आज पिता जी की पुण्य तिथि है. आज उन्ही की एक कविता श्रद्धा -सुमन के रूप में उन्ही को अर्पित है -त्वदीयं वस्तु गोविन्दम तुभ्येव समर्पयामि.......
अथ नेता अर्ध चालीसा
दोहा:
बंदौ नेता पद कमल,सब सुख धन दातार
कम्प्यूटर नहीं कह सकत,माया अमित अपार
चौपाई
यद्यपि सब भगवान बखाना, नेता अनुपम अगम महाना
नेता चरित अगाध अपारा,समुझत कठिन कहत विस्तारा
कथनी करनी कहि नहिं जाई,क्षण प्रतिक्षण विस्मय अधिकाई
बहु विधि सब्ज बाग़ दिखलावे,पीछे बहुरि न पूछन आवे
मतदाता सब खोजत फिरहीं, अलख ब्रह्म इव देख न परहीं
महा महा मुखिया सब जोहत,माथा ठोक ठोक पुनि रोवत
पत्रकार निशि दिन यश गावें,सहजई बढियां माल उड़ावें
ठेकेदार सब जय जय करहीं,बिनु श्रम लूटि तिजोरी भरहीं
जो व्यवसायी चंदा देई,कोटा परमिट सब कुछ लेई
तस्कर अपराधी सब मिलते,'रस्म' चुकाई मधुर फल चखते
दोहा:
नहि विद्या नहिं बाहु बल ,बिनु धन करत कमाल
संबंधी तक हो रहे, झटपट मालामाल
चौपाई
धन्य वचन अद्भुत चतुराई,ह्रदय भेद कोऊ जान न पाई
लोकतंत्र की अलख जगाते,पोलिंग बूथ कैप्चर करवाते
समाजवाद की माला जपते, फाईव स्टार होटल में रमते
जातिवाद का मन्त्र जगाते,धर्म निरपेक्ष गीत बहु गाते
असमाजिक जन बहु आते,अभय दान पा मंगल गाते
कला शास्त्र विज्ञान न आवा,नित नूतन अभिनन्दन पावा
देश सभ्यता सब कुछ जाए, सत्ता सुख नहिं जाने पाए
लोकलाज मर्यादा हीना ,'सब कुछ' करत न होत मलीना
जो कोऊ तुम्हरो यश गावे, विहसि प्रशासन कंठ लगावे
झोला बस्ता तक जो ढोवे,पुलिस सभीत सशंकित होवे
प्रभुता कोऊ नहिं सके बखानी,आई ऐ एस तक भरते पानी
दोहा:
धन्य धन्य तुम धन्य हो, तव प्रताप को जान
देवता सब रोवत फिरें,मौन भये भगवान
-डॉ.राजेन्द्र प्रसाद मिश्र
(रचना काल:१९९५;'राजेन्द्र स्मृति' से )


