गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

परिणय के वर्ष हुए आज उनतीस ना कोई खटपट हुई ना रिश्ते छत्तीस .....

सुधियों  के वातायन में उनतीस वर्ष पीछे लौटता हूँ -इलाहाबाद विश्विद्यालय के ताराचंद छात्रावास में था उन दिनों एक शोधार्थी ..पिता जी ने लडकी देखी और शादी तय कर दी बिना मुझसे जाने बूझे ,पूंछे पछोरे ....मैं कुछ स्पष्ट नहीं था इन मामलों में -मुझे महज फोटो दिखाई गयी -न भी दिखाई गयी होती तो भी इनकार थोड़े ही करता -माँ बाप बच्चों के दुश्मन थोड़े ही होते हैं -और मैं इन बातों को कभी उतनी गंभीरता से लेता भी नहीं था -क्योंकि साधारण सा एक गवईं संस्कार का युवक था -मगर बहुत सांसारिक बातों में मेरा मन न तब लगता था और न आज ही ..आज भी मेरा एक अंतर्जगत है तब भी था ....उसे केवल खुद से ही साझा करना होता है -वही आत्म शक्ति देता है दुनियावी बातों ,रीति रिवाजों ,बिडम्बनाओं और परिस्थितियों से समंजन स्थापित करने का -मेरे जैसे अंतर्जगतीय जीवन में जीने वाले लोग पलायनवादी भी हो जाते हैं मगर तमाम असफलताओं और दुनियावी जीवन के धोखे खाने के बाद भी पलायन मैंने नहीं सीखा -और यहीं भूमिका में अवतरित होती हैं संध्या मिश्र (पहले शुक्ल ) ,मीरजापुर शहर के स्वतन्त्रता सेनानी श्री विद्यासागर शुक्ल की बेटी और मेरी १९८१ से सहचरी ..(संयोगात समीर जी की भी  ससुराल  मीरजापुर है ) ....
                                                 उनतीस वर्षों के अहसास डिनर के साथ साथ 

आज हमारे विवाह के उनतीस वर्ष पूरे हुए ....अभी रजत जयंती तो मानो  कल की ही  बात हो जब परिजनों का ढेर सा स्नेह और आशीर्वाद मिला था ..समय कितने तेजी से भागता है लेकिन अहसास थम से गए होते हैं .मुझे आज भी लगता है कि जैसे विवाह के इतने वर्ष बीते ही न हो और हम आज भी नव दम्पति सरीखे ही हैं -वही ऊर्जा  और वही उत्साह बल्कि और बढ़ता हुआ -ऐसा संभवतः इसलिए भी कि अब जिम्मेदारियां समापन की  ओर है और हम एक दूसरे के लिए और समर्पित हो रहे हैं .याद नहीं आता हममे कभी कोई तकरार अधिकतम  एक दिनी अवधि से ऊपर भी  गयी  हो -थोड़ी अनबन जरूर होती रही है गाहे बगाहे मगर कोई भी खटपट लम्बी  अवधि की नहीं -इसका श्रेय उन्ही को है ...उनकी क्षमाशीलता और उदारता सचमुच भारतीय नारी को   मूर्तिमान करती है ...

                                             हमारी डेजी भी रही है पिछले दस वर्षों से हमारे साथ 

स्मृतियाँ धुंधलाती जाती हैं ,चित्र नहीं ..... तो कुछ चित्र भी आज के कुछ मधुर पलों के यहाँ लगा रहा हूँ ...समयुगीन जीवन की घोर आपाधापी और अनेक दुश्चिंताओं के बीच हर दम्पति को अपने लिए, सहचरी /सहचर  के लिए कुछ समय अवश्य निकालना चाहिए -जान बूझ कर भी ...भले ही कभी  कुछ "मेक  बिलीव"  सा लगे तब भी -जीवन की चिरन्तनता/नैरन्तर्य के लिए जीवन के प्रति मोहबद्धता बेहद जरूरी है -और उसके अवसर आपको लपकते रहते चाहिए, छीनते  रहने चाहिए इस बेदर्द होती दुनिया से ......
                                                              कुछ उपहार सविनय विनिमय 
आप की शुभकामनाओं की दरकार है .

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

भक्तजनों आज का प्रसंग है राम -रावण युद्ध -प्रवचन

अभी अभी कुल जमा २  भक्तजनों ने रामचरित मानस का राम रावण प्रसंग सुना .भक्तजनों की क्या कहिये, वैसे ही कलि काल है उनकी संख्या घटती बढ़ती रहती है मगर आज तो बहुत ही   कम   हो गयी -बस घर के दुई परानी -बेटे और पत्नी -बिटिया बाहर है नहीं तो वह भी एक भक्त श्रोता है .राम चरित मानस की कई पारायण विधियाँ है -जो इस ग्रन्थ में उल्लिखित हैं वे तो महज दो है -एक तो नवाह्न पारायण और दूसरी मास पारायण की मगर लोकमानस में 'अखंड रामायण ' भी बहुत प्रचलित है जिसमें सामान्यतः २४ घन्टे  के आस पास पाठ पूरा हो जाता है . मेरी पारायण विधि महीने वाली है -मगर कुछ अधिक समय लग जाता है अपरिहार्य कारणों से .कारण यह कि मैं खुद महज स्वान्तः सुखाय पारायण न करके प्रायः अर्थ के साथ प्रवचन मोड /मोड्यूल का सहारा लेता हूँ -भक्तजनों को हर्षित होता देख हर्षित भी होता हूँ और कभी कभी कोई भक्तजन प्रवचन के दौरान सोने लगता है तो क्रोध भी आता है और प्रवचन स्थगित भी कर देता हूँ -इसलिए थोडा समय अधिक लग जाता है.बहरहाल थोडा बैकग्राउंड देना जरूरी था न! आज से आप भी भक्तजनों की मंडली में शामिल हो रहे हैं ,अरे घबराईये न आप को तो कभी कभी ही सुनाऊंगा.

आज राम ने रावण से खुद युद्ध करने का निर्णय लिया है -कहा कि वानरों अब आप विरत होईये अब रावण से मेरा युद्ध देखिये .यह प्रसंग इसलिए आपको भी सुनाने का मन हो आया क्योंकि राम ने एक बहुत अच्छी सीख दी है रावण को -हे रावण व्यर्थ डींग मारकर अपने सुयशों का नाश मत करो -पराक्रम दिखाओ!एक बड़ा ही सुन्दर छंद है -
जनि जल्पना कर सुयश नासहूँ 
नीति  सुनहि  करहिं क्षमा 
संसार में पुरुष त्रिविध
पाटल रसाल पनस समा
एक सुमन प्रद ,एक सुमन फल 
एक फलहिं केवल लागहिं 
एक कहहिं करहिं नहिं 
कहहिं करहिं एक 
एक करहिं न केवल गावहिं 
( हे रावण ,डींग हांककर अपना सुयश नष्ट मत करो ,क्षमा करो और  एक नीति की बात सुनो  (क्षमा इसलिए कि रावण विद्वान् था उसे नीति सिखाने की बात किंचित अशिष्टता थी  )- इस संसार में तीन तरह  के पुरुष होते हैं गुलाब ,आम और कटहल जैसे -जिसमे एक में तो केवल फूल लगा दिखता है फल नहीं(गुलाब )  , दूसरा आम जिसमें फूल (मंजरी -बौर ) भी लगा होता है  और फल भी और तीसरा कटहल जिसमें फूल नहीं दिखता मगर  फल ही दृश्यमान होता है -इसी तरह कुछ लोग बस हांक तो देते हैं उसे चरितार्थ नहीं कर पाते,कुछ जो कहते हैं कर दिखाते हैं और तीसरे कहते ही नहीं बस कर दिखाते हैं )  
हे ब्लाग भक्त जनों आप ब्लॉग जगत में भी यह कथा साम्य ढूंढिए और यह सुन कर प्रणाम कीजिये -

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

माई नेम इज खान के बाद अब आने वाली फिल्म है माई नेम इज हनुमान!

आज देखी माई नेम इज खान! बिलकुल बेहूदा बकवास .अमेरिका में पता नहीं सचमुच इस फिल्म ने धमाल मचाया हुआ है या फिर यह पब्लिसिटी प्रमोशन का ही कोई स्टंट है  -याद होगा पिछले वर्ष खान को अमेरिका में आव्रजन अधिकारियों द्वारा जाँच पड़ताल के लिए रोक लिए जाने पर हंगामा खड़ा किया गया था -शायद वह भी इस फ़िल्म के प्रोमोशन का ही कोई स्टंट रहा हो .टाईम्स आफ इण्डिया ने जब इस फिल्म को अपने पॉँच के पाँचों स्टार लुटा दिए तो उत्कंठा हो आई कि आखिर है क्या इस फिल्म में -सो आफिस का काम काज निपटा कर पास के ही एक माल में घुस गया अकेले ही यह फिल्म देखने -इसलिए भी की कुछ आनंदमय देखने को मिल जाय - मतलब -" अ थिंग(कुछ)  आफ ब्यूटी इज ज्वाय फार ईवर"  -मगर घोर निराशा लगी .

फ़िल्म में अमेरिका के ट्रेड सेंटर के आतंकी हमलो के बाद मुसलमानों को लेकर वहां के मूल निवासियों में फैले  आक्रोश जनित हालातों पर फोकस है और यह बताये जाने की हास्यास्पद कोशिश कि  सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते -वह साहब वाह, हद है, यही बताने के लिए आपने मेरे २०० रूपये और तीन घंटे बर्बाद कर दिए ? और न जाने कितने लोगों की जेबों को खाली करवा रहे हैं!क्या यह कोई एक ऐसे राज की बात थी कि इसके लिए फिल्म बनाने की नौबत आन पडी ? आखिर यह सत्य कौन नहीं जानता? मजे की बात तो यह है कि पूरी फिल्म में नायक कुरआन की आयते पढ़ पढ़ कर लगातार यह साबित करने की कोशिश करता रहता है कि दुनियावालों ,इस्लाम की सही समझ के मुताबिक़ वह एक शांति और सौहार्द का मजहब है और अंत में एक आतंकी ही इस्लाम के नाम पर उसे छूरा घोप देता है -कितना हास्यास्पद ? आप जब किसी रेलिजन को जस्टीफाई करते हैं और बार बार  करते हैं तो वह खुद कटघरे में आ जाता है -विश्वसनीयता खोने लगता है .इस फिल्म में अनावश्यक रूप से इस्लाम को बार बार जस्टीफाई किया गया है -महज यह सूत्रवाक्य समझाने के लिए कि सभी मुसलमान आतंकी नहीं होते -जैसे यह दुनिया पहले से ही मानती   है कि सारे मुसलमान आतंकी है .हमारे जैसे करोडो लोग है जो अब तक तो बिना इस फिल्म के देखे ही यही मानते रहे हैं कि नहीं भैया संभी मुसलमान आतंकी नहीं होते -मगर इस फिल्म को देखने के बाद तो यकबारगी ऐसा ही लगने लगा कि नहीं .हो न हो सभी मुसलमान आतंकी होते ही होंगे तभी यह बेचारी फिल्म कितनी जी तोड़ मेहनत कर इसका उलटा समझाने में लगी है .अपने ब्लागजगत और इतर भी कई मुसलमान  मित्रों के चेहरे भी  सहसा दिमाग में कौंधने लगे -खीझ हो आई इस फिल्म की केन्द्रीय सोच पर -जो नहीं है अब आप उसे पैदा कर दो ....
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श्रेष्ठ साहित्य की एक कसौटी है यह भी है कि वह  यथार्थ के  करीब हो  -सामाजिक कहानियां वही यादगार बनती हैं जिसमे सच का  वर्णन बहुत ही विश्वसनीय तरीके से किया गया हो -यह फ़िल्म इस दिशा में भी कोई छाप नहीं  छोडती -सारे के सारे दृश्य यथार्थ से बहुत दूर है -एक रूमानी कल्पना भर -इस्लाम के आदर्शों को स्थापित करने का एक सिनेमाई अंदाज -नायक महोदय की गाडी छूट  रही है ,उनके  नमाज पढने का वक्त हो आया -एक विनम्र और होशियार मुस्लिम दंपत्ति उन्हें सलाह देता है -मियां जगह और लोगों को देखकर नमाज पढनी चाहिए -आप क्या कर रहे हैं ? तो यह जवाब कि  जगह और लोग नहीं बल्कि नमाज ईमान से पढी जाती है, वे नमाज अता करने में लीन  हो गए -इस डायलाग पर कुछ तालियाँ तो मिल गयीं, मगर जरा आप बताईये कि आपका प्लेन छूट रहा हो तो आप एरोड्रम पर नमाज अता करने लग जायेगें ? यह  है अनायास  ही किसी रेलिजन का माखौल उड़ाया जाना . हम कहते हैं कि अगर मानव जीवन तर्कों और सामान्य बुद्धि के सहारे बेहतर तरीके से जीया जा सकता है तो फिर रेलिजन  के शरण में अनावश्यक और निरर्थक जाना ही क्यों  चाहिए .

फ़िल्म में इस्लाम को मजबूती से स्थापित करने का बचकाना प्रयास किया गया है और कोई आश्चर्य नहीं कि इसी के जोड़ की जल्दी ही कुछ ऐसे नाम वाली फ़िल्म भी न आ  जायं  -माई नेम इज हनुमान -या आ भी न चुकी हो शायद! आमिर ने तारे जमीं पर में जबसे एक जन्मजात जेनेटिक विकलांगता ग्रस्त बच्चे के साथ  अभिनय किया है नकलची बालीवुड बस ऐसे ही पात्र से दर्शकों  की सहानुभूति बटोरने की कोशिश में रहता  है -इस फिल्म में ऐसी  सहानुभूति दर्शको में शाहरुख़ खान खुद  उत्पन्न करने की कोशिश में हैं. यहाँ भी  मौलिकता नहीं है .एक दृश्य में यह दिखाने की बनावटी कोशिश में कि कतिपय जेनेटिक बीमारियों से ग्रस्त लोगों में मानवीय भावनाएं होती है -नायक का नवविवाहिता पत्नी (काजोल ) के साथ यौन सम्बन्ध  की आतुरता को बार बार बहुत आपत्तिजनक और भौंडे तरीके से दिखाया   गया है -नायक एक पुस्तक का आमुख ही दर्शकों की ओर करके नायिका को कनविंस करने का प्रयास  करता है जिसपर लिखा रहता है -इंटरकोर्स मेड इजी जैसा कुछ ! हद है कोई  माँ बाप अपने बेटे बेटी के साथ इस भारतीय परिवेश में वह दृश्य कैसे झेल सकता है ?

टोटल घटिया है यह फ़िल्म -बस एक स्टार  काजोल के अभिनय के कारण इस फिल्म को दिया जा सकता है -नाट रिकमेंडेड .
पुनश्च : फिल्म का गीत संगीत रूमानी है -आनंदित करता है  मगर फिर फिर वही मजहबी ड्रामा शुरू हो जाता है -गीत संगीत के लिए एक स्टार और दिया एक टिप्पणीकर्ता स्प्रिन्ग्मेलाडीज  के हस्तक्षेप पर -उनके द्वारा अपने   ब्लाग पर दिए गीत को जरूर सुन लीजिये  .
कुल **

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

चिट्ठाकार चर्चा में आज "मुक्ति" से मुलाकात!

                                 अराधना चतुर्वेदी "मुक्ति "

आईये आपको आज "मुक्ति" से मिलवाते हैं. आप उनसे अब परिचित हो चुके हैं मगर उनकी तारीफ़ और तआरुफ़ करने /कराने का एक मौका हम भी चाहते हैं -वे शख्सियत ही ऐसी हैं-स्वाध्यायी ,सजग पाठक ,गंभीर ब्लॉगर , संस्कृत साहित्य की विदुषी और भी बहुत बहुत कुछ .वे ब्लॉग जगत में प्रत्यक्षतः बहुत पहले से तो नहीं हैं मगर उनका यहाँ अदृश्य आविर्भाव काफी पहले से लगता है .मैं तब गौरवान्वित हुआ था जब अभी पिछले दिनों उन्होंने मुझे याद दिलाया कि वे पहले से ही मेरे ब्लागों की पाठिका रही हैं -किंचित हतप्रभ और संकोच से मैंने इस तथ्य   का पुनरीक्षण किया तो पाया कि वे सही कह रही  हैं .एक विदुषी पाठिका -अनुसरणकर्ता,  वह भी ब्लॉग जगत में -मेरा मन  सहज ही उनके प्रति एक कृतज्ञता भाव से भर उठा .बिना छल क्षद्म की बौद्धिकता को सम्मान देना तो जैसे खुद को ही सम्मानित होने की अनुभूति  करना है .और यह सुअवसर मुहे सहज ही मिल गया था अब .

'मुक्ति ' अर्थात आराधना(अनुराधा नहीं )चतुर्वेदी अर्थात गुड्डू (माँ का दिया नाम ) .संस्कृत साहित्य की अध्येता -  जे.एन.यू. में शोधरत    ( I.C.S.S.R  की फ़ेलो )....ब्लॉग जगत में नारीवादी -बहस ,फेमेनिस्ट पोएम और आराधना ब्लागों की नियमित लेखिका .मगर उससे बढ़कर एक सजग पाठक -कहीं भी जो उनके मन  का हो और नारी की अस्मिता को ,पहचान को उभारता हो .वे  एक मुखर नारीवादी हैं -मगर दुराग्रही नहीं .अपने आत्मकथ्य में वे कहती हैं -"कुछ ख़ास नहीं,बस नारी होने के नाते जो झेला और महसूस किया ,उसे शब्दों में ढालने का प्रयास कर रही हूँ.चाह है, दुनिया औरतों के लिए बेहतर और सुरक्षित बने " मगर मैंने पाया है कि वे किसी प्रायोजित या कुंठित नारी स्वातन्त्र्य अभियान की प्रवक्ता नहीं हैं -नारी स्वातन्त्र्य के उनके अपने मायने हैं जो बार बार उनकी सहज सी लगती कविताओं और आलेखों में अभिव्यक्त होता रहता है .वे किसी भटके हुए और गुमराह नारी आन्दोलन की सदारत नहीं कर रही हैं बल्कि अपने मानवीय रिश्तों और बुनियाद की समझ से समस्यायों का निराकरण करने की चाह रखती हैं -  सिर्फ हंगामा खड़ा करना ही मंतव्य नहीं है मुक्ति का .

संस्कृत साहित्य की अध्येता होकर भी वे परम्परा वादी नहीं है -संस्कृति के श्रेष्ठ मूल्यों के प्रत्ति उनकी निष्ठां असंग्दिग्ध है मगर पोंगा पंथ को लेश मात्र भी प्रश्रय नहीं है वहां -कभी कभी तो मुझे लगता है संस्कृत साहित्य का गहन अवगाहन मनुष्य को तमाम अनुचित आग्रहों,व्यामोहो,पूर्वाग्रहों से विमुक्त करता है -और यह उक्ति शायद सबसे सटीक संस्कृत साहित्य के अध्ययन पर ही चरितार्थ होती है -सा  विद्या या  विमुक्तये! इसका एक अनुभव मैंने अभी ताजा ताजा ही किया जब मेरी इस पोस्ट पर जहां पुरुषों का ही वर्चस्व बना रहा -मुक्ति आयीं, बेहिचक  अपने विचार रखें और थोडा चुहल भी किया .कोई ग्रन्थि नहीं कोई पूर्वाग्रह नहीं -पूरी साफगोई और स्पष्टता -केवल और केवल  इसलिए कि उनके अकादमीय आग्रह और उनके व्यक्तित्व में कोई द्वंद्व, कोई क्लैव्यता नहीं है -वे विमुक्त हो चली है तमाम अनावश्यक प्रतिरोधों ,मनोग्रंथियों  से ....

ऐसे व्यक्तित्व हिन्दी ब्लागजगत के जीवंत धरोहर हैं - उनसे यह भी आशा है कि वे जितना भी संभव है यहाँ समय दें और इस जगत को अपने अवदानों से निरंतर समृद्ध  करें -यद्यपि उनके सामने उनका कैरियर है और निश्चित ही उनकी प्राथमिकता भी वही होना चाहिए मगर मेरी इच्छा है कि वे यहाँ भी अपनी प्रशस्त उपस्थिति का अहसाह निरंतर कराती रहें .मित्रों, एक संस्कृत की विदुषी के बारें में लिखते हुए मेरी  भाषाई अत्यल्पज्ञता  बार बार आगाह सी कर रही है  और सायास ऐसे शब्द भी यहाँ उत्कीर्ण हो रहे है  जो आप में से बहुतों को सच ही बनावटी से लग रहे होंगे मगर मैं करुँ भी तो क्या -संस्कृत के प्रति मेरी शायद  जन्मजात सी रागात्मकता ऐसा किये हुए है मुझे और कदाचित असहज भी   .काश मैं संस्कृत का छात्र हुआ होता तो  यह जीवन धन्य हो गया होता .मैं अपनी संस्कृत के प्रति इस चाह को मुक्ति में ढूंढता हूँ!


मित्रों ,आपने मेरी दृष्टि से मुक्ति को देखा और अब आह्वान है कि उन्हें अपनी नजरों से भी देखिये  -मुझे पूरा  विश्वास है कि वे आपको भी प्रभावित किये बिना नहीं रहेगीं .
पुनश्च: चिट्ठाकार चर्चा में मुख्यतः चिट्ठाकार के व्यक्तित्व पर ही चिट्ठाकार -चर्चाकार का फोकस रहता आया है किन्तु उड़न जी के एक कमेन्ट के संदर्भ में मुक्ति विरचित  वात्सल्य बोध परिपूरित यह और यह  पोस्ट पढना चाहें!

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

ब्लॉग जगत में वर्तनी सुधारो अभियान -एक अकेला थक जायेगा साथी हाथ बढ़ाना!

अपने गिरिजेश भाई इन दिनों तन मन लगन से एक अभियान में लगे हुए हैं -अपने वर्तनी सुधारों अभियान से हर किसी की ऐसी तैसी करने में पिले पड़े हैं .हाय बटोर रहे हैं . कभी मैं भी इस काम में तन मन  से मुब्तिला होकर लोगों की बद दुआएं   बटोरता फिरा था. सिद्धार्थ भाई का बड़ा सहारा मिला था उन दिनों .फिर यह 'बेकाम का काम' दिनों दिन  उबाऊ बनता गया मेरे लिए -और कुछ अपने सुहृद जन भी वर्तनी की गलतियों की ऐसी ढेर लगा बैठे कि मैं दबता  गया अपनी और उनकी गलतियों के  नीचे -सहसा कमान छूट ही गयी  अभियान की मेरे हाथो और मेरे भाग्यवश आदरणीय दिनेश जी के हाथ लग गयी .काफी बहस मुबाहिसा हुआ .एक मोहतरमा बार बार यह समझाती रहीं  (मानो सब यहाँ बुद्धू बकलेल ही  हैं ) कि महत्वपूर्ण संवाद है शब्द नहीं ...शब्द वब्द ब्रह्म नहीं है सब पंडितो के चोचले हैं -बात समझ में आ जाय चाहे अंखियों  की भाषा से या फिर लात घूँसा से, अभीष्ट इतना भर है .बात सच भी लगती है संचार /व्यवहार वैज्ञानिको की राय में महज ९ प्रतिशत संचार - संवाद वाचिक / भाषिक है .बाकी तो हाव भाव भंगिमाएं मुद्राएँ और इशारे हैं जो जैव /मानव संवाद का दामन थामे हुए हैं -फिर बार बार ये वर्तनी विलाप क्यों?  

गिरिजेश जी इन बातों का उत्तर देगें यही संबल है अब तो क्योंकि मैंने अपना  हाथ   इस प्रोजेक्ट से काफी पहले ही खींच लिया था -यह पोस्ट इसलिए लिखने को बाध्य होना पडा कि जिस कंटकाकीर्ण मार्ग को मैं त्याग चुका हूँ  छोटे भाई निर्भीक उसी पर बढे जा रहे हैं बेपरवाह ,आत्मलीन या शायद आत्ममुग्ध भी ..यह नहीं देख रहे हैं कि लोगों की आहें अब उनके दामन तक पहुंचने लगी हैं .मैं गिरिजेश जी को डिफेंड करना चाहता हूँ इसलिए आज यह सब लिख रहा हूँ -मित्र जनों ,गिरिजेश भाई यह जान बूझ कर नहीं कर रहे हैं यह उनसे हो जा रहा है -यह एक वृत्ति है -वर्तनी दोष देखने पकड़ने की वृत्ति -मैं इसका भुक्तभोगी हूँ इसलिए यह मर्म समझ रहा हूँ -ऐसे व्यक्ति को राह चलते विज्ञापन बोर्डों के चित्ताकर्षक दृश्य बाद में दिखते हैं वर्तनी दोष पहले ....यह एक आब्सेसन है मगर है लोक कल्याण और शुचिता  बोध से प्रेरित ...नहीं तो गिरिजेश जी जैसे व्यस्त व्यक्ति (वे एक बड़े उपक्रम में अधिशासी  हैं)  को कहाँ इतनी फुरसत कि वे  हर किसी की  पोस्ट पर वर्तनी जांचते चले .मगर वे सर्वजन हिताय इस काम में जुटे हुए हैं मगर क्या वे अकेले इस काम को पूरा कर पायेगें ? आपका सहयोग चाहिए .

कई जगहों पर उन्होंने वर्तनी दोष को इंगित करते हुए लम्बी लम्बी टिप्पणियां की हैं -उदाहरणार्थ -
श्रुंग को श्रृंग कीजिए। वैसे शुद्ध तो शृंग होगा - खटकेगा क्यों कि उचित टाइप सेट नहीं है।
निम्न संशोधन भी अपेक्षित हैं:
द्रष्टि - दृष्टि
युध्ध - युद्ध
चिडीयों - चिड़ियों
श्रध्धा - श्रद्धा
विद्वत्ता - विद्वता
परम्मात्मा - परमात्मा
सीखलाये - सिखलाये, अच्छा हो कि सिखाये कर दें
चुडियाँ - चूड़ियाँ
 
 
 
 
बानगियाँ तो और भी हैं मगर बात समझने और समझाने के लिए यही  काफी होनी चाहिए.
यह अभियान किसी अकेले एक बूते का नहीं है -एक अकेला थक जायेगा साथी हाथ बढ़ाना साथी  रे ..... 
 
 
 

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

आज सुनिए शिव तांडव स्त्रोत्र ....

आज बाबा की नगरी में सब कुछ बाबामय हो गया है -बम बम बोल रही है काशी .हमने श्रीमती जी के साथ  आज  शिव तांडव का पाठ किया एक लम्बे अंतराल के बाद ...पिता जी ने बचपन में कंठस्थ कराया था .कुछ उच्चारण दोष है -जिसे विद्वतजन क्षमा करेगें .यह स्त्रोत्र  राक्षस राज रावण कृत कहा गया है -कथा है कि रावण ने कैलाश पर्वत ही उठा लिया था और जब पूरे पर्वत को ही लंका ले चलने को उद्यत हुआ तो भोले बाबा ने अपने अंगूठे से तनिक सा जो दबाया तो  कैलाश फिर जहां था वहीं अवस्थित हो गया ...शिव के अनन्य भक्त रावण का हाथ दब गया और वह  आर्तनाद कर उठा ....शंकर शंकर -अर्थात क्षमा करिए क्षमा करिए... और स्तुति करने लग गया जो कालांतर में  शिव तांडव स्त्रोत्र  कहलाया .आप भी श्रवण लाभ करें .अंतर्जाल पर यह पाठ अन्यत्र भी त्रुटिहीन और स्वर साधकों की आवाज में भी उपलब्ध है .
अर्थ यहाँ देख सकते हैं.

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

रिटर्न टू अल्मोड़ा से ....कृपया ध्यान दें , वयस्क सामग्री है !

इंटर गवर्नमेंटल पैनेल आन क्लाईमेट चेंज (IPCC ) के मुखिया और इसी संस्थान के लिए नोबेल पुरस्कार झटक लेने वाले अपने राजेन्द्र पचौरी साहब इन दिनों सुर्ख़ियों में हैं, मगर इस बार कारण दूसरे हैं . हिमालय के ग्लेशियरों के पिघल जाने  संबंधी २००७ में किये गए अपने दावों में कतिपय गलतियों के लिए उनकी खिंचाई अभी थमीं नहीं थी कि एक दूसरा मामला उनकी जग हंसाई का कारण  बनता जा रहा है .यह दूसरा मामला दरअसल उनके रोमांटिक उपन्यास रिटर्न टू अल्मोड़ा को लेकर है जिसके हाट विवरणों को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में बवेला मचा हुआ है .
 कृपया ध्यान दें ,आगे वयस्क सामग्री है -
 रिटर्न टू अल्मोड़ा  की कहानी का  मुख्य पात्र  एक मौसम विज्ञानी  संजय नाथ है जिसके साथ खुद पचौरी साहब का स्पष्ट तादात्म्य झलकता है -साठोत्तरी जीवन में पदार्पण कर चुके संजय नाथ अपने संस्मरणों का साझा करते हैं पाठकों से -कैसे वे भारत के एक कसबे से निकल कर पेरू से होते हुए अमेरिका पहुंचे और उनकी एक अध्यात्मिक यात्रा पूरी हुई .उनके उपन्यास में वनों  को विदीर्ण करते ठेकेदार माफिया और भ्रष्ट राजकीय तंत्र के साठ गाठ  का खुलासा तो है मगर उपन्यास के गर्म वृत्तांत पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों और साहित्यकारों और मीडिया के बीच चर्चा का विषय बन चुके है जो चटखारे ले लेकर उन्हें पढ़ और एक दूसरे से बतिया रहे हैं -नोबेल प्रतिष्ठा प्राप्त एक जग प्रसिद्ध शख्सियत की  यौनिक आसक्ति/फंतासी का मसला  गरमाया हुआ है .कई विवरण तो बहुत ही गरम हैं -यहाँ उद्धृत करने में की बोर्ड पर थिरकती अंगुलियाँ  शायद  और भी थरथरा उठें, मगर कुछ बानगी तो न चाहते  हुए भी  जी कड़ा करके यहाँ दे रहा हूँ -बस गुजारिश यही है कि मित्रगण मुझे बख्श देगें -भैया इदं न मम -यह मेरा नहीं पचौरी साहब का जज्बा है और मैं तो उनके जज्बे को देख खुद भी  हतप्रभ हूँ -प्रतिभा और सेक्स फंतासी में जरूर कोई न कोई सम्बन्ध है जरूर -हा हा -लीजिये मुलाहिजा फरमाएं सीधे रिटर्न टू अल्मोड़ा से .......

"अपनी  महबूबा शिरले मैक्लीन  से नैनीताल में  संजय के मिलन का यह पहला मौका था  -वह खुद संजय को बेडरूम में ले गयी ....उसने पहले गाऊँन उतारा ,नाईटी को भी नीचे सरका दिया और  शरीर को रजाई के भीतर  ढकेल दिया ...संजय ने उसे बहुओं के घेरे में ले लिया   और ताबड़तोड़  चुम्बनों की बरसात कर डाली...धीरे धीरे बाहुओं का  कसाव और चुम्बनों की  गहराई बढ़ती गयी ....
मैक्लीन फुसफुसाई ,सैंडी .मुझे आज कुछ नया अनुभव हुआ ....मेडिटेशन के ठीक बाद  तो तुम गजब ढाते हो .....क्यों नही तुम हर मेडिटेशन सेशन के बाद एक यह सेशन भी करते ....."

यह तो बस एक छोटी सी बानगी है .मुख्य पात्र के नारी उभारों  के प्रति असीम ललक के वृत्तांत से पृष्ठ दर पृष्ठ रंगे हुए हैं ...... यौनिक आनंदों के खुल्लम खुलाखुल्ला उल्लेख तो उपन्यास में खुला खेल फरुखाबादी से भी आगे बढ़ता  चला गया  है.
एक और बानगी ...."संजय ने एक स्थानीय  सावली  सलोनी कन्या को विनय के बिस्तर पर देखा ... उसकी भी सहसा एक अतृप्त कामना बलवती हो उठी ....उसने  अपने कपड़ों को उतार फेंका और संजना  के शरीर की स्पर्शानुभूति में जुट गया .खासकर उभारों को.........लेकिन अतिशय उत्तेजना के चलते शुरू होने के पहले ही वह ढेर हो गया था ......
.....उसने कन्धों को थोडा पीछे की ओर पुश किया इससे उन्नत उभार आगे की ओर और उभार पा गए ....जिन्हें देखकर उसकी सांसे धौकनी हो चलीं ...."
उपन्यास के कई वृत्तांत समूह यौनिक आनन्द पर फोकस होते हैं .एक दृश्य में तो नायक चलती ट्रेन की सहयात्री के रेशमी  लाल रुमाल को झटक कर   उसी के ही सहारे  अपनी पिपासा  शांत कर लेता है . 

यूनाईटेड नेशंस के अधिकृत एक वैश्विक संगठन का बॉस और नोबेल सम्मान से जुड़े एक प्रखर मेधा के वैज्ञानिक के लिए ऐसा क्या आन पड़ा कि वह भारतीय सन्दर्भ में अश्लीलता से भरे एक सतही  रूमानी उपन्यास की रचना कर बैठा ? उपन्यास का विमोचन अभी हाल ही में मुम्बई में उद्योगपति  मुकेश  अम्बानी के हाथों हुआ -प्रतिभा का एक और अधोपतन! सर्वे गुणा  कांचन माश्रयंते ....

पचौरी  अपने इन कृत्यों से भारतीयों के सामने कौन सा आदर्श स्थापित कर रहे हैं ?-कहीं इस व्यक्ति को पहचानने में पूरी दुनिया को कोई  धोखा तो नहीं हुआ है ? 
चाहें तो कुछ यहाँ,  और यहाँ  भी देख सकते हैं .


 


रविवार, 7 फ़रवरी 2010

नायक भेद पर एक फगुनही पोस्ट

नायिका भेद श्रृंखला के समापन पर सुधी मित्रों /पाठकों के अनुरोध को शिरोधार्य करते हुए मैंने वायदा किया था कि कभी मैं  नायक भेद प्रबंध काव्य का पारायण भी कराऊंगा आप सब को ...फिर इसके लिए फागुन से उपयुक्त अवसर भला और कौन मिलेगा -कहते हैं कि इस महापर्व पर जाने अनजाने कुछ गुस्ताखी हो भी जाय तो वह अनदेखी हो जाती है -उसकी नोटिस विज्ञ जन नहीं लेते .इस फागुन इम्यूनिटी कवच को धारण कर मैं अवसर का भरपूर लाभ उठा नायक भेद प्रसंग को निपटा ही लेना चाहता हूँ -पाई समय जिमि सुकृत सुहाये ......मुझे पता नहीं यह नायक विमर्श एक पोस्ट में ही सिमट जायेगा या लम्बा खिचेगा क्योकि नायिकाओं के मुकाबले नायक -चर्चा छ्ठांश भी नहीं है .और दूसरे मैं इस विषय के एक "ले परसन" की तरह ही यह चर्चा आपसे करना  चाहता हूँ -जग जाहिर है मैं इन विषयों का न तो शास्त्रीय और न ही साहित्यिक विद्वान् हूँ ,चूकि ज्ञान के सरलीकरण/ लोकगम्यता का प्रबल पक्षधर हूँ इसलिए अपने अल्पज्ञान और अर्धज्ञान को भी लोगों से बाँटने को उतावला हो जाता हूँ यद्यपि यह खतरनाक है ,कहा भी गया है अधजल गगरी छलकत जाय .मगर  मौसम फागुन का हो और मदन अभिलाषाएं जोर पकड़ रही हों तो फिर गगरी आधी क्या पूरी की पूरी उलीच जाने को अकुला उठती है .


नायक भेद पर आचार्यों के मतानुसार नायिका के प्रति व्यवहार के आधार पर  जो  नायक - वर्णन मिलता है  वही सबसे सीधा और सरल है .उत्तम नायक वह है जो हर प्रकार से नायिका को प्रसन्न रखता है .मध्यम वह जो न तो नायिका को प्रसन्न रखने और न ही उसे रुष्ट करने के प्रति प्रयत्नशील होता है .और अधम वह है जो नायिका के मान  के प्रति उपेक्षाशील रहता है-
उत्तम तिय को लेत रस ,मध्यम  समय विचार ,अधम पुरुष सो जानिये निलज्ज निशंक आगार (उद्धरण:सुधानिधि )
कुछ  विद्वानों ने नायकों को मानी ,चतुर, अनभिग्य आदि नामों से भी जाना है  -चतुर के दो भेद हैं जिनमे वचन व्यंग -समागमचतुर और च्येष्ठाव्यंगसमागमचतुर आते हैं मतलब एक तो केवल वाग्विलास तक ही सीमित रहकर आनंदानुभूति करता है दूसरा क्रियारत भी होता है -इसलिए सहज सरल भाषा में एक वचन चतुर और दूसरा क्रियाचतुर कहा  गया है.एक विद्वान् हुए हैं ब्रह्मदत्त ,उन्होंने तो नायकों का विभाजन  कतिपय गूढ़  निहितार्थों के साथ वृषभ, मृग तथा अश्व के रूपों  में किया है और यह कामसूत्र/शास्त्र से पूर्णतया प्रभावित है .अब फागुन  और होली  पर विज्ञजन निहितार्थों को समझेगें ही ,विस्तारण कदाचित आवश्यक  नहीं है . 



यहाँ यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि नायक भेद का विवेचन भी प्रुरुष के दृष्टिकोण से ही  है और इसलिए पुरुष की काम विषयक फंतासियों से वह अछूता नहीं है .इसमें नारी की भावना का प्रतिबिम्बन निश्चय ही सहज और सटीक रूप में नहीं हुआ लगता है क्योंकि आधुनिक मनोविज्ञान और यौनविज्ञान  भी अब यह मानता है कि पुरुष की अपेक्षा नारी का रति संबंधी मनोभाव बहुत जटिल और विषम है -बहुधा  अगम्य सा है (नारी ब्लागरों से ज्ञानार्जन की दृष्टि से इस पर प्रकाश डालने का अनुरोध है -बुरा न मानो होली है के रक्षा कवच के साथ हा हा ) .
आज बस इतना ही -आग लगाने {अंतराग्नि} के लिए  इतना ही क्या काफी नहीं है?

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

वसंत का शंखनाद!

हिन्दी ब्लागजगत  में वसंत पंचमी से बालक बसंत की  फिफिहरी जो बजनी शुरू हुई अब वह  शंखनाद बन गयी है .इस बार की उसकी चतुरंगिनी सेना की अगुवाई  कर रहे सेनापतियों की एक सूची यहाँ देखी जा सकती है .संक्रामकता की पूरी आशंका है .तरह तरह के गुप्त सुषुप्त संकेत और मनुहार शुरू हो गए हैं .मन  महुआ और तन फागुन होने लग गया है .यह प्रेमाकुलता का मुखर पर्व है .मनुष्य का तो कोई निश्चित ऋतुकाल नहीं होता अर्थात उसका हर पल ऋतुकाल ही  है मगर वसंत के दिनों की यह मादकता सोचने पर विवश करती है .आज नहीं हजारो वर्षों  से मदनोत्सव मनाया  जाता रहा है -ऋषि मुनियों तक ने इसके महात्म्य को स्वीकारा और वसंत ने उनके दंभ को पराभूत किया .जब आदि देव शंकर और मर्यादा पुरुषोत्ताम श्रीराम ही वसंत के पुष्प वाणों से आहत हो उठे हों  तो दूसरे तपस्वियों, पामर देहियों का तो  कहना ही क्या ?

उसी कामदेव ने लगता है अपनी चतुरंगिनी सेना के साथ ब्लागजगत पर धावा बोल दिया है .तब आपन प्रभाउ विस्तारा ,निज बस कीन्ह सकल संसारा ....सदाचार जप जोग बिरागा ,सभय बिबेक कटकु सब भागा और सबके हृदय मदन अभिलाषा लता निहार नवहिं तरु शाखा जैसी स्थिति बस होने ही वाली है. मगर न जाने क्यूं मुझे प्रेमातुरता का यह मुखर रूप सदैव  आतंकित करता रहा है . प्रेम क्या शंखनाद का मुहताज है ? बशीर बद्र की इन पक्तियों को देखिये -
मुझे इश्तिहार सी लगती  हैं ये मुहब्बतों की कहानियां 
जो कहा नहीं वो  सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो 
प्रेम  तो बस अनुभूति का विषय है .और सार्वजनिक करने का मामला नहीं है ,भले ही वह जगजाहिर हो जाय यह बात दीगर है .एक और शायर पूरी सन्जीदगी  से कहता है कि उसके पास बहुत कुछ तो सारी दुनिया को सुनाने के लिए हैं मगर चंद अशआर तो बस दिल में बसी उस और सिर्फ उस माशूका के लिए ही हैं .

मित्रों, मेरी गुजारिश है प्रेम का आतंक यहाँ मत शुरू करें -यह एक बहुत ही सुकोमल नाजुक अनुभूति है .होली की उद्धतता कभी कभी शालीनता की सारी हदे पार कर जाता है और बात बनने के बजाय बिगड़   जाती है .मुझे डर  है  कि कहीं मैं भी संक्रामकता के चपेट में आकर हुडदंगीं  न बन जाऊं और अपना भी कुछ नुक्सान कर डालूँ -पहले के ही भारी नुक्सान की अभी भरपाई नहीं हो पाई है .तो यह मेरा डर ही आज यह अपील  करवा रहा है  मुझसे .....

बाकी तो आप सब खुद जिम्मेदार और होशियार हैं .....थोडा लिखा अधिक समझना .हा हा (इतना लिखने के बाद भी ) .

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

टिप्पणी क्या कोई कर्मकांड है?

इन दिनों बहुत व्यस्तता है -राज काज नाना जंजाला! सिद्धार्थशंकर  त्रिपाठी जी से कल बात हुई उन्होंने भी अपनी इसी पीड़ा का इजहार किया .लेकिन ब्लागरी है मुई कि अपनी ओर बरबस खींचती ही रहती है -किसी जादूगरनी की ही तरह -बार बार मोहभंग होने के बाद भी.यह मनई तीन वर्ष से बिना टंकी( हिन्दी ब्लॉग शब्दावली का एक शब्द,वे जो नहीं जानते पर जान ही जायेगें  ) पर चढ़े लगातार यहाँ खुद उत्साह वर्धित होता  रहा है भले ही   लोगों का  उत्साह वर्धन कर पाया होया नहीं .हाँ कुछ लोग मुझसे नाराज भी हुए हैं और उनकी भयंकर  नाराजगी का दंश लिए भी मैं निर्लज्जता के साथ यहाँ डटा हूँ -निश्चय ही कोई "इदं न मम " का भाव/मर्म  ही है जो मुझे रोके है ,बोरिया बिस्तर लपेटने  से . मगर यह भी सच है हमारे यहाँ रुकने न रुकने से किसी को भी या पूरे ब्लागजगत को कोई फर्क नहीं पड़ता /पड़ेगा .कोई भी हम सरीखा अकिंचन अपरिहार्य नहीं है यहाँ!

अब आज की शीर्षक चर्चा ..... देखिये मानव मन  ही ऐसा है कि वह अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है .ऐसा न होता तो चमचे चाटुकारों का बिलियन डालर का व्यवसाय न होता .जिनके चलते देशों के सरकारे हिल डुल जाती हैं .उनके पद्म चुम्बन से पद्म पुरस्कारों तक में भी धांधली हो जाती है .तो वही मानव मन  यहाँ ब्लागजगत में अपनी पोस्टों पर टिप्पणियाँ भी चाहता है .कौन नहीं चाहता ? मैं नहीं चाहता या समीर भाई नहीं चाहते . मगर हम उतनी उत्फुल्लता से दूसरों के पोस्ट पर टिप्पणियाँ नहीं  करते .समीर भाई अपवाद हैं . इस टिप्पणी शास्त्र पर बहुत चर्चा पहले भी हो चुकी है -मैं विस्तार नहीं करना चाहता .मगर यह भी है कि टिप्पणी की चाह एक व्यामोह नहीं बन जाना चाहिए .एक व्यसन न हो जाय टिप्पनी पाने का .आप श्रेष्ठ रचोगे समान धर्मा लोग मिलगें ही ,टिप्पणियाँ भी झकाझोर आयेगीं -आखिर ससुरी जायेगीं कहाँ ? मगर शर्त वही श्रेष्ठता की है .अन्यथा पीठ खुजाई का अनुष्ठान टिकाऊ नहीं है .संत लोग कहीं डोल डाल  लिए  तो  फिर मजमा उखड़  जाएगा और सन्नाटा छा जाएगा .संत लोग  कोई टिकाऊँ होते हैं कहीं?

मैं राज की बात बताता हूँ- पीठ खुजाऊ टिप्पणियाँ मैं भी करता हूँ मगर काफी कम .मैं ब्लागवाणी /चिट्ठाजगत स्क्राल करता जाता हूँ जो रुचता है वहां टिप्पणी करता हूँ .इसलिए कई बार टिप्पणियों का आग्रह मुझे क्लांत कर जाता है .टिप्पणी कोई अनुष्ठान नहीं है मेरे लिए कि मूढ़ मगज करता रहूँ चहुँ ओर ...
बाकी फिर अभी भागना है आफिस !

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