गुरुवार, 22 मार्च 2012

एक फेसबुकिया परिचर्चा

इन दिनों एक दुर्लभ किस्म की आजादी का लाभ उठा रहा हूँ....जो शादीशुदा लोगों के लिए वरदान है मगर प्रत्यक्ष नहीं छुपा हुआ वरदान ...पत्नी मायके गयी हुयी हैं ....पिछली पोस्ट पर इस आजादी की  उद्घोषणा कर चुका हूँ ...तब से बनारसी गंगा का  लाखो टन पानी राजघाट से आगे निकल गया है ...और अब आजादी का समापन भी नज़दीक आन पहुंचा है ....आम दुनियावी शिष्टाचार में गृहिणी के घर से लम्बे समय तक बाहर रहने पर लोग बाग़ सबसे पहले यही पूछ लेते हैं कि भई खाना  पानी कैसे हो रहा है ..जैसे हम कोई ढोर गंवार हैं जिसे सानी पानी चोकर भूसा कोई और देगा तभी जिन्दा रहेंगे  -हम खूंटे में बंधे कोई जनावर तो हैं नहीं .....यह बात भी आपत्तिजनक है कि लोग अर्धांगिनी को केवल खाना बनाने की अपरिहार्यता के रूप में देखते हैं -बस जैसे पत्नी का केवल  यही एक काम  हो ..भारतीय सोच समाज बदलने से रहा ....

मुझे पता है कि कुछ मित्र मन में सोच रहे होंगे कि मैं फिर वही पकाऊ विषय लेकर बैठ गया ...भैया अगर भोगा हुआ यथार्थ ही असली साहित्य का स्रोत  है तो मुझे साहित्यिक सेवा से काहें रोक रहे हैं ..? इन दिनों अपने खालिस अनुभवों को आपसे साझा कर मुझे कुछ तो साहित्यिक अवदान का पुण्य लेने दें :) अब बात लम्बी न खींच कर इसी विषय पर  फेसबुक परिचर्चा का उल्लेख कर दूं जिसे मैंने मित्रों के बीच आयोजित किया था और ढेरो छुट्टा विचार प्राप्त हुए थे....विषय था - "पत्नी का मायके में रहना पति के लिए छुपा हुआ वरदान है"... गिरिजेश भोजपुरिया  ने विषय देखते ही एक लिंक पकड़ा दिया और परिचर्चा से फारिग हो लिए ....ढेर सारे मित्रों ने बड़े उर्वर विचार रखे ....मजे की बात यह कि जिन्होंने सबसे गूढ़ और विस्तृत विचार रखे वे खुद शादी शुदा नहीं हैं -मैंने पूछा प्रभु बिना सेब का स्वाद चखे इतना विषद और सुदीर्घ अनुभव आपको कैसे हुआ तो उन्होंने बड़े फिलासिफियाना अंदाज में जवाबा दिया कि अंतर्बोध और अंतर्ज्ञान भी कुछ चीज होती है ...मुझे अंतर्बोध पर व्याख्यान नहीं सुनना था इसलिए उनके द्वारा उछाले गए इस विषय को हठात परे धकेलते हुए मूल परिचर्चा के विषय पर ही लोगों को फोकस करने की गुजारिश की ....आप भी कुछ अनमोल विचार ग्रहण करें ...सबसे पहले तो उन्ही मित्र महानुभाव के विचार जो अभी तक कुंवारे हैं -गदह पचीसी के आस पास हैं ..आप इनके विचार पढ़कर  भारत की युवा शक्ति  से वाकिफ हो सकते हैं. नाम है ज्ञानेंद्र त्रिपाठी ..कृतित्व की बानगी यहाँ मिल ही जायेगी व्यक्तित्व से उनके फेसबुक प्रोफाईल पर जाकर परिचय प्राप्त कर सकते हैं -
"वैसे ये बात कभी पति पत्नी के सामने स्वीकार नहीं कर सकता की पत्नी का घर जाना वरदान है अतः इसे छुपा हुआ कहना ही सही होगा ........ अब ये वरदान है, इस की पुष्टि के लिए पति को मिलने वाली निम्नलिखित स्वतंत्रता उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत है...........
१. पत्नी घर पर हो तो पड़ोस की भाभी जी से हंस कर बात करना, दफ़ा ३०७ के तहत आता है........ न हो तो अच्छा है.
२. घर पर रोजाना उपयोग के समान ढूढ़ने नहीं पड़ते या इसके लिए पत्नी को चिल्ला कर आवाज़ नही लगानी पड़ती, ये सारे समान (कंघा, बनियान, तौलिया आदि) बिस्तर पर उपलब्ध होते है....... या सामने मेज या कुर्सी पर उपलब्ध होते है.
३. किसी भी मित्र (म./पु.)को घर पर बुलाने की स्वतंत्रता....... अगर सुरा की इच्छा हो तो घर पर ही माहौल बन सकता है.
४.खाना बनाने मे थोड़ी दिक्कत होती है, पर इसी बहाने सही पड़ोस वाली भाभी जी हाल चाल ज़रूर पूंछ लेती है. और उनसे जान पहचान बढ़ाने का मौका मिल जाता है. और उनकी सहानभूति भी मिलती है. अब बात होगी तो आगे भी बढ़ेगी.
५. वैसे कुछ दिनों बाद पत्नी की याद भी आती है, खास करके जब कपड़ों का हुजूम इकठ्ठा हो जाता है........ पर लगता है की कुछ और दिन मज़े ले लिए जाए पता नही ये दिन कब आए, .......... और ये तो सोने पर सुहागा हो जाए अगर वो देर से आए......... एक तो एंज़ोय करने कुछ और दिन.. उसपर उसको घुड़की पिलाने का मौका मिल जाए." 


किस नतीजे पर पहुंचे आप? मतलब ज्ञानेंद्र जी के अंतर्बोध के मामले में? ...अपने पुराने संगी राज भाटिया जी भी विषयाकर्षण से बंच नहीं पाए ,देखिये कैसे दुखती रंग पर उंगली धरते भये ....
" पत्नी मायके गई हे तभी वरदान है  जब घर के काम काज के लिये अपनी छोटी बहिन को छोड गई हों ....:) वर्ना तो आफ़त है ... और  मेरे जैसे के लिये तो बिना पत्नी के रहना नामुमकिन है ... क्योकि मुझे अपने किसी भी समान का कुछ पता नही.... " ...
मित्र अजय त्यागी ने तो एक कविता ही ठोक दी ....
पत्नी गयीं मायके 
ओये मौजा ही मौजा 
भाई मौजा ही मौजा 
ऍमये ओम्मे करिए 
भाई मौजा ही मौजा 
पड़ोसन आये रोटी लाये 
संग बैठकर वो बतलाये 
भाई मौजा ही मौजा 
दिन बीता और रात हो आये 
घुटना मोड़ पेट में सोये ...
बीवी जब वापस आये 
सास की भेजी मिठायी लाये 
भाई मौजा ही मौजा 

आप भी इस परिचर्चा में भाग लेना चाहेंगे? :)  

सोमवार, 19 मार्च 2012

ये कैसी 'कहानी' है?

बिद्दा ( विद्या बालन)  की यह नयी मूवी मैंने कुछ दिनों पहले ही देख ली थी मगर इस पर कुछ लिखने का मन नहीं हुआ ..एक साधारण सी फिल्म लगी थी मुझे. मगर ब्लागजगत और फेसबुक के ज्यादातर मित्रों ने इसे एक अच्छी फिल्म माना है और उनकी यह दावेदारी ईमानदारी से की गयी लगती है... मगर फिर भी बहुत सोचने विचारने के बाद भी मैं इसे एक साधारण फिल्म से ऊपर नहीं पाता....यही कोई दो ढायी  स्टार लायक... विद्या बालन को लेकर कई प्रचार प्रमोशन कंपेन के जरिये दरअसल लोगों को 'कंडीशन' किया जा रहा है ...और जब हम 'कहानी' को देखते होते हैं तो हमारा अवचेतन कंडीशन हुआ मन विद्या बालन की  फिल्म के बारे मे कुछ भी निषेधात्मक स्वीकार नहीं करने देता ... यह वही कंडिशनिंग ही है कि एक अन्यथा झेलाऊ फिल्म का बेड़ा बिद्दा(फिल्म में विद्या को लोग बाग़ बिद्दा  ही कहते हैं )  पार लगा गयी हैं....

फिल्म की कहानी/पटकथा  पश्चिमी सस्पेंस कथाओं से बेहद प्रभावित है ...मगर अपने देश में ,यहाँ के परिवेश और लोकेशन में ये कथायें सहज नहीं लगतीं .... अब कलकत्ता की पुलिस  कितनी उदार है ,कितनी भद्र है ..कलकत्ता ही क्यों पूरे भारत की ही, यह हम जानते हैं ..भारतीय पुलिस और सदाशयता? शिष्टाचार? यह स्काटलैंड नहीं है. मगर फिल्म की कलकतिया  पुलिस  आश्चर्यजनक तौर से बड़ी   भद्र और शिष्ट दर्शित की गयी है! उलटे केन्द्रीय आई बी का मुलाजिम बेहद अशिष्ट दर्शित हुआ है जबकि हकीकत ठीक उलट है  ..कहना यह है कि फिल्म में कम से कम यहाँ तो यथार्थ का चित्रण नहीं हो पाया ..

इधर फिल्मों में  एक चलन फिल्म की लोकेशन /पृष्ठभूमि को भी एक पात्र के रूप में प्रस्तुत करने की है -पिछले सालों की कई फिल्मों जैसे धोबीघाट इत्यादि में मुंबई को इस तरह चित्रांकित किया गया है जैसे वह शहर भी एक पात्र सरीखा हो ...यह बात यहाँ कोलकता के बारे में दुहराई गयी  है ....यानी यहाँ भी कोई नवीनता नहीं है ....कोलक़ता के बारे में जो कुछ हम जानते हैं -दुर्गापूजा की धूम आदि वही यहाँ भी है ...सब दुहराव केवल दुहराव ....बल्कि कोलकता के भद्र बंगाली मोशाय नहीं दीखते ....बस यहाँ पुलिस ही भद्र है ....कहानी का यह डायलाग हकीकत की चुगली करता लगता है कि " कोलकाता से भाग जाओ यह बड़ा डैन्जेरस शहर है " भले ही कहानी की जबरन मांग हो, ऐसे अनावश्यक डायलाग अनपेक्षित हैं ...क्योकि यह बात तो फिर किसी भी शहर के साथ की जा सकती है ...

हाँ कोलकाता के दृश्यांकन के दौरान कैमरा अँधेरे कोनो को ही फोकस करता रहा -घोर अमानवीय स्थति ,गरीबी, गन्दगी ..यह एक कुटिल रणनीति है फिल्म को विदेशी व्यूअर्स पुरस्कारों के लिए क्वालीफाई कराना ...अब कहानी का क्या?  सस्पेंस कथाएं और भी लिखी फिल्मांकित की गयी हैं ....यह उनके  सामने भी नहीं ठहरती ... सस्पेंस क्रियेट करने के लिए अनावश्यक असम्बद्ध दृश्य भी कैमरे के एंगिल में है और दर्शक को भ्रमित करते हैं  ..कहानी के  कई छोटे सिरे ऐसे बिखरे हैं कि दर्शक उन्हें जोड़ता ही रह जाता है ..आरम्भिक दृश्य में ट्रेन के भीतर एक बच्चा अपने बस्ते को भींचे बैठा है ..उसके दोस्त उससे बस्ता खींचते हैं ...बगल की एक महिला का भी बस्ता (झोला ) उसके जाते ही लावारिस हो जाता है और एक दूध की बाटल उसमें से गिरती है और जहरीली गैस फ़ैल जाती है ....इस दृश्य को पता नहीं क्यों इतना जटिल बना दिया गया है . क्या केवल इसलिए कि दर्शकों को एक सस्पेंस फिल्म देखने को तैयार किया जा सके?

हाँ बिद्दा ने फिल्म को संभाल लिया है ...वन वूमन शो है यह फिल्म .....कहानी आप कहीं भी पढ़ सकते हैं ..यहाँ भी ....वैसे सस्पेंस फिल्मों की पूरी कहानी तो आपको पढने को मिलेगी  नहीं ..समीक्षक की भी अपनी प्रोफेशनल आनेस्टी /मजबूरी होती है :) (समीक्षक की ,मेरी नहीं )   अगर किसी फिल्म को  अच्छा माना जाता  हैं तो उसका कोई वस्तुनिष्ठ मापदंड होना चाहिए -मनोरंजन ? शिक्षा सन्देश? समस्या का हल? या किसी समस्या पर फोकस? सामाजिक सरोकार?  अब मनोरंजन तो बेहद  सब्जेक्टिव मामला है ..और मनोरंजन छोड़  दिया जाय तो यह फिल्म अन्य पहलुओं पर औंधे मुंह गिरती है...बाक्स आफिस पर भी  शुरुआती भीड़ भले ही दिखी हो अब हाल खाली जा रहे हैं .....बनारस में तो यही स्थिति है .....कोई और च्वायस हो तो इसे देखने जाना न.... जाना न ... :) बस यह प्रोमो भर देख लीजिये जो जान है फिलम की ....

पुनश्च: भारत के अभिजात्य बौद्धिक वर्ग ने अपने कई 'मेक बिलीव' बना रखे हैं,जिसके तहत वह सहज बोध के विपरीत अपनी पसंदगी नापसंदगी का निर्धारण करता है -फिल्मों के बारे में राय बनाने में भी यही मानसिकता है -चालाक निर्देशक यह बात बखूबी जानते हैं और इस तबके से भी पैसा वसूल कर लेते हैं -इस वर्ग के कुछ मेक विलीव यह हैं-
१-फिल्म सेट पैटर्न से अलग हो ..
२-तीसरी दुनियां की फिल्थ कचरा गलीजता पर कैमरे का फोकस हो 
३-महिला पात्र केन्द्रीय भूमिका में हो 
४-गानों का अलग से फिल्मांकन न हो ..ऐसे ही बेतरतीब पार्श्व गायन हो तो चलेगा 
५-परदे पर कहानी साफ़ सपाट न हो ,दर्शकों को बेतरतीब धागों को सुलझाना पड़े -मतलब जिगसा पजल सा ..
आदि आदि फिलहाल ऊपर के लगभग सभी बिन्दुओं का समावेश कहानी में हुआ है .....
हम भी पिछले पचपन साल से श्रेष्ठ कहानी के प्रतिमानों में इन्ही को वरीयता देते आये हैं ...
मगर अब सहज होना चाहते हैं! :) 

शनिवार, 17 मार्च 2012

उनका मायका,मेरी मौज!

आज वे मायके चली गयीं हैं ..और इससे उपजे अहसास पर  सोचा एक पोस्ट चेप दूं .यह भीड़ जुटाऊ श्रेणी की पोस्ट है . कभी कभार की  ऐसी पोस्टों से ब्लॉगर की मौजूदगी का शिद्दती अहसास दीगर ब्लागरों में  बना रहता है ...अगर यह पोस्ट ज्यादा टिप्पणियाँ नहीं जुगाड़ेगी तो महज इसलिए कि भीड़ जुटाने की बात मैंने बेबाकी से कह डाली है ..लोग आयेगें तो मगर टिप्पणियाँ करने में संकोच कर सकते हैं ..मगर मैं मुतमईन हूँ मेरे चाहने वाले जरुर आयेगें और अपने प्रेरणा पुष्पों को सदैव की भांति यहाँ बिखेर जायेगें ...स्टैट काउंटर आने वालों की  संख्या भी बतायेगा ही .. मगर पहले की ही तरह कुछ लोग जलेगें भुनेगें मगर यह उनकी नियति है तो मैं क्या कर सकता हूँ ..मैं तो भीतर से सभी का शुभाकांक्षी हूँ -मगर लोग बाग़ आँखें तरेरे रहें तो  मैं  करूं भी क्या? बहरहाल वे आज मायके गयीं हैं .. जाने की प्रस्तावना विविध रूप रंगों से  कई दिन से बना रही थीं -मैं इस बार निरुत्तर और निरपेक्ष था ..पत्नी को मायके जाने से रोकने वाला कलियुग में घोर पाप का भागी बनता है ..सुना पढ़ा है ऐसे पतियों को कुम्भीपाक नरक नसीब होता है ..और अब वानप्रस्थ का समय निकट आता जा रहा है तो मुझे भी परलोक की चिंता होने लगी है -यह तो रही बाहर की बात  -एक अन्दर की बात भी  है ..जरा कान करीब  लाईये न..बताते हैं ....(खुसर पुसर ) ....

 पत्नी के मायका गमन से एक परम शान्ति ,सकून और आजादी का अनुभव भी होता है ....यह आप लोगों में से श्रेष्ठ और गुणी  पुरुषों ने अनुभव भी किया होगा ....दरअसल घर स्त्री का ही होता है ...एक गृहिणी ब्लॉगर ने इसी बात को अभी हाल में अपनी एक लम्बी कविता में समझाया भी है और मैं उनकी इस बात से पूरा इत्तेफाक भी करता हूँ -दरअसल यह भोगा यथार्थ मेरा भी है..घर पर तो गृहणी की ही चलती है -वह तानाशाह होती है ...लेडी आफ द हाउस या गृह मंत्रालय जैसे  नामकरण इसकी  पुष्टि भी करते हैं ..अब मैं प्राणी व्यवहार का अध्येता रहा हूँ तो किसी भी व्यवहार का उदगम ढूंढता फिरता रहता हूँ -आखिर गृह स्वामिनी इतनी कड़क क्यों होती हैं ? घर पर अपना अकेला अधिपत्य क्यों समझती हैं? घर स्त्री का होता है और घर बिल्ली का भी होता है ...आपको क्या पता है कि बिल्लियाँ जिस घर में होती हैं उनका गृह स्वामी/स्वामिनी के बजाय घर से लगाव होता है और कुत्ते घर के बजाय अपने स्वामी /स्वामिनी से गहरे जुड़े होते हैं ....आप किसी मकान को छोड़ जाएँ और वर्षों बाद लौट आयें तो आप ताज्जुब कर सकते हैं अपनी पुरानी पाली हुयी बिल्ली को  वहां देखकर ..मगर कुत्ता स्वामी/स्वामिनी  के साथ ही घर छोड़ जाएगा नहीं तो जान दे देगा ...

जाहिर है आज के मनुष्य में भी कतिपय इन्ही पशु  प्रवृत्तियों का  ही विस्तार तो  हुआ है ....पत्नी घर छोड़ना नहीं चाहतीं  मगर बिचारी मायके के मोह में विवश हो जाती हैं ...किन्तु  जब घर पर इस  तानाशाह की मौजूदगी रहती  है तो पति निषेध कार्यक्रम बदस्तूर जारी रहता है - यह न करो वह न करो ..ये तौलिया यहाँ क्यों रखा ...ये सामान यहाँ क्यों छोड़ा ..ये गन्दगी यहाँ क्यों की ..डेजी (कुतिया ) की चेन यहाँ क्यों रखी?अखबार यहाँ  क्यों पड़ा है? चप्पलें यहाँ क्यों निकाली?  डिटाल की शीशी खुली क्यों पडी है?मतलब नाक में दम!-लगता है हे भगवान ये तो पूरी जिन्दगी ही तबाह हो गयी है ...इसलिए गृह स्वामिनी के घर छोड़ते ही परम सुख की सहज स्वयमेव  तत्काल प्राप्ति हो जाती है ....अब तो सबै भूमि गोपाल की ..जहां कहीं भी मन हो निढाल हो रहिये ..जो भी जैसा भी करिए ...कोई बोलने वाला नहीं ...परम सुतंत्र न सर पर कोई ..एक दिव्यानुभूति! घर की ऐसी तैसी! वैसे भी कुत्तामना पुरुष घर को ठेंगे पर ही रखता है ..हाँ दूसरे आस पड़ोस के घरों के बारे में और गृह वासियों के बारें में उसका ख़याल तनिक जुदा सा होता है ...वह तो मुए अंतर्जाल ने पुरुषों को भी घर से चिपका रखा है अब, नहीं तो हमसे पहले की पीढी के मर्द घर पर रहते ही कहाँ थे -...

उस विरहिणी नायिका का आर्तनाद सुना है आपने? -कहवाँ बिताई सारी रतिया ,पिया रे सांच कहो मोसे बतिया ....या फिर ..तुम जाओ जाओ मोसे ना  बोलो सौतन के संग रहो....भोर भये आये हो द्वारे ये दुःख कौन सहे .... अब मैं होता तो बिचारी विरहणी को ढाढस देता छोडो ऐसे कुत्ता (आ)चारी पिया को वे ऐसे ही होते हैं ..उन्हें आदिकाल से पड़ोस ही अच्छा लगता आया है ...जीनों की विरासत है जो ...अब इतनी जल्दी तो बदली नहीं जा सकेगी ..रफ्ता रफ्ता एकाध लाख साल तो लग ही जाएगा ..हाँ नारीवादी थोडा जोर लगा लें तो एकाध हजार साल कम भी हो सकता है ....अब विरहिणी घर को छोड़ नहीं सकती -उसका प्राण बसा है उसी में ...और लोग भी न जाने कैसे कैसे मुहावरे गढ़ डाले हैं -डोली और अर्थी का गहरा  रिश्ता पिया के घर से जोड़ते भये हैं ...मगर मुआ मर्द वह तो चिर स्वतंत्र है ..कुत्ता है कुत्ता ..न घर का न घाट का -घाट घाट का पानी पीने के लिए भटकता रहता है ताउम्र ....तब भी उसकी प्यास नहीं बुझती ..छिः कुत्ता कहीं का .....

बहरहाल मैं परम स्वतंत्रता का अनुभव कर रहा हूँ और आज की और आगे की भी ..कुछ दिनों की इस स्वयमेव अर्जित आजादी को सेलिब्रेट करने की कार्ययोजना बना रहा हूँ -सरकारी मानुष हूँ कार्ययोजनायें बना लेता हूँ ...एक मित्र तो अभी पहुँचने वाले हैं ..हम उन्हें बुलावा भेजे हैं ..घर से निकल चुके हैं ..उन्हें भी कहीं बाहर खुली हवा में सांस लेने की दरकार है ....गुजरेगी खूब जब आज मिल बैठेगें दो यार ..कई दिल्ली के दोस्तों की भी बरबस याद आ रही है -काश वे  होते यहाँ ! न न भाई ..अब इत्मीनान से मार्च के बाद आईयेगा अभी तो यह टेम्पररी मुक्ति है ...पता नहीं कब घर की मालकिन टपक पड़ें ! खतरा तो है ही! फिलहाल तो घर पर मेरा कब्ज़ा है ..परसों नरसों तक वे फिर काबिज हो जायेगीं -मगर सच कहूं तो न घर उनका न घर मेरा यह तो बस इक रैन बसेरा है ....

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

और अब हंस गीतिका!

राजहंसों की पुनर्खोज विषयक पहली और दूसरी पोस्ट के बाद यह आख़िरी किश्त है जिसमें हंस /राजहंस की एक और प्रबल दावेदारी का उल्लेख किया जाना जरुरी लगता है .यह कटेगरी है गूज (goose )की जिन्हें भी भारतीय साहित्य में हंस और कहीं कहीं राजहंस का दर्जा मिला हुआ है .सालिम अली ने भी बारहेडेड गूज (अन्सेर इंडिकस ) को हंस, राजहंस,बिरवा और सवन  के हिन्दी नामों का उल्लेख किया है .एक मिलती जुलती प्रजाति -बड़ी बत (अन्सेर अन्सेर)  भी है.दोनों भारत में जाड़े की प्रवासी हैं और अक्सर अक्टूबर से मार्च तक नदियों ,झीलों के आस पास दीखते हैं . 
बार  हेडेड गूज -यह भी है एक हंस!

गूज जाड़े में समूचे उत्तर भारत, आसाम तक फ़ैल जाते हैं .मगर मध्य भारत को छोड़ आगे बढ़ते हुए ये मैसूर तक देखे गए हैं . मध्य भारत में इक्का दुक्का दिखाई पड़ते हैं .किसी हिन्दी कवि  ने यह कहा है कि 'सिंहों के नहीं लेहड़े,हंसों  की नहिं पांत " तो निश्चय ही उसने गूजों की टोली और पंक्तिपावन परम्परा अनदेखा ही किया था ..ये जमीन पर तो बड़े झुंडों में होते ही हैं उड़ते  वक्त भी या तो V का अकार लेते हैं या फिर रिबन सरीखी कतार से नभ के दो सुदूर कोनों को जोड़ते हुए से लगते हैं .इनकी आंग आंग की आवाज गूजती हुयी सी लगती है . 

सुरेश सिंह ने 'भारतीय पक्षी' में  बारहेडेड गूज का सोनाबत और कादम्ब हंस  भी नाम दिया है .उनका कहना है कि कि कुछ कवियों ने इसे ही कलहंस या हंसराज भी कहा है ...उनके अनुसार यह मंगोलिया और साइबेरिया के दक्षिणी भागों में अपने घोसले बनाती है . तिब्बत और लद्दाख की झीलों में भी इनकी एक बड़ी आबादी जोड़े बनाती है . 
भारत सरकार की भी दरियादिली कि एक बत्तख को भी देवहंस का दर्जा मिल गया 

कई कवियों ने ज्यादा नीर क्षीर विवेक के चक्कर में पड़कर बत्तखों को हंस मान लिया है जिनमें नुक्टा या काम्ब डक और ह्वाईट विंग वूड डक है जिन्हें क्रमशः नंदीमुख हँसक और देवहंस का नाम मिला है ...जाहिर हैं कवियों की कल्पनाएँ उनके नीर नीर क्षीर विवेक और प्रकृति के सूक्ष्म प्रेक्षण पर हावी रही हैं . कुछ कवियों ने चैती (टील )  आदि को भी हंसराली,काणक हंस  जैसे सुन्दर नाम दे डाले हैं ....आशय यह कि एक आम पाठक के लिए इन्ही विवरणों के चलते असली हंस की पहचान मुश्किल तलब होती चली गयी ....
....इसलिए ही हंस गीतिका* आपकी सेवा में दरपेश हुयी -
*स्वान सांग = अंतिम कृति! 

सोमवार, 5 मार्च 2012

हे कवयित्री!


हे कवयित्री!

होली देहरी लाँघ चुकी है अब तो छेड़ो  नेह की  बातें   
घुट घुट जीवन क्या जीना अब तो  करो फाग की बातें 
बीता जो बीता, कल की कब की अब न बात करो 
जीवन जो शेष पड़ा है अब उसका तो श्रृंगार करो 
हे कवयित्री! 
सबका जीवन ऐसा ही है जहाँ सुख दुःख का रेला है 
कोई ऐसा भी है जिसने दुःख को कभी न झेला है ?
फिर नित क्यूं  रोना धोना ह्रदय शूल को दूर करो 
फागुन ने दी दस्तक है  बढ़  आगे बंदनवार धरो 
हे कवयित्री!
माना बेदर्दों ने तुमको दुःख पहुचाये हैं अनगिन पल छिन 
लेकिन देखो  कोई है जिसकी  है तुममे  दिन रात लगन 
त्याग युगों की यह सिसकन,उठ देख  द्वार है कौन आया 
अभिसार करो   हो  धन्य, हो जाए  पुलकित  मन  काया 
हे कवयित्री!  
 मंगलमय  होली पर आप सभी मित्रगण को रंगारंग शुभकामनाएं!

रविवार, 4 मार्च 2012

बांधे रखती है फिल्म पान सिंह तोमर!

जी हाँ फिल्म के प्रमुख किरदार का नाम ही फिल्म का नाम भी है . दरअसल एक  असली किरदार के 'रियल लाईफ' का ही रील वर्जन है यह फिल्म . पान सिंह तोमर कभी सेना में दौड़ प्रतिस्पर्धाओं के नेशनल चैम्पियन हुआ करते थे ...मगर जमीन जायदाद और पट्टीदारी के चक्कर में ऐसा उलझे कि उन्हें चम्बल के बीहड़ों में शरण लेनी पडी और अंत में मुठभेड़ में उनकी जान  चली गयी ....नहीं..नहीं...यह फिल्म चम्बल के डाकुओं का महिमा मंडन या गौरव गान नहीं करती जबकि उन विवशताओं को जरुर उजागर करती है जिस खातिर एक सीधा सरल सच्चा व्यक्ति भी बीहड़ के रास्ते चल पड़ता है ...

फिल्म पर पिपली लाईव का प्रभाव स्पष्ट है -कई कलाकार भी उसी फिल्म के हैं -ग्राम्य परिवेश का चित्रण करने में फिल्म पिपली लाईव का अनुसरण करती दिखती है ...फिल्म की पटकथा कसी हुई है ...एक सेकेण्ड को भी फिल्म बोरिंग नहीं हुई है जबकि पूरे सवा दो घंटे की फिल्म है ....संवाद प्रभावित करते हैं और सबसे अधिक प्रभावित मुख्य पात्र इरफ़ान खान करते  हैं जिन्होंने इस फिल्म में अपने अभिनय के झंडे गाड़ दिए हैं ...एक जगह पान सिंह तोमर से  सेना के अधिकारी पूछते हैं कि क्या उसका सम्बन्ध डाकुओं के परिवार से है तो वह कहता है  साब! डाकू नहीं बागी कहिये ..डाकू तो भारत के पार्लियामेंट   में पाए  जाते  हैं {लगता है अरविन्द केजरीवाल इसी डायलाग से प्रभावित हुए हैं जिसका इस्तेमाल वे धड़ल्ले से हाल की अपनी तकरीरों में कर रहे हैं .. - :) } ..

पीपली लाईव के बाद इस फिल्म ने एक बार फिर भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था -ला एंड आर्डर के नकारे- निकम्मेपन ,असंवेदनशीलता और नाकाबिलियित को फोकस किया है ..किस तरह पुलिस निकम्म्मी और पक्षपाती है ,यहाँ तक कि एक बेहद संगीन और नाजुक मौके पर खुद जिले का कलेक्टर समस्या का निराकरण न कर कहता है कि दोनों पक्षों में चंबल के खून की गरमी है आपस में खुद निपट लो और घटनास्थल से चल पड़ता है ....पानसिंह तोमर की विवशता उसे चम्बल का राह दिखाती है .. जहाँ एक नेशनल खिलाड़ी के रूप में उसे कोई पूछता नहीं ,इलाके का थानेदार तक उसका मेडल फेक देता है, बागी बन जाने  पर उसकी फोटो अखबार के पहले पन्ने पर छपती है ....लोग उसके नाम से थर्राते हैं ...इसी विडंबना को लेकर वह व्यथित है .

खैर जो भी हो पान सिंह तोमर ने कानून को अपने हाथ में लिया तो फिल्म के अंतिम दृश्य में हुयी मुठभेड़ में उसका एनकाउंटर भी हो जाता है ...मगर फिल्म इस मामले का कोई हल नहीं दिखा पाती कि आखिर समस्या का समुचित समाधान /विकल्प क्या है ? क्या  पान सिंह तोमर का रास्ता ही अंतिम विकल्प है और नहीं तो फिर विकल्प क्या है? शायद आज की मौजूदा भ्रष्ट और नाकारा व्यवस्था में सचमुच कोई विकल्प नहीं दीखता? और फिल्म इसी मोड़ पर समाप्त होती है -आखिर कोई हल हो तो वह सुझाये! 

फिल्म बहुत अच्छी है .पटकथा  चुस्त दुरुस्त .अभिनय बेमिसाल! देख सकते हैं! साढ़े तीन स्टार! दीगर विवरण यहाँ देख सकते हैं !

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

४९ ओ का अन्ना फैक्टर और केजरीवाल की किरकिरी

उत्तर प्रदेश में मतदान का एक दृश्य! मतदान केंद्र पर वोट देने के लिए अपनी बारी का बेसब्री से इंतज़ार करते दो छात्र -नवयुवक जिनका मतदान करने का यह पहला अवसर है.आखिर उनका नंबर आ ही गया और वे मतदान अधिकारी प्रथम के पास पहुँचते हैं .. .....
"मुझे फ़ार्म ४९ ओ दीजिये....मुझे किसी भी प्रत्याशी को वोट नहीं देना है ..सबके सब  नालायक हैं, किसी काम के नहीं हैं ...." पीछे का लड़का भी यही मांग करता है .
"ऐसा कोई फ़ार्म नहीं है ..मतलब मुझे नहीं पता है, जाईये पीठासीन अधिकारी से मिलिए ...." उसने उन दोनों को एक ओर इशारा किया जहां पीठासीन अधिकारी बैठे थे ....
"अजीब मामला है इन लोगों को कुछ पता ही नहीं है ..." छात्र बुदबुदाए...पीठासीन अधिकारी के पास पहुंचकर  उनका स्वर खीझभरा हो गया ...उनमें से जो एक ज्यादा तेज था बोला ...
"आपके मतदान  अधिकारी को तो कुछ पता ही नहीं है ....हमें किसी को वोट नहीं देना है इसलिए हमें लाईये दीजिये फ़ार्म नंबर ४९ ओ ताकि किसी को भी वोट न देने के अपने अधिकार का हम प्रयोग कर सकें ...."
"फ़ार्म नंबर ४९ ओ? " पीठासीन अधिकारी के माथे पर बल पड़ते हैं ..फिर वह अपने सामने के कागजों को उलटता पलटता है ...परेशान सा बोल पड़ता है ..नहीं है ..ऐसा तो कोई फ़ार्म नहीं मिला है और न ही हमें ट्रेनिंग में बताया गया है ..."
"मगर केजरीवाल साहब का तो यही कहना है कि अगर कोई काबिल प्रत्याशी  न हो तो फ़ार्म  ४९ ओ लेकर आप अपना मत डाल सकते हैं .." दोनों लडके एक साथ लगभग चीखते हुए बोले ....
" आप एक काम कीजिये ... मतदाता रजिस्टर जो हमारे मतदान अधिकारी दो के पास है उस पर अपना मतदाता संख्या और साईन करके कह दीजिये कि हम मतदान नहीं करना चाहते ..हम फिर आपकी साईन कराके और अपनी भी साईन करके आपको यह करने की अनुमति दे देगें  ... मगर आप  ई वी एम मशीन में वोट नहीं डाल सकते और नहीं ऐसा कोई फ़ार्म मुझे मिला है ....जिसकी बात आप कर रहे हैं ..." पीठासीन अधिकारी ने लगभग उठते हुए कहा ....

अब तक उन छात्रों का टेम्पर लूज हो गया था ..मुंह से निकल रहे सुभाषितम में निर्वाचन आयोग और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ दो शब्द  साफ़ सुनायी दे रहे थे ...अब तक शांत केन्द्रीय सुरक्षा बल का जवान सहसा हरकत में आया और अगले पल ही दोनो  छात्र खुद लम्बी लाईन के आखिरी छोर पर जा  पहुँच गए थे ...मगर वे अब  वहीं धरने पर बैठ गए ... और निर्वाचन आयोग मुर्दाबाद ,अन्ना जिंदाबाद शुरू हो गया .....निर्वाचन कंट्रोल रूम तक अनुगूंज सुनायी पडी और इक्का दुक्का ऐसी ही खबरे और भी मतदान स्थलों से आने लगीं.. 

दरअसल यह मामला किसी फ़ार्म /प्रपत्र का नहीं बल्कि एक नियम से है -निर्वाचन संचालन नियम १९६१ के नियम ४९ ओ के अनुसार कोई भी मतदाता मतदान स्थल में प्रवेश और  मतदाता पंजिका में हस्ताक्षर और अमिट स्याही या यहाँ तक कि ई वी एम मशीन में कमांड दिए जाने के बाद भी  मतदान करने से मना  कर सकता है ..इसके लिए उसके इस निर्णय के एवज में पीठासीन अधिकारी उसका हस्ताक्षर मतदाता  पंजिका (१७ अ ) में कराकर उसे इसकी अनुमति दे सकता है . यही ४९ ओ है . यह नियम है कोई फार्म वार्म नहीं! मगर अब अन्ना साहब की टीम का क्या किया जाय जो अपने प्रशंसकों को अच्छा होमवर्क नहीं दे रही है ....यह उन्हें ठीक से बताना चाहिए था कि ४९ ओ की व्यवस्था क्या है? 

मगर लगता है अन्ना साहब के टीम मेंबर भी अब पर उपदेश कुशल बहुतेरे की प्रचलित भारतीय आदत के शिकार हो चुके हैं ..खुद अरविन्द केजरीवाल जो इतना जोशीला भाषण देते हैं ,मतदाताओं को लम्बे अरसे से जागरूक करने का अभियान चलाये हुए हैं यह जानने की जहमत नहीं उठाये कि उनका ही नाम मतदाता सूची में नहीं है ....और इस खातिर अभी उनकी जोरदार किरकिरी हुयी है ....कल गोआ और उत्तर प्रदेश में मतदान है .उत्तर प्रदेश में तो आख़िरी सातवाँ  चरण ..अगर आप या परिजन मतदान करने जा रहे हैं तो यह पोस्ट पढ़कर आप अपना मत किसी भी के पक्ष में न डालने के निर्णय पर ४९ ओ की उपर्युक्त प्रक्रिया अपना सकते हैं   ..हो सकता आगे यह सुविधा ई वी ऍम में एक अलग बटन देकर कर दी जाय -राईट टू रिजेक्ट की बटन! मगर अभी तो ४९ओ से ही  संतोष  करना होगा ....भले ही इसकी बड़ी विडंबना यह है कि इसमें मतदान की गोपनीयता भंग हो जाती है ..आप ने किसी को वोट नहीं डाला यह बात उजागर हो रहती है ..जबकि निर्वाचन की व्यवस्था कानूनन गोपनीय है! इसलिए मेरी तो सलाह है कि किसी अपेक्षाकृत बेहतर पार्टी /प्रत्याशी के पक्ष में अपना गोपनीय मत ही डालें! अपने वोट को बर्बाद न करें! 

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

मानस के राजहंस :भाग -2

हंस विषयक पिछली पोस्ट में सुधी पाठकों /मित्रों की कई जिज्ञासाएं व्यक्त हुयी है ,सुझाव मिले हैं .पहले तो यह स्पष्ट कर दूं कि यह पोस्ट महज उस राजहंस की पहचान आपके सामने रखने के लिए है जिसका जिक्र अक्सर हमारे प्राचीन ग्रंथों और मिथकों में हुआ है ..वैज्ञानिक लिहाज से स्वान (swan ) और  गूज (goose )  अलग प्रजातियों के पक्षी हैं मगर हिन्दी में इन सभी को हंस कह दिया जाता है ....कामिल बुल्के के अंगरेजी हिन्दी कोश में भी अंगरेजी के इन दोनों शब्दों का अर्थ हंस बताया गया है.कामिल बुल्के ने स्वान का अर्थ बताया है -राजहंस ,हंस तथा गूज के लिए भी हंस, कलहंस ,हंसी ,हंसिनी शंब्दों का उल्लेख किया है ...

स्वान(Swan),जैसा कि पिछले पोस्ट में जिक्र हुआ है भारतीय मूल का पक्षी नहीं है किन्तु असली 'मानस का राजहंस'  वही लगता है ...और निश्चय ही  प्राचीन  बृहत्तर भारत के आखिरी छोरों से आज की भागोलिक सीमाओं में कभी   आ सिमटे हमारे अदि पूर्वजों के की स्मृति शेष में रचे बसे उसी स्वान -राजहंस की ही छवि -विवरण हम ऋग्वेद एवं कतिपय प्राचीन संस्कृत साहित्य के ग्रंथों में पाते हैं ....और परवर्ती साहित्य में हिमालय पार कर यहाँ आने वाले कई प्रवासी पक्षी (गूज आदि ) ,यहाँ तक कि बत्तखों को भी हंस माना जाने  लगा. विश्वमोहन तिवारी कहते हैं कि वैदिक काल  के ऋषि गणों  के भ्रमण का दायरा बड़ा विस्तृत था -वे कश्मीर ,कैलाश तथा मानसरोवर तक आते जाते रहते थे जहां प्रवासी स्वान प्रजाति भी शीत ऋतु में दिख जाती थी..मगर कालान्तर के कवि जन तराई तथा गंगा की कछार तक ही सीमित होते गए जहां उन्हें गूज दिखते रहे और उन्होंने इसी प्रजाति की पदोन्नति हंस में कर दी .. हिमालय की एक घाटी जिससे ऐसे प्रवासी 'हंस' मैदानी भागों में प्रवेश करते है को कालिदास ने मेघदूत में हंसद्वार कहा है जो आज भी कुमायूं जिले में नीतीघाटी  के नाम से जाना जाता है और इससे होकर तिब्बती यात्री आते जाते हैं ....


संस्कृत साहित्य के विद्वानों में भी असली राजहंस को लेकर मतभेद रहा है .कुछ विद्वानों ने इसे बिलकुल सफ़ेद न मानकर धूसर माना है .अमरकोश में राजहंस के बारे में बताया गया है कि इनका शरीर 'सित' आँखें और पैर लाल रंग के होते हैं ...राजहंसास्तु ते चक्षुचरणैलोहितै: सितः ..सित का अर्थ बिलकुल सफ़ेद  न होकर धूसरता लिए सफेदी से है ..जाहिर है यह विवरण 'स्वान' से नहीं मिलता बल्कि फ्लमिंगो (The Greater Flamingo (Phoenicopterus roseus से काफी मिलता है और इसलिए यह पक्षी भी राजहंस पद का प्रबल दावेदार है -यह मूल भारतीय देशज पक्षी है और गुजरात के कच्छ जिले के 'ग्रेट  रन आफ कच्छ' में इनका विशाल नीड़-क्षेत्र है -जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है .इसे फ्लमिंगो सिटी के नाम से भी जाना जाता है .यह विश्व का सबसे बड़ा फ्लमिंगो प्रजनन स्थल है . यही पास में ही हड़प्पा सभ्यता के अवशेष मिले हैं जो  पुरातत्व विशेषज्ञों के भी आकर्षण का केंद्र है -इस तरह कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति के आदि काल  के  भी साक्षी  रहे हैं फ्लमिंगो! और कोई आश्चर्य नहीं यदि इस पक्षी को जन स्मृतियों में महत्वपूर्ण स्थान मिला है .सालिम अली ने अपनी पुस्तक 'द बुक आफ इंडियन बर्ड्स ' में इसे राजहंस की पदवी पर प्रतिष्ठित  किया है ...कामिल बुल्के ने इसे ही हंसावर कहा है .
राजहंस का एक और प्रबल दावेदार (विकीपीडिया ):फ्लमिंगो  

फ्लमिंगो गुजरात के कच्छ जिले ही नहीं देखा जा सकता बल्कि जैसा कि सालिम अली मानते हैं यह अपने घुमक्कड़ स्वभाव के कारण भारत में कहीं भी दिख सकता है,विश्व के तमाम और भागो में तो पाया ही जाता है ... मैंने आज तक फ्लमिंगो नहीं देखा मगर हो सकता है आपमें से कुछ ने देखा हो ...यह बहुत सुन्दर पड़ा पक्षी है और राजहंस कहलाने की पूरी काबिलियत रखता है ...
विकीपीडिया के नक़्शे में रन ऑफ़ कच्छ 
मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं कभी रन आफ कच्छ जरुर जाऊं और इन नयनाभिराम पक्षियों का दर्शन कर नेत्रों को लाभ दूं .यह वैसे तो पूरा मरुथल है मगर बरसात के दिनों में मीठे -खारे पानी का जमाव यहाँ होता है और फ्लमिंगो घोसले बनाते हैं जो मिटटी के तिकोने ढूहे से लगते हैं . रिफ्यूजी फिल्म की शूटिंग यही हुयी थी ...क्या कोई ब्लॉगर मीट यहाँ हो सकती है एक लाईफ टाईम नज़ारे को आँखों  में कैद करने के लिए? कोई गुजराती ब्लॉगर बंदा  क्या पढ़ रहा है यह?

क्रमशः ....

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

मानस के राजहंस (1)

विभिन्न सामाजिक अवसरों के इस वाक्य से भला शायद ही कोई अपरिचित हो -...."हे मानस के राजहंस तुम भूल  न जाना आने को ..." मतलब मेहमान को एक बड़ी पदवी देकर सम्मान सहित बुलाने का भाव इस अर्धपंक्ति में निहित है ..मगर मानस के राजहंस से क्या सचमुच हम भलीभांति परिचित हैं? ...यह आश्चर्यजनक है कि भारत में कई पक्षी विद्वान भी इस पक्षी की वास्तविक पहचान को लेकर भ्रमित रहे हैं .ऋग्वेद में जो राजहंस वर्णित है वह तो भारतीय महाद्वीप का पक्षी ही नहीं है ...पक्षी प्रेमी विश्वमोहन तिवारी अपनी पुस्तक "आनंद पक्षी निहारन का" (नेशनल बुक ट्रस्ट ) में कहते हैं कि 'हंस शब्द वैदिक काल में अधिकतर महाहंस (हूपर स्वान-Cygnus cygnus ? ) को इंगित करता था' मैं उनके कथन से सहमत हूँ मगर महाहंस जिसे मैं राजहंस भी कहूँगा यहाँ का पक्षी है ही नहीं ..
यही है वह हंस -महाहंस जिसका उल्लेख हमारे ग्रंथों में हुआ है -(Whooper स्वान) 

यह शुभ्र -श्वेत पक्षी  विभाजित  रूस के अधिकाँश भाग से लेकर फिनलैंड तक  अपना साम्राज्य आज भी बनाए हुए है और ये कई यूरोपीय देशों,कैस्पियन सागर,जापान ,चीन के कुछ क्षेत्रों और कभी कभार भूले भटके कश्मीर तक प्रवास करते देखे गए हैं .....आज भी इनकी संख्या १८0,000 है मगर अफ़सोस कि भारत में ये नहीं मिलते.. मगर जो बात आश्चर्य में डालती है वह यह कि आज के भारत में इनकी नामौजूदगी के बाद भी प्राचीन भारतीय ग्रन्थों ,वैदिक साहित्य और संस्कृत साहित्य में हंस की इसी प्रजाति का बहुलता से विवरण है ..ऐसा कैसे संभव है?

हंस ज्ञान की देवी सरस्वती का वाहन घोषित है -कवियों ने हंस को सरस्वती के वाहन के रूप में ही प्रतिष्ठित नहीं किया, नीर -क्षीर विवेक के गुण से भी युक्त किया -यह सरस्वती के साहचर्य के साथ सर्वथा उपयुक्त ही था -हेन्सैर्यथाक्षीरमिवाम्बुमध्यात  ....अर्थात यह हंस पानी का पानी और दूध का दूध  (अलग)   कर सकता है -कवि कल्पना ने यहीं विराम नहीं लिया वरन कैलाश पर्वत के सन्निकट मानसरोवर(अब चीन नियंत्रित तिब्बत में )  को इसका वास स्थान बताकर उस सरोवर से मोती चुग कर खाने की  विशिष्ट आहार प्रियता के गुण का भी बखान किया ...मगर फिर वही प्रश्न  उठता है कि जब महाहंस यहाँ था ही नहीं तो इसका इतना विपुल विवरण भारतीय साहित्य में कैसे है?
स्वान -हंस का मूल पर्यावास और प्रवास क्षेत्र :ध्यान दें भारत तक इनकी पहुँच नहीं है (विकीपीडिया ) 

निश्चय ही भारत की आज की भौगोलिक सीमा  हजारों वर्ष पहले इतनी सिमटी हुयी नहीं थी -या फिर इरान और कैस्पियन सागर तक रह रहे हमारे पूर्वज जो महाहंस से पहले से ही बखूबी परिचित रहे हों ,अपने रचना लोक .में इसका उल्लेख करते रहे हों.  जब प्रवास गमन के उपरान्त वे और नीचे मौजूदा भौगोलिक सीमाओं में आयें हों तो यह स्मृति भी स्मृति -वाचिक परम्परा में यहाँ अक्षुण बन गयी हो ...ध्यान रहे ईरानियों के ग्रन्थ अवेस्ता और ऋग्वेद में आश्चर्यजनक समानताएं हैं -अब यह पक्षी साक्ष्य भी इसी तथ्य की इन्गिति करता है कि हमारे पूर्वजों का साम्राज्य निश्चय ही इरान और वाह्य  यूरोपीय सीमाओं तक कभी न कभी अवश्य फैला था और वे कालांतर में दक्षिण पूर्व की और लौटे हैं ....जबकि प्रवासी पक्षी हजारो साल से एक निश्चित परिक्षेत्र में ही रहते आये हैं उनके प्रवास क्षेत्र /मार्ग में बड़े परिवर्तन नहीं हुए हैं ...यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने इस पक्षी को  भलीभांति देखा भाला था ,अपनी स्मृतियों-श्रुतियों  में अमर कर रखा था और बाद में उनकी आगामी पीढ़ियों की कृतियों में भी उनका उल्लेख बना रहा है -भले ही कभी भी महाहंस का यह पर्यावास  न रहा हो ....
राजा रवि वर्मा की एक अमर कृति : राजकुमारी दमयंती और राजहंस 

हमारे लौकिक साहित्य में भी हंस को कई रूपों में जाना समझा गया है -दो हंसो का जोड़ा दाम्पत्य निष्ठा का प्रतीक है तो हंस आत्मा का भी प्रतीक है ..हंस विद्वता का प्रतीक है, परमहंस परम ज्ञानी का द्योतक है ....कालिदास ने  महाहंस (स्वान ) तथा अन्य हंस प्रजातियों में  विभेद किया है -विश्वमोहन तिवारी ने अपनी उक्त पुस्तक में महाहंस ,हंस तथा हंसक श्रेणियों का उल्लेख किया है और बताया है कि भारत में महाहंसों के चार  वंश ,हंसों के नौ वंश तथा हंसकों के छत्तीस   वंश हैं जिनमें गूज  'goose ' और बत्तखें तक सम्मलित है .इसी संदर्भ में उन्होंने कालिदास को उद्धृत किया है -जिन्होंने  रघुवंश में स्वयंबर के लिए राजाओं के सामने चलने वाली इंदुमती की चाल को महाहंस की चाल ,रानी बनने के बाद गरिमा और भव्यता को दर्शाती उनकी हंस की चाल का उल्लेख किया है -महाभारत के एक कथा दृश्य - राजकुमारी दमयन्ती और हंस संवाद को रवि वर्मा ने अपनी पेंटिंग के लिये  चुना है जहां हंस दरअसल 'स्वान' ही है ..जाहिर है हंसों की विभिन्न प्रजाति का ज्ञान पूर्व मनीषियों को था   .मगर सबसे बड़ा सवाल तो यह कि जिस महाहंस की बात आज हम यहाँ कर रहे हैं उसका प्रवास क्षेत्र तो कभी  यहाँ रहा ही नहीं! स्पष्ट है हमारे पूर्वज कवि निश्चय ही 'स्वान' के प्रवास क्षेत्र से ही इन स्मृति बिम्बों को पीढी दर पीढी अक्षुण बनाए रहे ...


जारी .... .

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

बहुत खराब है महिलाओं का समय प्रबन्ध

वैसे तो ऐसे  पुरुष भी कमतेरे नहीं हैं जिनका समय का प्रबंध बहुत लचीला रहता है -समय से आफिस नहीं पहुंचते,प्रायः बॉस की डांट खाते हैं मगर अमूमन महिलाओं का समय प्रबंध बहुत कमज़ोर होता है ऐसा मेरा अनुभव रहा है . आश्चर्य है इतने महत्वपूर्ण विषय पर आज तक कोई गंभीर अध्ययन नहीं हुआ है या कम से कम मेरी खोजबीन का नतीजा यही रहा है ...कई भारतीय महापुरुषों का समय प्रबन्ध बड़ा ही सटीक और शानदार रहा -गांधी जी समय के बड़े पाबन्द थे ...एक बार उन्होंने एक अध्यापक को मिलने का समय दिया था जो दस मिनट देर से पहुंचे तो गांधी जी ने उन्हें  बड़ी फटकार लगाई -कहा कि अगर यही आदत उनके छात्रों की होगी तो देश समय के कितने पीछे चला जायेगा ...विदेशों में समयबद्धता की कितनी मिसालें तो हम अक्सर सुनते ही रहते हैं ..मुझे विदेशी पुरुषों और महिलाओं के तुलनात्मक समय प्रबंध की कोई प्रमाणिक जानकारी तो नहीं है मगर कहे सुने की बात है कि सारी दुनिया में ही अमूमन समय प्रबंध के मामले में पुरुषों की तुलना में वे खासी फिसड्डी होती हैं ....

सबसे खस्ताहाल तो भारतीय महिलायें हैं -यहाँ तो लगता है कि उनसे  समय का विवेक ही छिन सा गया है...एक स्टीरियोटाईप तो वही है कि पतिदेव तैयार बैठे हैं ...किसी का बुलावा है शादी समारोह का और पत्नी जी तैयार हो रही हैं ....इस स्थिति से आपका भी दो चार हुआ ही होगा ..मिनट नहीं, घंटे बीत जाते हैं मगर श्रीमती जी का सजना बजना बदस्तूर बना रहता है ...पतिदेव कुढ़ रहे होते हैं ,झंखते झल्लाते हैं मगर अंततः असहाय हो चुप मार जाते हैं ,उन्हें भी पता है ही कि इस मामले  का कोई इलाज नहीं है ....मेरे एक संबंधी हैं बिचारे की पत्नी जी की तैयारियों में कई बार ट्रेन छूटी है ..एक बार तो ऐसा वाकया हुआ कि ट्रेन के चल पड़ने के साथ ही जब पत्नी जी पहुँची तो उन्हें तो ट्रेन पर चढ़ा कर वे खुद उतर गये और पत्नी को विदाई का गुड बाय कह दिया ..ट्रेन रफ़्तार पकड़ चुकी थी ..खैर फोन कर यात्रांत के परिजनों को उन्हें रिसीव करने को आगाह कर दिया ...बात तो ख़त्म हो गयी लेकिन अभी भी समय प्रबंध को लेकर दंपत्ति  में जिच कायम रहती है . 

मैंने ज्यादातर सरकारी कार्यालयों  में पाया है कि देवियाँ तनिक या फिर अधिक देरी से ही पहुँचती हैं ..कई बार बेबस बॉस भी कुछ कह नहीं पाता इस कारण से कि सख्ती का परिणाम कहीं उसे ही महिला शक्ति से टकराने के  के खामियाजे के रूप में न भोगना पड़ जाए -कुछ सख्त बॉस अपने ऊपर लांछन आदि भी झेल चुके हैं, इन कबाहतों के चलते ..मैं भी इस मामले में फूंक फूंक कर ही कदम उठाता आया हूँ -क्योकि मुझे पता है कि जिस तरह से मैं अपने पुरुष सह कर्मियों के ऊपर समय की लापरवाही को लेकर बिफर पड़ता हूँ अगर कहीं महिला कर्मी से यही बर्ताव हुआ तो शायद वह दिन भी न देखना पड़ जाय जिससे बच पाने  में मैं विगत तीस वर्षों से भाग्यशाली रहा हूँ ..मगर इसका रंच मात्र भी  गुमान नहीं है मुझे  ..बल्कि डर ही बना रहता है..शेष सरकारी सेवा बस कट जाय किसी तरह! 

जैवीय विज्ञान और व्यवहार शास्त्रों के अध्ययन ने मुझे इस मामले को भी सुलटाने को प्रेरित किया .काफी सोचने विचारने के बाद जो बात मन में कौंधी है वह यही है कि महिलायें इसकी दोषी नहीं हैं -दोष उनके वैकासिक अतीत का है ..उनकी जीनों में उनकी देर सवेरी का राज छुपा है -जब मनुष्य गुफावासी था तो पुरुषों का दल जहां  शिकार को निकल पड़ता था वहीं घरैतिनें घर पर मौज मस्ती काटती थीं ..एक दूसरे का सुखवा दुखवा सुनती सुनातीं थीं ..आराम से बच्चों को नहलाती धुलाती थीं ...चौका बासन के साथ ही खाना पानी का इंतजाम करती थीं मगर सभी कुछ आराम से,सलीके से ....कोई  जल्दीबाजी नहीं ....पतिदेव  तो शाम को ही आयेगें ....ढेर सारा फुर्सत भरा समय ..समय ही समय ..फिर समय प्रबंध की जरुरत ही कहाँ ? जबकि पुरुष टोलियों के लिए समय प्रबंध उनके लिए जीवन मृत्यु का प्रश्न था ..खिसकते सूरज के साथ उन्हें शिकार की टोह में दूर सुदूर भटकने के साथ ही समय से वापस लौटने की फ़िक्र होती थी ....कहीं रात हुयी तो धुप अँधेरे में शिकारी के  शिकार बन जाने की बड़ी आशंका थी ....हिंस्र पशुओं की भरमार थी तब ....दिन के उजाले में बचाव संभव था मगर रात में शिकारी असहाय था .....

 पुरुषों का समय प्रबंध महिलाओं से बेहतर तभी से हुआ ..चूंकि जीन प्रेरित व्यवहार हज़ार लाख वर्ष में ही बदलते हैं इसलिए समय का यह लोचा आज भी कायम है ....दृश्य भले ही बदल गएँ हैं जीन हमारे वही हैं! 

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