सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

शिव बारात सज रही है!

आज तो बम बम बोल रही है काशी....शिवरात्रि पर काशी  शिवमय हो जाती है ..शिव बारात सज रही है ...बरात क्या है चित्र विचित्र दृश्यों का संयोग है -एक बूढा बैल पकड़ा गया है,लोग उस पर भयावह से लग रहे बाल शिव को बैठाने के उपक्रम में हैं ...बैल बिदक रहा है ..लोग उसे संभाले हुए है ..दर्शक दूर से नमस्कार कर रहे हैं ..कहीं बैल बिदक गया तो किसी के थामें न थमेगा ..मेरे मन में भी दहशत है इसलिए एक सुरक्षित कोना ढूंढ लिया है ..बारात सज बज रही है ...यह भी कोई बरात है?


बैल तो बिदक गया अश्वारूढ़ हुए शिव बाबा -शिव बरात का एक दृश्य 

अजब गजब स्वांग भरे हैं बाराती -कोई नंगा ,कोई अधनंगा ,कोई लूला कोई लंगड़ा ,कोई अँधा कोई काना ...और भूत पिशाचों की तो एक अलग टोली है -खुद शिव मुंड माला पहने हैं ,अधनंगे हैं ,भभूत लपेटे हैं ,गले का जिन्दा फुफकारता नाग  है,विषदंत न भी टूटा  हो तो भी विषकंठी पर विष का प्रभाव कहाँ? अजब गजब बरात.. बस चलने को उद्यत है ...यह कैसा दृश्य है? ..कोई बरात ऐसी भी हो सकती है भला? हजारो हजार साल से शिव की बरात ऐसी ही निकलती आयी है -कहीं यह हजारो हजार विपन्न, अभाव ग्रस्त प्रवंचित भारतीयों का एक सांकेतिक चित्रण तो नहीं? क्या हुआ हम गरीब हैं ,बुभुक्षित हैं मगर उत्सवप्रेमी हम भी हैं -क्या हम मानव नहीं ? हमें क्या खुशियाँ मनाने का हक़ नहीं? हम जैसे हैं वैसे ही अपनी खुशियों का इज़हार करेगें! शिव की यह बरात मन में कई तरह के भावों को संचारित कर रही है -यह भी लग रहा है कि शिव  भी कुछ कम मौजी और किलोल -कौतुकी नहीं हैं -ऐसी बरात उनकी परिहास प्रियता का नमूना तो नहीं?

लोकमन के जितने करीब शिव हैं उतना  कृष्ण भी नहीं ...जन जन में रचे बसे हैं शिव ...न जाने कितने लोक गीत और लोक कथाएं भोले को लेकर प्रचलित हैं ..कहते हैं अपने नंदी पर ही पार्वती को भी बिठाए  हुए     (जबकि पार्वती का   वाहन अलग है ) भोले बाबा गाँव गिरावं घूमते रहते हैं- लोगों का दुखदर्द बांटते रहते हैं ...भला ऐसे दयालु दंपत्ति से लोगों का लगाव क्यों न हो ..भारत की नारियां तो शिव के प्रति पूरी समर्पित हैं ...शिव पूजा के प्रति उनमें विशेष उमंग और उछाह रहता है .....वर्षा ऋतु का एक पर्व है ललही छठ-यह औरतों का ही पर्व है जहां  वे इकट्ठी होकर शिव पार्वती के अन्तरंग पलों का भी चटखारे लेकर बयां करती हैं -इस शिव पार्टी में पुरुषों का जाना निषेधित है ..ऐसी पार्टी में एक बच्चे के रूप सम्मलित  मैंने जो कथायें सुनी है कि बस उनका स्मरण मात्र होठों पर मुस्कान बिखेर रहा है ...एक आम भारतीय नारी का शिव से इतना अपनापा है कि बस कुछ मत पूछिए ..शिव   खुद उनके स्वामी की प्रतीति हैं  ... शिव भोले भले हैं मगर  रसिक भी कम नहीं ..बस दिखने में ही बौरहे बकलंठ हैं, अन्दर से बड़े गहरे हैं ...उन्हें हल्के में लेना भारी पड़ सकता है ....वे कड़े योगी हैं तो बड़े भोगी भी हैं ..
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आदि देव हैं शिव ....विद्वानों के बीच उनके आर्य अनार्य होने की बहस छिड़ जाती हैं ..मैं तो यही मानता हूँ की वे मानव की चेतना की अनुपम अभिव्यक्ति हैं -उनकी संकल्पना खुद हमारी अभिलाषाओं ,आकांक्षाओं ,दुर्बलताओं ,विपन्नताओं ,प्रवंचनाओं की ही देन है -इसलिए ही तो हम उन्हें अपने इतना करीब पाते हैं -हर किसी ने शिव को अपने अपने रंग में गढ़ा है -विद्वानों को  जहाँ वे 'नमामीशमीशान निर्वाण रूपं .....' लगते हैं तो एक तांत्रिक को वे भस्मावेष्ठित  कपाल कुंडल युक्त अघोरी दिखते हैं ..नर्तक -गायक उन्हें इस विद्या के अधिष्ठाता  मानते हैं तो किसी योद्धा को वे तांडव मुद्रा की प्रतीति कराते हैं ....कालांतर में सबने उन्हें अपना बनाया  है ,वे क्या सर्वहारा क्या समृद्धिवान सभी के चहेते देव हैं ....लोकमानस ने उनके साथ खुद को इतना जोड़ लिया है ,इतनी कथायें रच डाली हैं कि वे आम भारतीय में सदियों से ऐसे गुथे हुए हैं कि आगे भी कितनी सदियाँ क्यों न बीत जाएँ जनमानस शिवत्व से विलग नहीं हो सकता .....

योगी तो ऐसे कि उनके ध्यान भंग करने के लिए  कामदेव को अपनी जान की बाजी लगाने पडी ..मगर आसक्त भाव भी ऐसा की दक्ष यज्ञ के पश्चात मृत सती का शरीर लिए छः माह व्यथित विकल घूमते रहे ....मृत विगलित शरीर जगह जगह गिरता रहा -जो पुण्य स्थान बनते गए ...बनारस के एक घाट पर मणि कुंतल के साथ कान गिरा तो वह  मणिकर्णिका कहलाया -जो मोक्ष "श्रोतम श्रुतैनैव ' से नसीब था वह मणियुक्त पार्वती के कर्ण अवशेष अनुप्राणित स्थल के जीवित ही नहीं मृत्योपरांत भी  संस्पर्श मात्र से ही सर्व सुलभ है -आज  हिन्दुओं का अंतिम संस्कार के रूप में यहीं शव दाह की परम्परा है ---कामरूप कामाख्या में सती का एक कामांग  गिरा तो  जन श्रुति चल पडी कि पूरब की महिलाओं में जादू का आकर्षण है -यहाँ अकारण ही पूरब की बूढ़ी दादियाँ और स्त्रियाँ अपने बच्चों /पतियों को असम/बंगाल के सौन्दर्य से  बच के रहने की चेतावनी नहीं देतीं ....

बिना पार्वती के संस्पर्श -साथ के शिव भी शव रूप ही हैं ....वे शिव तो शिवा के संयोग से ही हैं ....एक भक्त ने वामांग में  पार्वती को बैठे देख हठ कर लिया कि वह केवल शिव रूप का ही अर्चन चाहता है तो शिव खुद अर्धनारीश्वर बन गए ...उस मूरख को कहाँ पता था कि वे अलग है ही कहाँ?  वे तो शब्द और अर्थ की भांति जुटे हुए हैं ....वागर्थाविव संपृक्तौ ...पार्वती परमेश्वरौ .....शिव की बारात नगर की गलियों को गुलजार कर रही है -बच्चे बूढों सभी के आकर्षण का केंद्र बनी हुयी है ....चारो और हंसी और ठिठोली का माहौल है .....भला ऐसी भी कोई बारात होती है ....जस दुलहा तस बनी बराता....

इस संसार में जो कुछ भी मनोरम है, सौष्ठव और सामंजस्य लिए है विभिन्न विरूपताओं में भी संतुलन बनाए हैं  वही शिव है -आप सभी का शिव पार्वती मंगल  करें-यही कामना है !  

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

परिणय बत्तीसी: सुहाना सफ़र और सलामत बत्तीसी!

वह प्रथम मिलन: संध्या -अरविन्द!  
देखते देखते दस बीस नहीं बत्तीस वर्ष बीत गए ....गनीमत यही कि खुदा के फज़ल से अभी बत्तीसी सलामत है..१८ फरवरी १९८१ की उस गुनगुनी शाम और गुलाबी निशा की यादें आज भी तरोताजा हैं, हाँ बारीक डिटेल्स यानी कोहबर और सोहबत की बातें  जरुर विस्मृत हुई  हैं ....यह पूरी तरह से एक अरेंज्ड मैरेज थी .....पिता पितामह चाचा आदि श्रेष्ठ जनों ने जो आज्ञां दी सर माथे ले ली थी ....उसके पहले के एकाध क्रश और क्रैश का गला घोटकर :)  ...मैंने विवाह पूर्व के कतिपय कैजुअल रागात्मक सम्बन्धों के  दरम्यान यह बात बहुत साफ़ करके रखी थी कि विवाह का स्वतंत्र निर्णय मैं नहीं ले पाऊंगा ..यद्यपि दूसरों को इसके लिए प्रोत्साहित करता था और अपने एक मित्र की कोर्ट मैरेज में मैंने भी बखूबी उत्प्रेरण का दायित्व निभाया था......
  परिणय के साक्षी मित्रगण 
मगर खुद अपने बारे में ऐसा निर्णय इस लिए नहीं ले पा  रहा था कि परिवार में कुछ वर्षों पहले ही बिना पारिवारिक सम्मति के  एक इंटर रेलिजन विवाह हो चुका था और परिवार के कई सदस्य इससे संतप्त थे -ख़ास कर मेरे पितामह जिन्हें मैं बेहद चाहता था ..फिर दुबारा कम से कम उन्हें दुखी करना नहीं चाहता था..उन्हें अपनी खोयी साध पोते की शादी में पूरी करनी थी सो उन्हें मैं इसका पूरा अवसर उन्हें देना चाहता था ..यह उनका हक़ था ....और किन तरीकों से पितामह ऋण से उरिण हुआ जा सकता है ...  साथ ही  एक पूर्व पारिवारिक घटना के संघात की भरपाई भी करना मेरा जैसे मकसद सा था -जैसे त्याग का एक जनून सा तारी हो गया था  मुझ पर ..और इसलिए  मां बाप नियोजित इस विवाह प्रस्ताव को शिरोधार्य कर लिया था मैंने ...

....पितामह और परिजनों ने सचमुच अपनी साध पूरी की और पूरी सज धज के साथ बारात निकली थी ..बरात में दो दो रियासतों के राजा -राजा जौनपुर और राजा सिंगारामउ गए थे जो की एक विरल घटना मानी गयी थी -कारण कि रियासतों के वैमनस्य के कारण वे कभी साथ साथ नहीं होते थे ....मित्रगण इसे एक सामंतवादी नजरिये का नाम देगें और शायद उनकी यह सोच सही भी है ..मैं भी उन दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र था और बहुत सी बातें मुझे भी नागवार लगती थी मगर मैं तो त्याग की प्रतिमूर्ति बना बैठा था न ....सो चुप ही रहा हर समय... 

मगर मुझे आज भी लगता है कि बिना कोर्टशिप के विवाह कैसा? गनीमत यही थी कि प्रचलित रस्म के मुताबिक़ मेरा गौना(वधू की विदाई )  लगभग एक वर्ष बाद होना था सो मैंने एक जिम्मेवार पति के दायित्व को बखूबी निभाया ...उन दिनों गौने के पहले ससुराल आना जाना एक टैब्बू था सो मैंने पत्राचार का रास्ता निकाला..हर रोज श्रीमती जी को एक पत्र  लिखने लगा ..और निरंतर यह अनुरोध   कि वे भी मुझे निरंतर पत्र लिखें ...आखिर शुरुआती संकोच के बाद उनके पत्र  लेखन का सिलसिला नियमित हो चला था औंर गौने के दिन आते आते एक दूसरे के प्रति हमारे अपरिचय का फासला मिट चुका था ..प्राणी शास्त्र /व्यवहार विज्ञान के अध्ययन ने मुझे मनुष्य की मूलभूत जैवीय आवश्यकताओं के बारे में काफी कुछ समझा रखा था और एक बात जो जेहन में बराबर घूमती रहती थी वह यह थी कि मनुष्य के मामले में कोर्टशिप अवधि अमूमन एक वर्ष की होती है ....मतलब हमारे बीच यह अवधि सफलतापूर्वक बीत गयी थी भले ही गहन पत्राचार के जरिये ही ...और प्रत्यक्षे किम प्रमाणं? आज ३२ वर्ष बीत गए हैं और हमारे बीच की सहमति सामंजस्य के प्रति जन परिजन भी प्रायः ईर्ष्यालु हो उठते हैं ....
आज कुछ घंटों पहले का एनीवर्सरी  फोटो 

हम तब तक जिम्मेदारियों के बोझ का साझा निर्वहन भलीभांति नहीं कर सकते हैं  जबतक जोड़ बंध मजबूत न हों और वे कैसे मजबूत हो सकते हैं मुझे लगता है कि उसे एक प्राणिविद से बेहतर शायद ही कोई समझ सकता हो .... :) भले ही हमारे  अली भाई अपने  समाजविज्ञान की अपनी विद्वता बघारें और सुश्री प्रिय आराधना चतुर्वेदी अपना पांडित्य ..जैवीयता के बंध गहरे होते हैं यह मैं आपसे पूरी ईमानदारी के साथ शेयर करना चाहता हूँ -यह  बेसिक/आधारशिला है  और बाद में समाज विज्ञान और मनुजता की दीगर विशिष्टताएं भी आ जुड़ती  हैं ....आज हम मिया बीबी, हमारे  बच्चे एक गहरे बंधन से जुड़े हैं और अपने जीवन से सर्वथा संतुष्ट और तमाम आपा धापी, विरोधाभास   और जीवन की अपरिहार्य ,समस्याओं के बावजूद भी हम एक इकाई हैं .....
आज शाम हम पुष्प प्रदर्शनी देखने गए तो जामियास  वू सा लगा !

संध्या  धुर आस्तिक हैं तो मैं नास्तिक हूँ ..मगर हाँ मैं एक दूसरे तरीके का नास्तिक हूँ ..मुझे अपनी संस्कृति ,संस्कारों पर गर्व है और ईश्वर के अस्तित्व को लेकर मैं अपने उपनिषदों के नेति नेति की विचारधारा का समर्थक हूँ ...ईश्वर को न तो प्रकल्पित किया जा सकता है और  न ही रूपायित ही ....यहाँ मैं इस्लाम में ईश्वर की अवधारणा के करीब हूँ मगर इस्लाम के परवर्ती विचारों और कूपमंडूकता से मुझे  सख्त नफरत है, उसी तरह से जैसे हिन्दू धर्म के पौरोहित्यवाद और पंडावाद का मैं विरोध करता हूँ -मगर क्या करियेगा ..कबीलाई समूहों की प्रवृत्ति हमारे जीनों में रची बसी है और इसलिए अपने को अलग थलग दिखाते रहने की जैवीय प्रतिबद्धता ने हमें हिन्दू मुस्लिम में बाँट  के रखा है और यह मनुष्य प्रजाति के खात्में के साथ ही शायद  ख़त्म होगा.... अरे अरे यह कैसा लेक्चर देने लगा मैं ..आज तो हमारी परिणय बत्तीसी है ....

आप महानुभावों की शुभकामनाओं,आशीर्वाद और कुछ प्रियजनों की मीठी ईर्ष्या की भी दरकार है आज तो, ...और आप सभी हम दोनों को इनसे धन्य और परिपूर्ण  करेगें ऐसी आशा है ...... 

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

मुर्रा भैंसों का कैटवाक:स्पर्धा में बेशर्म चयनित ,शर्मीली बाहर!

यह अभिनव आयोजन हरियाणा के जींद शहर में होना तय है .इसके पहले सोनपुर के प्रसिद्ध पशु मेले में भी ऐसे आयोजन को जनता का भरपूर समर्थन मिला था ...माडल्स का कैटवाक तो फैशन की दुनिया का एक जानामाना आयोजन है -बिल्लौरी आँखों के चुम्बक और मदमाती "फेलायिन " चाल से लोगों के कलेजों  पर बिजलियाँ गिरातीं माड्लें...निश्चित ही नए आयोजन की प्रेरणा स्रोत भी यही माड्लें ही हैं ..वैसे भैंसों की तुलना भी बेहतर सेक्स से चोरी छुपे और दबी जुबान में पुरुष जन करते ही रहते हैं ....अब यह आयोजन एक दमित इच्छा का उत्सवी प्रगटीकरण  ही लगता है ...

सौन्दर्य की  नयी श्यामा :) कैसी लगी ? 
सौन्दर्य के इन नयी कृष्णा -माडलों के लिए अलग ढंग और डिजाईन के रैम्प बनाए जा रहे हैं....और आयोजन के पहले चयन की स्पर्धा में बेशर्म भैंसों को ही चयनित किया गया है और शर्मीलियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है -आयोजक बिलकुल वही मोड्यूल अपना रहे हैं जो माडलों के कैटवाक का है ...बेशर्म इसलिए कि हजार जोड़ी घूरती गृद्ध दृष्टियाँ कहीं भैंसों को भी नर्वस न बना दें ....इसलिए शर्मीली  पहले से ही बाहर कर दी गयीं -यहाँ तो भीड़ के सामने उद्धत और बेपरवाह ,बिंदास या बम्बास्ट ही बने रहना पड़ता  है ..शर्मीली  बिचारियों के लिजलिज संस्कार उनके आड़े जो आ जाते हैं ...सो वे कहीं आयोजन के रंग में भंग न डाल दें इसलिए जजों की पारखी दृष्टि ने उन्हें पहले ही पहचान कर घर का रास्ता दिखा दिया है ....

अगर हम माडलों के कैट वाक्  के अल्पकालीन इतिहास पर गौर करें तो इसकी शुरुआत फैशन डिजाईनरों ने अपनी दुकान चलाने को किया था -हाँ इससे माडलों को और भी  मौके मिले और विश्व सुन्दरियों तक का चयन भी ऐसे ही आयोजनों से मूर्त रूप लेने लगा  -प्रयोगधर्मियों ने बाद में गृहणियों को भी रैम्प पर रम पम   कराने की मुहिम चलाई और यह कतई असंगत नहीं कि अब रैम्प पर सौन्दर्य की नयी कृष्णाओं की धमक होने को है ...कैटवाक पर निश्चित ही पुरुष माडल सफल नहीं हुए और यही कारण है कि भैसे  इस प्रतियोगिता से अभी भी बाहर हैं -युगल कैटवाक का भी यहाँ सवाल नहीं है क्योकि कहीं यम दूत और दूतियाँ रैम्प पर कैटवाक करते करते सहसा कुछ और अप्रत्याशित  गुल न खिला दें -यह एक बड़ा रिस्क है!आयोजक यह रिस्क लेने को तैयार नहीं हैं खास तौर पर इस बासंती मदमाते मौसम में!

वैसे हरियाणा सरकार का जाहिरा तौर पर यह दावा है कि पूरा आयोजन मुर्रा भैंसों की नस्ल  को जनप्रिय बनाए जाने का है -जो अधिक दूध देती हैं .और हरियाणा में इन्हें पालने वालों को समाज में ऊँची नज़रों से देखा जाता है -जितनी मुर्रा  भैंसे दरवाजे पर उतनी ही बड़ी हैसियत और रुतबा -अब इसके बारे में डॉ .दराल साहब और दीगर हरियाणवीं ब्लॉगर बन्धु ज्यादा जानकारी दे सकते हैं ....

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

काश तुम मेरी वैलेंटाईन होती...!

तुम्हे पता है इन दिनों मैं कितना व्यस्त हूँ ..बावजूद इसके अपने प्रेम का इज़हार करने का कुछ समय चुरा ही लिया  -धरती के भूगोल के इस हिस्से में प्रेम के  नए महापर्व के पूर्व दिवस पर....यह पत्र  मैं गोपन भेज सकता था मगर न जाने क्यों यह मन हो आया कि इसे सार्वजनिक दृश्य पटल पर रखूँ ...प्यार कोई गुनाह नहीं फिर डरना भी क्यों ....कभी कभी ऐसा भी होता है जो बात अकेले में कहने में संकोच  होता है उसे सार्वजनिक करने में उतनी मशक्कत नहीं होती .... यह सहानुभूति और जन सहमतियाँ बटोरने का कारगर नुस्खा भी रहा है ...टंकी रोहण का धर्मेन्द्र का शोले दृश्य भला किसी को भूल सकता है .....

अब लोगों को शायद  गुमान हो या न भी हो मगर यह पत्र केवल तुम्हारे लिए है ......तुम कौन? कभी मैंने इसका उत्तर दिया था -तुम जो मात्र शरीर ही नहीं एक शाश्वत कामना हो .....अब उम्र के इस पड़ाव पर सहसा ही यह अहसास हो चला है कि प्यार केवल और केवल सूफियाना ही होता है ....और जो सूफियाना हो वही दरअसल सच्चा प्यार है ....देह की हिस्सेदारी तो महज कुदरत की चालबाजी है जो केवल अपनी लीला का विस्तार चाहती है और कितनों को ही बसंत के फसंत में फंसाती है -बड़ी ठगिनी है रे यह कुदरत......मगर इस देह फांस के बाद भी जो बच रहता है वही तो है न प्यार!  

मैंने सोचा कल पता नहीं हो या न हो यह इज़हार आज ही कर संतुष्ट हो लूं ....वैसे भी कल परसों यू पी के इलेक्शन में मरने की भी फुरसत नहीं रहेगी ...लोग कयास लगायेगें कि यह बासंती सन्देश किसके लिए है मगर तुम्हे तो किंचित भी डाउट नहीं होना चाहिए ...जानेमन यह तुम्हारे और केवल तुम्हारे लिए है ....मुझे उन लोगों की अस्मिता और स्टीरियो टाईप सोच पर तरस आता है जो प्यार के मनोभावों को महज इसलिए जगजाहिर नहीं करते कि आखिर लोग क्या कहेगें ..दुनिया क्या सोचेगी ..इमेज का क्या होगा ? उनसे केवल यही सवाल है कि प्यार में भला कौन सी भद्दगी है या गन्दगी छुपी है? और वैलेंटाईन दिवस से बेहतर कौन सा दिन हो सकता है ऐसी अभिव्यक्ति का -वैसे भी वैलेंटाईन दिवस और बसंत का आह्वान साथ होने में महज कोई संयोग नहीं दीखता ....हमारे कुछ साथी न जाने क्यों इस अवसर पर आक्रामक हो उठते हैं ..प्यार मनुहार पर आक्रोशित हो उठते हैं ....मुझे नहीं लगता कि मानवीयता और मानवता का इतना उत्कृष्ट प्रदर्शन कोई और होता हो ....कहीं  यह  कुछ दिशाहीन मित्रों की कोई अपनी ही संकीर्णता तो नहीं जो अवसर पर मुखरित हो उठती हो ? कहीं  वे प्यार के चिर प्रवंचित तो नहीं  ..सहानुभूति है उनसे ....मुझे लगता है उन्हें भी रेड रोजेज चाहिए ..ढेर सारे रेड रोजेज... काश वे प्यार के अहसास से लबरेज हो पाते....

मैंने अपने मन की बात कह दी है ..मुझे तुम्हारे जवाब की अधीरता से प्रतीक्षा रहेगी .यहीं या मेरे मेल पर .....
तुम्हे और मेरे सभी मित्रों और दुश्मनों को भी वैलेंटाईन दिवस की अनेक अशेष शुभकामनाएं! 

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

बनारस की एक सुबह बेहया यादों के नाम

कुछ यादें सचमुच कितनी बेहया होती हैं कि जितनी बार भी उनसे पीछा छुडाओ वे बार बार गले आ  पड़ती हैं.अब भला ये कोई बात हुयी बनारस की अल्लसुबह रामनाम जपने के बजाय बेहूदी बेशर्म यादें सर चढ़ के बोलने लगीं ...अभी अभी फेसबुक पर अपनी यह व्यथा दर्ज कर उनसे पीछा छुड़ाना चाहा मगर वे हैं कि जाने का नाम नहीं ले रहीं तो सोचा उन्हें ब्लॉग कर दूं तो शायद ब्लाक हो जाएँ ....फेसबुक पर लिखा -

बहुत दिनों से नहीं आयी है तुम्हारी याद 
हम तुम्हे भूल गएँ हो ऐसा भी नहीं .....
मगर कोई भुलाए न भूले,बुलाये न बने तब? 
तब तो ...
याद में तेरी जहां को भूलता जाता हूँ मैं 
भूलने वाले कभी तुझको भी याद आता हूँ मैं ? 
या फिर बकौल बशीर बद्र ...
अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जाएगा 
जिसने तुझे भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो ...
उफ़ ये सुबह रामनाम के बजाय किस बेवफा की याद हो आयी :( 
 मगर ये वाली याद सचमुच बड़ी बेशर्म टाईप वाली है ....मुझे चिढ इस बात की है कि ये सुबह सुबह ही क्यों कोबरा के फन  की तरह उठ आती  है? ..और वह भी सुबहे बनारस में ...तोबा.. तोबा...सुना है ऐसी यादें अक्सर शाम को आती हैं और जिन्दगी  तक के खात्में का अंदेशा दे जाती है ...अजब मरहलों से गुज़र रहे हैं दीदाओ दिल ...सहर की आस तो है ज़िंदगी की आस नहीं ...

दिलासा देने वाली बात बस इतनी है कि कोई एक अकेला मैं ही नहीं कितने ही बेहतरीन शख्सियतें ,शायर या सहरियार इन यादों में मुब्तिला होते रहे हैं और उनसे पीछा छुड़ाने के जुगाड़ में ताज़िंदगी लगे रहे हैं  ..और कुछ बेमिसाल कह गए, लिख गए....मगर अपनी तो इतनी कूवत भी नहीं ...कि उन यादों का कुछ ऐसा इस्तेमाल कर पाऊँ...उनसे तो बस पीछा छूट जाए अब ....किसी के पास कोई मेमरी इरेज़र जैसी कोई जुगत है भाई तो बताओ न ....अब मुश्किलें हद के पार हो रही हैं .....यह तो कुछ ऐसा लफडा हो गया लगता है कि रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा.......और ये भी ......गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहें,ख़याल मेरे दिल को सुबह-ओ-शाम किस का था......

 कुछ दोस्त मेरी इस हालत से इत्तेफाक करेगें और कोई रास्ता बतायेगें जिससे मेरी और बनारसी सुबहें बर्बाद न होने पायें....

बुधवार, 25 जनवरी 2012

राष्ट्रीय मतदाता दिवस की बधाई!


यह शुरुआत पिछले वर्ष से हुई. २५ जनवरी ,२०११  को पहला राष्ट्रीय  मतदाता दिवस मनाया गया था .दरअसल २५ जनवरी १९५० को भारत निर्वाचन आयोग का गठन हुआ था और इस लिहाज से यह  शुभ दिन लोकतंत्र के इस  अधिष्ठान का स्थापना दिवस भी है . और विगत वर्ष को यही तिथि मतदाताओं के नाम कर दी गयी ...उन्हें लोकतंत्र के प्रति उनके दायित्वों को याद दिलाने और खुद उनके महत्त्व और गौरव गान के लिए ...लोकतंत्र की सारी कवायद धरी की धरी रह जाए अगर इसके मतदाता अपने कर्तव्य का निर्वाह भलीभांति न कर पायें .यह दिवस उन्हें जगाने और चेताने के लिए है कि लोकतंत्र के वे ही कर्णधार हैं ...उनका निर्णय ही एक मजबूत या फिर कमज़ोर लोकतंत्र की आधारशिला रखता है ....विगत दशकों में जिस तरह लोकतंत्र के पहरुओं में माफियाओं और धन पशुओं का दमखम बढ़ा उसके लिए मतदाता के बजाय और कौन जिम्मेदार है ...किसी ने चुटकी लेते हुए कहा था कि शायद हम खुद ऐसे ही लोकतंत्र को 'डिजर्व' करने वाले  मतदाता है...हमें मतदाता की अपनी यह तस्वीर  बदलनी होगी....
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आनलाईन क्विज़ विजेता राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर हुए पुरस्कृत 
भारत निर्वाचन आयोग उन तमाम कोशिशों को अंजाम दे रहा है जिससे इस देश का मतदाता विज्ञ बने और समझदारी के साथ अपने निर्णय ले ...इसी लिए विगत वर्ष से देश में मतदाता जागरूकता का अभियान चलाया जा रहा है ...जिसे सुनियोजित मतदाता जागरूकता और निर्वाचक सहभागिता -सिस्टेमेटिक वोटर एजुकेशन एंड इलेक्टोरल पार्टिसिपेशन प्रोग्राम यानि 'स्वीप'  के नाम से जाना जा रहा है ....राष्ट्रीय मतदाता दिवस एक तरह से स्वीप कार्यक्रमों का ही समुच्चय है. स्वीप का अर्थबोध कई तरीके से  हो सकता है ...एक तो यही कि हमारे सही निर्णय ही मतदान परिणामों में स्वीप करें ...



आज बनारस में स्वीप के विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं ....मतदाताओं को आकर्षित करने और उन्हें उनके सही कर्तव्य का बोध दिलाने के लिए तरह तरह के उत्साहवर्धक और रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किये गए हैं ..कहीं मतदाता जागरूकता मानव श्रृंखला है ,तो कहीं जागरूकता मैराथन है तो कहीं जागरूकता नौकायन रैली है कहीं स्लोगन लिखे  गुब्बारों का आकाशगमन तो कहीं स्लोगन लिखी गर्वीली पतंगों की उड़ान ...एफ एम चैनेल मतदाताओं को उनके कर्तव्य की याद दिला रहे हैं तो अनेक जगह युवा मतदाताओं को मतदान की शपथ दिलाई जा रही है ....युवाओं के झुण्ड जागरूक मतदाता टोपियाँ पहने मतदान की अनिवार्यता की अलख जगाने को तत्पर हैं .....उनका नारा है जागरूक मतदाता गर्वित मतदाता .....हमें गर्व है कि हम मतदाता है ....इस अवसर के अनेक नारे खुद युवाओं ने तैयार किये हैं ....एक बानगी लीजिये ....
निर्भय हो मतदान करेगें राष्ट्र का सम्मान करेगें ,लोकतंत्र की यही पुकार मत खोना  अपना अधिकार ,बनो राष्ट्र के भाग्य विधाता ,अब जागो प्यारे मतदाता ,हम सबका मत है अनमोल ,मत जाना प्यारे तुम भूल ,मतदान का चले अभियान ,मतदाता है देश की शान ,लोकतंत्र की असली  पहचान ,शत प्रतिशत जब हो मतदान ..अदि आदि ...
आई टी  आई चौकाघाट से निकली विशाल युवा मतदाता रैली 
मतलब इस बार जोश और दमखम ज्यादा दीख रहा है और पूरी आशा है मतदान का प्रतिशत इस बार बढेगा और सही जन प्रतिनिधि के चुनाव में मददगार होगा ....आप भी मतदाता हैं तो अपने राज्य के लोकतंत्र के इस महायज्ञ  में मत रूपी हविदान करना न भूलियेगा .....
उड़ी उड़ी रे मतदाता जागरूकता पतंग: उप जिला निर्वाचन अधिकारी वाराणसी श्री रामयज्ञ मिश्र ने पतंग प्रतियोगिता की डोर ढीली की 

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

पर्चा दाखिल कर ना सके ब्लागर अफलातून


दैनिक  जागरण वाराणसी की यह रिपोर्ट पढ़िए 


पर्चा दाखिल न कर सके अफलातून

वाराणसी : घर-परिवार, पड़ोसी और रिश्तेदारों से आशीर्वाद व मंदिर में भगवान को नमन कर कैंट विस क्षेत्र से पर्चा दाखिल करने कलेक्ट्रेट पहुंचे अफलातून के सारे ख्वाब धरे रह गए। उनके साथ आए प्रस्तावकों के नाम वोटर लिस्ट में नहीं मिले, इसके चलते आरओ ने उन्हें लौटा दिया।
सामाजिक संगठन साझा संस्कृति मंच व समाजवादी जन परिषद से जुड़े अफलातून 12 प्रस्तावकों के साथ कैंट विस सीट से नामांकन दाखिल करने एडीएम आपूर्ति के कोर्ट स्थित नामांकन कक्ष पहुंचे। चार प्रस्तावकों द्वारा बताए गए भाग संख्या व क्रम संख्या का मौजूद वोटर लिस्ट से मिलान किया गया तो नाम नहीं मिला। वोटर लिस्ट से नाम गायब होने को लेकर नामांकन कक्ष में मौजूद अधिकारियों व अफलातून के बीच काफी देर तक बहस हुई। अफलातून का कहना था कि वोटर लिस्ट आरओ कक्ष में छिपाकर रखी गई है। प्रस्तावकों के पास आयोग द्वारा जारी परिचय पत्र मौजूद है। नए परिसीमन के चलते कई क्षेत्र के वोटरों का भाग व क्रम संख्या बदल गया है। प्रस्तावक के पास यदि वोटर कार्ड मौजूद है तो यह नामांकन से जुड़े अधिकारी व कर्मचारियों का दायित्व है कि वे वोटर लिस्ट से नाम खोजकर निकालें या तो प्रस्तावकों को फर्जी कार्ड रखने के आरोप में जेल भिजवाएं।
कमेंट्री: अफलातून  भाई दस प्रस्तावकों का पहले से पूछ पछोर तो कर लिया होता ..जान पहचान तो कर ली होती ....फिर आर ओ कक्ष में पहुंचते....अपने इस ब्लॉगर भाई से भी सलाह मशवरा कर लिया होता ....अब आप  निर्वाचन आयोग की गलतियाँ गिना रहे हैं ....पहचान पत्र होना इस बात का शर्तिया सबूत नहीं हो सकता कि मतदाता का नाम निर्वाचक नामावली में हो ही ,हो सकता है वह मतदाता परिसीमन के बाद दूसरी विधान सभा में हो गए हों... इस हंगामें की खबर मुझ तक पहुँची तो देर हो चुकी थी-एक हंसोड़ इस वाकये को  बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत कर रहा था ..जब मैंने पूछा क्या हो गया तो अपनी ख़ास स्टाईल में बोल पड़ा -पर्चा दाखिल कर ना सके ब्लागर अफलातून,पहुंचे न थे पहनकर टाई औ पतलून .......लोग बाग़ हंस पड़े ..मगर मेरा अनुरोध है अफलातून भाई अभी भी परचा दाखिले का वक्त है ..पूरे तैयारी  से फिर आयें ....और मतदाता सूची में प्रस्तावकों के नाम से पहले संतुष्ट हो लें .....

शनिवार, 21 जनवरी 2012

ब्लॉग जगत में एक अदद उद्धव की तलाश!

अब आप तो यह बात जानते ही हैं कि प्रेम का इज़हार कर पाने में कुछ लोग पैदाईशी कमज़ोर किस्म के होते हैं ...मतलब मिलो न मुझसे दिल घबराए मिलो तो आंख चुराए वाला मंज़र ..काजल कुमार और अभिषेक ओझा या देवांशु निगम सरीखे दीगर नौजवान लोग मेरी इस बात से इत्तिफाक नहीं करेगें मगर हम उस पीढी के हैं जब इजहारे इश्क को लेकर बड़ी जहमत होती थी ....लोग कह नहीं पाते थे मगर लम्बी लम्बी चिट्ठियाँ आहें भर भर कर जरुर लिख डालते थे और अक्सर यह भी हो जाता था वे गंतव्य तक न पहुच कर किसी रकीब या माशूका के पहलवान भाई आदि को मिल जाती थीं और बड़ा गुल गपाड़ा होता था ....अब आज शार्ट मेसेज सर्विस वाली पीढी शायद इजहारे इश्क को उतना तवज्जो नहीं देती या फिर बाकी का काम पहले ही निपटा कर बाद में जरूरत के मुताबिक़ इज़हार वैगेरह किया तो किया और न किया तो न किया, जैसा फार्मूला जो  अपने अनूप शुकुल जी टिप्पणी देने के मामले में करते हैं ....को अंजाम देती है .... 

काफी नामी गिरामी शायर या ग़ज़ल गायक भी इजहारे इश्क को लेकर काफी संजीदा रहे हैं ...जेहन में मेहदी हसन की वह ग़ज़ल अभी गूँज रही है ..बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी .....आखिर यह मुश्किल क्यों आन पड़ती है? मैंने खुद भी ऐसा शिद्दत के साथ महसूस किया है और दूसरों के मामले में भी देखा है कि कितनी ही साफगोई बरतने वाले ,खरी खरी मुंह पर सुना देने वाले मुहब्बत का इज़हार करने में टोटली फेल हो रहते हैं ....फिल्मों ,उपन्यासों में कई ऐसे बिचारे चरित्र नायकों के आख्यान भरे पड़े हैं.. और ऐसे मौकों पर भरोसेमंद दोस्त काम आते हैं और कभी तो वे भी ऐसा वाकया कर गुजरते हैं कि दुश्मन भी उनसे बेहतर लगते हैं ..लगता है भूमिका लम्बी खिंच रही है ....यह भी एक दिक्कत ही है इज़हार करने की ....बहरहाल ....

कभी कभी मुझे लगता है कि किशन कन्हाई के साथ भी कुछ ऐसा ही लफड़ा रहा होगा ..इजहारे इश्क में पूरी तरह फेल वे अपनी बासुरी का सहारा लेने पर बिचारे मजबूर होते थे.....लेकिन इससे मुश्किलें ही बढती गयीं ...कईयों को यह इल्म हो गया कि किशन कन्हाई तो असली वाला इश्क केवल उन्ही से करते हैं ....किस्सा कोताह यह कि उनकी अभिव्यक्ति की इस दिक्कत के चलते उनके इर्द गिर्द तमाम ऐसी भीड़ जुड़ने लगी जिसे वे बिलकुल भी नहीं चाहते थे मगर यहाँ भी कह नहीं पाते थे...अपने हाव भाव से यह जरुर दिखाते थे कि कोई एक ही उनकी चाहत है मगर यह भी उनका दिखावा मान लिया जाता था ...छलिया किशन ....और सब जन यही सोचती रहती थीं कि असली वाली मुहब्बत तो कान्हा  उन्ही से करते हैं ...मामला जब काफी संगीन हो गया तो किशन कन्हाई रोज रोज की चख चख से घबरा कर द्वारिका की ओर  रुख कर गए ...मगर मुसीबत ने यहाँ भी उनका दामन नहीं छोड़ा ...बिचारे  अपने एक विश्वसनीय मित्र उद्धव को अपनी असली वाली को प्रेम सन्देश के लिए नियुक्त किये ..गोकुल भेजे भी मगर यहाँ फिर वही मुसीबत ...हर गोपी यही समझे कि गोपेश्वर ने बस उन्ही के लिए सन्देश भेजा है .....उद्धव बिचारे की पूरी फजीहत हो गयी ..वो किस्सा तो आप सब जानते ही हैं ....यहाँ भी यही लगता है कि उद्धव बिचारे खुद भी अभिव्यक्ति -पटु नहीं रहे होंगे शायद और इसलिए मिशन में पूरी तरह असफल रहे ...सन्देश की डिलेवरी सही सही और सही गोपी तक नहीं पहुंचा पाए ....

मेरे जैसे अभिव्यक्ति -पंगु के लिए आज भी एक वाक्पटु उद्धव की तलाश जारी है और शायद यह एक शाश्वत खोज है .....

शनिवार, 14 जनवरी 2012

मेहदी हसन साहब ..उनसा कोई नहीं है!

मेहदी हसन साहब आई सी यू में भर्ती किये गए हैं ,उनके दुश्मनों की तबीयत नासाज है ..हम उनके भारतीय प्रशंसक ,दीवाने ये दुआ करते हैं कि वे जल्दी ठीक हों और फिर अपनी आवाज का जादू बिखरने के लिए हमारी नज़रों के सामने हों ....यह खुशी की बात है कि भारत सरकार ने उनके यहाँ इलाज के लिए वीजा की पहल शुरू कर दी है .... समकालीन ग़ज़ल गायकी के सिरमौर हैं मेहदी हसन साहब ..उनसा कोई नहीं है सारी दुनिया में और अगरचे इस सारे ब्रह्माण्ड में भी कहीं दीगर भी ग़ज़ल गायकी और ग़ज़ल गायक हों तो भी मेहंदी हसन साहब की बराबरी नहीं ..अभी तो आप भी उनकी यह ग़ज़ल सुनिए ....और उनके शीघ्र स्वास्थ्य की कामना  कीजिये ...


रविवार, 8 जनवरी 2012

लोकतंत्र के महायज्ञ में धनबल और बाहुबल की आहुति

पांच राज्यों में चुनावी रणभेरी बज चुकी है ...उत्तरप्रदेश, पंजाब,गोआ,मणिपुर और उत्तराखंड ऐसे राज्य हैं जहां विधानसभा के चुनावों  की घोषणा होने के बाद चुनावी प्रक्रिया अपने विभिन्न चरणों में है ..इस बार भारत निर्वाचन आयोग ने धनबल और बहुबल के जरिये चुनाव  जीतने वालों की  अच्छी खबर ली है ....ऐसी व्यापक और कारगर रणनीति बनी है कि कालेधन की आवाजाही और बाहुबल के प्रदर्शन से मत हासिल करना अब टेढ़ी खीर है  ...इस बारे में भारत निर्वाचन की तैयारियों का एक जायजा आप भी लीजिये ...

इस बार एक सुगठित निर्वाचन व्यय अनुवीक्षण का कार्यक्रम बनाया गया है जिसमें कालेधन,अवैध शराब  की आवाजाही पर पाबंदी लगाने और आदर्श आचार संहिता के अनुपलान के लिए कई टीमें गठित हुयी हैं ...

फ्लाईंग स्क्वायड मतलब उड़न दस्ते जिनमें प्रत्येक  विधानसभाओं में एक मजिस्ट्रेट ,एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और कई पुलिस कर्मी शामिल हैं और एक वीडियो ग्राफर भी है ...यह दिन रात अपने क्षेत्रों में चक्रमण पर हैं और आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों जैसे दीवारों पर पोस्टर बैनर, वाल रायटिंग,बिना अनुमति के सभा जुलूस ,वाहनों के अनुचित काफिलों आदि पर नज़र रखे हुए हैं वहीं बिना स्रोत की नगदी ,शराब, साड़ी या मतदाताओं को रिझाने के दूसरे साजोसामान पर भी उनकी कड़ी निगाह हैं ...

वीडियो  टीमें निगरानी टीमें सभी विधानसभाओं में इनकी भी कवायद जारी है जहाँ भी आचार संहिता के उल्लंघन के मामले हैं या फिर प्रत्याशियों ने अनुचित तरीके से या बिना अनुमति के पोस्टर बैनर आदि लगायें हैं तो उनकी वीडियों क्लिपिंग बनाने , कार्यकर्ताओं/ मतदाताओं के आमोद प्रमोद पर हो रहे अनुचित व्ययों को कैमरे में कैद करने के काम में ये भी जुटी हुयी हैं ...

वीडियो अवलोकन टीमें विधानसभावार गठित इन टीमों को वीडियो क्लिपिंग, सीडी का सजगता से अवलोकन कर प्रत्याशीवार अनुचित व्ययों का विवरण तैयार करना है जिसे विधानसभावार ही गठित लेखा टीमों को प्रत्याशीचार खर्च का आकलन कर उसके खाते में डाल  देने का काम सौंपा गया है  ...

विधानसभावार लेखा टीमें ...इन्हें सभी स्रोतों से मिल रही जानकारियों की पुष्टि के बाद किस प्रत्याशी का कितना खर्चा हो रहा है उसे उसके निमित्त खाते में डालने का जिम्मा सौंपा गया है जिससे यदि वे अपनी निर्धारित चुनावी व्यय सीमा जो राज्यों में अलग अलग है को लांघें तो उनपर कार्यवाही की जा सके ....यह व्यय सीमा उत्तर प्रदेश में १६ लाख है .

स्टैटिक निगरानी टीमें   सभी थानों में कम से कम प्रत्येक चेकपोस्ट पर मजिस्ट्रेट और वरिष्ठ पुलिस कर्मी के नेतृत्व में यह टीम अवैध/ बिना स्रोत के धन की आवाजाही और शराब आदि की बड़ी छोटी खेपों पर कहर बनकर टूटी है ..उत्तर प्रदेश में पाऊच व्यवस्था तो पहले ही ख़त्म हो चुकी है ....

आशय साफ़ है अपनी सकारात्मक छवि और जनसेवा के जरिये अगर  चुन कर आना है तो ठीक नहीं तो आपका पत्ता साफ़ ....धन बल और बाहुबल की बातें बीते दिनों की बात हो चली है ..अपराधी ,कालेधन के कारोबारी अब विधानसभाओं और लोकसभाओं के मुंह न देख पायें ऐसी मुकम्मल व्यवस्था की आस जग चुकी है -अंततः हर बूथ पर केन्द्रीय बल की तैनाती अनुचित तरीके से मतदान करने वालों हौसलाबुलन्दो के अरमानों पर अंतिम कील है ...अगर आपकी नीयत में खोट है तो दूर रहिये मतदान स्थल के आस पास भी मत फटकिये नहीं तो जान से भी हाथ धोना पड़ सकता है ..क्योकि वे किसी की नहीं सुनते ....


यह तो एक विहगावलोकन भर  है इस बार के चुनावी इंतजामिया का .....अब बारी है मतदाता की अगुवाई की और उसके बेख़ौफ़ मतदान करने की ..सारी काली संपत्ति अब लोकतंत्र के इस महायज्ञ में स्वाहा हो रही है ...उत्तर प्रदेश में ही अभी तक ६ करोड़ रूपये और कई किलो सोना चांदी चंद  दिनों  में ही जब्त की जा चुकी  हैं आयकर टीम भी मुस्तैदी से काम कर रही है ....यातायात अधिकारी वेहकिल एक्ट का सख्ती से पालन करने में जुट गए हैं ..आप अगर सही काम और इरादों के भी  दो ढायी लाख से ऊपर की नगदी लेकर इन प्रदेशों में आ जा रहे हों उनका स्रोत और वाजिब अभिलेख साथ में जरुर रखें ....

आगे भी कोशिश रहेगी की फुर्सत मिलते ही हम  इस बार के  भारत निर्वाचन के नए अभियानों की जानकारी देते रहें ....

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