लड़के या लडकी दोनों किशोरावस्था के पहले से ही यौनिक अहसासों से गुजरने लगते हैं.यह बहुत कुछ मनुष्य की जिज्ञासु प्रवृत्ति के चलते ही है .भारत जैसे गरम देश में यौन लक्षणों का प्रगटन भी जल्दी ही ९-१० वर्षों से ही आरंभ होकर १४-१५ वर्ष तक आते आते बिल्कुल स्पष्ट हो रहता है -यद्यपि बाह्य और आंतरिक यौनांग अभी भी विकास की अवस्था में होते हैं ,मगर यौनिक अनुभूति अब मुखर होने लगती है -यौन रसायनों का ऐसा प्रभाव होता है कि लड़के और लडकियां दोनों का विपरीत सेक्स की ओर झुकाव तीव्रतर होने लगता है ...ऐसे ही समय लड़के प्रायः परिवार के भी विपरीत लिंगी लोगों -माता पिता या समतुल्य व्यक्तियों का अधिक स्नेह सामीप्य चाहते हैं.यह सहज और स्वाभाविक है.ऐसे वक्त उनके जैवीय विकास और मनोविज्ञान की समझ अभिभावकों के लिए जरुरी है.ऐसे वक्त एक बेटे का माँ द्वारा अनदेखा किया जाना या उपेक्षित करना भावी जीवन में विपरीत लैंगिक आकर्षण के बजाय विकर्षण उत्पन्न कर सकता है. कई समलैंगिकों ने अपनी जीवनी में माँ या किन्ही मदर फिगर द्वारा बचपन के तिरस्कार को भी अपनी समलैंगिकता एक कारण बताया है और मनोविज्ञानियों ने इसकी पुष्टि की है. इसी तरह बेटियों का पिता के भी प्रति आकर्षण बहुत सहज और निर्मल भाव लिए होता है -वह पिता से प्यार दुलार ,अपनत्व की अपेक्षा रखती है -यहाँ केवल एक आकर्षण ,आईडल वरशिप का भाव होता है, जो सहज है,वह भी पिता या किसी फादर फिगर का स्नेह सामीप्य पाना चाहती है ..मगर कई बार इसे माँ बाप या अभिभावकों द्वारा सही ढंग से समझा नहीं जाता और ऐसे सहज नैसर्गिक झुकाओं के प्रति बहुत ही रोषपूर्ण तिरस्कार का भाव दिखाया जाता है.ऐसे "अनुपयुक्त'' से व्यवहार को ठीक से समझ न पाने के कारण माता पिता प्रायः बच्चों को तिरस्कृत करते है ,उपेक्षा करते हैं और यहीं से उसके अवचेतन में विपरीत लिंग के प्रति एक तरह का दुराग्रह जन्म ले लेता है ..यही वक्त है जब बच्चों को अधिक केयर ,स्नेह दुलार चाहिए ....
किशोरावस्था के ठीक पूर्व के एक दो वर्षों और किशोरावस्था के अनुभव किसी भी के भावी यौन व्यवहार को नियमित करने ,प्रभावित करने की माद्दा रखते हैं .चाहे वह समलैंगिकता हो या फिर विपरीत लैंगिक अरुचि .....एक शिक्षक ने ११ वर्षीय कक्षा ६ के छात्र को अपने साथ की लड़कियों से घुलमिल कर बात करते देख उसे बुलाया और बहुत डांटा..कहा कि लड़कियों से इस तरह बात करना अच्छे घरों के बच्चों को शोभा नहीं देता -बहुत खराब माना माना जाता है .बच्चे के कोमल मन पर इसका इतना दुष्प्रभाव हुआ कि वह लड़कियों की उपस्थिति मात्र से असहज होने लगा,उनसे दूर रहने लगा -उसने बाद में स्वीकार किया कि एक उस घटना से ही उसका भावी यौन जीवन एबनार्मल होता गया ..वह कुछ सालों तक समलैंगिकता की ओर मुड़ा और विवाह के उपरान्त ही कुछ हद तक उसका यौन जीवन सहज हुआ मगर आज अपनी प्रौढावस्था में भी वह लड़कियों ,युवतियों के संपर्क -सम्बन्ध में असहजता का अनुभव करता है ....उसका व्यवहार सामान्य नहीं रह पाता... वह उन्हें मात्र सेक्स आब्जेक्ट के ही रूप में देखता है .आकर्षित विकर्षित होता रहता है. एक शिक्षक के अविवेकपूर्ण निर्णय से कैसे किसी का पूरा जीवन प्रभावित हो सकता है यह मात्र एक उदाहरण है मगर ऐसे अनेक उदाहरण भारतीय समाज में मिल जायेगें .अब इन विषयों पर चर्चा 'सभ्य ' समाज में प्रत्यक्षतः ठीक नहीं मानी जाती और यहाँ असहज यौन व्यवहार पर परामर्श का उतना चलन नहीं है इसलिए समाज की इन यौन ग्रंथियों का अमूमन कोई निवारण भी नहीं है ..
किशोरावस्था के दौरान के ही पहले यौन अनुभव जीवन के स्थाई भाव बनते हैं -एक 'सब्जेक्ट' ने कहा कि उसे पहले स्खलन का अनुभव नर्तकी के कामुक नृत्य और उसके उन्नत वक्षों की गति को देखकर हुआ था सो वह ताउम्र नारी वक्षों से ही विशेष रूप से उद्वेलित होता रहा .किशोरावस्था या आरम्भिक युवावस्था के अप्रिय और अनचाहे यौन संसर्ग से भावी जीवन के सहज सेक्स के प्रति भी तीव्र विकर्षण ,दहशत की प्रतिक्रिया का एक स्थायी भाव मन में घर कर जाता है ....और अन्यथा पूरी तरह सामान्य जीवन जीने के बावजूद भी ऐसे लोगों की सेक्स लाईफ सामान्य नहीं रह पाती ....जोड़े के एक पार्टनर के लिए सहचर /सहचरी का अनपेक्षित व्यवहार एक अबूझ पहली बन जाता है ....कई बार इनसे घर के टूटने और तलाक तक की नौबत आ जाती है .
अभी जारी है ....

