्यम हद दर्जे तक सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गए हैं . मजे की बात देखिये जो मुद्रण माध्यम में अपनी समझ के अनुसार कोई बड़ा तीर मार ले रहे हैं वे उसे भी फेसबुक पर डालने से नहीं चूकते! हाँ अगर मुद्रण माध्यम कुछ मानदेय आदि दे रहे हों तो बात कुछ समझ में आती है। मगर इसके लिए ब्लॉग लेखन को तिलांजलि दे दी जाय बात समझ में नहीं आती .हम केवल चंद  पैसों के लिए तो यहाँ नहीं आये थे और यह बात मैंने तभी कही थी जब गुजश्ता  ब्लागिंग काल के त्रिदेवों में से एक आर्थिक सम्पन्नता के बाद भी ब्लागिंग से कमाई का जरिया ढूंढते नज़र आते थे . 
पैसा कमाना एक आनुषंगिक उपलब्धि हो सकती है मगर वह हमारे सामाजिक सरोकार को भला कैसे धता बता सकता है? हम ब्लागिंग या डिजिटल मीडिया में क्या केवल चंद रुपयों की मोह में आये थे? जो अब यहाँ नहीं पूरा हुआ तो मुद्रण माध्यम की ओर वापस लौट लिए?या फिर डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए किया और फिर इसे भुनाने मुद्रण माध्यम की ओर  लौट चले जैसा कि दिनेश जी ने कहा ? मुफ्तखोर मुद्रण मीडिया तो अब खुद डिजिटल मीडिया के भरोसे पल रहा है -यहाँ से हमारी सामग्री बिना पूछे पाछे उठाकर छाप रहा है। 
मित्रों आह्वान है कि इस डिजिटल मीडिया को छोड़कर कहीं न जाएँ -यह काउंटर प्रोडक्टिव है! आज का और आने वाले कल का मीडिया यही है, यही है!

मंगलवार, 11 जून 2013

भारतीय समाज की विवशताएँ!


पहले तो मैंने इस पोस्ट  के लिए भारतीय समाज की विडंबनाएं शीर्षक चुना था .मगर विचारों के प्रवाह में सहसा सूझा कि जिन्हें मैं विडंबनाएं समझ रहा हूँ दरअसल वे हमारी विवशतायें हैं . हम तमाम अंधविश्वासों में मुब्तिला हैं . आज भी किसी को 'छोटी माता' ( चिकन पाक्स ) के निकलने पर मनौती मानी जाती है, कुछ " अंगऊ" (दैवीय सत्ता को समर्पित करने के लिए अग्रिम के रूप में नगदी सोना या कोई भी सम्पदा को सहेजना ) निकालते  हैं और शीतला माई के मंदिर तक भागे जाते हैं . बेटियों को बेटों के बराबर दर्जा नहीं देते .चाहे वह अभिव्यक्ति की हो या शिक्षा की या  निर्णय की स्वतंत्रता ...हम झूठी मान मर्यादा के लिए आनर किलिंग जैसे नृशंस कृत्य तक उतर आते हैं . ऐसे अनेक मौजूदा परिदृश्य हैं जो  आज की इस तार्किक दुनिया में क्या किसी विडम्बना से कम है? मगर हम इस परिदृश्य के मूल कारणों की अगर पड़ताल करें तो भारतीय समाज की विवशताएँ उजागर होती हैं और मन पीड़ा से भर उठता है. 
हमें कई समस्याओं के उदगम को समझने के लिए अपने अतीत में जाना होगा?आखिर गलती  कहाँ हुई और हम कहाँ सांस्कृतिक लिहाज से एक सभ्य समाज नहीं बन पाए . पहले तो वर्ण व्यवस्था जो स्वभावगत कर्म के आधार पर लोगों के कार्य विभाजन को मान्यता देती थी कालांतर में जन्म आधारित जाति को जन्म दे गई
समाज की कथित "ऊंच " और "नींच" जातियों का वजूद स्थापित होता गया . .आज भी यह कितना हास्यास्पद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि कितने ही ब्राह्मण आज भी जनेऊ और चुटिया को ही ब्राह्मणत्व का प्रमाण मानते हैं . आज इस  दुर्भाग्यपूर्ण और अवैज्ञानिक सामाजिक संरचना को अब तो राजनीतिक संबल मिल गया है .एक पार्टी जो ब्राह्मणों को जूते मारने के उद्घोष से सत्ता में आयी थी अब उसी सत्ता को संभालने के लिए ब्राह्मणों का चरण चुम्बन कर रही है . मतलब अब जाति व्यवस्था और भी स्थापित हो गयी . इस जातिगत व्यवस्था को तोड़ पाना आज की एक बड़ी चुनौती और विवशता है . कभी समाजिक मार्गदर्शकों ने इस जातिगत व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए "ऊंच " और "नींच" जातियों के बीच 'रोटी और बेटी " के सम्बन्ध का आह्वान किया गया था . मगर आज यह आह्वान अपना दम ख़म खो चुका हैं। 
अब इससे कौन इन्कार करेगा कि तमाम विकासोन्मुख योजनाओं के बावजूद भारत में भयंकर गरीबी हैं ,अशिक्षा है और स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर अभाव है . और इसके साथ /बावजूद भी मान मर्यादा और 'इज्जत' के  मूर्खतापूर्ण विचार हैं . लडकी घर की 'इज्जत' है अगर उसके साथ कुछ हुआ तो एक गरीब विपन्नता के बोझ  से जो पहले से ही कराह रहा है 'इज्जत' गवाने का एक अतिरिक्त बोझ भला कैसे उठा सकता है ? लिहाजा वह बेटी/बेटियों की स्वतंत्रता का बचपन से ही गला घोटने लगता है . 
न जाने इस दहेज़ व्यवस्था का  उद्भव कब से हुआ मगर इस आर्थिक संघात ने भी बेटियों की स्थिति को कमजोर बनाया है . एक वह देश जो नारियों का दर्जा देवी देवताओं के बराबर देता था आज नारी को  समाज के निचले पांवदान पर उतार चुका  है। आज 'इज्जत' और दहेज़ का भय एक बड़ी विवशता बन चुका है. हद तो यह है कि किसी दूसरी जाति के साथ प्रेम या विवाह भी जातिगत कथित सम्मान पर भारी पड़ता है .आज भी शादी -व्याह को जातिगत बंधन से मुक्त नहीं किया जा सका है -जबकि विभिन्न जातियों में अंतर्विवाह से वंश की सबलता के प्रामाणिक 'जीनिक ' कारण मौजूद हैं . 
यौन कुंठाओं की तो पूछिए मत .आज बच्चों और युवाओं से बढ़कर प्रौढ़ों को यौन शिक्षा की जरुरत है -यह भी एक भयमूलक कारण है जो लड़कियों को लड़कों सदृश स्वच्छन्दता देने से रोकती है . बड़े -बूढों द्वारा सेक्स के प्रति बनाए गए सामाजिक परिवेश में लड़के और लडकियां दोनों ही यौन -कुंठित हो तमाम यौन अपराधो में संलिप्त हो उठते हैं . मेरा मानना है एक वर्जनाहीन समाज में यौन अपराध कम होंगें! चिकित्सा सुविधाओं /शिक्षा का घोर अभाव और निर्धनता आज भी लोगों को बीमारियों के इलाज के लिए ओझा -सोखा और देवी माता के पास ले जाने को विवश करता है . अब ये सारे परिदृश्य हमारे भारतीय समाज की विडंबनाएं हैं या विवशताएँ इसका निर्णय आप ही करें! लगता है भारतीय समाज का पुनर्निर्माण अब असंभव हो चला है !


सोमवार, 29 अप्रैल 2013

पात्रता की पहचान

यह हम सभी को पता है कि प्राचीन काल में ऋषि मुनि बिना शिक्षार्थी की पात्रता की अच्छी भली जांच परख किये उन्हें स्वीकार नहीं करते थे .कई पौराणिक कहानियां इस बात को बड़े ही रोचक तरीके से प्रस्तुत करती हैं . जैसे कर्ण और परशुराम की कहानी को ही ले लीजिये जो कुछ यूं है (साभार विकिपीडिया) -"कर्ण की रुचि अपने पिता अधिरथ के समान रथ चलाने कि बजाय युद्धकला में अधिक थी। कर्ण और उसके पिता अधिरथ आचार्य द्रोण से मिले जो उस समय युद्धकला के सर्वश्रेष्ठ आचार्यों में से एक थे। द्रोणाचार्य उस समय कुरु राजकुमारों को शिक्षा दिया करते थे। उन्होने कर्ण को शिक्षा देने से मना कर दिया क्योंकि कर्ण एक सारथी पुत्र था, और द्रोण केवल क्षत्रियों को ही शिक्षा दिया करते थे। द्रोणाचार्य की असहमति के उपरान्त कर्ण ने परशुराम से सम्पर्क किया जो कि केवल ब्राह्मणों को ही शिक्षा दिया करते थे। कर्ण ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम से शिक्षा का आग्रह किया। परशुराम ने कर्ण का आग्रह स्वीकार किया और कर्ण को अपने समान ही युद्धकला और धनुर्विद्या में निष्णात किया ............ कर्ण की शिक्षा अपने अन्तिम चरण पर थी। एक दोपहर की बात है, गुरु परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर विश्राम कर रहे थे। कुछ देर बाद कहीं से एक जंगली कीड़ा आया और उसकी दूसरी जंघा पर काट कर घाव बनाने लगा। गुरु का विश्राम भंग ना हो इसलिए कर्ण असहनीय पीड़ा को सहता रहा। कुछ देर में गुरुजी की निद्रा टूटी, और उन्होनें देखा की कर्ण की जांघ से बहुत खून बह रहा है। उन्होनें कहा कि केवल किसी क्षत्रिय में ही इतनी सहनशीलता हो सकती है कि वह बिच्छु डंक को सह ले, और परशुरामजी ने तपबल से सब जान लिया और  कर्ण के   मिथ्या भाषण के कारण उसे श्राप दिया कि जब भी कर्ण को उनकी दी हुई शिक्षा की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, उस दिन वह उसके काम नहीं आएगी। और यही हुआ युद्ध के समय ऐन वक्त कर्ण का पहिया जमीन में जा  धंसा और वह उसे निकालने में वह ऐसा बेसुध हुआ कि अर्जुन ने सहज ही उसे मार गिराया .

यह कथा यह बताती है कि शिक्षा दीक्षा के मामले में प्राचीन गुरु लोग पात्रता का बहुत ध्यान देते थे और अक्सर यह भी होता था शिष्य को अपना सम्पूर्ण ज्ञान न देकर कुछ अपने पास ही रखते थे ...इन कथाओं का मर्म यही है कि अगर पात्र व्यक्ति का चयन शिक्षा दीक्षा के लिए सही न हुआ तो ऐसा गलत चयनित व्यक्ति प्राप्त दीक्षा का दुरूपयोग कर सकता है  ,खुद अपने ही गुरु के लिए भस्मासुर बन सकता है और खुद अपना नाम बदनाम करने के साथ ही गुरु का नाम भी डुबो सकता था . ऐसा नहीं है कि ऐसी पुराकथाएँ केवल भारत भूमि की हैं . ये चतुर्दिक विश्व की बोध कथायें हैं , ली फाक के प्रसिद्ध कामिक्स श्रृखला मैन्ड्रेक में मैन्ड्रेक का एक जुड़वा दुष्ट भाई भी है जिसने  मैन्ड्रेक के साथ ही साथ गुरु थेरान से शिक्षा पायी ...मगर जहाँ मैन्ड्रेक गुरु से प्राप्त अपनी जादुई शक्तियों से एक समाजसेवी बना वहीं उसका जुड़वा भाई मानवता का दुश्मन बन बैठा और अपने गुरु के लिए भी कष्टकारी बन गया ..गुरु थेरान उसकी पात्रता की जांच में चूक गए ...
आज तो बड़ी विषम स्थति है -पात्रता का चयन बड़ा ही मुश्किल हो गया है .फलतः अकादमीय क्षेत्रों में चेला ही गुरु का कान काट ले रहा है . राजनीति में जिस सीढी से नौसिखिये नेता ऊपर जा पहुंचते हैं उसी को नीचे फेंक देते हैं . पहलवान अपने ही गुरु को धोखे से धूल चटा  दे  रहे हैं . अब परशुराम सी शक्ति तो आज बिचारे गुरुओं में रही नहीं कि अपने पथभ्रष्ट शिष्य को शापित कर सकें ..मगर आजके गुरुओं को पुराने गुरुओं की इस परम्परा को कदापि नहीं भूलना चाहिए कि दीक्षा देने के लिए पात्रता को वे अवश्य देखें -अन्यथा उनका शिष्य उनका ही कान काट खायेगा या नाम डुबो के छोड़ेगा .... अब यह भोगा यथार्थ मुझ जैसे गरीब गुरु से बेहतर कौन अनुभव कर सकता है :-(

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

शंख बोली बलाय टली ...

दिल्ली की घटना ने सहसा इतना दुःख संतप्त और दिमाग को कुंद कर रखा था कि कुछ लिखने पढने का मन ही नहीं हुआ -ज्यादातर वक्त टीवी देखते गुजरा ,जिसने मन को निरंतर और भी विक्षुब्ध किया। मानवता को शर्मसार करते  एक घिनौने जघन्य कृत्य की जिम्मेदारी न लेकर उसके विरोध में सहज ही सड़कों पर उतर आये छात्र छात्राओं और अभिभावकों पर पुलिस का निर्मम बल प्रयोग दिल को सालता रहा . अब आशा बंधी है कि यौन अत्याचार पर प्रभावी अंकुश लगाने की दिशा में कुछ ठोस कार्यवाही हो सकेगी .और इस सोच ने मुझे और भी प्रफुल्लता से शंख ध्वनि के लिए प्रेरित किया . मैं प्रति दिन गीता के पांच श्लोकों के पाठ पूरा होने पर शंखनाद करता हूँ। कुछ एक अनुष्ठान की पारम्परिक प्रक्रिया के  तहत तो कुछ फेफड़ों के स्वास्थ्य के लिए .
शंख एक अद्भुत आदि -नैसर्गिक वाद्य यंत्र है . आप सभी जानते ही हैं कि यह वस्तुतः बिना रीढ़ के मोलस्क संघ   का समुद्री प्राणी है जो  इस मजबूत खोल में अपनी रक्षा करता है . हिन्द महासागर में पाया जाने वाला शंख - टरबिनेला पायिरम( Turbinella pyrum )  धार्मिक अनुष्ठानों का शंख है .

शंख वादन को  आदि मानवों ने शुरू किया होगा -अपने आस पास के घने जगंलों से खतरनाक पशुओं को दूर रखने के लिए . आग और शंख ध्वनि ही उन प्राचीनतम उपायों में रहे होंगें जिनसे आदि मानवों ने हिंस्र पशुओं से अपनी रक्षा की होगी -बाद में कई दूर तक मार करने वाले अश्त्र शस्त्र -धनुष ,भाले बरछे भी ईजाद  हुए होंगें . कह सकते हैं मनुष्य की आत्मरक्षा में शंख का योगदान प्राचीनतम है। मनुष्य की कल्पनाशीलता और कला प्रियता ने शंख के कई और भी उपयोग कालांतर में ढूंढ निकाले। धर्मयुद्धों के पूर्व शंखनाद की एक परिपाटी ही बन गयी . भारत वर्ष के सबसे बड़े युद्ध महाभारत की शुरुआत ही महा शंखनाद से हुयी -पांचजन्य हृषीकेशो देवदत्तं धनंजय : पौंनड्रम   दध्मौ महाशंखम भीमकर्मा वृकोदरः मतलब श्रीकृष्ण ने पांचजन्य ,अर्जुन ने देवदत्त ,भीमसेन ने पौण्ड्र नामके शंख बजाकर धर्मयुद्ध की घोषणा कर दी . फिर तो शंखों के नाद की एक श्रृखला ही शुरू हो गयी ...युधिष्ठिर ने अनंत विजय और नकुल सहदेव ने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामके शंख बनाए -फिर तो अनेक योद्धाओं ने अपने अपने शंख बजकर तुमुल घोष किये।
शंखनाद! 

कालान्तर  में यजमानी वाले पुरोहित  पंडितों ने इसे अपना कुल वाद्य यंत्र ही बना लिया और हर कथा वार्ता के अंत में शंखनाद करना आरम्भ किया . सत्यनारायण व्रत कथा के हर अध्याय की सम्पूर्ति पर शंख बजाने का चलन है . हमारे कुल पुरोहित  पंडित जी के पास एक पुश्तैनी शंख हैं,वह कई पीढ़ियों से उनके  पास है .  सत्यनारायण संतोषी माँ सरीखे काफी बाद के अन्वेषित देवता है और विष्णु   के स्वरुप लगते हैं .विष्णु  को शंख बहुत प्रिय है . उनके एक हाथ में शंख है -सशंख चक्रम  सक्रीट  कुण्डलं... हमलोग शंख की आवाज सुनकर  बचपन में भोग- प्रसाद और चरणामृत लेने पूजा स्थल पर पहुँच जाते थे , लोकजीवन में शंखनाद शुभ, कुशल क्षेम के आगत  का प्रतीक है . राबर्ट्सगंज के मेरे नए पड़ोसी 90 वर्षीय वृद्ध मेरे शंख बजने पर खुश होकर बोल पड़ते हैं -शंख बोली बलाय टली ...

मैंने भारत के समुद्र तटीय धार्मिक स्थलों जैसे रामेश्वरम ,कन्याकुमारी,पुरी अदि की यात्रा पर वहां से शंख खरीदे हैं और पंडितों को शंख -दान किये हैं जिन्हें उन्होंने प्रफुल्लित होकर स्वीकार किया है . शंख केरल का राज्य प्रतीक चिह्न ऐसे ही नहीं बनाया गया है . भारत में अब फिर से एक बार तुमुल शंखनाद आरम्भ हो गया है -निहितार्थ आप सुधीजन समझ ही रहे होंगें -इसी तुमुल नाद में एक कोमल स्वर मेरा भी है!  

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

महफ़िल में इस ख़याल से फिर आ गया हूँ मैं :-)


मुझे  निकाल के कहीं पछता  रहे हों  न  आप 
महफ़िल में  इस ख़याल से फिर आ गया हूँ मैं :-)
यह शेर आज तब याद आया जब इस नए स्थान - राबर्ट्सगंज में नेट से कनेक्ट होने पर मुझे सहसा ब्लागिंग की सुधि आयी . इतना लम्बा अंतराल पिछले पांच वर्षों में किन्ही दो  पोस्ट के बीच नहीं हुआ था . जब गत 21 नवम्बर को सारे तामझाम, सर सामान और एक अदद धर्मपत्नी तथा  एक विदेशी नस्ल की कुतिया -पाम-स्पिट्ज(डेजी)  के साथ यहाँ बनारस से सरे शाम पहुंचा तो अंतर्जाल से लगभग  कट चुका था ..हाँ मोबाईल से/ का एक गर्भनाल सम्बन्ध अवश्य बना था मगर वह नाकाफी था .....लगा किसी सूनसान जनहीन द्वीप पर आ पहुंचा हूँ . कटे होने और गैर जुड़ाव की यह अनुभूति नयी किस्म की थी ....और यह सिलसिला लम्बा चला .नए स्थान पर अनुकूलन और व्यवस्थित होने की प्राथमिकतायें कुछ ऐसी रहीं कि विलासितापूर्ण ब्लागिंग के लिए कई मौका नहीं मिला . आते ही तेल नून लकड़ी के नवीन संस्करणों -गैस कनेक्शन ,आर ओ ,इनवर्टर ,दूधवाले ,अखबारवाले ,महरी की जुगाड़/व्यवस्था फिर डिश  टीवी कनेक्शन , बैंक खाता आदि  में ऐसा जी हलकान रहा कि हम अपना ही नहीं कई अन्य  पसंदीदा ब्लॉग फिलहाल भूल गए और साथ ही कई ब्लागरों को भी  ....मजे की बात वे ब्लॉगर भी मुझे भूल गए -हाँ कुछ फेसबुकिये  मित्र जरुर सम्बन्धों के आशा दीप टिमटिमाये रहे ......और मुझे नेट कनेक्ट करने के  तरीके बताते रहे .....फिलहाल  रिलायंस नेट कनेक्ट डाटाकार्ड एक जगहं से उधारी पर ले यह पोस्ट लिख रहा हूँ . हाँ खुद का अप्लाई कर दिया है ,एक हप्ते का वक्त लगना बताया गया है . 
नए स्थान पर जमने में अभी समय लगेगा ,नए लोग नए मिजाज। मगर लग अच्छा रहा है -पिछड़ा इलाका है तो लोगों की सरलता सहजता संदूषित नहीं हुयी है और खाने पीने के सामान भी अपेक्षया बहुत कम संदूषित  है ....पत्नी यहाँ के दूध और सब्जियों की मुग्ध भाव से प्रशंसा कर रही हैं .उनके विशेषाग्रह पर बचपन से ही दूध से नाक भौ सिकोड़ने वाला मैं भी यहाँ थोडा दूध पीने लगा हूँ -पियो  ग्लास भर दूध की तर्ज पर ......सब्जियों में निश्चय ही ताजगी भरा अलग सा स्वाद है . अब इतना सब इंतजाम होने के बाद बस ब्लागिंग की कमी रह गयी  थी सो वह भी आज से राह पर आ गयी -जिन्दगी की गाडी तेजी से पटरी पर लौटने लगी है . 
इस बीच केवल संतोष त्रिवेदी जी ने फोनियाया और हाल चाल पूछा .....कमाल के ब्लॉगर हैं वर्ना आज की इस भागमभाग की दुनिया में किसे किसकी फ़िक्र रहती है . गहन रिश्तों के वायदे करने वाले भी न जाने कहाँ मुकर  गए ....आप यहाँ तभी तक हैं जब तक हैं और दिख रहे हैं -अन्यथा कोई आपकी सुधि लेने वाला नहीं है .....नए ब्लागरों को यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए ....और अपेक्षाएं नहीं पालनी चाहिए ...अंतर्जाल आंनद के लिए कोई बैकुंठ नहीं है,असली दुनिया से भी इस मामले में गया गुजरा है . कितने मित्रों से इसलिए पहले से भी दुआ सलाम बंद है -और इन पांच साला ब्लागिरी में दुआ सलाम बंद वाली लिस्ट भी बढ़ती गयी है -कभी किसी ने कहा था क़ि आपकी आँखें बहुत गहराई  वाली सुन्दरता लिए हैं,किसी ने मेरी एक प्रोफाईल फोटो जो अब लगभग दस वर्ष पुरानी है मगर कहीं कहीं अब भी दिख जाती है -अरे वही सूट टाई वाली को देखकर मर मिटने का अभिनय किया था  :-) ....तब से सूट पहनना बंद ही कर दिया :-( ....किसी किसी ने  इमरजेंसी का तकाजा देकर कुछ इमदाद भी झटक लिया था ...वे सभी अब तटस्थ हो लिए हैं .....मगर यह सब मैं बनारस की गंगा मैया को समर्पित कर आया हूँ .....
सोनांचल में एक नयी ताजगी के साथ एक नयी ब्लागिंग पारी शुरू करते हुए मुझे एक नौसिखियापन सा लग रहा है :-) मैं वापस लौट आया हूँ ......हो सकता है मेरा यहाँ अनुपस्थित रहना किसी को सचमुच खला ही हो ... :-) यह बात अब तक मुंह से निकल पायी हो तो अब भी कोई देर नहीं हुयी है ...मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा ...सुस्वागतम! 

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

बहुत कुछ हमारे सोच पर निर्भर है!


आज हमारे समाज में अनेक समस्यायें हैं -कुप्रथायें हैं ,अंधविश्वास है ,बेरोजगारी और भूख है, दिशाहीनता है, पलायन है. कई मामलों में मनुष्य की मूलभूत जरूरतों का हवाला हम अक्सर देते हैं -कपडा ,रोटी और मकान ,मतलब जीविकोपार्जन और रहने के लिए  एक खास जगह  की दावेदारी -मतलब एक छत . मगर देखा यह जाता है कि इन मूलभूत जरूरतों के पूरा होने के बाद भी कई समस्यायें उठती रहती हैं . और उनका एक तात्कालिक हल निकालकर हम आगे बढ़ते हैं .कई बार तो समस्याओं का निराकरण तो कुछ ऐसे फार्मूले से होता है जैसे कि गरीबी हटाने का सबसे  कारगर तरीका है गरीबों को ही मिटा देना :-) .... चलिए यह तो भूमिका हो गयी . आज की इस पोस्ट के लिए कोई एक विषय तो चुनना होगा. मैं भ्रष्टाचार पर कुछ कहना नहीं चाहता -काजल की कोठरी में रहकर तो हर ओर अँधेरा ही दिखता है -समाज में नारी की स्थिति,विवाहादि पर  अकेले कुछ नारीवादी ही इतना लिख चुके हैं कि कुछ ख़ास  बचा ही नहीं लिखने को और लिखा तो कुहराम मचना तय है. बढ़ती जनसख्या ,गर्भनिरोध के तरीकों पर लिखना अब कुछ नया नहीं रह गया . मनुष्य के अन्तरंग  जीवन के पहलुओं पर लिखने पर हमेशा श्लीलता और अश्लीललता की विभाजक रेखा धुंधलाती हुयी सी लगती है . फिर ?
आज सोचता हूँ कुछ ख़ास पर्सोनालिटी टाईप्स की बात करूँ. ऐसे लोग जो हमेशा नकारात्मक ऊर्जा का संचार करते रहते हैं .अंगरेजी का एक शब्द है सिनिक (cynic ) -अर्थात- दोषदर्शी/मानवद्वेषी/निंदक ...ऐसे लोग आपसे भी अक्सर टकराते होंगें .उन्हें हमेशा यह लगता है कि यह दुनिया ही बड़ी कमीनी है ,स्वार्थी है ,यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं है ....अब कुछ भी नहीं बचा जो अच्छा हो -कबीर ने ऐसे आदमी की पहचान तरीके से कर ली थी बल्कि यहाँ तक कह डाला था कि उसकी तो बड़ी आवाभगत करो -घर के भीतर भी बुला आँगन में बिस्तर आदि लगा उसकी पूरी सेवा श्रूशुषा करो क्योंकि वह तो आपनी आदत से बाज तो आएगा नहीं, हां आपकी बर्दाश्त करने की आदत में निरंतर इजाफा करता जाएगा -अब महापुरुष लोग समस्याओं का ऐसा ही कोई यूनिक तरीका बताते  हैं जो व्यवहार में पूरी तौर पर कभी लागू न हो पाए और इसलिए उसे कभी खारिज भी न किया जा पाए :-)  
मगर मुझे लगता है कि ऐसे लोगों को अवायड करना चाहिए क्योकि वे आपमें एक तरह की नकारात्मक ऊर्जा का समावेश करते हैं -आपका आत्मविश्वास डिगाते हैं. और आपका कोई काम बनते बनते इसलिए बिगड़ जाता है कि आप में नकारात्मक सोच घर कर गयी थी . दर्शनशास्त्र  में ऐसी ही एक विचारधारा(Solopsism) है कि आपका मस्तिष्क जो सोचता है वही साकार हो उठता है. इसलिए मस्तिष्क का सकारात्मक सोच वाला होना बहुत आवश्यक है .मनुष्य की यह सकारात्मक सोच न होती तो वह चन्द्रमा का जेता न हुआ होता और आज ब्रह्माण्ड के असीम दिक्काल तक जा पहुँचने का हौसला न रख पाता. हम छोटी छोटी बातों को लेकर नकारात्मक हो उठते हैं -किसी ने अन्यान्य कारणों से आपका साथ नहीं निभाया तो सारा समाज ही दोषी हो गया , किसी औरत ने अपने खसम पर हाथ उठा दिया तो सारी नारी जाति ही कुलटा बन गयी -ऐसे सोच खुद ऐसा सोचने  /कहने वालों को और प्रकारांतर से सारे समाज को नुकसान पहुंचाते हैं . एक व्यक्ति  ऐसी नकारात्मक अतिवादी सोच के चलते अपना और समाज का बड़ा नुक्सान करने पर उद्यत रहता है . 
मेरा आशय यह नहीं कि सभी झूठ मूठ आदर्शवादी हो जायं ....यथार्थवादी रहते हुए भी एक सकारात्मक ऊर्जा के साथ हम क्यों न रहें? -विवेकानन्द की अनेक ऊर्जाभरी बातों में मुझे यह उनका सबसे अच्छा विचार लगता है कि देखो अगर तुम सब कुछ खो चुके हो तो भी पूरा भविष्य अभी भी तुम्हारे पास बचा हुआ है . यह है आशावादी सोच -हमेशा नकुआये रहना ,मुंह को बिसूरते बिसूरते उस पर एक  नकारत्मक स्थायी भाव ही चिपका लेना मुझे तनिक भी नहीं भाता ..माना कि दुनिया बहुत बुरी है मगर सच तो यह है कि बहुत कुछ हमारे सोच पर निर्भर है -. सकारात्मक सोच और ऊर्जा के प्रवाह से हम नरक को स्वर्ग में तब्दील कर सकते हैं ....ऐसा मेरा सोचना है . 
आपका क्या सोचना है ? 

बुधवार, 19 सितंबर 2012

क्या ब्लॉग जगत के नारी वादियों की वाद प्रियता शून्य हो चली है?

इन दिनों एक पोस्ट पर जबरदस्त विलाप प्रसंग चल रहा है. भारतीय वांगमय और लोक जीवन में विलाप की  बहुत गाथायें हैं. अभी जो चर्चा में हैं वह है विधवा विलाप ....कुछ ज्ञानी जन इस पर अलग अलग प्रकाश डालते भये हैं और  अपने ज्ञान का पूरा कटोरा उड़ेल चुके हैं . मैं साहित्य का आदमी नहीं हूँ ,कोई विशिष्ट साहित्यिक बोध भी नहीं है बस सामान्य बोध से काम चला लेता हूँ .इतना जानता हूँ कि शाब्दिक और अलंकारिक अर्थों में फर्क होता है .कई बार उद्धरण सीधे शाब्दिक या अभिधामूलक न होकर लक्षणा या व्यंजना का भाव लिए रहते हैं. शाब्दिक अर्थ में तो पति के दिवंगत होने के बाद नारी का क्रंदन ही विधवा विलाप होता है .मगर अपने लाक्षणिक और व्यंजनात्मक अर्थों में यह एकदम अलग भाव संप्रेषित करता है -वहां कोई जरुरी नहीं है कि नारी का ही विधवा विलाप हो -कोई पुरुष ,कोई राजनीतिक पार्टी भी किसी मुद्दे को लेकर ध्यानाकर्षण के मकसद से विधवा विलाप कर सकती है . यहाँ विधवा विलाप का मतलब ध्यानाकर्षण के लिए अत्यधिक और बहुधा निरर्थक  प्रयास से है -जैसे लोग घडियाली आंसू बहाते हैं -उसी तरह विधवा विलाप भी कर सकते हैं! समझ में नहीं आता इस सामान्य सी बात को न समझ कर इन दिनों कुछ ख़ास लोग ब्लॉग जगत में क्यों विधवा विलाप/ किये जा रहे हैं . 
एक और विलाप है -अरण्य विलाप ..मतलब चिल्लाते जाईये कोई सुनने वाला नहीं ....बहरे बन जाते हैं सब .....यह असहायता  और घोर निराशा का क्रन्दन है -और इसी अर्थ में अक्सर प्रयुक्त होता है -अब कोई जंगल में जाकर थोड़े ही विलाप करता है! :-) इसी तरह विधवा विलाप कह देने का मतलब यही नहीं कि किसी का पति गोलोकवासी हो  गया है और विधवा का विलाप हो रहा है . मगर हे मूढ़ बुद्धे बात कहां की कहाँ पहुंचा दी गयी और गोल जुटा कर विधवा विलाप को ही चरितार्थ कर दिया गया  . एक और शब्द युग्म है रति विलाप -जब शंकर जी ने कामदेव को भस्म किया था तो उसकी पत्नी ने बहुत ही भयावह क्रंदन -रोना पीटना आरम्भ किया था -शंकर भी सुन निरीह -असहाय हो गए और कामदेव को सर्वव्यापी मगर अनंग बना दिया ......रति विलाप का भी लाक्षणिक प्रयोग साहित्य में ख़ास मामलों में होता आया है . 
एक विलाप सीता का भी था जब रावण उन्हें जबरदस्ती लेकर भाग चला था -ज्यों विलपति कुररी की नाईं -जिसने भी कुररी पक्षी (टर्न ) का चिल्लाना सुना होगा वह अंदाज लगा सकता है कि सीता का वह असहाय क्रंदन कैसा रहा होगा? और फिर तो सुलोचना मंदोदरी विलाप भी हैं ..हे अब कोई मुझ पर यह न आरोपण कर दे कि मैं अमुक अमुक और अमुक को यह दर्जा दे रहा हूँ ..मैं ऐसा कुछ भी नहीं कर रहा हूँ -बड़े सात्विक विचार से विलाप साहित्य का अनुशीलन करना ही यहाँ मेरा ध्येय है ....हाँ आप को कोई और विलाप की श्रेणी पता हो तो आप भी विलाप साहित्य की श्री वृद्धि कर सकते हैं .साहित्यिक चर्चा और सत्संग से कैसा परहेज भाई?  स्वयं भगवान् कृष्ण ने गीता में कह रखा है -वादः प्रवदताम अहम् ...मैं तत्व निर्णय के लिए परस्पर विवाद करने वालों द्वारा किये जाने वाला  वाद हूँ! अर्थात उन्हें भी वाद बहुत प्रिय हैं और कहा भी गया है कि वादे वादे जायते तत्वबोधः....क्या ब्लॉग जगत के नारीवादियों  की वाद प्रियता शून्य हो चली है?  

बुधवार, 12 सितंबर 2012

असीम त्रिवेदी के चर्चित कार्टून पर एक काव्य प्रतिक्रिया


असीम ने हमारे मूल प्रतीक चिह्न के वर्तमान निहितार्थ को ही अपने अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है उनका अभिप्राय कतई हमारे राष्ट्रीय प्रतीक को कलंकित करने का नहीं है ......और यह आजादी मानावाभिव्यक्ति की आजादी है! असीम के पक्ष में पिता जी की यह कविता पढ़िए: 
चले थे कहाँ से ,किया था क्या वादा 
कहाँ आ गए हम, हुआ क्या इरादा 
कितने मनोरम वे सपने लगे थे 
हुए क्यों पराये जो अपने सगे थे 
बहुत ही सुखद था उमीदों का पलना 
हुआ जब सवेरा तो छलना ही छलना 
सितारों का पाना समझा सरल था 
बढ़ाया कदम तो अमृत भी गरल था 
शहीदों ने जिसके लिए व्रत लिया था 
कहाँ है वह भारत जो सोचा गया था 
जितने हैं मक्कार गद्दार पाजी 
हुए हैं विधाता बने हैं वे काजी 
सत्यमेव्  जयते को क्या हो गया है 
महाकाव्य का अर्थ ही खो गया है 
वोटों की खातिर जुटे हैं जुआड़ी 
हुयी द्रोपदी आज जनता बेचारी 
हालत जो पहुँची है बद से भी बदतर 
कहाँ चक्रधारी कहाँ हैं धनुर्धर 
नहीं कोई आशा नहीं कोई हमदम 
नहीं हमको मालूम कहाँ जा रहे हम 
अस्मिता खोता भारत महाभ्रष्ट भारत 
आजाद है या पराधीन भारत 
महाभारती का महाघोष भारत 
करो या मरो मन्त्र लो फिर से भारत 

-डॉ. राजेन्द्र मिश्र (राजेन्द्र स्मृति से) 


शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

ब्लॉगर बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है!


 ब्लागर बोलता नहीं लिखता है,बोलता तो प्रखर मुखर वक्ता होता, वाचस्पति होता .मगर मंच और पंच  का आदेश है तो यह ब्लॉगर  सूत्रवत कुछ कहेगा ही.ब्लागिंग यानी चिट्ठाकारी को वैकल्पिक मीडिया ,नयी मीडिया और अब तो सोशल मीडिया के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में देखा जा रहा है .इसकी ख़ूबसूरती है इसका त्वरित और तत्क्षण दुतरफा संवाद और  खतरा भी यहीं मंडरा रहा है . संवाद विनिमय का इतना सहज स्वरुप है जैसे दो जन या बहुजन आमने सामने बतिया रहे हों -भौगोलिक दूरियों को धता बताते हुए . यह अभिव्यक्ति के अधिकार का लोकतांत्रिकीकरण है -कहने का अधिकार अब किसी सामर्थ्यवान या मीडियाहाउसेज  तक ही सीमित नहीं रह गया है -अब जबरा मारे रोये भी न दे वाला युग बीतने के कगार पर है ..अब दबे कुचले शोषित को भी खुद अपनी आवाज बुलंद करने की तकनीक वजूद में है ...

सोशल मीडिया की अनेक नेटवर्किंग साईट या फिर ब्लॉग  अपने कंटेंट/ फीड की  नेट वर्किंग के चलते एक प्रमुख सोशल मीडियम बन कर उभरा है . यहाँ कोई ख़ास प्रतिबन्ध नहीं है या बिल्कुल भी प्रतिबन्ध नहीं है .किन्तु यही खतरे की सुगबुगाहट है .....इसके दुरूपयोग की संभावनाएं हैं -साईबर आतंकवाद की भयावनी संभावनाएं हैं .जिसकी एक बानगी अभी हम बड़ी संख्या में शहरों से लोगों के असम पलायन के रूप में देख चुके हैं -एक दहशतनाक मंजर का हाल ना दैन्यं न पलायनम पर बयां हुआ है .....ऐसी अफवाहें  और भी संगठित रूप से किसी भी मसले को लेकर फिर फैलाई जा सकती है -सारे देश में अफरा तफरी का माहौल बन सकता है -यह साईबर आतंकवाद की एक छोटी सी मिसाल है ,झलक है .हमें सावधान रहना है . 

तकनीक के दुरूपयोग को भयावह दानव का मिथकीय रूप दिया जा सकता है ...इस अर्थ में तकनीक को हमेशा चेरी की ही भूमिका में रहने को नियमित करना होगा ,कभी भी स्वामिनी न बने वह ..(जेंडर सहिष्णु लोग इसे स्वामी या दास शब्द के रूप में कृपया गृहीत कर लें) ..और अब तो स्मार्ट प्रौद्योगिकी वाली इंटेलिजेंट मशीनें  भी आ धमकने वाली हैं  जिसके पास खुद अपने सोचने समझने की क्षमता होगी -आगे चल कर इनमें संवेदना भी आ टपकेगी ...तब तो इन पर नियंत्रण और भी मुश्किल होगा -दूरदर्शी विज्ञान कथाकारों ने ऐसी भयावहता को पहले ही भांप लिया था ...

इसाक आजिमोव ने इसलिए ही बुद्धिमान मशीनों पर  लगाम कसने का जुगत लगाया था अपने      
थ्री ला आफ रोबोटिक्स के जरिये -जिसका लुब्बे लुआब यह कि कोई मशीन मानवता को नुकसान नहीं पहुंचा सकती ..मनुष्य के आदेश का उल्लंघन भी कर सकती है अगर मानवता का नुकसान होता है तो ....वैज्ञानिक ऐसी युक्तियों पर काम कर रहे हैं जिससे मशीनें बुद्धिमान तो बनें मगर मनुष्यता की दुश्मन न बने ....ऐसे नियंत्रण जरुरी हैं  खासकर आनेवाली बुद्धिमान मशीनों के लिए .मगर आज भी जो मशीनें हैं ,अंतर्जाल प्रौद्योगिकी की कई प्राविधि -सुविधाएं हैं उन पर भी एक विवेकपूर्ण नियंत्रण तो होना ही चाहिए -मगर यह हम पर ही निर्भर हैं -हम इसका सदुपयोग करते हैं या दुरूपयोग!

आज ब्लॉग अपने शुरुआती स्वरुप यानी निजी अभिव्यक्ति से  ऊपर आ सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ रहे हैं .आज कितने ही सामुदायिक ब्लॉग हैं और विषयाधारित ब्लॉग हैं -साहित्य ,संगीत ,निबंध, कविता ,इतिहास ,विज्ञान, तकनीक आदि आदि के रूप में ब्लागों का इन्द्रधनुषी सौन्दर्य निखार पा रहा है .....मानवीय अभिव्यक्ति उद्दाम उदात्त हो उठी है ....मानव सर्जना विविधता में मुखरित हो उठी है ... मगर एक बात मैं ख़ास तौर जोर देकर कहना चाहता हूँ -ब्लॉग मात्र अभिव्यक्ति के माध्यम भर नहीं रह गए हैं अब  यह अभिव्यक्ति के  एक खूबसूरत और सशक्त विधा के रूप में भी पहचाने  जाने की दरख्वास्त भी करते हैं.

 विधाओं के अपने पहचान के लक्षण होते हैं -जैसे कहानी का अंत अप्रत्याशित हो ,ख़बरों का शीर्षक अपनी और खींचता हो ,प्रेम कथाओं में प्रेम पसरा पड़ा हो ....सस्पेंस कथाओं में द्वैध भाव हो ,कहानी(शार्ट स्टोरी )  एक बैठक में खत्म होने जैसी हो ....आदि आदि ..तो ऐसे ही ब्लॉग लेखन की विशेषताओं की भी पहचान और इन्गिति होनी चाहिए --क्या हो ब्लॉग विधा के पहचान के लक्षण ? ?  -हम इस पर चर्चा कर सकते हैं -जैसे ब्लॉग पोस्ट ज्यादा  लम्बी न हों ,ब्रेविटी इज द सोल आफ विट ....गागर में सागर भरने की विधा हो ब्लॉग ...कुछ लोग लम्बी लम्बी कवितायें ,निबंध ब्लागों पर डाल रहे हैं -कितने लोग पढ़ते हैं? -इसलिए कितने ही नामधारी साहित्यकार यहाँ असफल हो रहे हैं क्योकि उनकी पुरानी हथौटी लम्बे लेखों विमर्शों की है ....एक बार शुरू करेगें तो कथ्य का समापन और क़यामत  एक ही समय आये ऐसा  जज्बा होता है उनका :-) माईक पकड़ेगें तो छोड़ेगें नहीं ..

ब्लॉग लेखन ऐसी ही  कुशलता मांग करता है कि कम शब्दों में अपनी बात सामने रखें ....और यह अभ्यास से सम्भव है ..अनावश्यक विस्तार की गुंजाईश इस विधा में नहीं है .... लेखक की लेखकीय कुशलता का लिटमस टेस्ट है ब्लॉग विधा में लेखन ...ट्विटर तो १४० कैरेक्टर सीमा में ही अपनी बात कहने की इजाजत देता है ......किसी ने कहा था यहाँ तो मीडिया और मेसेज का भेद ही मिट गया है ..यहाँ मीडिया ही मेसेज है ...

ब्लॉग एक ही पोस्ट में लम्बे चौड़े अफ़साने सुनाने का माध्यम /विधा नहीं है ....हाँ जरुरी लगे तो श्रृंखलाबद्ध कर दीजिये पोस्ट को  ...मुश्किल यही है ब्लागिंग के  तकनीक के  सिद्धहस्त जिनकी संख्या बहुत अधिक है  यहाँ ,इसे बस माध्यम समझ बैठने की भूल कर बैठे हैं ....जबकि यह एक विधा के रूप में अपार पोटेंशियल लिए है हम इसकी अनदेखी कर रहे हैं .....आज ब्लागों के विधागत स्वरुप को निखारने का वक्त आ गया है ......हाऊ टू मेक अ ब्लॉग से कम जरुरी नहीं है यह जानना कि हाऊ टू राईट अ  ब्लॉग? ....

आपने मुझे बोलने का अवसर दिया इसलिए बहुत आभार! इस दूसरे अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मलेन और परिकल्पना सम्मान के आयोजकों को बहुत बधाई और आभार कि उन्होंने ब्लागिंग के इस उत्सव का सिलसिला बनाए रखा है . 
(अन्तर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मलेन ,लखनऊ ,२७ अगस्त में विषय प्रवर्तन) 

बुधवार, 27 जून 2012

एक आर्त अपील -लिव एंड लेट लिव!


भ्रष्टाचार पर मैंने कभी नहीं लिखा .बेमन टिप्पणियाँ जरुर की हैं इस विषय पर ब्लॉग पोस्टों पर . जल में रहकर मगर से बैर या आ बैल मुझे मार सरीखी बात ही नहीं है यह एक सरकारी मुलाजिम के लिए बल्कि उससे भी बढ़कर कि उसे  इस लाईलाज महारोग का कोई हल नहीं दीखता ..यह मनुष्य के आचरण,उसके संस्कार अर्थात लालन पालन, घर परिवार और दृष्टि-विवेक से जुड़ा मसला है. केवल सरकारी मुलाजिम ही नहीं भारत में भ्रष्टाचार घर घर तक पहुँच कर हमारे समाज और राष्ट्र के लिए एक बड़ी समस्या बन चुका है. कभी कभी तो  लगता है यह जैसे कोई आनुवंशिक बीमारी सा है जो पीढी दर पीढी चलता जा रहा है मगर इसके दीगर भी उदाहरण अक्सर मिलते रहते हैं .दो सगे भाईयों में एक बड़ा ईमानदार और दूसरा महाभ्रष्ट .एक ही मां बाप परिवार, संस्कार मगर फिर भी बड़ा  अंतर . यहाँ कुदरत के विभिन्नता का सिद्धांत समझ आता है :)  .कई ज्ञानी इस महारोग का औचित्य तक सिद्ध करते दिखाई देते हैं .दाल में नमक भर तो चलता है भाई? पता नहीं नैतिकता की किस तराजू से भ्रष्टाचार का माशा तोला ऐसे लोग तौलते हैं .फिर एक जुमला  यह भी अक्सर सुनाने को मिल जाता है कि अरे मन से और मूलतः तो भ्रष्ट  सभी हैं -जिसे मौके नहीं मिलते वे खुद को हरिश्चन्द्र दिखाने पर तुल जाते हैं -जाहिर है यह एक भ्रष्टाचारी का उद्धत वक्तव्य है . 

ईमानदारी के प्रवक्ता कहते हैं और अब यह एक बहु -उद्धृत वक्तव्य बन उठा है कि ईमानदारी होनी ही नहीं प्रदर्शित भी होनी चाहिए .गोया आज के दिखावे के युग में या महाभ्रष्ट युग में यह भी एक प्रदर्शन की वस्तु हो गयी है :) फिर तो यह प्रदर्शन कब ढोंग बन जाय कौन कह सकता है?. ईमानदारी भी एक जीवन मूल्य है .आज भी राजकीय सेवा में ऐसे अधिकारी मिल जाते हैं जो इस मूल्य के साथ किसी तरह जी ले रहे हैं बाकी तो कितने हिमालय की कंदराओं में या असमय ही अपने कुल पूर्वज (हरिश्चन्द्र ) से मिलने उनके नाम -प्रसिद्ध गंगा घाट की शरण लेते भये हैं . कुछ इस महामारी से अडजस्ट करने की अपनी मुहिम में यह दलील देते फिरते हैं कि जब जाड़ा अधिक पड़ने लगे तो जिद करने के बजाय रजाई न सही कम्बल तो ओढ़ ही लेना चाहिए ..नहीं तो कोई ऐसा धर्म नहीं है जो आत्मविनाश की हिदायत देता हो . मैं इन्ही विचारों की उहापोह में अपने सरकारी मुलाजिम होने के लगभग तीस वर्ष तो बिता चुका ....सेवा निवृत्ति की ओर बढ़ रहा मगर मुझे कोई निवृत्ति मार्ग नहीं सूझ रहा ...
और जब तक कोई हल न हो, समस्यायों को उठाना एक गैर उत्तरदायित्वपूर्ण काम है .इसलिए इस विषय पर कभी नहीं लिखा और फिर व्यवस्था के एक चाकर को इन विषयों पर लिखने की अनुमति नहीं है -कई भृकुटियाँ तन उठती हैं . मगर वो क्या है न जब जब दंश गहरे होते हैं एक कलम सेवी को कलम (अब की बोर्ड! ) का सहारा लेना ही पड़ जाता है . खुद के लिए नहीं भी तो उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता के नाते . लिहाजा मैंने सोचा आज से अपने सुधी पाठकों और मित्रजनों को और उनके जरिये समाज के और लोगों को जहां तक पहुँच हो सके इस मामले पर संवेदित कर सकूं . यह कोई अछूत विषय क्यों होना चाहिए? आज जब पूरे भारत में, खासकर युवाओं में ईमानदारी और पारदर्शिता तथा जवाबदेही के प्रति एक जुनूनी रुझान उठती दिखाई दे रही है तो शायद एक संभावना भी झलक रही है कि इस कोढ़ के विरुद्ध भी एक बड़ा जनमत उठ खड़ा होगा  और हम और अगली पीढियां इसके प्रभाव से मुक्त हो सकेंगी ..आशा ही तो जीवन है . 
भ्रष्टाचार एक छतरी शब्द है जिसके अधीन तरह तरह के भ्रष्टाचार हो सकते हैं - नैतिक, चारित्रिक, आर्थिक...इनमें तो अनेक बिलकुल निजी वैयक्तिक स्तर के हैं और समाज या राष्ट्र को इतना नुकसान नहीं पहुंचाते जितना आर्थिक किस्म का भ्रष्टाचार। आर्थिक भ्रष्टाचार में लगे लोग दीमकों की तरह हैं जो गरीब टैक्स पेयर के धन को तो हजम करते ही हैं, किसी भी राष्ट्र के आधार स्तंभों को खोखला करने की माद्दा रखते हैं। इनके समूल विनाश का कोई भी कृमनाशी नहीं बना है - ये कहीं भी किसी भी जगह पाए जा सकते हैं - मगर इनका जमाव टॉप पर अधिक है और इनकी इल्लियां तल पर भी मौजूद हैं। आर्थिक भ्रष्टाचार का मॉडल टॉप टू बॉटम का है। इस वैतरणी का उद्गम भी ऊपर से ही है। अगर ऊपर का भ्रष्टाचार मिट जाए तो मैदान की वैतरणी भी साफ़ पवित्र हो जाए। मिथकों में तो वैतरणी कभी भी साफ़ न होने वाली नदी बतायी गयी है। यहां तक कि इसके जल के स्पर्श मात्र से मनुष्य को अपवित्र होने की चेतावनी है। यह ऊपर अधर में लटके त्रिशंकु के लार से प्रवाहित हुई है। भ्रष्टाचार की लार भी ऐसे ही ऊपर से टपकती है। यह मॉडल टॉप टू बॉटम का है।
सरकार की नौकरियों के बारे में यही कहना ज्यादा उपयुक्त है कि यह काजल की कोठरी है। इस घटाटोप में ईमानदारी दिया बाती लेकर ढूंढने से नहीं मिलेगी। अब खुद भी एक ऐसे ही सिस्टम में काम करते हुए बहुत सी बाते मुझे व्यंजना और लक्षणा में कहनी पड़ रही हैं। सरकारी कर्मचारी की आचार संहिता आड़े हाथ आती है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस समस्या का मूलोच्छेदन कैसे हो...सबसे पहले वैतरणी के उद्गम को साफ करना होगा। भारी कीचड़ और कचरा वहीं से बहकर नीचे आ रहा है।
गीता में कहा गया है - यद्यदाचरति श्रेष्ठः तद्देवो इतरो जनः स यतप्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते मतलब जैसा आचरण 'श्रेष्ठ ' लोग करते हैं वैसा लोग अनुसरण करते हैं। अगर ऊपर के लोगों का आचरण पारदर्शी निष्कलंक हो जाए तो नीचे तो अपने आप चीजें सुधर जाएं। ज्यादातर मुलाजिम ऊंचे ओहदों पर कार्यरत बॉस का ही तो अनुसरण करते हैं।
आज यद्यपि भ्रष्टाचार एक वैश्विक मुद्दा बन चुका है मगर भारत में स्थिति बदतर है। यहां विसल ब्लोअर की बातें तो होती हैं मगर एक विसल ब्लोअर का मतलब है खुद अपने पांव में कुल्हाड़ी मारना...भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर खुद शहीद हो जाना। यानी मेसेज साफ है - खबरदार! सीटी मत बजाना। और अब तो यह अपना पूरा समाज ही भ्रष्ट हो चुका है। अपने समाज परिवार में से ही कोई न कोई इसी व्यवस्था के पोषण और औचित्य को सिद्ध करने में लगा है। बिना कुछ दिए लिए काम नहीं होता, जैसे जुमले अक्सर सुनने को मिलते रहते हैं। जाने माने कवि कैलाश गौतम ने अपनी एक कविता में यही बात बड़ी ख़ूबसूरती से सामने रखी थी -
काम नहीं होता है केवल अर्जी देने से
कुर्सी कुर्सी पान फूल पहुचाने पड़ते हैं
कैसे कैसे तलवे अब सहलाने पड़ते हैं...
आज भ्रष्टाचार का चिंतन भी हरि अनन्त हरि कथा अनंता सरीखा हो गया है। क्या मैं आर्त अपील करूं शिखरासीन भातृत्व से कि लिव एंड लेट लिव...!

शनिवार, 26 मई 2012

.... जो आपको न जाने ताके बाप को न जानिए ... :)


इन दिनों मन काफी उद्विग्न है .और उद्विग्नता का कारण भी 'मानवीय' है . कुछ तो ब्लॉग जगत से जुडा है  बाकी दीगर दुनिया के मानवी कमियों से ...वैसे तो मैं मूढ़ता की हद तक आशावादी हूँ मगर कभी कभी लगता है यह दुनिया सचमुच एक जालिम दुनिया ही है -यहाँ परले दर्जे की स्वार्थपरता है,आत्मकेंद्रिकता है ,अपने पराये की सोच है ,कृतघ्नता है ,धोखाधड़ी और छल है,अहमन्यता है ,हिंसा  है ,दुःख दर्द के सिवा और कुछ नहीं है -गरज यह कि यह दुनिया रहने लायक नहीं है ..हमीं लोगों ने इसे रहने लायक नहीं छोड़ा है ..भले ही हमारा चिर उद्घोष सत्यमेव जयते का है मगर अभी इसी बैनर से चल रहे दूरदर्शन कार्यक्रम ने  हमारे अपने समाज के घिनौने चेहरे की परतें उघाड़नी शुरू कर दी हैं -अब तक के केवल तीन इपीसोड़ ने ही बता दिया है कि हमरा समाज दरअसल लुच्चों कमीनों से भरा हुआ है ....गैर पढ़े लिखे नहीं, पढ़े लिखे ज्यादा खूंखार हैं ,संवेदनाओं से रहित हैं ...जयशंकर प्रसाद की ये पंक्तियाँ इन दिनों काफी शिद्दत से याद आ रही हैं -
प्रकृति है सुन्दर परम उदार 

नर ह्रदय परमिति पूरित स्वार्थ 

जहां सुख मिला न उसको तृप्ति 
स्वप्न सी आशा मिली सुषुप्ति 


मगर एक ऐसे समाज के सामने तो अभी अपना ब्लागजगत लाख गुना अच्छा है ..हाँ यह भी अपने समान्तर दुनिया से मिलने की राह पर ही है.

ब्लॉग जगत का भी वह पुराना सहज उत्साह ,मासूमियत भरी उछाह जाती रही...यहाँ भी अब घाघों और घुघूतों का बसेरा है (घुघूती जी माफ़ करेगीं यह उनके घुघूत के लिए नहीं है बल्कि यहाँ  यह उल्लुओं की एक प्रजाति के नाम के रूप में उद्धृत है) ...अब घुघूती जी बीच में आ रही हैं नहीं तो यह शब्द अपने सार्वजनीकरण में कतिपय स्त्रीलिंगों को भी लपेटता ,उनके लिए धन्यभाग, घुघूती जी रक्षा कवच बन गयी हैं :) यहाँ भी दिन ब दिन अजीब अहमन्यता तारी होती जा रही है ..केवल अपनी गाते रहना दूसरों की न सुनना ....दिक्कत यही हुयी कि यहाँ हर कोई ब्लॉगर  है यहाँ दरअसल कोई पाठक है ही नहीं ...जो पाठकीय वृत्ति रखते थे वे भी अब काम भर के ब्लॉगर हो गए हैं .....ब्लॉगर तो एक अलग कौम ही है -उसे साहित्य आदि से कुछ लेना देना भी नहीं है ....बस जबरदस्ती ब्लागरी ( बलागीरी)  करते जाना है ...कोई शिष्टाचार भी उसके लिए मायने नहीं रखता क्योकि वह ब्लॉगर है -केवल अपनी पढना अपनी गुनना ...अपनी ढपली अपना राग ....

तेजी से लोग दूसरे ब्लागों को पढना बंद कर रहे हैं -काहें कि अपने सिवा दूसरे के ब्लाग पढना  ब्लागीय आचार संहिता में नहीं आता ..हाँ टिप्पणियों की लालच में दूसरे  ब्लागों के पढने का स्वांग भर करते हैं -अगर टिप्पणियों पर एक ठीक ठाक नज़र डाल दी जाय तो अक्सर यही दिखता है कि ब्लॉगर बिचारे ने निष्पत्ति कुछ दी है ..टिप्पणी उससे तनिक भी मेल नहीं खाती ..यही चलता रहा तो जल्दी ही टिप्पणी भाष्यकारों की मांग भी होने लगेगी ..मैं तो पहले ही रिजायिन कर रहा हूँ -खुद अपने ब्लॉग पोस्ट पर की गयी टिप्पणियाँ जब समझ नहीं पा  रहा हूँ ,दीगर ब्लागरों की क्या ख़ाक मदद कर पाऊंगा?यह भी एक अजीब सी अहमन्यता है दूसरे ब्लागों को झाँकने तक नहीं जायेगें और ख्वाहिश यह रहेगी कि उनके यहाँ राग दरबारी बजती रहे ... अब कोई आप के यहाँ आया आपको पढ़ा और एवज में एक स्मारिका /टिप्पणी छोड़ गया तो आपका भी यह दायित्व बनता है कि कभी कभार ही सही वहां जाकर कृतज्ञता दिखायें -यह शिष्टाचार का तकाजा भी है . मगर यहाँ अपना विशिष्ट बोध ,अपनी दिखावटी व्यस्तता आड़े हाथ आती हैं ... मुझे यह कतई पसंद नहीं है इसलिए मैंने भी अब निर्णय लिया है कि ब्लॉग पोस्ट अगर पढने लायक रही तो पढ़ जरुर लूँगा मगर टिप्पणी तो वहीं करना है जो हमारे यहाँ भी भले ही भूले भटके आता रहे ....नहीं तो हम भी इतने दरिया दिल काहें  बने .....शठे शाठ्यम समाचरेत ...यह संस्कृत उक्ति तो है ही मार्ग दिखाने  को :) 

उत्तर प्रदेश में नगर निकाय का चुनावी बिगुल बज चुका है ..अब अगले डेढ़  माह तक मेरे पास भी फुर्सत भरा समय नहीं है ..इसलिए नए संकल्प को अपनाने में सहूलियत ही होगी ...वैसे मेरी अपील यही है कि चाहे जो भी हो ब्लॉग लिखना आप कोई भी बंद न करें और दूसरी पोस्टों पर भी अगर आपने उन्हें पढने के बाद पाया है कि वे टिप्पणी डिजर्व करती हैं अपना पत्रं पुष्पं जरुर छोड़ आयें ....हाँ अगर वह बन्दा इतना अहमन्यता पाले बैठा है कि वह कहीं और टिप्पणी करता ही नहीं और कभी भी भूल से भी आपके यहाँ नहीं आता और आप उसके नियमित टिप्पणीकार हैं तो वक्त आ गया है उसकी अहमन्यता को बढ़ावा तो न ही दें .... वह आपके ही उदारता से और भी अहम पालता चला गया है  ...अगर उसके पास वक्त नहीं है तो आपके पास वक्त कहाँ है? -हाँ ऐसे लोग अपवाद हैं जिन्होंने इन्ही बातों के मद्दे नज़र अपना दरवाजा /खिड़की/टिप्पणी खांचा बंद  कर रखा है -मतलब लेने देने का व्यवहार बंद -मगर जो दोनों कपाट खोले जूकियो की तरह कांपा लगाये बैठे  टिप्पणी की ओर टकटकी लगाये रहते हैं और खुद कहीं टिप्पणी नहीं करते हैं -उन्हें सबक सिखाया जाना चाहिए ... वे आपकी सदाशयता और सहिष्णुता के पात्र नहीं हैं .... जो आपको न जाने ताके बाप को न जानिए ... :) 

मैं जानता हूँ मेरे कुछ मित्र भी जो इसी कटेगरी के हैं यह पढ़कर मुझ पर  सठियाने का आरोप लगायेगें उनके लिए बता दूं कि ब्लॉगर पुंगव (श्रेष्ठ ) अनूप शुक्ल जी मुझे पहले ही चिर युवा की संज्ञा/विशेषण दे चुके हैं ....और अभी तो मैं पचपन का भी नहीं हुआ ...पचपन मानें बचपन ! :) 

मेरी ब्लॉग सूची

ब्लॉग आर्काइव