मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

बचपन से ही पड़ती है यौन कुंठाओं की नींव (प्रौढ़ों को है यौन शिक्षा की ज्यादा जरुरत-२)



लड़के  या लडकी दोनों  किशोरावस्था के पहले से ही यौनिक अहसासों से गुजरने लगते हैं.यह बहुत कुछ मनुष्य की जिज्ञासु प्रवृत्ति के चलते ही है .भारत जैसे गरम देश में यौन लक्षणों का प्रगटन भी जल्दी ही -१० वर्षों से ही आरंभ होकर १४-१५ वर्ष तक आते आते बिल्कुल स्पष्ट हो रहता है -यद्यपि बाह्य और आंतरिक  यौनांग अभी भी विकास की अवस्था में होते हैं ,मगर यौनिक अनुभूति  अब मुखर होने लगती है -यौन रसायनों का ऐसा प्रभाव होता है कि लड़के और लडकियां दोनों का विपरीत सेक्स की ओर झुकाव तीव्रतर होने लगता है ...ऐसे ही समय लड़के प्रायः परिवार के भी विपरीत लिंगी लोगों -माता पिता या समतुल्य व्यक्तियों का अधिक स्नेह सामीप्य चाहते हैं.यह सहज और स्वाभाविक है.ऐसे वक्त उनके जैवीय विकास और मनोविज्ञान की समझ अभिभावकों के लिए जरुरी है.ऐसे वक्त एक बेटे का माँ द्वारा अनदेखा किया जाना या उपेक्षित करना भावी जीवन में विपरीत लैंगिक आकर्षण के बजाय विकर्षण उत्पन्न कर सकता है. कई समलैंगिकों ने अपनी जीवनी में माँ या किन्ही मदर फिगर द्वारा बचपन के तिरस्कार को भी अपनी समलैंगिकता एक कारण बताया है और मनोविज्ञानियों ने इसकी पुष्टि की है. इसी तरह बेटियों का पिता के भी प्रति आकर्षण बहुत सहज और निर्मल भाव लिए होता है -वह पिता से प्यार दुलार ,अपनत्व की अपेक्षा रखती है -यहाँ केवल एक आकर्षण ,आईडल वरशिप का भाव होता हैजो  सहज है,वह भी पिता या किसी फादर फिगर  का स्नेह सामीप्य पाना चाहती है ..मगर कई बार इसे माँ बाप या अभिभावकों द्वारा सही ढंग से समझा  नहीं जाता और ऐसे सहज नैसर्गिक झुकाओं के प्रति बहुत ही रोषपूर्ण तिरस्कार का भाव दिखाया जाता है.ऐसे "अनुपयुक्त'' से  व्यवहार को ठीक से समझ  पाने के कारण माता  पिता प्रायः बच्चों को  तिरस्कृत करते है ,उपेक्षा करते हैं और यहीं से उसके अवचेतन में विपरीत लिंग के प्रति एक तरह का दुराग्रह जन्म ले लेता है ..यही वक्त है जब बच्चों को अधिक केयर ,स्नेह दुलार चाहिए ....
 किशोरावस्था के ठीक पूर्व के एक दो वर्षों और किशोरावस्था के  अनुभव किसी भी के भावी यौन व्यवहार को नियमित करने ,प्रभावित करने की माद्दा रखते हैं .चाहे वह समलैंगिकता हो या फिर विपरीत लैंगिक अरुचि .....एक शिक्षक  ने ११ वर्षीय  कक्षा  के छात्र को अपने साथ की लड़कियों से घुलमिल कर बात करते देख उसे बुलाया और बहुत डांटा..कहा कि लड़कियों से इस तरह बात करना अच्छे घरों के बच्चों को शोभा नहीं देता -बहुत खराब माना माना जाता है .बच्चे के कोमल मन पर इसका इतना दुष्प्रभाव हुआ कि वह लड़कियों की उपस्थिति मात्र से असहज होने लगा,उनसे दूर रहने लगा   -उसने बाद में स्वीकार किया कि एक उस घटना से ही उसका भावी यौन  जीवन  एबनार्मल होता  गया ..वह कुछ सालों तक समलैंगिकता की ओर मुड़ा और विवाह के उपरान्त ही  कुछ हद तक उसका यौन जीवन सहज हुआ मगर आज अपनी प्रौढावस्था में भी वह लड़कियों ,युवतियों के संपर्क -सम्बन्ध में असहजता का अनुभव करता है ....उसका व्यवहार सामान्य नहीं रह पाता... वह उन्हें मात्र सेक्स आब्जेक्ट  के ही रूप में देखता है .आकर्षित विकर्षित होता रहता है. एक शिक्षक के अविवेकपूर्ण निर्णय से कैसे किसी का पूरा जीवन प्रभावित हो सकता है यह मात्र एक उदाहरण है मगर ऐसे अनेक उदाहरण भारतीय समाज में मिल जायेगें .अब  इन विषयों पर चर्चा 'सभ्य ' समाज में प्रत्यक्षतः ठीक नहीं मानी जाती और यहाँ असहज यौन व्यवहार पर  परामर्श का उतना चलन नहीं है इसलिए समाज की इन यौन ग्रंथियों का अमूमन कोई निवारण भी नहीं है ..

किशोरावस्था के दौरान के ही पहले यौन अनुभव जीवन के स्थाई भाव बनते हैं -एक 'सब्जेक्टने कहा कि उसे पहले स्खलन का अनुभव नर्तकी के कामुक नृत्य और उसके उन्नत वक्षों की गति को  देखकर हुआ था सो वह ताउम्र नारी वक्षों से ही  विशेष रूप से उद्वेलित होता रहा .किशोरावस्था या आरम्भिक युवावस्था के अप्रिय और अनचाहे यौन संसर्ग से भावी जीवन के सहज सेक्स के प्रति भी तीव्र विकर्षण ,दहशत की प्रतिक्रिया का एक स्थायी भाव मन में घर कर जाता है ....और अन्यथा पूरी तरह सामान्य जीवन जीने के बावजूद भी ऐसे लोगों की सेक्स लाईफ सामान्य नहीं रह पाती ....जोड़े के  एक पार्टनर के लिए सहचर /सहचरी का अनपेक्षित व्यवहार एक अबूझ पहली बन जाता है ....कई बार इनसे घर के टूटने और तलाक तक की नौबत आ जाती है .
अभी जारी है ....


शनिवार, 14 अप्रैल 2012

बच्चों को नहीं यहाँ प्रौढ़ों को यौन शिक्षा की जरुरत है!


बच्चों को यौन शिक्षा का अर्थ क्या है? यह अनिवार्य क्यों होना चाहिए? और जिन बच्चों को यौन शिक्षा नहीं दी गयी मतलब आज और कल तक की पूर्ववत प्रौढ़ पीढी, तो उनका यौन जीवन निर्वाह कैसे हुआ या हो रहा है? ये कई ऐसे सवाल हैं जो किसी के भी जेहन में उठ सकते हैं .मगर मुश्किल यह है कि सेक्स पर चर्चा एक उपेक्षित और सामजिक रूप से वर्जित विषय है ..नैतिकता और संस्कार के सवाल उठने लगते हैं .भारत में तो सेक्स एक बड़ा वर्जित शब्द ही नहीं एक वर्जित कर्म भी है .कुछ वर्जना तो प्रकृति प्रदत्त है -जैवीय सृजन की गतिविधि किसी भी भांति  बाधित न हो इसलिए यहाँ कुछ तो आवरण में है ,गोपन है और निजता की जरुरत होती है .बाकी सृजन की इस मूल प्रेरणा को लेकर प्रकृति का अपना ताम झाम है -सेक्स एक सहज बोध है .बहुत कुछ अपने आप समझ आ  जाता है .किशोरावस्था की शुरुआत ही 'द्वितीयक लैंगिक लक्षणों' से शुरू हो जाती है मगर लैंगिक भावना बचपन से ही जाहिर होने लगती है ...बच्चे तक भी खेल खेल में लैंगिक बोध से गुजरते हैं -" तुम अपना दिखाओ मैं अपना दिखाता हूँ" जैसे खेल बच्चों में प्रिय हैं . यहाँ किसी यौन शिक्षा की जरुरत नहीं है .प्रकृति खुद उन्हें राह दिखाती है . व्यवहार वैज्ञानिकों ने इन गतिविधियों को " इक्स्प्लोरेटरी एक्टिवीटीज  " -खोज बीन/जिज्ञासु गतिवधियां कहा है . बच्चे तक समझने लगते हैं कि उनके अंगों में फर्क है . अरे यह तो लडकी है -देखो वह लड़का है!


अब तक तो सब कुछ ठीक ठाक रहता है मगर किशोरावस्था तक आते आते मामला गंभीर होने लगता है ..अब समय होता है द्वितीयक लैंगिक लक्षणों के प्रगट होने का ...मूछें निकलना ,आवाज भारी होना और यौनांग पर बाल उगना ऐसे लक्षण हैं जिनसे बच्चों  में कुछ घबराहट सी होनी शुरू होती है और लड़कियों में उभार तथा मेंसेस का आरम्भ उनकी मुसीबत बनती है ...यही वह अवसर है जब बच्चों को सही यौन शिक्षा दी जानी चाहिए -मगर होता उल्टा है ..प्रौढ़ों से उन्हें सहज व्यवहार के बजाय डांटना डपटना झेलना पड़ता है ...इसे देखो अभी से इस नालायक की मूंछे निकलने लगीं ....और तो और एक पिता के मुंह से बेटा जब यह कठोर वचन सुनता है, उसका दिल बैठ जाता है ...कुछ जरुर गलत है ....कुंठा का पहला अनुभव उसे होता है ..माँ भी अपनी बेटी को जब उसके उभारों और मेंसेस के प्रथम  अनुभव के  समय सहानुभूति के बजाय तरह तरह के कटु वचन बोलने लगती है तो उसे लगता है कि उसे जीना ही नहीं चाहिए ...यहाँ यौन शिक्षा की किसे ज्यादा जरुरत है? 

द्वितीयक लैंगिक पहचानों के उभरने के साथ ही दो मुख्य यौन रसायन -टेस्टोस्टेरान  और इस्ट्रोजेन का उत्पादन मस्तिष्क शुरू करता है -यह वही अवसर है जब विपरीत लिंग के प्रति जबरदस्त आकर्षण होता है . दिन रात की बेचैनी ,चेहरे पर हवाईयां ....चोरी छिपे कुछ वारदातें ....लड़कों ही नहीं लड़कियों में भी जीवन के पहले क्रश का अनुभव इसी समय होता है -कोई बेहद अच्छा लगने लगता है ,किसी के साथ हर पल छिन रहने का जी चाहता है ...लड़के या लडकी दोनों की यही हालत होती है और यह बेहद सामान्य बात है -यहाँ उन्हें सहानुभूति और सही सलाह मिलनी चाहिए मगर होता उल्टा है -माँ बाप अभिभावकों  की डांट डपट शुरू हो जाती है ....और यह अपने वीभत्स रूप में खाप पद्धतियों तक जा पहुँचती है ....

और यही पहला वक्त होता है जब शुरू होता है प्रौढ़ों द्वारा यौन शोषण -लड़का या लडकी, यह ज्यादती दोनों के हिस्से में है . जान पहचान केलोग , सगे रिश्तेदार तक भी बेजा हरकते करते हैं ....जहां  एक प्रौढ़ को जिम्मेदारी निभानी है वहीं वह बिकुल ही गैर  जिम्मेदाराना हरकत करता है -यहाँ फिर से प्रौढ़ों को ही यौन शिक्षा की जरुरत है .. यही यह वक्त होता है कि माँ बाप खुद अपने बच्चों को कई जरुरी बातें पूरी सहानुभूति और अपने प्रति उनमें भरोसा देकर समझा सकते हैं  ...यौनानुभव  के साथ जो जरुरी सावधानियां ,.प्रसव /जन्म निरोध ,यौन रोगों और एड्स की संभावना आदि का ककहरा यहीं से शुरू होना चाहिए ...और यह भी कि यौन संसर्ग के प्रति एक सकारात्मक सोच की प्राथमिक कक्षा भी यहीं से शुरू होती है . यह बात यहीं से समझाई जानी चाहिए कि यह सहज बात है ,प्राकृतिक है मगर कुछ सावधानियाँ भी अपेक्षित है -सेक्स कतई घृणित नहीं है ...गंदी चीज नहीं है -क्योकि यहीं से गलत पाठ आगे की ज़िंदगी को प्रभावित कर सकता है -एक मेरे स्वजन हैं उनकी मर्मान्तक पीड़ा है कि एक तो उनकी सहचरी घनिष्ठ क्षणों के लिए तैयार नहीं होती हैं और अगर किसी तरह तैयार भी होती हैं तो जाड़े की ठिठुरन भरी रात ही क्यों न हो बालों को खोलकर देर तक नहाती हैं .....ऐसे व्यवहार दरअसल कुंठित यौन व्यवहार का ही एक उदाहरण है ..
यह यौन -कथा अभी बहुत  बाकी है ... -:) 

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

मंगल पर निस दिन मंगल हो और चाँद पर हो इक आशियां!


यह सचमुच हैरान करने वाली बात है कि हमारे आदि पूर्वजों ने भी कभी अन्तरिक्ष में एक शहर बसाने का सपना देखा था ....इस बारे में मय दानव और उसके द्वारा बसाए गए त्रिपुर नामक अन्तरिक्ष की कथा बड़ी रोचक है ..मय एक मायावी दानव था मगर हर तरह के छल प्रपंच और माया के विस्तार के बावजूद भी वह देवताओं से युद्ध में पराजित हो गया था ...उसने घोर तप किया और ब्रह्मा से अन्तरिक्ष में नगर बसाने का वरदान मांग लिया ....और फिर उसने त्रिपुर नामका अन्तरिक्ष शहर बनाया .जैसा कि नाम से जाहिर है त्रिपुर  तीन छोटे शहरों को मिलाकर बनाया गया था जिनके नाम थे-अयसपुर,रजतपुर और सुवर्ण नगर ...इन सभी शहरों की अपनी विशेषताएं थीं ,जैसे अयसपुर यानि लौहपुर मजबूती  के कारण ,रुपहली आभा वाला रजतपुर और सोने सा दिखने वाला सुवर्णपुर अपनी चमक के कारण विख्यात हुआ ..इन सभी नगरों में बहुमंजिली इमारतें ,सड़कें, तालाब,बाग़ , झरने, तरह तरह के पशु पक्षी और वृक्ष सभी तो थे .एक नगर से दूसरे नगर तक की हवाई यात्रा के लिए विमान भी थे...पुराकथा  के मुताबिक़ ये तीनों नगर धरती से सौ योजन की दूरी पर   एक तारे सदृश दिखते थे.....मय राक्षस अपने बन्धु बांधवों के साथ यहाँ  विलासपूर्वक रहता था, मगर एक बार शंकर के कुपित हो जाने  पर उनके द्वारा इन नगरों को भस्म कर दिया गया .....शंकर का एक नाम इसलिए ही त्रिपुरारि है! 

एक ऐसी ही कथा त्रिशंकु की भी है जिसे विश्वामित्र ने अपने तपोबल से सीधे स्वर्ग भेज दिया था ....चूंकि धरती से सशरीर स्वर्ग की यात्रा दैविक  नियम के अनुकूल नहीं थी /है अतः इंद्र ने उसे स्वर्ग द्वार से ही नीचे ढकेल दिया .  बिचारा त्रिशंकु औधे मुंह नीचे गिरने लगा ..उसकी आर्तनाद से विश्वामित्र ने कुपित हो उसे बीच में ही रोक दिया ...पौराणिक मान्यता के अनुसार आज भी औधे मुंह त्रिशंकु वहीं धरती और स्वर्ग की देहरी -अधर में लटका हुआ है ..उसके मुंह से निकली लार से कर्मनाशा नदी की निर्मिति हुई है ....

अन्तरिक्ष में नगर बसाने की  सोच केवल एक कपोल कल्पना भर ही नहीं रह गयी ....आज हम सभी जानते हैं कि अन्तरिक्ष स्पेस स्टेशन एक हकीकत है और अन्तरिक्ष में  गतिमान है ....यह एक कृत्रिम उपग्रह की तरह  अन्तरिक्ष की एक निचली कक्षा में स्थापित है .और धरती से नंगी आँखों से देखा जा सकता है . इसमें दो चार अन्तरिक्ष वासी निवास भी कर सकते हैं,बल्कि रूसी और अमेरिकी अन्तरिक्ष यात्री वाहना रुकते भी रहे हैं . .आज अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों के पास ऐसे अन्तरिक्ष के रैन बसेरों ,होटलों के ब्लू प्रिंट मौजूद हैं जहाँ लोग सैर सपाटे के लिए ,हनीमून के लिए जा सकते हैं ...अन्तरिक्ष के पर्यटन उद्योग का एक भरा पूरा स्वरुप अंगडाई लेने लगा है. 

प्रसिद्ध इतालवी -फ्रांसीसी गणितज्ञ जोसेफ लुयिओस लाग्रेंज ने १७७२ में गणितीय आधार पर यह साबित किया कि सूर्य ,धरती और चन्द्रमा के  गुरुत्व के मध्य एक ऐसा बिंदु है जहां गुरुत्वाकर्षण बल नगण्य है यानि वहां कोई भी वस्तु स्थापित हो तो स्थिर रहेगा ..इन्हें आज लाग्रेजियन बिंदुकहा जाता है और उन्ही गुरुत्व हीन स्थानों में ही भविष्य की अन्तरिक्ष बस्तियों के बसाए जाने की कवायद है . क्या यह रोचक नहीं कि हमारे पुराणकारों की कल्पनाएँ अब उपयुक्त प्रौद्योगिकी के विकास के चलते  साकार होने लगी हैं ....कितना अच्छा हो  यदि भविष्य की किसी अन्तरिक्ष बस्ती का नाम  त्रिपुर या त्रिशंकु रखा जाता .... 


      
अन्तरिक्ष स्पेश स्टेशन अब एक हकीकत है 
प्रसिद्ध विज्ञान कथाकार आर्थर सी क्लार्क ने १९४५ मे एक लेख लिखा था जिसमे यह दर्शाया गया था कि यदि अन्तरिक्ष की भू स्थिर कक्षाओं मे उपग्रहों को स्थापित कर उनसे संचार संवहन कराया जाय तो समूची दुनिया मे एक साथ ही सहजता से संचार स्थापित हो सकता है .यद्यपि उन्होंने इस युक्ति को पेटेंट नही कराया मगर उनका यह स्वप्न जल्दी ही साकार हुआ और एक दशक बीतते बीतते पहला संचार उपग्रह धरती के भू स्थिर कक्षा मे स्थापित कर दिया गया . आज अंतर्जाल पर हमारी गतिशीलता इन्ही संचार उपग्रहों की ही देन है ..क्लार्क ने  1940 में यह भी घोषणा की थी कि मनुष्य सन १९८० के दशक तक तक चांद पर जा पहुंचेगा, चालीस के दशक में मनुष्य के चांद पर पहुंच जाने की कल्पना प्रस्तुत करने पर लोगों ने उनका उपहास किया,1969 में ही अमरीकी नागरिक नील आर्मस्ट्रांग ने आखिर चांद पर कदम रख ही दिए .तब अमरीका ने क्लार्क की सराहना करते हुए कहा था कि उन्होंने हमें चांद पर जाने के लिए बौद्विक रूप से प्रेरित किया.

शायद वह दिन अब बहुत दूर नहीं,मतलब अगले सौ पचास वर्षों में  ही    मंगल पर होगा निस दिन मंगल और चाँद पर हम बनायेगें इक आशियाँ ....और हमारे पुराण -मनीषियों की संकल्पनाएँ साकार हो उठेंगी .....

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

निर्मल बाबा: एक नजरिया यह भी !

मुझे एक पत्रिका के सम्पादक ने आग्रह किया मैं निर्मल बाबा सरीखे ढोगीं व्यक्ति के बारे में उन्हें एक लेख  लिख कर भेजूं .उन्होंने मुझे  उकसाया भी कि अंधविश्वास के प्रति मुहिम चलाने वाले व्यक्ति यानी मुझे ऐसे ढोगी बाबाओं के खिलाफ मैदान में उतर आना चाहिए .... उन्हें पता नहीं शायद कि मैं (उकसावों के) बहकावों में अब नहीं आता ....वो दिन बीत गए जब ..... हाँ, मैंने जब इस विषय की अहमियत के चलते कुछ लिखने को सोचा तो जो लिखा गया वो बिलकुल अलग था ..मैं भी हैरान कि यह क्या लिख डाला मैंने ..सहज लेखन शायद ऐसा ही होता हो ...सामग्री थोड़ी बासी है क्योंकि मेरे फेसबुकिये मित्र इसे पहले ही चख चुके हैं मगर मुझे मालूम है मेरे कई सुधी पाठक और मित्र फेसबुक पर नहीं हैं -यह उनके लिए है ! 

 

निर्मल बाबा के प्रकरण को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा .अपने देश में चमत्कार के प्रति लोगों में एक ऐसा ही जुनूनी लगाव है .गैर पढ़े लिखे लोग ही नहीं अच्छे ओहदों पर बैठे प्रशासक ,न्यायविद जब फलित ज्योतिष के मुरीद हैं ,अपनी दसों उँगलियों में अंगूठियाँ पहनते हैं तब एक निर्मल बाबा पर हल्ला बोल से क्या होगा ? 



यह एक बड़ा व्यापार है .निर्मल बाबा ने कितनों की झोली भर दी  है .एक भरा पूरा व्यवसाय उठ खड़ा हुआ है .बैंक ,परिवहन, ईवेंट प्रबंध आदि आदि ..सभी के पौ बारह हैं ...लोगों का व्यवसाय चमक उठा है . मीडिया अथाह धन हलोर रहा है ..बाबा अरबपति हो गए हैं ..एक निर्मल बाबा बे इतने चमत्कार क्या कम किये हैं ? और दीगर बाबाओं से सचमुच साफ़ सुथरे भी हैं ...कोई अंतर्कथा, कोई रासलीला भी नहीं सामने नहीं आई है ...बातें भी तार्किक करते लगते हैं ...कोई ख़ास अनुष्ठान भी नहीं ..अब लोग वहां उमड़ पड़ रहे हैं तो क्या किया जा सकता है ..लोकतंत्र है.... लोगों की इच्छाओं का सम्मान करना ही होगा ....बजा कहे जिसे आलम उसे बजा समझो .....

देश में जिस तरह आस्था और विश्वास का संकट है ,हमारे सामने ऐसे उदाहरण नहीं हैं जिनका अनुसरण किया जाय ,समाज की अगुआई करने वाले नेता भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं ,न्याय और कार्य प्रणाली इतनी सुस्त है तो लोग आखिर जाएँ तो जाएँ कहाँ ? ऐसे में एक बाबा उन्हें उनके दुखों से निजात दिलाने का विश्वास देता है ,जीने का सहारा देता है ...हमारे पास फिलवक्त कोई विकल्प नहीं जो हम इन निराश लोगों के जीवन में आशा और विश्वास का संचार कर सकें ....



समाज में चहुँ ओर बेईमानी भ्रष्टाचार व्याप्त है ...ऐसे में केवल एक बाबा पर निशाना क्यों? आशाराम बापू ,जय गुरुदेव आदि सभी तो ऐसा ही कुछ कर रहे हैं .....निर्मल बाबा ने कोई अलग कार्य नहीं किया बल्कि इस देश के हजारो करोड़ों लोगों को जीने का एक आसरा दिया है ...और जनता की जेब ढीली हो रही है तो उनकी मर्जी से ..किसी ने डाका तो नहीं डाला ,कोई चोरी तो नहीं की ...इंतज़ार कीजिये उस वक्त का जब रामराज्य आएगा और जब ऐसे बाबाओं की कोई जरुरत ही नहीं होगी ....आज शायद हमारे समाज को बाबाओं की ही जरुरत है ....भारत का विज्ञानी भी इतना समर्थ नहीं हो पाया कि महज दस लोगों को भी अपना अनुयायी बना सके ...बाबाओं पर निशाना साधने के बजाय उन कारणों पर गौर किया जाना चाहिए जिनके चलते इन बाबाओं की चान्दी ही चान्दी है.


यहाँ ज्यादातर तो गरीबों के ही बाबा हुए हैं ...केवल एक को छोड़कर -रजनीश! और रजनीश का अध्ययन बहुत व्यापक था और वे एक बड़े ही कुशल वक्ता थे ....बुद्धिवादी थे ,तार्किक प्रज्ञा से लबरेज मगर यहाँ की जनता जनार्दन ने उन्हें नकार दिया ...वे कहते थे .."आय एम अ रिच मैंन गुरु ...." उन्होंने धर्म के नाम पर अनेक अनीतियों ,दुराचारों का जमकर विरोध किया मगर खुद के इतने विरोधी भी बना लिए कि देशांतरण करना पड़ा -अमेरिका में भी उनके साथ षड्यंत्र हुआ -उन्हें असमय ही देह त्याग करना पडा ....रजनीश के ही उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाएगा कि यहाँ की जनता में ही कुछ ऐसा है जो उन्हें ज्ञानमार्गी बाबा पसंद नहीं है उनकी पहली पसंद ढोंगी बाबा है जो उन्हें इहलोक और परलोक का बेडा पार करने के सपने दिखाते हैं ....


मगर फिर बात वहीं आकर अटकती है -हमारे पास क्या कोई और भरोसा है ? विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने मनुष्य के जीवन को काफी आरामदायक बनाया है मगर विज्ञान की और आम जनों की इतनी अरुचि क्यों ? क्यों हमारा विज्ञान और प्राविधि लोगों में  भरोसा नहीं कायम कर पा  रहा है ? हमारे देश में बाबाओं की बजाय विज्ञान संचारकों की फ़ौज क्यों नहीं जगहं ले पा रही है ? विज्ञान प्रचारकों की क्या जरुरत नहीं है हमें ? 


बाबाओं के बहाने इन बिन्दुओं पर विचार जरुरी है !


गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

अथ नकलोपाख्यानम!


जी भ्रम न करें नकलोपाख्यानम ही है.... पुराणों का नलोपाख्यानम यानि नल दमयंती आख्यान नहीं..नकल का अख्यान. इन दिनों परीक्षाएं चल रही हैं तो सोचा आप सबसे कुछ इसी मामले पर बतियाया जाए। नक़ल और परीक्षाओं का तो बड़ा गाढ़ा रिश्ता है। नक़ल विहीन परीक्षा की सारी कवायद के बाद भी नक़ल रोके नहीं रुक रही है तो केवल इसलिए कि यह हमारी एक बड़ी पुरानी थाती हैकला है और भारतीयता की पहचान है। शिक्षा व्यवस्था में चाहे वह तोता रटंत विद्या हो या नक़ल विद्याइनकी जड़ें बहुत गहरी हैं। वेदपाठी ब्राह्मण वेद की ऋचायें रट रट कर ही याद करते थे। बाबा तुलसी भी कहते भये हैं- 'दादुर धुन चहुं दिशा सुनाईवेद पढ़हिं जिमि बटु समुदाई'... मतलब वर्षा ऋतु में मेंढक ऐसे टर्रा रहे हैं जैसे वेदपाठी ब्राह्मणों के समूह वेदपाठ कर रहे हों। शिक्षाशास्त्री और भाषा विज्ञानी लाख कहें कि रटना मानव  बुद्धि की संभावनाओं को कमतर करता हैहम नहीं मानते। यदि ऐसा होता तो वैदिक वांगमय हजारो साल तक अक्षुण न रहते। हमने अपनी इसी नैसर्गिक क्षमता से ही तो अपने वेदों और स्मृतियों को हजारो साल तक बचाए रखा। लिखने की कला और छापे खाने तो कितने बाद में आए। अब नक़ल की बात कर लीजिए। आज नक़ल पूरे विश्व में भारतीयता की पहचान मानी जाती है। कोई भी उपकरण पश्चिमी देश आविष्कृत करें, यहां उसका तर्जुमा तुरत फुरत तैयार... और नक़ल में भी अकल की दखल ऐसी कि हमारी कितनी ही 'जुगाड़ीतकनीकों को दुनियां में इनोवेशन के उदाहरण के तौर पर देखा जाता है।

इसलिए यह सर्वथा उचित लगता है कि नक़ल के प्रति हम अपने नकारात्मक दृष्टिकोण को बदलें और अपनी इस पुरानी कला को परिमार्जित करें। इस कला को आगे बढ़ाने में हर पीढी के छात्रों का बड़ा योगदान रहा है। शायद ही कोई पढ़ा लिखा ऊंचे ओहदे पर बैठा मानुष यह दावे के साथ कह सके कि उसने जीवन में कभी नक़ल नहीं की। बड़े ओहदों के प्रशासकों  और राजनेताओं ने भी बिना रटंत विद्या या कभी कभार के नक़ल के जीवन में इतनी ऊंचाई शायद ही पाई होती। हां इनके नक़ल के तरीके जुदा जुदा भले ही रहे हों। मेरे एक मित्र हैं आज कल एक बड़े राजनेता हैं। हम साथ ही पढ़ते थे। उनका रटने या समझने में विश्वास जरा कम था इसलिए वे परीक्षा के समय पुर्जियां बनाते रहते थे और हम सब को हिकारत भरी नज़र से देखते थे। कहते, लगाओ घोटा ...जितनी देर में तुम लोग रट्टा मारकर एक दो सवाल याद करोगे, मैं पचीसों सवाल की पुर्जी बना चुका रहूंगा। बला की फुर्ती से वे महीन अक्षरों में नक़ल की पुर्जी बनाते थे और अंत में एक पुर्जी यह भी बनाते थे कि अमुक अमुक पुर्जी कहाँ कहाँ छुपाई जाएगी।

एक बार तो अपनी इसी सूझ के चलते वे भारी मुसीबत में पड़ गए। हिन्दी का साहित्य का प्रश्नपत्र था। उनका दुर्भाग्य की कक्ष निरीक्षक खुर्राट किस्म के निकल गए और उन्हें नक़ल करते धर दबोचा और दुर्भाग्य से वही पुर्जी उन्हें पहले ही दिख गयी जिसमें कुछ ऐसा मजमून बारीक अक्षरों में था। मीराबाई मोज़े में, तुलसीदास कांख में, कबीर दास लंगोट में, रसखान रीढ़ के नीचे... आदि आदि। जाहिर है कक्ष निरीक्षक के हाथ नक़ल साहित्य का खजाना ही मिल गया था। बेचारे अलग कक्ष में ले जाए गए जहां उनकी नंगाझोरी करनी पड़ी। अभी वे नक़ल शुरू नहीं कर पाए थे कि यह विपदा आन पड़ी थी। बहरहाल उनकी सारी नक़ल सामग्री जो जहां जहां से प्राप्त हुई जब्त कर ली गयी। गनीमत यही रही कि उन्हें परीक्षा देने की अनुमति दे दी गयी और ताज्जुब कि वे फिर भी पास हो गए थे। यह  राज तो उन्होंने बाद में उजागर किया कि वह पुर्जी तो उन्होंने जानबूझ कर निरीक्षक को थमा दी थी ताकि उनका ध्यान बंट जाए। असली वाली पुर्जी  तो कहीं और थी...

भला बताइए, ऐसी  तीक्ष्ण प्रतिभा वाले को नक़ल के नाम पर प्रताड़ित करना कहां तक उचित था और आज वे अपनी इसी प्रतिभा के बल पर राजनीति के  एक बड़े नाम हैं। उनसे ही जुड़े  एकाध और संस्मरण हैं। एक बार काला चश्मा लगाए एक कक्ष निरीक्षक जब पधारे तो हमारे प्रिय भावी राजनेता ने उन्हें इस बात पर कनविंस कर लिया कि वे बिना काले चश्मे के ही बला की पर्सनालिटी वाले लगते हैं। लिहाजा निरीक्षक साहब ने चश्मा निकाल कर सामने रख दिया। यह सब उन्होंने  इसलिए किया था कि उनके मुताबिक़ काले चश्मे  से यह पता नहीं लग पा रहा था कि वे देख किधर रहे हैं और नक़ल करने के लिहाज से यह एक असहज स्थति थी।
इनके कुछ क़िस्से  फिर कभी। आज का नक़ल आख्यान बस इतना ही।

यह पोस्ट श्री प्रवीण पाण्डेय जी की इन दिनों चल रहे नक़ल विमर्श से प्रेरित है अतः उनका आभार! 

रविवार, 1 अप्रैल 2012

मैंने ऐसे मनाया पृथ्वी प्रहर,बोले तो अर्थ आवर


संचार माध्यमों ने कुछ ऐसी फ़िजा बनाई कि मैं भी पृथ्वी प्रहर (अर्थ आवर) मनाने को संकल्पित हो गया। अर्थ आवर आने पर उसका जोरदार स्वागत करने के लिए मोमबत्तियां वग़ैरह की खरीददारी की। सोचा कि इस अवसर को एक रूमानी संस्पर्श भी दिया जाय। क्यों न अवसर का लाभ ले कैंडिल डिनर का आनंद उठाया जाय। घुप अंधेरे में और कुछ करने की बजाय एक रूमानी डिनर पर समय व्यतीत किया जाना ज्यादा पर्यावरण हितकारी लगा। वैसे भी घुप अंधेरे में दिमाग को खाली तो कदापि न रखा जाए, क्योंकि वह कहावत तो है ही न कि 'खाली दिमाग शैतान का घर होता है'। बहरहाल पृथ्वी प्रहर के आते ही हमारा डिनर तैयार था। आज हमारा भी रसोई में प्रवेश निषिद्ध नहीं था, तो मैंने भी हाथ बटाया। खाना सुस्वादु होना ही था। उठ रही सुगंध इसकी गवाही दे रही थी। पृथ्वी प्रहर आन पहुंचा था। हमने सारे कमरों की बत्ती बुझाने के लिए मेन स्विच ऑफ कर दिया और डिनर टेबल पर सजे सुस्वादु भोजन का आनंद हम दंपती आराम से पुराने रूमानी दिनों की याद करते हुए उठाते रहे। साढ़े आठ से साढ़े नौ का समय भी कब पूरा हो गया पता ही नहीं लगा। मैंने ठीक साढ़े नौ बजे मेन स्विच ऑन कर दिया।

मगर यह क्या? बिजली तो नदारद थी। ओह तो अब पृथ्वी प्रहर मनाने का सरकारी टाइम आ गया था। अपनी सरकार तो रोज ही पृथ्वी प्रहर मनाती है, एक घंटे का नहीं घंटों का। कई-कई घंटों का, चौबीस घंटे में कई अंतरालों पर अपनी सरकार नित्य प्रति पृथ्वी प्रहर मनाती है। अचानक ही विचारों का एक रेला आया और इस पोस्ट की जुगाड़ कर गया। जिस देश में सरकारें रोज ही पृथ्वी प्रहर मना रही हों वहां क्या किसी एक दिन पृथ्वी प्रहर मनाने का कोई औचित्य भी है? हम प्रायः पश्चिमी देशों के विचार और बहिष्कृत तकनीकी अपनाने के आदी हो चले हैं, मगर यह भी तो देखें की वहां पल भर को भी बिजली नहीं जाती, जबकि हमारी अधिकांश आबादी पहले से ही अंधेरे में सोने को अभ्यस्त है। तमाम पश्चिमी देशों ने नाभिकीय बिजली अपना ली है मगर आज भी हमारे देश में पनबिजली का ही आसरा है, जो ज्यादातर प्रदेशों में शहरों तक में भी 15-16 घंटे से अधिक उपलब्ध नहीं रहती, गांव की तो बात ही छोड़िए। मगर, फिर भी हम पृथ्वी प्रहर मनाने को उतावले हो जाते हैं।
इन दिनो परीक्षाएं चल रही हैं। बच्चों की पढ़ाई जोरों पर है अब बिजली आई तो बच्चे पढ़ने पर, नकलची नकल की पर्ची बनाने में लगेगें कि पृथ्वी प्रहार मनाएगें? अच्छा हुआ यह अभियान यहां बनारस में तो फेल हो गया। दरअसल, हम पश्चिमी अभियानों को अपनी जमीनी हकीकत के लिहाज ने नहीं देख पाते। पर्यावरण से जुड़े ज्यादातर बुद्धिजीवी सिर्फ अकादमिक बहसों में उलझे होते हैं, जमीन से नहीं जुड़े होते।
माना कि आज धरती के संसाधनों का बड़ा दोहन हो रहा है, मगर इसमें पश्चिमी देश ही बहुत आगे हैं। उनकी प्रति व्यक्ति बिजली या अन्य ऊर्जा साधनों की खपत हमसे पहले से ही काफी अधिक है। उनका पृथ्वी प्रहर मनाया जाना जन चेतना को जागृत करने के लिए बेहद जरूरी है। मगर, ऊर्जा का उपभोग तो हमारे यहां अब भी बहुत कम है और उत्पादन भी, इसलिए ही भारत का आम आदमी ऐसे पश्चिमी अभियानों को तवज्जो नहीं दे पाता, उसके मंतव्य से मन से जुड़ ही नहीं पाता और जिस कारण से अर्थ आवर मनाया जा रहा है वह खुद वैज्ञानिकों के बीच विवादित है। वे कहते हैं वैश्विक ऊष्मन (ग्लोबल वॉर्मिंग) की ओर दुनिया का ध्यान दिलाना है। मगर, वैज्ञानिकों का एक और खेमा यह कहता फिर रहा है ग्लोबल वॉर्मिंग की बात छोड़िए हिमयुग की वापसी होने जा रही है। अब कौन गलत है और कौन सही यह आम आदमी कैसे समझे। पहले तो ये वैज्ञानिक फैसला कर लें, तब हम फैसला करें कौन सा आयोजन मनाया जाना जरूरी है। आज भारत में भी पर्यावरण अतिवादियों का एक खेमा बहुत सक्रिय है उनसे सावधान रहने की जरूरत है। यहां पृथ्वी प्रहर के आयोजन से ज्यादा जरूरी गंगा और सहायक नदियों की रक्षा है जो जीवन की आखिरी सांसें ले रही हैं।

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

चिर यौवन और अमरता की हमारी ललक(पुराण कथाओं में झलकता है भविष्य-2)


धरती के जन्मे को एक न एक दिन मृत्यु का वरण करना ही है-इसलिए ही पृथ्वी को मृत्युलोक कहा गया है .मगर मृत्यु चाहता कौन है? कहते हैं जनमत मरत दुसह दुःख होई ...और यह भी कि मनुष्य की लोकेष्णायें ,चाहनायें उसे जीते रहने को प्रेरित करती रहती हैं . ग़ालिब साहब  देखिये क्या कह गए हैं -.गो हाथ को जुम्बिश नहींआँखों में तो दम हैरहने दो अभी सागरों-मीना मेरे आगे ...गरज यह कि यह जीने की तमन्ना आदमी को ठीक से मरने भी नहीं देती ...वह अमरता का सपना देखता रहता है - वह चिर यौवन का आनंद उठाना चाहता है .यह आज की नहीं हमारी आदिम सोच है . चिर यौवन और अमरता की हमारी ललक कई पुराण कहानियों में दिखाई देती है। अब समुद्र मंथन को ही लें- यहां से भी चौदह रत्नों में से एक अमृत कलश था जिसे देवताओं ने पिया और वे अजर-अमर हो गये। च्यवन ऋषि ने ऐसा माजूम बनाया और खाया कि वे फिर से युवा बन गये। संजीवनी बूटी की कथा भी अमरता से जुड़ी है। कहते हैं कि संजीवनी विद्या असुरों के गुरु शुक्राचार्य के पास थी... देवताओं ने एक कुचाल रच कर अपने गुरु बृहस्पति के पुत्र कच को यह विद्या सीखने शुक्राचार्य के पास भेजा।

अब कच असुरों के गुरु शुक्राचार्य के आश्रम में रहकर संजीवनी विद्या सीखने लगा। मगर जल्दी ही असुर आश्रमवासियों को यह जानकारी प्राप्त हो गई और वह सब मिलकर कच का वध करके उसके शरीर के टुकड़े वन में ही विचरते एक भेड़िए को खिला दिए। शुक्राचार्य की बेटी देवयानी कच का बहुत ध्यान रखती थी। घर से गौए चराने के लिए कच के शाम बीत जाने के बाद भी न लौटने पर देवयानी को चिंता हुई। उसने पिता से अपनी चिंता व्यक्त की। शुक्राचार्य ने ध्यानस्थ होकर यह जान लिया गया कि राक्षसों ने कच को मारकर उसके अंगों को भेड़ियों को खिला दिया है। शुक्राचार्य ने उसी संजीवनी विद्या का प्रयोग किया और कच जीवित हो उठा। मगर कुछ ही दिन में फिर असुरों ने मिलकर कच को मार डाला। यही नहीं मारने के बाद कच को जलाया गया और उसकी राख असुर गुरु शुक्राचार्य की मदिरा में ही मिला दी गई। अब बड़ी मुश्किल! कच का पुनर्जीवित होना अब दुष्कर कार्य था। देवयानी ने कहा कि वह बिना कच के जी नहीं सकती। शुक्राचार्य ने कच को पुकारा। भयभीत कच ने उनके पेट से ही अपनी दशा बताई। तब जाकर शुक्राचार्य ने कच को पूरी संजीवनी विद्या बताई जिसे पेट में ही सीखकर कच बाहर आ गया और फिर उसने उसी विद्या से शुक्राचार्य को जिला दिया।

अमरता की यह चाह आज भी मनुष्य को वैसे ही सालती रहती है। वैज्ञानिक आज भी प्रयोगशालाओं में ऐसे अनेक प्रयोगों में जुटे हैं जिनमें या तो मनुष्य की उम्र घटा देने की युक्ति है या फिर उसे अमरता के पास तक पहुंचा देने की ज़िद है। असाध्य रोगों से जूझ रहे मरीजों को क्रायोनिक कैप्सूलों में क़ैद कर लंबे समय तक उन्हें सस्पेंडेड एनिमेशन में रखने की जुगत तो जैसे बस कुछ वर्षों में ही सुलभ हो जाएगी। जब असाध्य रोगों का इलाज ढूंढ लिया जाएगा तब इन जिंदा लाशों को कैप्सूलों से आज़ाद कर उन्हें नया जीवन अदा कर दिया जाएगा। एक समुद्री जीव जेलीफिश की कोशिका का अध्ययन जारी है जो अमरता का वरदान पाए हुए है। जिस दिन उसकी कार्य पद्धति को वैज्ञानिक समझ जाएगें अमरता की कुंजी हमारे हाथ होगी। कुछ शोधार्थी गुणसूत्रों पर काम कर रहे हैं जिसमें एक हिस्सा टीलोमीयर उम्र बढ़ने के साथ ही घिसता जाता है। प्रयास यह है कि इस हिस्से को घिसने न दिया जाए और मनुष्य को चिर युवा बने रहने दिया जाए।

पुराणों की हमारी सोच आज विज्ञान की नई खोजों को दिशा दे रही है।

पुनश्च: मित्रों अब क्वचिदन्यतोपि की व्याप्ति नवभारत टाइम्स आनलाईन पर भी है!   

मंगलवार, 27 मार्च 2012

पुराण कथाओं में झलकता है भविष्य(1)-मन से चालित विमान सौभ!

आज से यह नई श्रृंखला. बीच बीच में दुनियावी  बातें और लीला भी चलती रहेगी . अक्सर हम लोगों को कहते सुनते हैं कि यह नई खोज यह नई जुगत तो हमारे यहाँ वेदकाल से ही रही है .लोग विमानों पर घूमते घामते थे ,लड़ाईयों में स्वचालित आयुधों का इस्तेमाल करते थे ,पल भर में एक जगहं से दूसरी जगहं की यात्राएं कर लेते थे ....ये पश्चिम वाले जो आज खोज रहे हैं वह तो हमारे यहाँ हजारो साल पहले से ही था ...मेरा भी यही मानना है मगर सोच का अंतर बस यही है कि ये चीजें बस लोगों की कल्पनाओं में ही विद्यमान थीं ...इनका कोई भौतिक वजूद नहीं था ..क्योकि उन दिनों आज जैसी प्रौद्योगिकी उपलब्ध नहीं थी ....अब पत्थर युग में प्रौद्योगिकी के नाम  पर बस विविध उपयोगों हेतु तराशे पत्थर ही तो थे ....तब नैनो टेक्नोलोजी थोड़े ही थी ...मगर हाँ ,सोच के मामले में भारतीयों की कोई सानी नहीं थी ..भले ही वह एक अरण्य सभ्यता थी मगर हमारे पुरखे ,ऋषि गण अपनी सोच और कल्पनाओं के मामले में बहुत आगे थे ..वे बीन  बीन कर दूर की कौडियाँ लाकर सहेज रहे थे  ताकि भविष्य के उनके वंशधर उन कल्पनाओं का सहारा ले कोई चमत्कार कर सकें ...और आज सचमुच हमारे पास वह उपयुक्त प्रौद्योगिकी है जो अगर पुरखों की कल्पनाओं से संयुक्त हो जाय तो हमारे सामने एक सर्वथा अनोखी दुनियाँ,एक आश्चर्यलोक उपस्थित हो जाए -वैसा ही जैसा की विज्ञान कथाओं में वर्णित है ...इसलिए मैं अक्सर कहता हूँ कि हमारी पुराकथाओं और आज की विज्ञान कथाओं में कई साम्य हैं ...यह एक लंबा और विषद विमर्श है आईये तब तक आपको हम एक कथा सुनाएँ ...
सौभ!एक परिकल्पना!
शिशुपाल की याद तो आपको होगी ही ...अरे वही वाचाल शिशुपाल जिसका वध कृष्ण ने किया था ...उसी शिशुपाल का एक मित्र था शाल्व ...उसने एक बार प्रतिज्ञा की थी कि वह धरती से यदुवंशियों का नाश कर देगा ..अपनी प्रतिज्ञा को पूरी करने के लिहाज से उसने भगवान् शंकर को प्रसन्न  करने के लिए घोर तप किया.. भोले भंडारी प्रसन्न हो गए ..वर मांगने को कहा ..शाल्व ने  शंकर से एक ऐसे विमान की मांग की जो अजेय हो और जो मन द्वारा नियंत्रित होता हो यानी मन से संचालित होता हो ...एवमस्तु! शंकर ने कहा और सौभ नामक विमान उसके हवाले कर दिया ..जिसे कुशल शिल्पी मय नामक दानव ने तैयार किया था ..यह एक मायावी विमान था ...जो अदृश्य भी हो सकता था और अँधेरे में केवल शाल्व को दिखता था इसी विमान में बैठ कर उसने यदुवंशियों से भयंकर युद्ध छेड़ दिया ....द्वारिकावासी घबरा उठे ...श्रीकृष्ण थे नहीं, वे युधिष्ठिर के साथ राजसूय यज्ञ में शामिल होने के लिए इन्द्रप्रस्थ आये हुए थे ...अब शाल्व से भिड़ने की जिम्मेदारी प्रद्युम्न पर थी ...भयानक युद्ध हुआ जो २७ दिनों तक चलता रहा ...सौभ जैसे मन चालित विमान के चलते शाल्व को हराना मुश्किल था ...आखिर कृष्ण के लौटने पर सौभ विमान उनके युद्ध कौशल के आगे विनष्ट हो गया और शाल्व मारा गया ....

अब देखिये आज मन के सहारे मशीनों का संचालन संभव  होता दिखायी दे रहा है ...आप विश्वविख्यात टाईम पत्रिका की यह रिपोर्ट पढ़िए ..जिसमें मन की बीटा तरंगों के संकेन्द्रण और एक जुगत 'द बाडी वेव' के सहारे कम्प्यूटर पर कमांड देना संभव  हो गया है ....ओंटारियो(अमेरिका ) की  पावर जेनेरेशन न्यूक्लियर प्लांट के कई वाल्वों को मात्र मन की बीटा किरणों के सहारे खोलने की करामात वहां के एक प्रबन्धक ने कर दिखायी ....इन बीटा तरंगों को कम्यूटर तक ट्रांसमिट करने का काम आई पाड सरीखी एक जुगत करती है जिसे कलाई में बान्ध दिया जाता है ...इस प्रविधि के और विकसित होने पर घर बैठे मन के कमान्ड से ही  कई कामों को अंजाम दिया जा सकेगा ..चाहे वह आफिस से घर के काम काज हों ..या युद्ध के मैदान में बमों का प्रहार -बस सोच भर लीजिये काम पूरा ...

अब कोई यह कहे कि अरे यह जुगत तो हमारे यहाँ पहले से ही थी ...सौभ विमान नहीं था? आपकी क्या प्रतिक्रया  होगी तब ? 

शनिवार, 24 मार्च 2012

चिट्ठाकार चर्चा की नीरवता को तोड़तीं अमृता तन्मय!

बहुत दिन बीते चिट्ठाकार चर्चा में  किसी सुधी  चिट्ठाकार की चर्चा नहीं हो पाई ..एक नीरवता सी छाई रही है यहाँ...यह नीरवता अकारण  नहीं है ...एक तो शायद वह शुरुआती उमंग रोमांच नहीं रहा ब्लागिंग का -अर्थशास्त्र के ला आफ डिमनिशिंग रिटर्न की भांति इस विधा की अब वह शुरुआती चाहना नहीं रही और कुछ इस  टैब्बू से मैं आशंकित रहा जिसमें एक मोहतरमा लागर  ने सरे आम मुझे यह कह डाला  था कि मैं जिसे भी चिट्ठाकार चर्चा में शामिल करता हूँ उससे मेरे सम्बन्ध ख़राब हो जाते हैं -मुझे भी हैरत हुयी जब मैंने सिंहावलोकन में आंशिक रूप से इस बात को सच पाया . मैं इतना ही कहूँगा कि मानव जीवन ,भावनाएं और व्यवहार बहुआयामी और बहुत जटिल हैं ...अब किसी की प्रोफाईल को सम्मिलित करने का मतलब यह भी नहीं कि उसके साथ मेरा कोई सप्तपदी का अनुबंध हो गया और मैं आजीवन उससे बड़ा ही उदारतापूर्ण, सहिष्णु सम्बन्ध बनाए ही रखूँ ...और सारी बात का ठीकरा मेरे ही सर पर फोड़ दिया जाय यह भी कहाँ का न्याय है ....दूजे यह बात भी है कि कुछ ऐसे भी मित्रगण रहे हैं जिनसे मेरे टाप के और गहन सम्बन्ध रहे मगर उन्हें मैं अन्यान्य कारणों से अपने इस प्रिय स्तम्भ में नहीं ले पाया हूँ -कुछ तो ब्लागजगत को भी छोड़ चुके हैं और इस धरा पर कहाँ हैं अब यह भी नहीं मालूम -गुमनामी की अंधियारे में खो गए ..और मुझे बच्चन जी की यह सीख याद कराते रहते हैं,जो बीत गयी से बात गयी ...और नीड़ का  निर्माण फिर फिर .....ओह प्रस्तावना इत्ती लम्बी क्यों हो रही है ..लाजिमी है इतना दिन का अंतराल रहा है जो ...मगर आज उस अंतराल की पूरी भरपाई करने ब्लागजगत की एक खालिस कवयित्री आयी हैं ....अमृता तन्मय....

मगर किंचित संकोच भी है कि चिट्ठाचर्चा में इस चिट्ठा -कवयित्री को शामिल करने की सहमति/अनुमति उनसे नहीं ले पाया ....क्योकि उनसे संपर्क का कोई सूत्र नहीं मिला ..उनका ब्लॉगर  परिचय पृष्ठ केवल उनका नाम बताता है और वह भी शायद उनका काव्य नाम है ,वास्तविक नहीं ..फिर उनका जेंडर फीमेल बताता  है और लोकेशन पटना, इण्डिया बताता है ...आशा है ये विवरण सही हैं ...उन्हें चिट्ठाकार चर्चा  में लेने का एक  गूढार्थ भी है -अब चूंकि उनसे कोई खतो किताबत,चर्चा परिचर्चा नहीं है इसलिए सम्बन्ध खराब होने की संभावना भी नहीं है ...और यह भी कि इस तरह मेरे इस स्तम्भ से जुडा टैब्बू ख़त्म हो जाय सो इस कवयित्री का यहाँ शामिल होना  एक शुभकारी टोटका -अनुष्ठान भी है ....

मेरी हे कवयित्री कविता आपने पढी होगी ..उससे दीगर अगर कुछ कवयित्रियाँ यहाँ है तो उनमें एक अमृता तन्मय भी है ...इनकी कविताओं में मैंने श्रृंगार  वियोग से अलग का फ्लेवर पाया है और वह इनके काव्यकर्म को एक पृथक पहचान देता है -आध्यात्मिक भाव का संस्पर्श  ...और प्रकृति के कई बिम्बों को लेकर भावाभिव्यक्ति! उनकी यह ताजी कविता, बस  कोई   पढ़ते ही मन में सहसा ही कौंधा कि क्यों न मैं इस काव्य कर्म प्रवीण कवयित्री का सादर आह्वान यहाँ अपने इस लम्बे समय से नीरवता ओढ़े स्तम्भ में करूं.. आलोच्य कविता में एक बहुव्यापी रिक्तता की ओर कविमन संकेत करता है -मतलब कहीं न कहीं कोई, कुछ सूक्ष्म सी  अपूर्णता है जो सम्पूर्णता के, समुच्चय के सुख की चरमता को हठात रोके हुए हैं  ..अगर वह सूक्ष्म अपूर्णता पूरी हो जाय तो बस बात ही बन जाय ..यह एक अकेली कविता ही कवयित्री के काव्य कर्म को  एक समादृत स्थान दिलाने में समर्थ है -इसमें भाव प्रवणता तो है ही मगर शिल्प और साहत्यिक बोध के आधार पर भी यह एक अद्भुत और लम्बे समय तक याद रखी जाने वाली कविता है .....

मेरे पूर्व के चिट्ठाकार चर्चा में व्यक्तित्व निरूपण को एक अनिवार्य घटक के रूप में लिया जाता रहा है ..मैंने स्वीकार किया है कि चिट्ठाकार चर्चा की अभ्यर्थता में मात्र कृतित्व ही नहीं व्यक्तित्व का  समावेश मेरे लिए अपरिहार्य रहा है ...मगर आज की चिट्ठाकार चर्चा इस अर्थ में भी अपवाद है ..मुझे कवयित्री के व्यक्तित्व का कुछ अता पता नहीं ...मात्र किसी के रचना कर्म से उसके व्यक्तित्व का निरूपण एक जोखिम भरा  काम है और ऐसा कोई जोखिम उठाने का कोई मतलब भी नहीं ...एक आशंका  भी रहती है कि महान कवि कवयित्रियों में कृतित्व और व्यक्तित्व का साम्य प्रायः  नहीं पाया गया है ....और ऐसी कोई प्रत्याशा भी शायद अनौचित्यपूर्ण है ....वो देशी कहावत है न -आम खाने से मतलब होना चाहिए आम के  पेड़ से नहीं!

अमृता तन्मय को मैंने चिट्ठा कवि लिखा है -मतलब वे ब्लागजगत में और शायद  अन्यत्र भी किसी अन्य विधा में योगदान नहीं कर रहीं ,यहाँ  तक कि अपने काव्य चिट्ठे पर आयी टिप्पणियों का जवाब भी  नहीं देती..महज कवितायें ही लिखती हैं.. यही उनका मुख्य व्यसन /टशन है . और हाँ वे क्वचिदन्यतोपि की नियमित पाठिका हैं ..और इसलिए भी मेरी कृतज्ञता आखिर उनके प्रति क्यों न हो ....

अन्य ब्लागों पर भी अमृता की  सार्थक अभिव्यक्तिपूर्ण टिप्पणियाँ देखने को मिलती रहती हैं ...वे एक सजग पाठिका भी हैं ..केवल आत्मकेंद्रित, आत्म मुग्धा ब्लॉगर ही नहीं ....मैं उन्हें उदीयमान कवयित्री कहने से हिचक रहा हूँ क्योकि मेरी दृष्टि में वे काव्य कर्म के उस  मुकाम पर पहुँच गयी हैं जहां किसी को महज उदीयमान कहना उचित नहीं .....वे लम्बे समय से ब्लागजगत में अविकल साहित्य सेवा कर रही हैं और आपमें से अधिकाँश उनके  काव्य लालित्य से परिचित भी होंगे ....मैं अमृता की कई कवितायें आपको  पढाना चाहता हूँ मगर उन्होंने अपने ब्लॉग पर ताला जड़ रखा है -मैं कापी पेस्ट नहीं कर  पा रहा हूँ ...मगर सर्दियों में उनकी लिखी  एक और कविता  पढने की जोरदार सिफारिश करते हुए इस संभावनाशील कवयित्री के काव्य कर्म के आस्वादन  का आह्वान करता हूँ ....
शुभकामनाएं अमृता!  



मेरी ब्लॉग सूची

ब्लॉग आर्काइव