रविवार, 29 नवंबर 2009

यह नायिका अन्यसंभोगदु:खिता है! (नायिका भेद -११)











यह नायिका अन्यसंभोगदु:खिता है!


"अरी ,दुष्ट मैंने तो तुम पर विश्वास कर  प्रिय तक बस एक सन्देश ले जाने को भेजा था  ,मगर यह तो सपने में भी नहीं सोचा था कि तुम उनसे ही रासरंग  रचा  बैठोगी! अरी विश्वासघातिनी ,यह तेरा अस्त व्यस्त श्रृंगार ही सारी बाते बता दे रहा है ,रति चिह्न सारी पोल खोल रहे हैं  ,यह खुली वेणी ,लम्बी निःश्वास -उच्छ्वास और पसीने से तर बतर तुमारा ये  बदन -रे कलमुही,  क्या महज यह सब मुझे दिखाने मेरे पास आई हो -चल दूर हट जा मेरी नजरो से अब!" 

यह भी तो हो सकती है आज की दुखिता


 







                                                                                                               
..डांट खाकर !


  यह नायिका अन्यसंभोगदु:खिता है जो अपनी दूती /सखी पर प्रिय के रति चिह्नों को देख विस्मित और सहसा दुखी हो गयी है !



       ..और यह  भी कहीं न हो जाय? किमाश्चर्यम?? 
  
आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भी ऐसी नायिकाएं क्यों नहीं हो सकतीं? युग दृश्य और पात्र बदल गए तो क्या हुआ मानव मन  तो अभी भी बहुत कुछ वैसा ही तो है ना ? अथवा नहीं?                                                                             


और कल की दुनिया में भी क्या नहीं रहेगी यह नायिका?



                                                              

चित्र साभार:स्वप्न मंजूषा शैल

शनिवार, 28 नवंबर 2009

एक और व्यथित नायिका है -विप्रलब्धा!(नायिका भेद-१०)


अनूढ़ा और परकीया के अधीन ही एक और व्यथित नायिका है -विप्रलब्धा !नायक को पूर्व निश्चित किये गए समय पर संकेत स्थल पर न पाने वाली व्यथित  नायिका ही विप्रलब्धा है .


राकेश गुप्त की यह कविता विप्रलब्धा की व्यथा को चित्रित करती है-


प्रिय से था अनुबंध मिलन का ,
खुशी खुशी थी चली गयी मैं ;
पर अभिथल पर नहीं मिले वे ,
मर्माहत थी ,भली  गयी मैं ;
चार घड़ी की व्यर्थ प्रतीक्षा ,
समय चक्र में दली  गयी मैं ;
वंचक का विश्वास किया था,
इसीलिये तो छ्ली   गयी मैं 






चित्र सौजन्य :स्वप्न मंजूषा शैल

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

कवि को श्रद्धा सुमन!

आज मेरे प्रिय कवि हरिवंशराय बच्चन जी की १०१वी जयंती है -इस अवसर पर उन्हें उन्हें उनकी ही कविताओं को पढ़ते हुए,गुनगुनाते हुए  श्रद्धा सुमन अर्पित करने का मन है - निशा निमंत्रण उनका एक कालजयी गीत संग्रह है जो मानव मन  के कितने ही आवर्त विवर्तों को समेटे हुए है .सच बताऊँ इस महान कवि की कविताओं ने मुझे अनेक उन अवसरों पर राहत दी है जब मैंने खुद को  क्लांत ,अकेला ,असहाय और छला हुआ पाया है .ये मेरी पीडाओं से साझा तो करती रही हैं मगर जीवन के उज्जवल पक्षों की ओर भी निरंतर प्रेरित करती रही हैं .
निशा -निमंत्रण से एक गीत आपके लिए भी -बाकी तो हम आज दिन रात कई स्वरान्जलियाँ कवि को अर्पित करते रहेगें -

दिन जल्दी जल्दी ढलता है!

हो जाय न पथ में रात  कहीं ,
मंजिल भी तो है दूर नहीं -
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी जल्दी चलता है !
दिन जल्दी जल्दी ढलता है !


बच्चे प्रत्याशा में होगें 
नीड़ों से झाँक रहे होगें -
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है !
दिन जल्दी जल्दी ढलता है !


मुझसे मिलने को कौन विकल ?
मैं होऊँ किसके हित चंचल ?
यह प्रश्न शिथिल करता  पद को ,भरता उर में  विह्वलता है !
दिन जल्दी जल्दी ढलता है !



इसे सुनते भी तो जाईये !




                                                                       

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

प्रेमातुर नायिका है अभिसारिका!(नायिका भेद -९)

किसी निश्चित समय और स्थान पर प्रियतम से मिलने के लिए जाने वाली प्रेमातुर नायिका अभिसारिका है !चित्रकारी के संदर्भ में  एक प्रासंगिक विवरण जो नेट पर भी मौजूद है इस प्रकार  है -
"अभिसारिका ऐसी नायिका है जो किसी भी जोखिम की परवाह न करते हुए अपने प्रेमी से मिलने निकल पड़ती है। उसे विभिन्न कवियों ने अलग-अलग नाम दिया है। पहाड़ी (हिमाचली) कलाकारों का वह प्रिय विषय रही है। कृष्ण अभिसारिका और शुक्ल अभिसारिका दो तरह की नायिकाएँ हैं जो चांद की स्थिति के अनुसार कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष के दौरान अपन प्रेमी से मिलने निकलती हैं। एक आकर्षक चित्रकारी में कृष्ण अभिसारिका ने नीला दुपट्टा ओढ़ रखा है और वह रात में अकेली जा रही है। अंधेरी रात है और बादल छाए हुए हैं और रुक रुककर बिजली चमक रही है। जंगल में सांप हैं और भूत-पिशाच तथा डाइनें घूम रही हैं। जंगल के भय से बेखौफ- तूफान, सांपों, अंधेरों के आतंक की तनिक भी परवाह न करते हुए नायिका प्रेमी के प्रति जनून लिए उसकी तलाश में निकल पड़ी है।" 




-वाह ,ऐसी नायिका की हिम्मत के क्या  कहने !निर्भय ,सापो से भी घिरी मगर  कितना समर्पित है वह अपने प्रेम और प्रियतम के प्रति ! राकेश गुप्त ने ऐसी नायिका की तारीफ में कुछ पंक्तियाँ यूं लिखी हैं ...
दो उन्नत उरोज आतुर थे
आलिंगन में कस जाने को ;
फड़क रहे अधरोष्ठ पिया के 
प्रियतम के चुम्बन पाने को ;
चंचल थे पद चक्र  कामिनी -
अभिथल तक पहुचाने  को  ;
तन से आगे भाग रहा मन 
मनमोहन में रम जाने को 


अभिसारिका जैसी  स्थितियां सामन्यतः अनूढा और परकीया में ही दृष्टव्य हैं .राधा का कृष्ण प्रेम  परकीया ही है!
चित्र सौजन्य :स्वप्न मंजूषा शैल  

 


सोमवार, 23 नवंबर 2009

......और यह है कलहान्तरिता नायिका ! (नायिका भेद -8 )

वह नायिका जो क्रोधवश दोषी नायक  को अपने से दूर करने के बाद फिर पश्चाताप करने लगती है वही कलहान्तरिता  है -जरा यह   विवरण तो देखिये -




"सखी ,भले ही उन्होंने 'वो ' गलती कर दी थी  मगर वे अपने किये पर लज्जित भी तो थे ,और वे कितना पछता भी तो रहे थे .मगर सौत से डाह के चलते मेरी चिढ और जिद के आगे उनकी कहाँ कुछ चल पायी थी -उनकी सारी मान मनुहारों निष्फल ही तो हुयी  थी ....और तो और वे मेरे पैरों पर भी गिर पड़े थे और बोल उठे थे ,"मेरी जान मुझे बस  इस बार माफ़ कर दो "लेकिन मैं  तो निष्ठुर हो गयी थी और फिर हताश से वे चले गए थे -आह अब मैं कितना पछता रही हूँ ..यह मैं ही जानती  हूँ ! "


                                                                           पश्चाताप! 

चित्र सौजन्य : स्वप्न मंजूषा शैल
कल चर्चा होगी अभिसारिका की ....

रविवार, 22 नवंबर 2009

एक शाम गिरिजेश ने की मेरे नाम!

अभी अभी तो गिरिजेश गए हैं ! थोड़ी रिक्तता तिर आई है ! सपरिवार आये थे किसी सामाजिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने ! ब्लॉगर स्नेह सौजन्य ऐसा कि मुझसे मिलने आ गये ! उनकी सदाशयता ,विनम्रता ने मेरी एक शाम को सुखानुभूतियों से भर दिया ! रहे तो वे महज एक घंटे मगर इसी में हमने मानो एक युग जी लिया ! वो कहते हैं न कि मिलन की दीर्घावधि की तुलना  में उसकी गहनता ज्यादे मायने रखती है ! हम खूब हँसे ,खिलखिलाए ,नाश्ता पानी किया ,थोड़ी ब्लागरी पर बतियाया ,एक फार्मल फोटो सेशन किया !




   आगे कौस्तुभ और अरिदम ,पीछे दायें से गिरिजेश राव  ,बिटिया अलका ,श्रीमती गिरिजेश राव ,संध्या मिश्रा और मैं  (फोटो की खराब क्वालिटी  के लिए खेद है )



मैंने दो कथा संग्रह उन्हें भेट किये -'एक और क्रौंच वध  ' और अभी सद्य प्रकाशित और लोकार्पित 'राहुल की मंगल यात्रा ' ख़ास तौर पर बच्चों,बिटिया अलका और बेटे अरिदम  को भेट किया !अब इतने सरल चित्त और विज्ञ पाठक मिलें तो  यह फायदा कौन उठाना नहीं चाहेगा ! कोई बमुश्किल एक घंटे गुजार कर वे अभी कुछ पल पहले ही सपरिवार लखनऊ कूच कर गए हैं -रोका पर रुके नहीं ! अभी अभी रास्ते से ही उनका फोन भी आ गया -बाऊ के पुनरागमन पर कतिपय  प्रिच्छायें कर रहे थे....पूरी तरह ब्लॉगर चरित्र पर उतर आये हैं बन्धु !

                             बेटे अरिदम के साथ एक पोज 

 अब उनसे यह मुलाकात सार्वजनिक की जाय या नहीं इसे लेकर भी कुछ असमंजस की स्थिति रही ....मगर ब्लॉगर क्या चाहे बस एक पोस्ट की जुगाड़ -के फलसफे पर मैं कायम था मगर पत्नी को गंवारा नहीं था हर पल ब्लागिंग को समर्पित करते रहना!  फिर मैंने कुछ तार्किक चिंतन मनन किया -ब्लागर की  स्वतंत्रता (के तर्क ) का पल्लू थामा ,यह भी कि आखिर घोडा घास से यारी करेगा तो खायेगा  क्या ? और यह भी सोचकर कि जिस तेजी से गिरिजेश एक ब्लॉगर सेलिब्रिटी होने को उद्यत हैं आज यह मुलाक़ात सार्वजनिक कर आप लोगों की गवाही भी ले ले -न जाने आगे वे कहीं  पहचानने से ही इनकार न  कर दें -प्रभुता पाई काह न मद होई


ब्लागरी वर्ल्ड ने सचमुच दुनिया को एक परिवार का रूप दे दिया है -जो काम रीयल जगत नहीं कर पाया अब यह रायल जगत कर रहा है -नए नए नेह सम्बन्ध बन रहे हैं ! एक नया उत्साह जीवन को नए अर्थ दे रहा है -हम तो बहुत आशान्वित हैं !  क्या आप भी ?

शनिवार, 21 नवंबर 2009

नहीं भूलेगी वो कैटिल क्लास की मानवता !(यात्रा वृत्तांत -अंतिम भाग)

पुष्पक एक्सप्रेस से एक आशा तो थी ही कि काश यह मिथकीय पुष्पक विमान की तरह एक अतिरिक्त जगह भी दिला दे तो इसके नाम के अनुरूप काम भी हो जाय ! मगर डिब्बे मे घुसते ही थरूर क्लास की जनता की भेडिया धसान देख होश फाख्ता हो गए ! जाकिर को खुद अपनी आरक्षित बर्थ ढूंढें नहीं मिल रही थी -आखिर बर्थ नंबर १७ तक हम किसी तरह ठेल ठाल कर पहुंचे भी तो उस पर पूरा एक कुनबा विराजमान था ! पति पत्नी बंच्चे सभी पूरे अधिकार से वहां जमे थे! मुझे खुद आत्मग्लानि हो रही थी कि बिना वाजिब टिकट के मैं भी एक आक्रान्ता की तरह उसी डिब्बे में घुस आया था ! पता नही ऐसे मौकों पर मैं क्यूं अतिशय विनम्रता का शिकार हो जाता हूँ ! मेरे मुंह से एक शब्द भी नहीं  फूट पा रहे थे! हाँ ज़ाकिर का हड़काना जारी था -फलतः १७ तो नहीं हाँ सामने वाली बर्थ  पूरी खाली कर के दे दी गयी -हुकुम आप सब तो बैठो सामने ! मैं या तो खुद बैठ गया धम से या रिक्त बर्थ ने ही तेज गुरुत्व बल से मुझे बिठा लिया था ! वे  अच्छे विनम्र लोग थे! जौनपुरी ही थे ,मेरी ही तरह ! मुम्बई से शादी व्याह के चक्कर मे साले बहनोई अपने भरे  पूरे परिवार के साथ यात्रा कर रहे थे! उनकी भी समस्या यह थी कि उनके पास सीटें तो थी कुल चार मगर वे थे पॉँच अदद ,रेजगारिया अलग ! मतलब थरूर क्लास अपने चरित्र का पूरा निर्वहन कर रहा था !  मेरा स्कोप अब कमतर होता दीख  रहा था !

मैंने थोडा सांस संभलने पर डिब्बे के अन्तःपुर का सजग निरीक्षण किया ! विंडो बर्थ पर दाहिनी ओर एक भद्र मुस्लिम परिवार का पूरा कुनबा महज दो बर्थों पर समाया हुआ था - आठ सीटों के इस जन संकुल  स्पेस में कुल आठ बच्चे थे-पूरा वातावरण एक जबरदस्त ऊर्जा के प्रवाह ,किलकारियों से गुलजार हो रहा था ! बायीं ओर की  मोहतरमा इतनी बढियां ठेठ अवधी बोल रही थी कि मैं मंत्रमुग्ध  हुआ जा रहा था - कोई खाटी अग्रेज भी क्या इतनी धाराप्रवाह अंगरेजी बोलेगा ! रहा न गया तो मैंने भी ठेठ में पूंछ लिया कि आखिर यह नारी प्रतिभा कहाँ से बिलांग करती हैं -जवाब मिला गोंडा ! और प्रश्न के जवाब देने के एवज में उन्होंने अपने लगातार रोये जा रहे बच्चे को डांट कर चुप करते रहने का जिम्मा मुझे पकड़ा दिया ! किसी अजनबी पर इतना भरोसा या अधिकार ? सहसा मैं असहज होते हुए भी इस नए मिले काम को अंजाम देने में लग गया !

जाकिर तब तक कुछ और रोबदाब  दिखा कर ऊर्ध्वगामित यानि सबसे ऊपर के बर्थ पर लम्ब लेट चुके थे! और कमाल देखिये मैं इधर थरूर क्लास की मानवता की सेवा में जुटा/जुता खुद मानवीय होता रहा  - पूरे ६-7 साथ घंटे और जाकिर ऊपर सोते रहे -बाद में मासूमी से बोले थे कि वे बस पलक ही मूदे थे-भला चिल्ल पो में किसी को नीद भी आती है ! बहरहाल उनकी साफगोई किसी को भी कन्विंस नहीं कर पाई थी ! सब मन ही मन सोच बैठे थे कि चलो किसी एक ने तो अपना नीद का कोटा पूरा कर लिया है -सभी को रात में सोने की रणनीति तंग कर रही थी ,खास तौर पर मुझे !

इसी बीच टी टी भी आ कर जा चुका था -मुझसे उसने बिना वाजिब टिकट के यात्रा करने पर लगने वाली फाईन २५० रूपये और साधारण तथा स्लीपर क्लास के टिकट का डिफ़रेंस किराया कुल ४५० रूपये वसूल कर लिए थे -मगर कुछ अतिरिक्त शुल्क  में पूरी ट्रेन में किसी भी श्रेणी में बर्थ दिला पाने के मेरे प्रस्ताव को पूरी ईमानदारी से उसने ख़ारिज कर दिया था ! आखिर ईमानदारी दिखने का मौका बार बार थोड़े ही आता है ! जब ट्रेन पुष्पक हो और खचाखच भरी हो ,फिर तो ईमानदारी छलक ही पड़ती है ! बहरहाल मैं अब तक काफ़ी विनम्र हो चुका था और कोई जो भी कुछ कहता था फौरन ही मान  लेता था ! तभी जानकारी हुई कि ट्रेन तो भोपाल  से होकर जायेगी ! मुझे कई ब्लॉगर बन्धु याद आ गये ! एकबारगी तो घोर इच्छा हुई कि किसी/कुछ  को फोन कर स्टेशन पर ही बुला लूं मगर फिर लगा कि वे यहाँ ब्लॉग पर तो आते नहीं स्टेशन तक क्या आयेगें ! वैसे आज पाबला जी से कोई ब्लॉगर  बन्धु आकर मुरैना स्टेशन पर मिल लिए हैं ! अब अपना अपना नसीब है भाई! फिर मन  हुआ कंचन जी को फोन करुँ और भोपाल में ही इस विपदा से मुक्त हो लूं ! मगर फिर घर जल्दी पहुँच जाने का सहज बोध जोर मारने लगा ! हरिवंश राय  जी की कविता बदस्तूर याद हो आई.....बच्चे प्रत्याशा में होंगे ,नीड़ों से झाँक रहे होंगे -यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है ...दिन जल्दी जल्दी ढलता है ! ट्रेन तेज गति से भागती जा रही थी!

लगता है जाकिर ने रात्रि शयन की एक रणनीति पहले ही बना रखी थी ! मुझे पूरी बर्थ दे दी, खुद नीचे अख़बारों पर चद्दर बिछा और दोहर में मुंह छुपा अव्यक्त हो गए -और मुझे अपनी अव्यक्त कृतज्ञता की असहज अनुभूति के साथ रात बिताने की सौगात दे दी ! कहने को ही कैटिल क्लास है ,यहाँ तो मानवता के कूट कूट के दर्शन हुए ! सुबह लखनऊ समय से आ गये थे! फिर  उच्च दर्जे का बनारस तक का टिकट ३३४ रूपये मे लेकर अमृतसर हावड़ा मेल की ३ ऐ सी में जा विराजा ....मात्र ६१ रूपये का अंतर अदा किया और शाम तक वाराणसी पहुंचा तो खूब  उत्फुल्ल ,प्रफुल्लित था !

खंडिता है यह नायिका :(षोडश नायिका -७)

वह नायिका खण्डिता  हो रहती है  जब  अचानक यह प्रामाणिक तौर पर मालूम हो जाता है  कि उसके  प्रेमी /पति ने उससे बेवफाई कर किसी और से प्रणय सम्बन्ध स्थापित कर लिए हैं - उसकी घोर व्यथा ,संताप/प्राण  पीड़ा और तद्जनित आक्रोश  की मनोदशा उसे जो भाव भंगिमा प्रदान करती है वह साहित्यकारों की दृष्टि में खण्डिता नायिका की है!


 ऐसे नहीं घर में घुसने दूगीं ,पहले बताओ यह सब क्या करके आ  रहे हो ?
"रात बीत बीत गयी अपलक  प्रिय की प्रतीक्षा में ...वे नहीं आये और अब सुबह लौटे भी हैं तो यह क्या हालत  बना रखी है - होठो पर काजल और गालों पर किसी के होठों की लाली और माथे पर पैरों का आलता ? आँखें भी उनीदीं ! ओह समझ गयी मैं  ,अभी मैं इनकी गत बनाती हूँ ! " 


( नायक ने बीती रात अपनी दूसरी प्रेयसी के साथ गुजारी है ,प्रणय संसर्ग के चिह्न शेष सब गोपन उजागर कर दे रहे हैं -क्या क्या गुल नहीं  खिले हैं  ... दोनों जन में पारस्परिक प्रेम व्यापार  का खूब आदान प्रदान हुआ है -होठो पर काजल होने का अर्थ है  सौत की आँखों का चुम्बन ,गाल पर लिपस्टिक प्रत्युत्तर  है उस चुम्बन का ,हद है धोखेबाज  ने सौत के पैरों पर शायद उसकी मान मनौअल में सर भी रख दिया है ,तभी तो पैरों का आलता माथे पर तिलक सरीखा जा लगा है ! और फिर यह होने में रात यूं ही बीत गयीं -उनीदीं आँखों का यही सबब है. ) .

 जीवन शैली बदली मगर क्या जीवन भी ?
आखिर कैसे बर्दाश्त हो नायिका को साजन की यह सब ज्यादतियां -खण्डिता नायिका अब मानवती बन बैठती है ! उलाहना -भाव प्रबल हो उठता है -"तुम जाओ जाओ मोसे  न बोलो सौतन के संग रहो ....अब होत प्रात आये हो द्वारे यह दुःख कौन सहे ...या फिर... कहवाँ बिताई सारी रतिया ....साँच कहो मोसे बतिया ....पिया रे साच कहो मोसे बतिया ! (यादगार ठुमरियों  के अमर बोल हैं ये ) 

मानवती नायिका, नायिका का एक उपभेद है जिकी चर्चा हम आगे करेगें !

चित्र सौजन्य :स्वप्न मंजूषा शैल

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

......आखिर कैसे छूटी ट्रेन और फिर शुरू हुआ 'कैटिल क्लास' का सफ़र ! (यात्रा वृत्तांत -२)

आखिर बनारस सुपर फास्ट ट्रेन छूट गयी ...और हम खड़े खड़े ,प्लेटफार्म पर जड़े जड़े गुजर गयी ट्रेन का हिसाब जोड़ते रहे ! मुझे जो समय ट्रेन के छूटने  का मालूम था ,वह था ११.४० और ट्रेन ठीक दो घंटे पहले बिलकुल सुई की नोक के ९.४० पर पहुँचते ही छूट चुकी थी ! आखिर यह गफलत हुई कैसे ? बहुत सी स्थितियां जिम्मेदार रहीं इसकी ! बल्कि सारी परिस्थितियाँ ट्रेन के छूट जाने की ही ओर अग्रसर होती रहीं और मैं उनसे बेखबर सम्मलेन और अन्य बातों की ओर बकलोल सा ध्यान केन्द्रित किये रहा !  एक वार्षिक त्रासदी या जश्न  के रूप में रेल विभाग द्वारा इस बिना पर कि ट्रेन के समय बदले जा रहे हैं  सम्बन्धित  स्टेशन से ट्रेन का प्रस्थान का समय टिकट पर न लिखा होना ,मेरे द्वारा स्वयं ट्रेन का  प्रस्थान का समय फिर से चैक न किया जाना ,औरों के इन्फार्मेशन पर ही निर्भर रह जाना-ये सब घातक कारण एकजुट हो लिए  थे    ! (नसीहत -३,खासकर नवम्बर माह में  यात्रा से जुडी ट्रेनों का निर्धारित स्टेशन पर आगमन और प्रस्थान  यात्रा आरंभ के ठीक पहले खुद अवश्य  चैक कर लें ! जाकिर ने तो नेट से अपनी ट्रेंन पुष्पक के टाईम टेबल का पूरा चार्ट ही प्रिंट आउट कर रखा था ) .पता नहीं अभी भी टाईम टेबल छपा कर आया या नहीं ! शायद ज्ञानदत्त जी प्रामाणिक जानकारी दे सकें !

 मेरी वापसी की यात्रा तो उसी दिन ही शंकाओं के घेरे में आ गयी थी जब लोकमान्य तिलक टर्मिनस -वाराणसी एक्सप्रेस २१६५ में आरक्षण के समय ही यानि २० अक्टोबर ०९ को  २ ऐ सी में वेटिंग १ की  असहज स्थिति उत्पन्न हुए  थी . लोग बार बार आश्वस्त   करते रहे कि अरे एक ही तो वेटिंग है , शर्तिया कन्फर्म हो जायेगा -मगर मुझे पहले का  एक और दृष्टांत याद आ  जाता रहा जब शिमला यात्रा के समय ऐसी ही स्थति में ज्ञानदत्त जी के आश्वासन के बावजूद भी यात्रा के एक दिन पहले ही मैंने टिकट निरस्त करा कर दूसरी कम महत्वपूर्ण ट्रेन में आरक्षण करा लिया था  ! मगर इस बार कई व्यस्तताओं और अन्य किसी ट्रेन के उपलब्ध न होने के कारण (हाय रे मुम्बई- बनारस रूट !) मैं हाथ ही मलता रह गया और वापसी का दिन भी अ पहुंचा  ! जब यात्रा का केवल एक दिन ही रह गया तो मेरा धैर्य जवाब देने लगा -उधर कांफ्रेंस अपने उरूज पर थी और इधर  मेरा मन आरक्षण की अनिश्चिता से उद्विग्न था !

उधर जाकिर को भी लौटने का आरक्षण पुष्पक में, ऐ सी में नहीं मिल  सका था मगर  उन्होंने न जाने कहाँ कहाँ से फोन वोन  कर स्लीपर में एक बर्थ का जुगाड़ कर ही लिया ! और मुझे आमंत्रित किया कि अगर आपका टिकट कन्फर्म नहीं होता तो आप भी एक ई टिकट लेकर मेरे साथ ही लखनऊ चले और वहां से वाराणसी चले जाईयेगा ! कोई विकल्प भी नहीं सूझ रहा था ,मेरा ऐ सी टू का वेटिंग अभी भी बरकरार था ,मानो मेरा मुंह चिढा रहा हो !  हजार किलोमीटर से भी दूर का सफर बिना आरक्षण कैसे संभव होगा ,सोच सोच कर दिल बैठा जा रहा था ! ज़ाकिर के सुझाव में दम दिखा और मैंने  उनके ट्रेन यात्रा ज्ञान पर मुग्ध होते हुए बगल के साईबर कैफे से  स्लीपर का का एक ई टिकट हथिया ही तो लिया ! वेटिंग १९७ ! जाकिर बोले फिकर नाट मेरे ही बर्थ पर डबलिया लीजियेगा ! टिकट तो रहेगा ही ! बहरहाल ,ई टिकट लेने के बाद कुछ राहत तो हुई ! मगर सबसे बड़ी राहत तब मिली जब अगले ही घंटे मोबाईल से सूचना मिल गयी कि पहले का वेटिंग लिस्ट आखिरकार कन्फर्म हो गया और १७ अंम्बर सीट भी अलाट हो गयी ! हो सकता है  यह मेरे मित्र और कभी रेलवे विजिलेंस में रहे देवमणि को sos भेजने का असर रहा हो !

अब मन फिर एक बार गंगा यमुना तीर हो गया था ! स्थानीय चीजों में सहसा ही फिर से एक नवीन रूचि उत्पन्न हो  गयी थी -वगैरा वगैरा ! अरे हाँ याद आया वह ई टिकट तो वापस कर देना था अब कुछ पैसे ही जु(ग )ड़  जायेगें !  ! हाँ हाँ क्यों नहीं जाकिर  ने भी हामी भरी  ! शातिर साईबर कैफे वाले ने चुपचाप  टिकट लिया ,की बोर्ड पर कुछ टिपियाया और कहा इसे जरा पढ़िए तो !वहां प्रदर्शित सूचना   में साफ़ साफ लिखा था कि चूंकि अब चार्ट तैयार हो गया है अतः रिफंड नहीं हो सकता ! जाकिर उग्र हुए ,मैंने रोका और कहा कि जाकिर यह ऐसा ही है -अब कुछ  नहीं हो सकता ! ४३० रूपये डूब चुके थे! साईबर कैफे वाले को सब पता था ,उसने चीट किया था !( नसीहत-४ ,ई टिकट को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतें और चार्ट तैयार होने के काफी समय पहले ही  अगर ऐसी स्थिति आये तो निरस्त करा लें  !नहीं तो जैसे मेरे डूबे आपके भी डूबेंगें-रेल विभाग इन्ही हराम की कमायियों से धन्ना सेठ बना बैठा है !  )

बहरहाल यह तो एक दिन पहले का चूना लगने का वृत्तांत रहा ! हाय कन्फर्म ऐ सी आरक्षण होने और वहीं  स्टेशन तक समय से पहुँच जाने के बावजूद भी मेरी ट्रेन आखिर छूट गयी ! अब क्या किया जाय !अगले तीस मिनट में पुष्पक यानि जाकिर की ट्रेन भी आने वाली थी और अब बस वही डूबने  वाले का  एकमात्र तिनका  सहारा  थी -मगर टिकट ? हम स्ट्राली वाली खींचते खांचते स्टेशन के बाहर भागे -एक लाईन में मैं जा चुकी ट्रेन का टिकट रद्द कराने और दूसरी में ज़ाकिर मनमाड से चारबाग लखनऊ का चालू टिकट लेने लग ही तो लिए ! मुझे विंडो  बाबू ने कुल ७२८ रूपये काट के थमाए रूपये ७२७ और मैंने यंत्रवत  नए टिकट के लिए उसी  में से ज़ाकिर को थमाए ३३४ रूपये ! अभी भी ओवर ब्रिजों को क्रास कर आने  से सांसे धौकनी की तरह चल  ही रही थीं और फिर पुष्पक भी न छूट जाये इसलिए हमने फिर एक दौड़ लगाई और गिरते पड़ते आखिर ट्रेन के आगमन तक प्लेटफार्म पर जा ही पहुंचे ! इस बार कोई चूक नहीं होनी थी -अभी अभी तो दूध के जले थे हम !

धडधडाती हुई पुष्पक आ गयी और हम बकौल शशि थरूर के कैटिल क्लास में लद लिए ! मरता क्या न करता ......
जारी .......

इंतज़ार की घड़ियाँ खत्म हुईं -आज की नायिका है विरहोत्कंठिता

चलिए आपके इंतज़ार की घड़ियाँ खत्म हुईं ! मगर  नायिका तो आज की विरहोत्कंठिता ही है !प्रिय के पूर्व तयशुदा समय पर न आने और चिर प्रतीक्षित आगमन के विलंबित  होते जाने पर व्यग्रता और दुश्चिंताओं  से ग्रसित और व्यथित नायिका ही कहलाती है -विरहोत्कंठिता!


विरहोत्कंठिता...कल की !

नायक के आगमन का पूर्व निश्चित  समय बीत चुका है ,समय आगे खिसक रहा है पल प्रतिपल -क्या हुआ कंत को ? व्यग्र नायिका को  अनेक शंकाएं त्रस्त  कर रही हैं ! भगवान् न करे ,कहीं उनके साथ कुछ हो तो नहीं गया  ?उसके केश वेणी के फूल मुरझाने से लगे हैं ,कांतिहीन हो चले हैं -वह घबराई सी प्रिय मिलन की संभावित  उत्फुल्ल , कामोद्दीपक क्रीडा कलोलो की  रोमांचित  कर  देने वाली कल्पनाओं को भी सहसा भूल सी गयी  है !  पल पल उस पर भारी पड़ रहा है ! बिलकुल यही तो है  विरहोत्कंठिता !

विरहोत्कंठिता ..आज की ...


मगर भाव तो चिरन्तन है !
चित्र सौजन्य : स्वप्न मंजूषा शैल                                      

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