हिन्दू समाज का जिन बातों ने सबसे ज्यादा अहित किया है उनमें जाति पाति की भावना एक है .आज जाति पाति की भावना सभ्य समाज का एक सबसे बड़ा कोढ़ है और दुःख की बात यह है कि यह भावना कथित ऊंची जातियों में ज्यादा बलवती दिखती है .मैंने एक ब्लॉग आलेख पढ़ा जिसमें जाति बोध से प्रेरित होने के कारण यह बताने का प्रयास किया गया कि भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ.राजेन्द्र प्रसाद, महान धर्मवेत्ता और दार्शनिक विवेकानन्द आदि महापुरुष कायस्थ थे...मैंने वहां यह टिप्पणी की -
"महापुरुषों को किसी जाति की श्रेणी में रखना उचित नहीं है .जातियां महापुरुषों से हो सकती हैं मगर महापुरुष किसी जाति के नहीं ....." (स्मृति के आधार पर )..मुझे दुःख हुआ कि मेरी टिप्पणी प्रकाशित न कर मुझे पूर्वाग्रही माना गया ..हाँ कई दूसरे सुधी टिप्पणीकारों ने जब इस ओर संकेत किया तो मुझे अपनी धारणा पर स्थिर रहने का बल मिला ..."
वैसे तो ब्लॉग लेखन ब्लॉग स्वामी को अपने मन का कुछ भी लिखने का छूट प्रदान करता है मगर सार्वजनिक लेखन में कुछ सामाजिक सरोकारों को ध्यान में रखना होगा ...आज हिन्दी ब्लॉग लेखन धर्म ,सम्प्रदाय और अब जाति आह्वान की ओर उन्मुख होता दिख रहा है -इसके अंतर्निहित कारण हो सकते हैं -चलो स्वजाति -प्रेरण से और कुछ नहीं तो कुछ टिप्पणियाँ ,कुछ सहानुभूति और कुछ जाति समर्थित दबदबा भी कायम हो ही जायेगा ....यह सचमुच दुखद है कि समाज में आज भी कई ऐसे आर्थोडाक्स बुद्धिजीवी मिल जायेगें जो अपने जाति बोध से निकल नहीं पाए हैं -मैं राजनीति के घिनौनेपन की तो बात ही नहीं कर रहा -मैं कुछ और लोगों की बात कर रहा हूँ जो जिम्मेदार पदों पर हैं ,अच्छा ख़ासा पढ़े लिखे हैं मगर अपनी जाति व्यामोह से उबर नहीं पा रहे हैं ..वे कहते हैं कि चाणक्य ब्राह्मण था ..फला फला ऋषि मुनि जिनकी हम संतानें हैं और जिनसे हमारे गोत्र बने हैं ब्राह्मण थे......मैं उनसे पूछता हूँ महाकाव्यों, पुराणों के संकलनकर्ता वाल्मीकि -वेदव्यास क्या थे? तो वे बगले झाँकने लगते हैं! हरिवंश राय बच्चन भले ही कायस्थ के घर पैदा हुए थे मगर उनके 'आचरण' तो ब्राहमण के रहे (ब्राह्मण का अर्थ है जो लोगों के मोहजनित अज्ञान को दूर करे ) ....उन्होंने पंजाबी भद्र महिला से शादी की और परिवार को एक ऐसा संस्कार दिया कि आज अमिताभ बच्चन यह नहीं मानते कि वे किसी जाति से सम्बन्धित हैं -उनका पूरा परिवार एक आदर्श भारतीय परिवार है ...
ब्लॉग जगत में जाति आह्वान और जाति वंशावली /विरुदावली यहाँ पहले से ही बढ रहे अलगाववाद और वैषम्य को और बढ़ा देगी -शायद ही कोई कथित जाति हो जिनमें महापुरुषों ने आँखे न खोली हो ..राजा राम तो ठाकुर ही थे,कृष्ण यादव और कितने ही हमारे महान आर्ष ग्रन्थों के रचनाकार शूद्र! फिर क्या बात बनी ? हम इससे क्या साबित करेगें ? मुझे दुःख है कि कई महानुभावों ने ब्लॉग लेखिका को किन्ही निहित कारणों से यह आश्वश्त किया कि उस पोस्ट से जाति की बिल्कुल बू नहीं आ रही है ..मैं सोचता हूँ जो व्यक्ति जाति पाति से ऊपर उठ कर अपने समाजिक सरोकारों को नहीं निभाता वह एक अच्छा नागरिक नहीं है .और उस पर मुगालता यह कि वे समाज की सेवा करने को तत्पर हैं ... आज तक के मेरे लम्बे सामाजिक जीवन में कई लोगों ने मुझसे ब्राहमण होने की दुहाई देकर छोटे मोटे लाभ अर्जित करना चाहा है मैंने उन्हें खूब लताड़ा है -मुझे कितने ब्राह्मणों को कहना पड़ा है कि मात्र ब्राह्मण के यहाँ जन्म लेने से कोई ब्राहमण नहीं हो जाता न तो केवल जनेऊ धारण करने और लम्बी चुटिया रख लेने से ..चुटिया रखने वाले विद्वानों को मैं हंसी मजाक में चोटी का विद्वान् कहता हूँ -
हमें जाति पाति को नहीं बल्कि व्यक्ति को महत्व /सम्मान देने का संस्कार बच्चों को देना चाहिए ....मुझे गर्व है कि मैं और मेरा परिवार जाति पाति में विश्वास नहीं रखता यद्यपि इस भावना से हमेशा पीड़ित प्रताड़ित भी होता आया है ...जाति से ऊपर उठिए मित्रों ......






