सुधियों के वातायन में उनतीस वर्ष पीछे लौटता हूँ -इलाहाबाद विश्विद्यालय के ताराचंद छात्रावास में था उन दिनों एक शोधार्थी ..पिता जी ने लडकी देखी और शादी तय कर दी बिना मुझसे जाने बूझे ,पूंछे पछोरे ....मैं कुछ स्पष्ट नहीं था इन मामलों में -मुझे महज फोटो दिखाई गयी -न भी दिखाई गयी होती तो भी इनकार थोड़े ही करता -माँ बाप बच्चों के दुश्मन थोड़े ही होते हैं -और मैं इन बातों को कभी उतनी गंभीरता से लेता भी नहीं था -क्योंकि साधारण सा एक गवईं संस्कार का युवक था -मगर बहुत सांसारिक बातों में मेरा मन न तब लगता था और न आज ही ..आज भी मेरा एक अंतर्जगत है तब भी था ....उसे केवल खुद से ही साझा करना होता है -वही आत्म शक्ति देता है दुनियावी बातों ,रीति रिवाजों ,बिडम्बनाओं और परिस्थितियों से समंजन स्थापित करने का -मेरे जैसे अंतर्जगतीय जीवन में जीने वाले लोग पलायनवादी भी हो जाते हैं मगर तमाम असफलताओं और दुनियावी जीवन के धोखे खाने के बाद भी पलायन मैंने नहीं सीखा -और यहीं भूमिका में अवतरित होती हैं संध्या मिश्र (पहले शुक्ल ) ,मीरजापुर शहर के स्वतन्त्रता सेनानी श्री विद्यासागर शुक्ल की बेटी और मेरी १९८१ से सहचरी ..(संयोगात समीर जी की भी ससुराल मीरजापुर है ) ....
उनतीस वर्षों के अहसास डिनर के साथ साथ
आज हमारे विवाह के उनतीस वर्ष पूरे हुए ....अभी रजत जयंती तो मानो कल की ही बात हो जब परिजनों का ढेर सा स्नेह और आशीर्वाद मिला था ..समय कितने तेजी से भागता है लेकिन अहसास थम से गए होते हैं .मुझे आज भी लगता है कि जैसे विवाह के इतने वर्ष बीते ही न हो और हम आज भी नव दम्पति सरीखे ही हैं -वही ऊर्जा और वही उत्साह बल्कि और बढ़ता हुआ -ऐसा संभवतः इसलिए भी कि अब जिम्मेदारियां समापन की ओर है और हम एक दूसरे के लिए और समर्पित हो रहे हैं .याद नहीं आता हममे कभी कोई तकरार अधिकतम एक दिनी अवधि से ऊपर भी गयी हो -थोड़ी अनबन जरूर होती रही है गाहे बगाहे मगर कोई भी खटपट लम्बी अवधि की नहीं -इसका श्रेय उन्ही को है ...उनकी क्षमाशीलता और उदारता सचमुच भारतीय नारी को मूर्तिमान करती है ...
हमारी डेजी भी रही है पिछले दस वर्षों से हमारे साथ
स्मृतियाँ धुंधलाती जाती हैं ,चित्र नहीं ..... तो कुछ चित्र भी आज के कुछ मधुर पलों के यहाँ लगा रहा हूँ ...समयुगीन जीवन की घोर आपाधापी और अनेक दुश्चिंताओं के बीच हर दम्पति को अपने लिए, सहचरी /सहचर के लिए कुछ समय अवश्य निकालना चाहिए -जान बूझ कर भी ...भले ही कभी कुछ "मेक बिलीव" सा लगे तब भी -जीवन की चिरन्तनता/नैरन्तर्य के लिए जीवन के प्रति मोहबद्धता बेहद जरूरी है -और उसके अवसर आपको लपकते रहते चाहिए, छीनते रहने चाहिए इस बेदर्द होती दुनिया से ......
कुछ उपहार सविनय विनिमय
आप की शुभकामनाओं की दरकार है .
Alarma sobre creciente riesgo de cyber ataque por parte del Estado Islámico
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Un creciente grupo de hacktivistas está ayudando Estado Islámico difundir
su mensaje al atacar las organizaciones de medios y sitios web, una empresa
de se...
11 वर्ष पहले


