रविवार, 14 मार्च 2010

टिप्पणी प्रसंग -पंचों का फैसला

जी हाँ ,टिप्पणी प्रसंग पर पंचो का फैसला आ गया है.जिसका सार संक्षेप और संकलन जरूरी लगता है . किसी भी ब्लॉग-पोस्ट पर की गयी टिप्पणियाँ उस ब्लॉग मालिक के हवाले हो जाती हैं और वह उनके साथ दुर्भाग्यवश "मार दिया जाय या छोड़ दिया जाय'' की ही तर्ज पर  छाप दिया जाय या छोड़ दिया(रिजेक्ट) जाय जैसा जो भी सलूक करना चाहे स्वविवेकानुसार कर सकता है -आशय यह कि किसी भी ब्लॉग पोस्ट पर टिप्पणी करने के बाद टिप्पणीकर्ता का न तो कोई अधिकार रह जाता है और न ही कोई भूमिका ,टिप्पणी करने के बाद टिप्पणी पर उसका कोई बस नहीं है .दिक्कत उन ब्लागों पर है जहां माडरेशन लगा है -आपने  टिप्पणी की और बाद में ब्लॉग स्वामी इनकार कर दे कि पकी टिप्पणी तो मिली ही नहीं थी .....  तो आप बस अपना सा मुंह लेकर रह जायेगें (प्रशान्त प्रियदर्शी ठीक कहते हैं कि अब नैतिकता की बात तो उठाना ही नहीं चाहिए ) ...और चूंकि उसे आपने  सेव /सुरक्षित नहीं किया है तो फिर वह विचार ,शब्द चयन -संयोजन और वाक्य रचना गयी काम से! याददाश्त  कभी भी अच्छी साथी नहीं होती ऐन  वक्त पर साथ छोड़  सकती है - ऐसे ही स्थिति से विगत दिनों मैं गुजरा जब सबसे पहले एक ब्लॉग पर मेरे विचार से  सटीक टिप्पणी करने के बाद भी वह नहीं छापी गयी क्योकि वह ब्लॉग ओनर के पोस्ट की प्रस्तुति  के प्रतिकूल थी -लोग यह तो बहुत कहते हैं कि असहमति की भी सहमति होनी  चाहिए -मगर यह  ज्यादतर लोगों के लिए एक रेटरिक ,एक लफ्फाजी के सिवा कुछ नहीं है -मैंने सम्बन्धित ब्लोगर को मेल करके पूरी शिष्टता से अपनी अप्रसन्नता दर्ज की कि आखिर मेरी टिप्पणी को इतने लम्बे समय तक माडरेशन में क्यूं रखा जा रहा है तो मुझे यह मौलिक सुझाव् दे दिया गया कि मैं चाहूं तो अपने ब्लॉग पर एक पूरी पोस्ट लिख कर उनके ब्लॉग की अंतर्वस्तु का विरोध कर सकता हूँ .लीजिये जनाब अब आपका ब्लॉगर की पोस्ट को ध्यान से पढना (सौजन्यता  को तो मारिये गोली ),फिर   ध्यान केन्द्रित करके टिप्पणी लिखना ,विचार ,शब्द चयन ,वाक्य विन्यास सब गया काम से ....अब भई गजल के शेर कहाँ रोज रोज होते हैं ? 

एक समर्पित टिप्पणीकार के लिए उसके अल्फाज और भाव किसी भी तरह कमतर नहीं होते -टिप्पणी करने के पीछे के श्रम ,समय और समर्पण  को भी समझना चाहिए!और ब्लॉग स्वामी का यह शिष्टाचार ,औदार्य तो होना ही चाहिए कि वह टिप्पणीकर्ता को यदि उसकी टिप्पणी प्रकाशित नहीं कर पा रहा है तो उसे एक विनम्र औपचारिक जवाब के साथ वापस कर दे -जैसे कि पुराने ज़माने के संपादकों द्वारा अस्वीकृत रचनाएँ कतिपय औपचारिक रिजेक्शन स्लिप के साथ वापस  कर दी जाती थीं .यह सौजन्यता अपने टिप्पणीकार के प्रति आपकी सदाशयता भी तो इंगित करेगी.देखिये अंतर्जाल युग के कितने ही  सुनहले नियम कायदे अभी भी बनने शेष हैं या तो अनंतिम दौर में हैं -आईये हम उन्हें अंतिम रूप देने में पहल करें! हिन्दी ब्लॉग जगत अब सक्षम है कि कुछ सुनहले नियमों को अपनाए और आने वालों के लिए भी एक आदर्श आचार संहिता को मूर्तमान करे -हम टिप्पणी के मामले में आईये एक ऐसी ही शुरुआत करें .

टिप्पणियाँ चिट्ठाकार को भी नियमित और मर्यादित करने/रखने /रहने  की क्षमता रखती हैं -कहीं  अंकुश  बनती हैं तो कहीं सचेतक भी लगती हैं .नहीं तो कई चिट्ठाकार निरंकुश ही न होते  जायं? मेरी दो टिप्पणियाँ ब्लॉग मालिको पर इतनी भारी पड़ गयीं कि उन्हें अपनी पूरी पोस्ट ही डिलीट करनी पड़ गयी -अब पुनः संदर्भ देकर मैं कोई वितंडावाद नहीं शुरू करना चाहता मगर मुझे इस बात का अफ़सोस जरूर हैं  कि मेरे पास अब वे ऐतिहासिक  टिप्पणियाँ(बात रखने के लिए निर्लज्ज आत्मप्रशंसा ही सही )  सुरक्षित नहीं हैं,याद कर भी उन्हें वापस लाना मुश्किल हैं - गेहूं के साथ घुन बन पिस गयीं वें ! मगर हाँ इसी विमर्श से उन्मुक्त जी द्वारा यह एक साईट सुझा दी गयी है जिसे मैंने अपना भी लिया है और जोरदार सिफारिश है कि जो भी अपनी टिप्पणियों पर जान  छिडकते हैं उन्हें इस साईट पर जाकर पंजीकरण करा लेना चाहिए! समीर भाई तो संत हैं! नेकी कर दरिया में डाल और परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर वाली परम्परा के सचमुच !

अब आईये पंचों के कुछ प्रमुख अंगुलि निर्देशों की एक पुनश्चर्या कर ली जाय ,विस्तार से देखने के लिए विगत पोस्ट की टिप्पणियों का  कृपया संदर्भ लें -वैसे पूरी बतकही ही संदर्भणीय है -वादे वादे जायते तत्वबोधः की ही परम्परा में ....

बेचैन   आत्मा ने जैसे मेरे मुंह की बात  छीन ली हो - 
"टिप्पणियाँ अमूल्य होती हैं. किसी कहानी, कविता, लेख या दर्शन को पढ़कर तत्क्षण उठाने वाले विचार हैं जिसे पढ़ने वाले ने उसी वक्त अभिव्यक्ति दी है..वह दूसरे दिन, दूसरे मूड में पढ़े, तो जरूरी नहीं कि वही लिख पायेगा जो उसने पहले लिखा था. इसलिए इसे मिटाना नहीं चाहिए . हाँ, लेखक को लगे कि उसने गलत लिखा है तो वह स्वयं मिटा सकता है."

"मोडरेशन की दशा में आप ब्लॉग पोस्ट के कंटेंट पर अपने विचार रखते हुए उसे लिंक कर अपने ब्लॉग पर अपनी आपतियां रखें वह अधिक उचित होगा."

"कई ब्‍लाग पर यह लिखा होता है कि आफ्‍टर अप्रूवल आपकी टिप्‍पणी पोस्‍ट की जाएगी। तब मुझे लगता है कि ऐसी स्थिति में वो टिप्‍पणी उस टिप्‍पणीकार के पास वापस भेज देनी चाहिए ना कि उसे डिलिट कर देना चाहिए।"
"....हालांकि हटाई गई टिप्पणी को उसी समयकाल में पुन: रोपे जाने का तकनीकी इलाज़ है, किन्तु सोचता हूँ कहीं यह गलत तो नहीं!"

'Be careful before falling for someone!'(किसी पर मर मिटने के पहले सावधानी बरतिए!अर्थात ....ऐसे ही मत जान /टिप्पणियाँ छिड़कते  रहिये चहुँ ओर )

"अगर टिप्पणीकार को लगता है कि उसका लिखा इतना ही महत्वपूर्ण है तो वह भी इसे सेव करके रख सकता है.. अगर टिपण्णी लिखने वाले ही उसे लेकर इतना परवाह नहीं कर रहे हैं तो पोस्ट लेखक भला क्यों करे?"

"टिप्पणियों की प्रति रखने का आइडिया जोरदार है। इसपर विचार किया जा सकता है।"

"टिप्पणियाँ साहित्यिक सृजन है । उन्हें सहेज कर रखना चाहिये । कोई विधि हो जिससे आपके द्वारा की गयी टिप्पणियाँ एक जगह एकत्रित रह सकें।"

"...मगर यहां मैं इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखता कि टिप्पणियां सिर्फ़ हमारी होती हैं ....मेरे ख्याल से तो यदि एक बार हमने उसे प्रकाशित कर दिया तो फ़िर गया वो मालिकाना हक ...."

"अरे भाई इसपर क्या कहें , ये तो ब्लॉग स्वामी की मर्जी !
पर अगर कोई इसकदर दिल से लिखा हो , तो दुःख होगा ही "

"-बस, टिप्पणी कर, गंगा में डाल- और भूल जाओ. "

१- जिस भी ब्लॉग में टिप्पणी का विकल्प है, ब्लॉग मालिक उसमें पोस्ट लगाने व टिप्पणी पाने के बाद उसे न हटाये, यदि ऐसा करता है तो अगली पोस्ट में कारण जानने का हक तो हो ही पाठकों को।
२- दूसरा अहम मुद्दा है पोस्ट को एडिट करने का, अगर आप बारीकी से देखें तो कुछ लोग क्या कर रहे हैं कि पोस्ट लिखी एक मुद्दे पर...स्टैंड लिया...और फिर कुछ समय बाद उसे इतना एडिट कर दिया कि नया मतलब पहले का बिल्कुल उलटा हो गया...फंस गया न बेचारा पाठक टिप्पणीकार!...ऐसा नहीं होना चाहिये!
३- और उन लोगों का क्या किया जाये जो दूसरों की पोस्टों पर पहले तो टिप्पणी देते हैं...फिर कुछ समय बाद उसे वहाँ से हटा देते हैं... क्योंकि या तो मामला सुलझा लिया बात करके या उन्हें लगता है कि दी गई टिप्पणी से उनकी इमेज को नुकसान पहुंच सकता है।... ऐसा भी कतई न हो!

१ - टिप्पणी का स्वामी, टिप्पणी करने वाल होता है। यह उसी का कॉपीराइट है।
२ - किसी चिट्ठी में कौन सी टिप्पणी प्रकाशित हो यह वह चिट्ठी रहे या मिटा दी जाय यह अधिकार चिट्टा स्वामी का ही है। इस पर कोई अन्य आपत्ति नहीं कर सकता है। हां यह जरूर है कि वह उस विषय पर अपने चिट्टे पर लिख दे।
.....टिप्पणी का स्वामी तो टिप्पणीकर्ता है पर यदि किसी चिट्ठी पर कोई टिप्पणी प्रकाशित हो जाती है तो उस टिप्पणी का दायित्व चिट्ठा मालिक का भी है। यानि कि, यदि कोई किसी चिट्ठी पर टिप्पणी द्वारा किसी की निन्दा करता है और वह टिप्पणी किसी के चिट्ठे पर प्रकाशित हो जाती है। तो निन्दा का दायित्व न केवल उस टिप्पणी कर्ता का है पर उस चिट्टा स्वामी का भी है।

"बॉई दॅ वे, मुझको इसे पोस्ट-लेखक का भूल सुधार मान लेने में कोई बुराई नहीं दिखती । ....
पर.. उन पोस्ट और ब्लॉगमालिकों का क्या, जो कईयों की टिप्पणी गड़प कर जाते हैं, डकार भी नहीं लेते ।"

"जब पोस्ट ही नहीं रही..तो कमेन्ट कि क्या बिसात."

"उन्मुक्त जी की टिप्पणी सबसे सटीक लगी और आपका ये कहना कि "टिप्पणीकार की मानस पुत्र और पुत्रियाँ है टिप्पणियाँ"...
 अन्य जिन सभी महानुभावों ने इस चर्चा /टिप्पणी विमर्श में भाग लिया मैं उन सभी का ह्रदय से कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ .









शुक्रवार, 12 मार्च 2010

वापस कीजिये प्लीज मेरी टिप्पणियाँ !

अब वे टिप्पणियाँ कैसे लौटेंगी जो उन डीलीटेड पोस्ट्स के साथ दफ़न हो गईं ? मैंने और आप सब ने भी  अगर ये दुनिया है तो कैसी दुनिया है-काव्य मंजूषा और स्प्लिट सेक्स चिकेन -स्वप्न दर्शी पर कल   टिप्पणियाँ की थीं मगर आज ये दोनों पोस्ट ब्लॉग मालिकों /मालिकाओं  द्वारा हटा  दी गयी हैं -मुझे उन पर की गयीं अपनी टिप्पणियों के दफ़न हो जाने का बहुत दुःख है -कृपया इसे कोई व्यक्तिगत मुद्दा न मानकर इन बिन्दुओं पर विचार करना चाहें-

हो सकता है कि किसी ब्लॉग ओनर ने अन्यान्य कारणों से अपनी पोस्ट डिलीट कर दी हो -यद्यपि यह गतिविधि  कई प्रश्न उठाती है -हो सकता है प्रश्नगत पोस्ट बहुत सुविचारित न रही हो ,आई हुई टिप्पणियों से उसकी कमियाँ उजागर हो गयी हो ,कोई तथ्यात्मक भूल हो गयी हो ,जवाबदेही की स्थिति बन गयी हो और फिर अगर पोस्ट हटानी ही है तो फिर लिखी ही क्यूं जाय ? मगर यह जवाब देही और शिष्टाचार का तकाजा तो बनता ही है ब्लाग ओनर का कि वह टिप्पणीकारों को सूचित करे कि  कतिपय अपरिहार्य कारणों (हम यह यह पूंछ पछोर नहीं करेगें भाई -आखिर शिष्टाचार भी कोई चीज है ) से मेरी अमुक पोस्ट हटाई जा रही है और आप चाहें तो हम आपकी टिप्पणियाँ वापस कर दें!ऐसा तो हुआ नहीं बस पोस्टें डिलीट कर दी गयीं और उन्ही के साथ टिप्पणियाँ भी दफ़न हो गयीं! शिष्ट दुनिया में हम रहते हैं तो इतनी जिम्मेदारी हमारी बनती है कि पोस्ट डिलीट करने जैसे  अतिवादी कदम उठाने पर भी हम  टिप्पणियों को बिना टिप्पणीकारों से पूंछे दफ़न न करें!अपनी पोस्ट को चूल्हे भाड़ में डालें या  डिलीटेड पोस्ट पर मर्सिया करें मगर टिप्पणियाँ किसी और की अमानत  हैं और अमानत में खयानत यहाँ ब्लॉगजगत में अभी तक कोई कानूनी  अपराध(साईबर क्राईम ) भले न हो नैतिक अपराध तो है ही !

टिप्पणियाँ भी एक सृजनकर्म  है -अगर मुख्य सृजन नहीं तो कोई गौंड भी नहीं -ब्लॉगजगत में चर्चा,प्रतिचर्चा और परिचर्चा की बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं टिप्पणियाँ -उनकी उपेक्षा कतई उचित नहीं हैं और नहीं उन्हें घूर घाट के किनारे लगाने की प्रवृत्ति होनी चाहिए .वे किसी भी तरह इतनी उपेक्षनीय नहीं हैं -टिप्पणीकार की  मानस पुत्र और पुत्रियाँ है टिप्पणियाँ! उनकी इतनी बेकद्री मुझे तो कतई रास नहीं आई!स्वप्नदर्शी ने नर नारी में लैंगिक  समानता दर्शाने की सक्रियता और उत्साह  में पक्षियों -मुर्गों में लैंगिक निर्ध्रारण के एक उपर्युक्त वैज्ञानिक शोध को संदर्भित किया और जब मैंने टिप्पणी में यह बताया कि स्तन पोषी प्राणियों में जिसमें मनुष्य भी है ,लैंगिक निर्ध्रारण चिड़ियों से भिन्न है तो वह टिप्पणी तो छोडिये पूरी पोस्ट ही डिलीट कर दी गयी! क्या एक वैज्ञानिक से यही अपेक्षा है कि वह सार्थक चर्चा करने के बजाय इस तरह के थर्ड ग्रेड पर उतर आये?पूरी पोस्ट ही डिलीट कर देना अपनी इमेज बचाए रखने का  'क्राईसिस कंट्रोल'  तो नहीं है ? हम विदेशों से अप संस्कृति तो सीख रहे हैं मगर वहां के कुछ सार्थक बातें क्यूं नहीं सीखते ? या हम अपने हिन्दी जगत  और गोबर पट्टी को हमेशा ऐसे ही डील करने के आदी हो गए हैं? वहां कोई भी वैज्ञानिक ब्लॉगर अपनी गलती मानने में ज़रा भी नहीं हिचकता ओर पूरी सहिष्णुता से टिप्पणी पर चर्चा करता .आभारी भी होता .मगर यहाँ तो हमें हमारी टिप्पणियाँ बिना हमारी अनुमति के डिलीट कर हमें अपने  गोबर पट्टी के होने की औकात बता दी गयी है!

इस पोस्ट के माध्यम से जहाँ मैं गला घोट कर अकाल ही दफ़न की गयी अपने टिप्पणियाँ सम्बन्धित ब्लॉग मालिकों से वापस मांगने -उन्हें पुनर्जीवित करने की मांग करता हूँ वहीं यह मुद्दा भी आप सुधी  जनों के पास विचार विमर्श के लिए छोड़ता हूँ -आगे से मैं महत्वपूर्ण -नाईस टाईप को छोड़कर, टिप्पणियों की  एक प्रति सुरक्षित रखने का भी ख़याल रखूंगा !

क्या मुझे मेरी टिप्पणियाँ वापस मिलेगीं? वापस कीजिये प्लीज मेरी टिप्पणियाँ !



मंगलवार, 9 मार्च 2010

फागुन के दिन चार बीत गए रे भैया

फागुन बीत गया -मनुष्य की चिरन्तन श्रृंगारिकता को उत्प्रेरित और आलोडित करके चला गया .अब अगले वर्ष फिर लौटेगा! कितना उत्सव प्रिय है मनुष्य आज भी ,मगर यह बात लोक जीवन में ही आप ज्यादा अनुभव कर सकते हैं.  बढ़ता  नागरीकरण मनुष्य मन को निरंतर आत्मकेंद्रित ,स्वार्थी और व्यक्तित्वहीन ही बनाता गया है -नागरीकरण की प्रेत छाया से गाँव भी बदलते गए हैं मगर वहां आज भी सामाजिक जीवन की जीवंतता,साझे सरोकार उत्सवों के आयोजन में देखने और खूब देखने को मिलते हैं -ऐसे ही एक पारम्परिक लोकोत्सव से कल लौट आया मगर मन  अभी भी उन्ही अमराईयों में कहीं बेसुध सा पड़ा है -पीड़ित सा क्लांत सा -"अमवाँ बौर गयल हो रामा ,,,पिया नहीं आये ..." "सेजिया पे टिकुली हेराने हो रामा" की गायन  अनुगूंजे  अभी  भी मन को व्यथित किये हुए है -बार बार लगता है यही वियोग ही श्रृंगार का मूल तत्व है .जो  इस वियोग की चेतना  से संपृक्त नहीं हुआ समझो वह श्रृंगारिकता के सहज बोध से ही प्रवंचित रह गया .लोग कहते हैं यह श्रृंगार उत्सव तो मध्यकालीन विलासिता की ही देंन  हैं -स्मृति शेष है .मुझे दुःख होता है कि लोकजीवन से कटे ये लोग जीवन की जीवन्तता से ही मानो वंचित हो गए हैं -जीवन की मुख्य धारा से ही मानो अलग हो गए हों .

क्या बिहारी और पद्माकर रचित विपुल  श्रृंगार साहित्य निःशेष हुआ ? निरर्थक हुआ ? महानुभावो अगले वर्ष किसी भी होली के लोकोत्सव में भाग लेकर देखिएगा -हाँ भले ही आप अप्रस्तुत से हो जायं मगर आप एक लाईफ टाईम अनुभव तो करके ही लौटेंगे  जैसा कि अभी अभय भाई बनारस से करके लौटे हैं -बताता चलूँ आज भी बनारस और इलाहाबाद कम से कम ऐसे 'आधुनिक ' शहर हैं जो प्राचीनता के कितने ही स्पंदनो को समाहित किये हुए हैं .कन्टेम्पररी क्लासिक -जैसे कुछ चिर नवीन के साथ  चिर प्राचीन भी! आज की कविता प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की पगडंडियों पे चलकर  लोकमानस की मुख्यधारा से ही मानो  अलग थलग पड़ती गयी है -बहुत कुछ बनावटी और मेक बिलीवों से भरी  हुई -आज रीतिकालीन कवियों की कवितायें बृहत्तर मानव जीवन को जीवन्तता दे रही हैं तो कैसे मान  लिया जाय कि वे अप्रासंगिक हुईं -अब रही बात अश्लीलता और श्लीलता  की -आज की नगरी पीढी की तो श्लीलता भी कुंठित होती लग रही है और अश्लीलता भी -उन्हें तो यह भी शायद ठीक से नहीं मालूम की असली अश्लीलता होती क्या है और इस नासमझी में वे उसे अंजाम दे देते हैं -आज भी गाँव में अश्लीलता -श्लीलता का पाठ समाज समझाता है ऐसे उत्सवों के अवसर पर और प्रकारान्तर  से उनकी मनाही भी करता है सरेआम और सकारात्मकता से ...

ये उत्सव सौन्दर्यबोध के उद्दीपनो के सामूहिक कारखाने भी हैं -जीवन से सौन्दर्यबोध गया तो बचा भी क्या -ठेंठ और रूढ़ सा जीवन -आज के मशीनी  जीवन में तो सौन्दर्यबोध के सतत उत्प्रेरण की  और भी आवश्यकता है -बहरहाल इतनी बड़ी प्रस्तावना मैंने आपको एक गायक -श्री नागेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी ,हिन्दी प्राध्यापक ,डॉ भगवानदास इंटर कालेज बघैला जौनपुर द्वारा सुनाये पद्माकर के इस कवित्त के अस्वादन के आमंत्रण के लिए दे डाली है -मैं इसे सुनवा भी सकता हूँ मगर उनके गायन  के दौरान व्यवधान हैं इसलिए फिलहाल कविता से ही संतोष कीजिये और खुद अर्थ समझिये . ज्ञानी जन तो समझ ही जायेगें और आस पड़ोस के भोले लोगों को समझा भी देंगें -फिर भी कहीं कोई संवादहीनता हो तो मुझसे संवाद कर सकते हैं -परमारथ के कारने सधुन धरा शरीर ! 
ऊंचे उसासन सो कहत पड़ोसन से 
मेरे हिय उठत कठोर दुई पाके हैं 
याही सकोचन से कछु ना सोहाय आली 
ऐसो कठोर ये पिरात नहीं पाके हैं 
कहैं पद्माकार न घबराहू ये बाला 
ए रतिजाल वाल पोषक सुधा के हैं 
जाके उर होत हैं पिरात नाहीं ताके उर 
जो इन्हें ताके पिरात उर ताके हैं 
हाय बीत गए ये  दिन चार फागुन के ....

शनिवार, 6 मार्च 2010

इस बार बच गया है अभिमन्यु मगर......

मुझे आज लिखना था साईब्लाग पर ,नर नारी समानता पर अगली पोस्ट मगर मन  इतना व्यथित है कि आज कोई भी सार्थक लेखन नहीं हो सकेगा -तो यह निरर्थक ही सही! मगर खुशी भी  इस बात की है कि इस बार बच गया अभिमन्यु ,वह मरा नहीं है -किस तरह से एक अभिमन्यु   पर कल कितनी ही दुखी -दमित कामनाएं,ब्रिहन्न्लायें और शिखन्डी तथा एक शकुनी मामा/जयद्रथ   टूट पड़े और  जितना कुछ संभव था नोच खसोट कर उसे क्षत विक्षत किया गया .भारतीय संस्कृति का भाष्य दर भाष्य होता रहा! क्या गलत कह दिया मिथिलेश ने कि महिलायें सार्वजनिक स्थलों पर सलीके से कपडे पहना करें -और यह भारतीय महिलाओं के लिए ही क्यों पूरी दुनिया की महिलाओं को लेकर क्यूं  नहीं  एक  उचित हिदायत  है ? कपडे तो सुरुचिपूर्ण होने ही चाहिए! क्यों होने चाहिए कान खोल कर सुन लीजिये, मैं बताता हूँ - कुछ पश्चिमी देशों में अनावृत्त वक्ष की वेटर ग्राहकों को सर्व करती हैं -मगर बाकायदा इसके लिए उन्हें प्रशिक्षित होना पड़ता है कि कि वे अपने   वक्ष अग्रकों को पुरुष ग्राहकों से कैसे बचाती रहें -क्योकि प्रायः पुरुष ग्राहक अचानक और सहज ही उन्हें छूने   के लिए अपने हाथ  बढा देते हैं -इसलिए कि उनके वक्ष अग्रक तीव्र नैसर्गिक उद्दीपन का प्रभाव डालते हैं -व्यवहार विज्ञानियों के शब्दों में उनके वक्ष अग्रक तीव्र "sign stimulus "  हैं जो "stimulas bound response   " के लिए पर्याप्त उद्दीपन देते हैं .

यह  तथ्य है कि नारी के खुले दैहिक क्षेत्र ऐसे तीव्र उद्दीपन उत्पन्न करते हैं -नगरीय मनुष्य इनके साथ रहता हुआ इनके प्रति काफी सीमा  तक असंवेदित होता  जाता है मगर वह भी अनदेखे उघारों पर उद्वेलित हो सकता है .किशोर और युवा तो सहज ही इनके प्रति रिएक्ट करते हैं -तो इसमें कहीं कोई अनुचित बात नहीं है कि पहनावे में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए -अब नारीवादी इन बातों पर हो हल्ला मचाएं तो मचाते रहें -जो वैज्ञानिक तथ्य है वह झुठलाया नहीं जा सकता! जब ड्रेस कोड की बाते होती हैं तो इनके पीछे यही भाव होता है -किसी भी लोक तांत्रिक व्यवस्था में पहनावे पर कोई रोक नहीं है -जो भी पहनना हो पहने -हाँ अपनी रिस्क पर -वेलफेयर स्टेट आपको बचाने हर जगह मौजूद नहीं है!

मुझे पर- मुखापेक्षिता नहीं आती -अपने बड़े सीनियरों से भी लड जाता हूँ -दुरभिसंधियां नहीं बनाता ,बेनामी टिप्पणियां नहीं  करता और इसकी कीमते भी चुकाता रहता हूँ ,बड़ी कीमतें भी -पर जैसा हूँ हूँ मुझे खुद से कभी कोई गिला शिकवा नहीं रहा -मुझे फख्र है कि अपने ऊपर कि मैं किसी भीष्म को मारने में शिखंडी नहीं बनता और न ही अकेले अभिमन्यु के वध के लिए किसी जयद्रथ की भूमिका में रहता हूँ -अब जिन्हें इन बातों पर जितनी लफ्फाजियां सूझे वे मुखर हो उठें जिसे रिझाना चाहें रिझाएँ और शिष्टता का ढोंग करना चाहें करें -मुझे मालूम है कि हमाम में कौन कौन नंगे हैं!

इस बार बच गया है अभिमन्यु मगर जयद्रथ बचेगा या नहीं -देखा जाना शेष है .....

मंगलवार, 2 मार्च 2010

गाँव में होली मनाई और खींच लाये कुछ चित्र !....

 माता जी के निर्देशन में गुंझिया निर्माण  गृह उद्योग
हर बार की तरह इस बार की होली मैंने सपरिवार गांवं में मनाई -यह बात दीगर है कि पिछले बार की तरह इस बार भी छुट्टी बीतने से पहले ही वापस मुख्यालय    यानि  बनारस बुला  लिया गया -मगर खैरियत है .हाँ, कुछ चित्र हैं मेरे साथ जिन्हें मैं आपके साथ साझा कर रहा  हूँ -गांवं की होली भी कई चरणों में होती है -होलिका दहन से रंग खेलने ,अबीर गुलाल लगाने से लेकर भांग की घोटाई और ठंडई की पिलाई तक और बीच बीच में कुछ मनसायन -गायन वादन भी!मुझे याद है वसंत पंचमी के दिन गाँव के छोर पर स्थापित किये  जाने वाले रेंड (अरंड ) के पेड़ पर जहां रंग खेलने के दिन के पूर्व की रात में होलिका दहन होता है हम लोग खांचे -दौरे भर भर कर पत्तियाँ , खर पतवार बटोर बटोर कर लाते थे और एक भव्य होलिका दहन की तैयारी करते थे.....इस बार तो रात में हम जब बाल गोपालों और बड़े  बुजुर्गों के साथ वहां पहुंचे तो पूर्णिमा की रात होने के बावजूद भी वह स्थल ही  नहीं मिला जहां रेड का स्थापित होना बताया जा रहा था -बहरहाल एक स्थल को चिह्नित कर गाँव से पुआल, सरपत ,ईख की सूखी पत्तियाँ मंगाकर रखी गयी -होलिका दहन के लिए -बच्चों को मैंने अपने दिनों की याद दिला कर कोसा कि पुरुषों का पुरुषत्व भले ही ख़त्म होता जा रहा हो तुम लोगों का बचपना कहाँ चला गया है,पत्तियाँ ही बटोर कर रखते  -बहरहाल इस डांट फटकार का नतीजा शायद  अगले वर्ष देखने को मिले .
गुझिया और किसिम किसिम की  होली -खाद्य सामग्री -शहर में  सीखें ,गांवं में बनाएं

होलिका में आग लगाने के पहले कबीर बोलने की परम्परा है जिस  पर पहले लिख चुका हूँ (सिफारिश है ,समय हो तो जरूर पढ़ लें ).दरअसल होलिका  दहन के पूर्व  कबीर बोलने की  परम्परा ही गाँवों की वह सार्वजनिक यौन  उन्मुखीकरण / यौन विषयक  ओपेन शिक्षण -स्थल है जहाँ किशोरावस्था की देहरी पर बस पहुँच रहे बच्चों को यौनिकता की ओर इशारा कर  मानो जता  दिया जाता है कि मानव जीवन में यौनिकता का भी एक अहम् रोल है -और इसके प्रति अनावश्यक शील संकोच कुंठाओं को जन्म दे सकता  है! तो कबीर में गाँव के प्रमुख लोगों ,जोड़ों से जोड़ते हुए यौनिक उद्भावनाएँ गीतों के जरिये खुल्लम खुल्ला व्यक्त होती हैं -और गाँव के दलित तक को भी पूरी छूट  मिलती है कि वे गांवं के कथित संभ्रांत और उच्च वर्ग के लोगों के यौन जीवन में ताक झाँक कर मनचाही फंतासियाँ कह बोल सकें -प्रगटतः तो यह सब  "अश्लील" सा लगता है और हम आज भी कबीर  सुनने में  शील संकोच से गड से जाते हैं -निःशब्द हो उठते हैं मगर वहां उपस्थित बच्चों -किशोरों को देख अपना अतीत भी याद आ  जाता है कि किस तरह बड़े बूढों के  सामने ही सुने गए 'कबीरों' के चलते   अगले कुछ दिनों तक हम उनसे   नजरें चुराते फिरते थे-पर इस सार्वजनिक व्यवस्था के प्रति एक आभार बोध भी है कि हमें यौनिक विषयों की जुगुप्सा यहीं से प्राप्त हुई -और इसके चलते भी बहुत कुछ सहज सामान्य  सा रहा कालांतर के जीवन में -यहाँ उन 'अश्लील' उद्धरणों को तो नहीं दिया  जा सकता -यह तो "सुनतै बनत बतावत नाहीं "जैसा अनुभव ही है!  इस बार कबीर गाने वाले भी कोई ख़ास नहीं रहे -अपने जमाने के बिज्जल चमार की याद आई जो होलिका दहन के लिए ५०० मीटर  दूर पर स्थित अपने घर से निकलते ही कबीरा स र र र र र की तान छेड़ देते और बिना उनके आये होलिका   नहीं जलती थी ....हाँ होलिका के जल जाने के बाद सब कुछ सुस्वप्न /दुस्वप्न सा हो जाता था -बात आई गयी हो जाती थी ..फिर कोई किसी को कबीर नहीं  बोल सकता था ....मेरी भी इच्छा ब्लागजगत के कुछ ऐठू -तुनक मिजाज मगर प्यारे  से लोगों को कबीर बोलने की हो आई है मगर होलिका तो जल चुकी ..चलिए अगली बार .....हा हा ...

 एक घूमंतू गायक टोली 

दूसरे दिन  बच्चों के साथ हुडदंग भी किया -नतीजतन आज भी शरीर का पोर पोर दुःख रहा है .हमने गीत गायन की बैठकी में भी भाग लिया -मनोज के निर्देशन में होली -चैता  गायकी का एक जज्बा यहाँ  देख सकते हैं .ठंडई पीया और थोडा भांग भी खाई -नशा नहीं हुआ -कौन जाने भांग ही  नकली  न रही हो!... और  फिर बैतलवा शाख पर यानि बनारस  वापस आ चुका हूँ!
होलिका जलने के पहले और नीचे जलने पर .....

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

वाह रे दिल्ली -आखिर बन ही गए न बुडबक! (यात्रा संस्मरण समापन किश्त)

 २४ फरवरी ,२०१० अपराहन 
कार चालक ने जाते जाते बता दिया था कि सर ये सामने कई बैंकों के ऐ टी एम की कतार है अगर किसी का वेट करना है तो यहाँ बुलाना आसान रहता है .गरीब रथ तो  ५.५० पर थी और अभी भी ३ बज रहा था .पराठा पच चुका था और जोरों की भूख लग आई थी -राजेश जी ने शिष्टता वश खाने का आग्रह किया  था और मैंने उतनी ही अतिरिक्त शिष्टता से उसे अस्वीकार कर दिया था -किंचित मिथ्याचार भी कि खाना हम खाकर ही निकले थे-वैसे मनीष के यहाँ का पराठा और सेवईं एक तरह से ब्रंच (ब्रेकफास्ट +लंच )  ही तो था . मगर भूख तब और लग आई जब नई दिल्ली स्टेशन के ठीक सामने और ऐ टी अम की कतार में ही एक रेस्टोरेंट के मीनू पर नजर गयी .यहाँ खाने वालों की कतार लगी थी -मीनू में पनीर के कई प्रेपरेशन अपनी ओर खींच रहे थे-मन  हो आया कि  बटर पनीर खाया जाय और साथ में बटर नान -यम यम! रहा नहीं गया -काउंटर पर गया टोकेंन  लेने -वहां बैठे गोल मटोल मगर चेहरे से क्रूर आदमी ने पूंछा  कि खाना खा लिया ?-मैंने जवाब दिया अभी कहाँ! -"खाने के बाद पेमेंट करियेगा" उसने प्रोफेसनल टोन में जवाब दिया -जी साब जी कहते हुए मैं रेस्टोरेंट में अपनी मन  माफिक टेबल खाली होने का इंतज़ार करने लग गया -लम्बा इंतज़ार था उफ़ ! बहरहाल टेबल खाली होते ही द्रुत गति से मैंने वहां कब्ज़ा जमाया -वेटर को आते ही आर्डर  दे दिया - अभी भी याद है उसने जोर देकर पूंछा था कि बटर पनीर हाफ ही लाना  है न, मैंने भी बल देकर कहा हाँ हाँ हाफ! (अब एक प्राणी फुल कैसे खाता ? ) मेरी छठी हिस कुछ कुछ सक्रिय होती दिखी मगर मैंने नई जगह पर ऐसी ही अनुभूति होती होगी  यह मानकर उस अनुभूति को उपेक्षित कर दिया .पनीर आया तो देखा ,यह तो फुल था -फिर सोचा हो सकता है दिल्ली की इकाई ही यही हो -मतलब हाफ में यहाँ फुल मिलता हो -देश की राजधानी है यह -ऐसी समृद्धता यहाँ हो भी सकती है .मगर जब सामने सुस्वादु व्यंजन हो तो ये विचार कितने दीर्घकालिक होते -बटर पनीर की भीनी मसालेदार  महक  और छवि के आगे तुरत ही छूमंतर हुए ये विचार -खाना वाकई लजीज था -मैंने दो बटर नान ,चावल हाफ माँगा तो वह भी मानो किसी अलग नियम से फुल मिला -यह ज्यादा हो गया था मगर सुस्वादिता पेट पर भारी पड़ती ही है -अब भुगतान की बारी थी ...काउंटर पर पहुँचने के पहले मैं मन  में एक रफ कलकुलेशन कर  चुका था जिसके मुताबिक़ ज्यादा से ज्यादा ७० -७५ रूपये का बिल होना था -काउंटर विलेन बोला -१३५ रूपये -मैं चौका -कहा, पनीर तो हाफ था -"पैसा भी हाफ का ही चार्ज किया गया है " विलेन बोला .बगल के एक शायद (शुभेच्छु) यात्री ने मामले को भाप कर मुझे सांत्वना दी -भाई साहब यहाँ फुल ही हाफ है -कोई फुल श्रेणी नहीं है यहाँ -आप फिर से मीनू पढ़िए! हद है अब मीनू पर लिखी वही  सूची पोस्टर के बड़े अक्षरों  सी साफ़ दिख रही थी -जहाँ फुल का नामोनिशान नहीं था -बस दो कटेगरी थी -हाफ और क्वार्टर! क्वार्टर सब्जी ?-न कभी सुना न कभी  देखा ,न अपने बनारस में और न अपने नखलऊ में -दिल्ल्ली के ठगों ने लूट लिया था आखिर ...बहरहाल इज्ज़त के साथ पेमेंट किया और एक बार नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की ओर निहार कर कहीं बैठने की जुगाड़ में लग गया -

केवल एक जोड़ा जुडी कुर्सियां दिखीं जिस पर एक सुरक्षा कर्मीं ये के -५६ लिए मुस्तैद था -दूसरी खाली थी ....सुबह एक सुरक्षा कर्मी से मुठभेड़ हो चुकी थी और उनसे डील करने का कुछ पेशेवराना कान्फिडेंस हो आया था और उसी लहजे में मैंने उससे बगल बैठने का अनुग्रह किया -आश्चर्यों का आश्चर्य वह मान  गया - भोजनोपरांत अपराह्न झपकी सी आ  रही थी मगर चेष्टा कर मैंने प्रियेषा को फोन कर बता दिया था कि तुम स्टेशन के ठीक सामने ऐ टी एम के कतार के सामने आई सी ई सी आई के सामने आ  जाओ -उसने कहा कि मैं १० मिनट में पहुँच जाउंगी .और मैं झपकियाँ लेने में मशगूल हो गया -अभी दस मिनट भी नहीं हुए थे  कि कानो को अप्रिय सी लगती मोबाईल की घंटी बजी -प्रियेषा का फोन था -
"पापा कहाँ हैं आप ? " 
"आई सी आई सी आई ऐ टी एम के ठीक सामने" 
"क्या ? यहाँ तो कोई आई सी आई सी आई ऐ टी एम नहीं है "
लगभग चीखते हुए उसने जवाब दिया 
एक तो भोजनोपरांत  सुन्दर सी झपकी में विघ्न और दूसरे कैसे नहीं दिख रहा है इतना स्पष्ट सा लैंडमार्क प्रियेषा को ...
मैं भी दुगुने आवाज में चीखते हुए एक एक शब्द को चबाते हुए से बोला -
"स्टेशन पर जहाँ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन लिखा हुआ है उसके ठीक सामने देखो.... "और मैंने अनिर्दिष्ट 
दिशा में हवा में हाथ भी लहराया ...
" हद है पापा, गरीब रथ कहाँ नई दिल्ली से जाती है ,पुरानी दिल्ली से जाती है "  वह सातवे सुर में बोल रही  थी ..
मानो मुझमें स्प्रिंग सा लग गया हो उछल कर खड़ा हो गया ,मोबाईल हाथ से छूटते छूटते बचा -सुरक्षा कर्मीं भी अचानक हुई इस हलचल से सकपका गया और मुझे  अविश्वास से देखने लगा ...
'' वहीं रुकिए मैं पहुँच रही हूँ " मानों बेटी को भान हो गया था कि यह संस्मरण  लम्बा खिंच जायेगा और उसे विराम देने (मेरी और फजीहत  न हो और इज्ज़त कुछ तो बंची रहे, )उसने मुझे खुद लेने का फैसला  लिया -(आखिर बेटी है न ! पापा की इज्ज़त प्यारी है उसे )
सुरक्षा कर्मी ने मेरी दयनीय दशा देखकर मुझे मेट्रो का द्वार खुद थोडा आगे बढ कर दिखाया ....और सच ही थोड़ी ही देर में प्रियेषा वहां आ पहुंची थी -कोसना  जारी था उसका जो अब भी जारी है -मैंने टिकट पर स्टेशन का नाम ठीक से क्यूं नहीं  पढ़ा?
और मेरी टेक कि तुम लोगों ने इतनी बार बात की तो बताया क्यूं नहीं  बहरहाल यह अंतहीन आरोप प्रत्यारोप है जो कम से कम अगली दिल्ली यात्रा तक तो चलता ही रहेगा ! 
आगे की मेट्रो की यात्रा बहुत शानदार और गरीब रथ की भी घटना  विहीन बीती -आखिर ड्राप सीन तो पहले ही जो आ  चुका था! मैं अब बनारस में था -अपनी मांद में .....

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

बालम मोर गदेलवा -एक एडल्ट पोस्ट (गदेलों की तांक झाँक वर्जित है)

मनोज के फागुनी पोड्कास्टों की  बयार के मदमस्त झोकें में  ब्लागजगत झूमने लगा है -ज्ञानदत्त जी तो फगुआ के बजाय कजरी गाने लग गए हैं -और बड़े मिसिर जी को भी शिद्दत से याद किया है उन्होंने जोडीदार बनने के लिए . हाजिर साहब जी . किसी ने जिज्ञासा भी  की है कि गदेलवा माने क्या होता है ? मनोज ने बताया बच्चा होता है गदेलवा . तरसे जियरा मोर बालम मोर गदेलवा -ये लाईन है जो नायिका गहरी  अनुभूतियों और आक्रोश   के साथ कहती हुई पाई जाती है -न जाने किससे किससे कहती जाती है बेचारी! मुझसे तो नहीं कहा अब तक !उसकी बेबसी ,उसकी अतृप्ति देखी नहीं जाती -मगर क्या इसलिए कि उसका बालम  गदेला है ? जी गदेला तो है मगर क्या वह  उम्र से गदेला है -बस यहीं झोल है और समझ का फेर  है -अरे नायिका तो है पूर्ण यौवन सम्पन्न और काम केलि /क्रीडा में पूरी दक्ष मगर बालम मिल  गया है निरा बुद्धू ,बकलोल ,निपट अनाडी -ससुरा कुछ समुझतै नहीं है -अब सलज्ज नारी संकोच से भी  बिचारी नायिका उबर नहीं पा रही है -अब क्या कहे और बताये भी तो क्या क्या ,पिय को कैसे अपने मदन आग्रहों और स्थलों की जानकारी देकर अग्र केलि के रहस्यों को समझाए -वह बुडबक तो बस ठेठ ही तरीका अपनाता है बार बार ,कोई परिष्कृत कार्य विधि नहीं है उसके पास -बुडबक कुछ समझता ही नहीं है नारी मन  को ....आखिर कशमकश और खीझ इन शब्दों में फूट ही पड़ती है -तरसै जियरा मोर बालम  , मोर गदेलवा!

मगर सावधान ये विचार भी तो किसी  रंगीले पुरुष के ही  हैं जो वह नायिका के जरिये कह रहा है -मतलब यह एक तरह  से /प्रकारांतर से वह उन तमाम काम कला प्रवीण मर्दों को खुला आमंत्रण दे रहा है -अरे भाई लोगों ,इस नायिका की पीड़ा तुममे से ही कोई दूर कर दो न -मेरी भव बाधा हरो  राधा नागर सोय की ही तर्ज पर कोई तो आगे बढ़ो -और अर्ह मर्दों की टोली कल्पनाओं में उड़ने लग जाती है -मस्त बहारे होली की मानों उन कल्पनाओं में पंख लगा देती हैं -और उद्दीपित और उद्वेलित कथित नायिका के संग संग उनकी  भव बाधाओं को पार करने में लग जाता है मर्दों का सदल बल .जैसे इस फाग को सुन सुनाकर भैया चचा लोग मदमस्त होने लग गए हैं और ब्लॉग होली शुरू हो चुकी है -फलाने फलानी के संग और फलानी फलाने के संग होली खेलने लग भी गए हैं -यहाँ बुडबक बालम हो तो तनिक भी फिक्र  न करें - ब्लाग नायिकाओं ! अगर तुम्हारा मन  अभी भी किसी से नहीं बिंध पाया है तो सलाहकार सेवा यहाँ उपलब्ध है -जो कोई यह कहे कि उसे होली अच्छी न लागे  है तो समझिये उसके मन  माफिक का गबरू गैर गदेला नायक अभी नहीं मिल पाया है उसे ......आप अपनी अर्जी दे सकते हैं मगर  आपको गदेला न होने का सार्टीफिकेट मिल गया हो तभी -यह ताऊ साब बाँट रहे हैं तुरंत अप्लाई  कर ही दीजिये -महफूज भाई आप तो इस बार लाईन में लग कर ले ही लो -मुझे बालवुड की कुछ तारिकाओं ने बताया है कि आप अभी गदेलवा की श्रेणी में  ही है भाई! नाम मैं उजागर कर दूंगा! 

और हाँ कुछ जोड़े भूमिगत भी हो गए हैं उनका पता आप यहाँ से लगा सकते हैं .नायिका ने तड से भांप लिया कि अमुक ब्लॉगर तो दिखता गदेलवा है मगर हैं नहीं तो इसका परीक्षण करने दोनों जने यानि जोडियाँ भूमिगत हो चुकी हैं  -और कुबरी संग जूझें रामलला का मंजर साकार होने लग गए हैं - यहाँ नहीं भाई असली संसार में -इसलिए ज़रा आस  पास चौकन्ना होकर देखिये कौन कौन गायब है ? 


आप सभी को होली की रंगारंग शुभकामनाएं!



दिल्ली की गुपचुप यात्रा-2(डायरी शैली में एक रोजनामचा-2)

२३ फरवरी ,२०१०
निस्केयर (NISCAIR ) में जिस गोपनीय काम के लिए गया था वह तो अपेक्षा के विपरीत जल्दी ही निपट गया .तीन बजे हम फुरसत पा  गए थे -अब कोफ़्त हो रही थी की आखिर कुछ ब्लॉगर मित्रों को बता दिया होता तो उनसे मिलना जुलना हो जाता .अब इतने कम समय में शायद यह संभव नहीं था तो मैंने अपने कुछ स्वजनों /परिजनों से मिलने को ठानी .मनीष को बुलवा लिया और निकल पड़ा मालवीय नगर जो दक्षिण दिल्ली में है -दिल्ली की दूरियां और ट्रैफिक .... लाहौलविलाकूवत .....हमें बहन ज्योत्स्ना के  यहाँ ही पहुँचने  में आठ बज गए -मन  में यह भी आया कि रंजना भाटिया जी भी उधर ही कहीं रहती हैं और मुक्ति भी जरा सा ही कुछ और दूर .....मगर अब इतना समय भी नहीं बचा था और न ही किसी भलेमानुष के यहाँ जाने का वह उपयुक्त समय ही था -ज्योत्स्ना ने खाना खिलाने का बहुत आग्रह किया मगर मैंने वहीं पुष्प विहार में अपने एक मित्र के यहाँ जल्दी पहुँच जाना उचित समझा -वहां भी आवाभगत खूब हुई -खाना खाने की मनुहार भी मगर खाने के दाने तो कहीं और प्रतीक्षा कर रहे थे-वहां से एक लम्बी और उबाऊ ड्राईव पर दिल्ली  से ही सटे और लगभग दिल्ली का ही एक पार्ट -गाजियाबाद के  इन्दिरापुरम के सृजन विहार का जी  -११ कक्ष  मेरा पलक पावडे बिछाए प्रतीक्षा कर रहा था -यह मनीष का घर है जो विज्ञान प्रसार में वैज्ञानिक अधिकारी हैं -वहां चार जोडी  ऑंखें हमारी राह देख रहीं थी -अनुपमा और नवजात मनु जिसके नामकरण के लिए मनीष ने मेनका गांधी विरचित एक बेटियों के नाम की पुस्तिका भी खरीद रखी है जो छपी तो है पेंगुइन से मगर इसमें सूर्पनखा का भी नाम है -अब भला बताईये कोई भारतीय अपने बेटी का  सूर्पनखा नाम कैसे रख सकता है! मेनका गांधी जैसे लोगों को भारत और भारतीयता की ऐसी ही भोथरी समझ है -बस टीप टाप कर किताबें जरूर प्रकाशित करवा लेती हैं.बहरहाल रात के १२ बजे हमने अनुपमा के हाथों का बहुत ही सुरुचिपूर्ण और मन  से बनाये गए भोजन -व्यंजनों का लुत्फ़ उठाया -देर से सोये मगर सुबह जल्दी उठ गए -कसक यह रह गयी कि बहुत प्यारी सी मनु के फोटो और इस सुन्दर छोटे से परिवार की तस्वीरें  हम अपने फोटोकैम से आपाधापी और  भागदौड़ के चक्कर में  नहीं उतार सके .
२४फरवरी २०१०
 आज तो वापसी का दिन था ....सुबह मनीष के यहाँ आलू के पराठे और सेवईं का तगड़ा नाश्ता करके निकल पड़ा ,पहले विज्ञानं प्रसार, जो मनीष  का संस्थान है . वहां विज्ञान के लोकप्रियकरण और संचार में जुटे कई  महारथियों से मिला -सुबोध महंती ,निमिष कपूर आदि  मित्रों से ..फिर हम दिल्ली की सड़कें फिर से  नापने निकल पड़े .

पहले   से तय कार्यक्रम के मुताबिक़ दिल्ली युनिवर्सिटी में पढ़ रही प्रियेषा (बेटी ) को बनारस लौटना था --प्रियेषा ने पूरा झाम फैला  दिया था -पापा या तो आप मुझे भी प्लेन से ले चलो या फिर आप भी हमारे स्वर्ग रथ -गरीब रथ से ही चलो .....बड़ी मुश्किल थी ...मुझे तो संस्थान की तरफ से दोनों ओर का फ्लाईट अनुमन्य की गयी थी  मगर प्रियेषा के लिए अतिरिक्त न्यूनतम  ४००० रूपये ? हिम्मत नहीं हो रही थी .मैंने प्रियेषा की बड़ी चिरौरी विनती की मगर जैसा कि बिट्टी की आदत है अपने फैसले से टस से मस नहीं होतीं (जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय में पढने का फैसला भी इनका ही था ) लिहाजा बाप ने बेटी के लिए इतिहास का एक सबसे बड़ा त्याग किया और संस्थान से गरीब रथ की वापसी का किराया मात्र ५०० रूपये लिया और गरीब रथ से ही वापस लौटने का फैसला कर लिया -(प्रियेषा ,आखिर हम तुम्हारे बाप जो हैं -तुम भी क्या याद रखोगी हा हा हा) ..प्रियेषा से कहा कि तुम समय से रेलवे स्टेशन पहुँच जाना और मैंने इस दौरान अपने कुछ और मित्रों से मिलने का मन बना लिया -

मनीष ने अपने संस्थान से वाहन की जुगाड़ कर ली थी -हम साथ ही राजेश शुक्ल जी से मिले जो नेशनल  काउन्सिल आफ अप्लायिड  इकोनोमिक रिसर्च (आई टी ओ के समीप ) में रिसर्च  फेलो हैं  (यहाँ रिसर्च फेलो बड़ी ऊँची तोप है ).वहां से हम एक दूसरे तोप आईटम डाक्टर मनोज पटैरिया  से मिलने राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार परिषद् नई दिल्ली(यह मेहरौली  रोड पर है )  पहुंचे -वहां  सेक्योरटी  से कुछ झडपें भी हुईं और ब्लॉगर चरित्र का पूरा निर्वहन किया गया .तमतमाए राजेश शुक्ल ने यहाँ तक कह दिया कि असली आतंकी यहाँ फोड़ कर चले जायेगें और तुम्हारी सारी काबिलियत तब नहीं दिखेगी -बहरहाल मैं सेक्योरिटी की समस्याओं को समझता हूँ  -बात संभल गयी .हम वहां से चार बजे फुरसत पा गए -मनीष को वहीं  छोड़ा  और राजेश जी ने मुझसे यह पूंछा कि ट्रेन कहाँ से हैं -पुरानी या नई दिल्ली से ? मैंने अकस्मात कहा नई दिल्ली और उन्होंने अपने विभाग के वाहन से मुझे अगले आधे घंटे में नई दिल्ली स्टेशन छुडवा दिया. ट्रेन का समय था शाम को ५.५० और मुझे भूख  सी लग आई थी .
जारी .......

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

दिल्ली की मेरी गुपचुप गोपनीय यात्रा -एक डायरी स्टाईल रोजनामचा!

२२ फरवरी ,२०१०,सोमवार 
....सुबह दिल्ली यात्रा की तैयारियां कीं -केवल एक  हैंडबैग जिसे यात्रा के दौरान साथ रख सकते हैं लिया - रेजर, जेल,शेविंग क्रीम,आफ्टर शेव , जिसे सुरक्षा जांच में अमूमन निकाल दिया जाता है को छोड़कर बस दो जोड़ी कपडे ,फरवरी माह की रीडर डाईजेस्ट के साथ आई सी ४०५ में पौने चार बजे सवार होकर ठीक एक घंटे ९ मिनट में दिल्ली एअरपोर्ट पर पहुँच गया -फेरी बस से अगले पांच मिनट में निकास द्वार तक और अगले ही पल इंदिरागांधी अंतरराष्ट्रीय  एयरपोर्ट  के घरेलू उडान टर्मिनल से बाहर था -मनीष जी ने ध्यान आकर्षित करने के लिए हाथ हिलाया -मैंने जवाब दिया और उनकी ओर बढ चला -मैंने इधर उधर चौतरफा नजरे घुमाई किसी और को भी देखने की प्रत्याशा में -यद्यपि मैं जानता था कि किसी और के द्वारा एअरपोर्ट पर पहुंच जाने का वायदा महज एक मजाक ही था मगर मनुष्य भी कितना आशावादी है -क्षीण  से क्षीण संभावनाओं को भी वजूद में आ जाने के सपने देखता रहता है .

मनीष ने टोका भी कि किसे देख रहे हैं ? मैंने सिर झटका और कहा कि किसी को नहीं चलिए चलते हैं -और संस्थान द्वारा भेजे वाहन से हम गंतव्य तक चल पड़े .अगले एक घंटे में में हम नेशनल फिजिकल लैबोरटरी के  अतिथिगृह में थे-जहां रुकने की व्यवस्था थी .यह संस्थान ही भारतीय  मानक समय के  प्रतिपल के प्रबंध और घोषणा का काम करता है -रेडियों और दूरदर्शन समाचारों के ठीक पहले जारी होने वाली   बीप  बीप भी यहीं से प्रसारित होती है . यह कार्य एक एटामिक घड़ी के जरिये होता है-संस्थान के मुख्य द्वार पर ही एक डिजिटल घड़ी बनी हुई है जो इस संस्थान के मुख्य द्वार को दूसरे संस्थानों के मुख्य द्वारों से अलग  पहचान देती है .  जीवन में कभी कभार साधारण  मानुषों को भी वी आई पी होने की गौरवानुभूति होती ही होगी जैसी कि  मुझे होने लग गयी थी और मैं बलपूर्वक उस श्रेष्ठताबोध - विचार को दिमाग  से परे धकेलने में लगा था -मनीष को मैंने चाय पिलवायी और विदा कर दिया क्योंकि उन्हें अपने आवास -इंदिरापुरम, गाजियाबाद के सृजन विहार तक जाना था .उन्हें देर हो रही थी ,रात के ८.३० बज चुके थे ....खाना खाया ..कुछ देर तक अपने सोनी एरिक्सन जी मोबाईल पर मेल और फेसबुक पर आये संदेशों को देखा जिसमें हिन्दी फांट का सपोर्ट न होने के कारण डब्बे डब्बे दिख रहे थे-रोमन स्क्रिप्ट और अंगरेजी के संदेशों को पढ़ा और जवाब भी दिया ......  फिर सो गया ....
२३ फरवरी ,२०१० मंगलवार 
सुबह डोर वेल की आवाज से नीद खुली -मतलब घोड़े बेंच कर सोया -उठा, दरवाजा खोला .बेड टी साब! ट्रे  संभाले एक अटेंडेंट बालक खडा था ..मतलब सुबह हो चुकी थी -घड़ी देखा,समय था  ६.३० , रोज से भी डेढ़ घंटे ज्यादा  सो गया था -क्या बेदिल दिल्ली की रातें सचमुच इतनी पुरसकूं होती हैं -शायद हाँ ,क्योंकि तभी उदीयमान प्रसिद्ध दिल्ली ब्लागर मिथिलेश जी का एक एस एम एस सन्देश भी मिल गया था -निश्चित ही रात पुरसकून थी -सन्देश था -
पानी  की बूंदे फूलों को भिगों रही हैं 
नई सुबह इक ताजगी जगा रही है 
हो जाओ आप भी इनमें शामिल 
एक प्यारी सी सुबह आपको जगा रही है 
गुड मार्निंग!
पहले तो मैं चौका कि मेरे गोपनीय दिल्ली प्रवास की खबर कैसे और किससे लीक हो गयी  (ये तो मैंने  आज ही देखा जाकिर मियाँ इसको तस्लीम पहेली की पोस्ट  पर उद्घोषित किये बैठे हैं.) मगर फिर संयत होकर मैंने एस एम एस का जवाब लिखा -जी सचमुच सुहावनी है सुबह दिल्ली की ......शुक्रिया ..मगर एस एम एस पहुंचा नहीं और आउट बाक्स में ही ठहर  गया .नए उम्र के ब्लॉगर सहज ही बहुत व्यग्र होते हैं -अब इतने प्रेम से एस एम एस लिखा गया था तो जवाब देना भी  जरूरी था -फोन मिला ही दिया -मिथिलेश की उत्साहित आवाज सुनायी दी  -शिष्टाचार संबोधनों का आदान प्रदान हुआ -मैंने वही एस एम एस वाला जवाब दुहरा दिया -
सचमुच सुहावनी है सुबह दिल्ली की!(रात में बूंदा  बांदी हुई थी और मौसम सचमुच सुहाना हो गया था मगर मुझे  यह बाहर  निकलने पर पता चला था ...)
मिथिलेश की सहज जिज्ञासा थी कि सर  आपको कैसे पता चला ?
"मैं दिल्ली मैं हूँ ''-फिर तो शुरू हुआ शिकायतों का सिलसिला ..और मैं डिफेंसिव मोड मे .....बहरहाल मैंने उनसे गोपनीय रहने की क्षमा मांग ली ....और ब्लॉगर मित्रों को भी अपनी व्यस्तता के मद्दे नजर  न बताने की गुजारिश की और दैनिक क्रिया कर्म में लग गया -१० बजे से वह गोपनीय काम जो शुरू होने वाला था जिसके लिए मैं वहां पहुंचा था ....नाश्ता वगैरह के बाद ठीक दस बजे संस्थान का वाहन मुझे लेने  आ गया था ......
जारी ......

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

श्रीश के अनुरोध पर मैंने लिखी इक कविता .लिखी क्या कविता ने लिखा लिया खुद को मुझसे!

जी हाँ ,एक दिन श्रीश ने हड़का ही लिया मुझे ....बच्चों का आतप झेला नहीं जा सकता .कभी उन्होंने मुझे नवोत्पल पर  लिखने को आमंत्रित किया था और मैंने इस साहित्यिक मंच की सदस्यता भी स्वीकार कर ली थी मगर लिखने को वक्त नहीं निकाल पा रहा था या फिर उस ओर ध्यान ही नहीं जा पा रहा था ..बस ऐसे में स्नेहाक्रोश से लबरेज श्रीश भाई ने मुझे जो हडकाया कि मेरी रूह फ़ना हो गयी .....तभी से इसी उधेड़बुन में था कि कुछ तो लिखूं वहां -वचन बद्धता तो थी मगर उत्प्रेरण नहीं मिल रहा था -साहित्य सृजन कोई प्रमेय का सिद्ध करना नहीं है शायद ....
और फिर उप्रेरण मिल गया कहीं से किसी  ने बेदखल सा किया तो बस कविता फूट पडी और बिना समूची निःसृत हुए रूकी नहीं -अब यह नवोत्पल पर है पर यहाँ उसकी पुनरावृत्ति ......ब्लागजगत में कविता लिखने वाले एक से एक गज और दिग्गज है उनसे सादर सविनय अनुरोध कि किसी भूल और नाद भंग को अनदेखा करेगें -क्योकि "कवि विवेक एक नहिं मोरे सत्य कहऊँ लिख कागज़ कोरे ".....
क्या लिखूं ?

ज्ञान लिखूं विज्ञान लिखूं या निज कोरा अभिमान लिखूं
जग जान न पाया अब तक जो वह गोपन वृत्तांत लिखूं
क्लेश लिखूं निज द्वेष लिखूं या प्रिय कोई सन्देश लिखूं
लिख नहीं सका जो अब तक निज मन का अवशेष लिखूं ?

पाप लिखूं या पुण्य लिखूं, या प्रायश्चित परिताप लिखूं
अपनों का छल - व्यवहार लिखूं ,या पराये उपकार लिखूं
जग हित जो कर नहीं सका क्या सब वह पश्चाताप लिखूं
उस परम का यशगान लिखूं या निज गुण दोष विधान लिखूं ?

स्व दोष लिखूं पर तोष लिखूं जन जन के दुःख दंश लिखूं
निज बंध लिखूं निर्वाण लिखूं सम्मान लिखूं अपमान लिखूं
माँ सरस्वती का  यशगान करूं निज दुर्बलता आह्वान करूं
शक्ति स्फुरण माँ से तनिक मिले जन जन का कल्याण लिखूं !
(श्रीश के अनुरोध पर) 
 

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