मुझे पता था कि एक ब्लॉग मंडली (खल मंडली नहीं कह रहा इसलिए यह मन में भी न लाईयेगा ) एक दिन पहले ही लखनऊ पहुँच रही है और मुझसे भी अपेक्षा थी कि मैं पहले ही पहुँच जाऊं मगर कोई मोटिवेशन ही न था सो सबेरे वाली गाडी (बनारस) से पकड़ी और लखनऊ पौने दस बजे पहुँच गया ...मैं टुकड़ों टुकड़ों फेसबुक पर कुछ अपडेट डालता जा रहा था .और दूसरों के पढता जा रहा था ..चेला चीनी संतोष त्रिवेदी (गुरु गुड रह गए चेला चीनी हो गए ) भी फेसबुक पर कुछ लिख पढ़ रहे थे ...मैंने रास्ते में ही नोटबुक पर कुछ लिख पढ़ लिया था कि कहीं कुछ बोलना ही न पड़ जाय ..अब मुझ जैसा वरिष्ठ गरिष्ठ ब्लॉगर यह कह कर कैसे छूट सकता है कि अगर बोलवाना था तो पहले बताना था न....और मेरी आशंका भी सच निकली ...कोई आदरणीय अतिथि नहीं आये तो मुझे भी अचानक ऐन वक्त उदघाटन सत्र के विशिष्ट डायस पर स्थानापन्न तौर पर बुला लिया गया और मैंने कुछ औपचारिक ना नुकर करके यह सुअवसर हाथ से जाने न दिया ....हालांकि मंच पहले से ही सुशोभित था और शिखा वार्ष्णेय जी की उपस्थिति उसे एक अंतर्राष्ट्रीय गरिमा भी प्रदान कर रही थी ..वे जितना सुन्दर फोटुओं में लगती हैं वास्तविक रूप में उससे अधिक सुन्दर और सौम्य हैं ....और उनके बगल में बैठना भी मेरे लिए कोई कम सौभाग्य नहीं था ..हालांकि मैं हिचकिचा रहा था और मंच तक पहुंचते ही जैसे ही एक आख़िरी कुर्सी पर पसरा था कि संचालक दिल्लीवासी ब्लॉगर डॉ .हरीश अरोड़ा ने घुड़क दिया कि संचालक की सीट रिक्त रखी जाय (अब संचालक को बैठने को का काम?) ..
बाएं से सुभाष राय ,शिखा वार्ष्णेय ,मैं सत्राध्यक्ष शैलेन्द्र सागर ,मुख्य अतिथि उद्भ्रांत जी
बहरहाल बेआबरू होकर कुर्सी छोड़ा तो उससे बेहतर जगहं मिल गयी -शिखा जी के बगल और बिलकुल डायस-मध्य की जगहं ..हालांकि शिखा जी ने तनिक भी लिफ्ट नहीं दी और अपनी तटस्थ गरिमामयी उपस्थिति बनाए रखने में सफल होती रहीं... यह कुछ वैसा ही है जैसा कि प्लेन के सफ़र में बगल के यात्री भी अक्सर पूरी यात्रा तक कुछ नहीं बोलते -यह एक वह परिप्रेक्ष्य है जो हाई सोशल आर्डर के निरंतर इम्पेर्सोनल होते जाने की कहानी कहता है ...मैंने अपनी एक विज्ञान कथा मोहभंग में इस पूरे भाव चित्र को काफी पहले ही शब्द दिए हैं ....आज मंच के डिग्नैटेरीज भी इसी संस्कृति का निर्वहन करने लगे हैं ....और अपनी धीर गंभीर उपस्थिति बनाए रखने को विवश होकर रह गए हैं ..दूसरी ओर अपने संतोष त्रिवेदी जैसी जीवंत शख्सियत है जिनकी निजी स्पेस में बार बार घुसपैठ असहज सी तो करती है मगर यह भी याद दिलाती रहती है हम अभी मशीन नहीं हुए, हाड़ मांस के ही प्राणी हैं -और मुझे मंच पर जाने का मौका मिलते ही यह भी लगा कि चलो कुछ देर तो चेले चीनी के नोच खरोंच से पीछा छूटा..मगर उनकी यह लागी ऐसी है कि छूटती नहीं अपने नौके कैमरे के साथ मंच पर भी आ पहुंचे और हे भगवान कैसी कैसी तस्वीरें खिंचवाई हैं तूने उनसे, यह तो बाद में पता चलेगा ....उनका कैमरा और वे खुद पूरे हाल और मंच तक चक्कर घिन्नी की तरह घूमते रहे और कोई आश्चर्य नहीं कि महराज के कैमरे से कुछ चित्र ब्लैकमेलिंग वालों की चान्दी न बन जायं -खबरदार चेले राम ऐसी कोई हिमाकत करोगे तो ठीक नहीं होगा ....
सचमुच यह एक सम्मान समारोह ही था,सम्मलेन या विमर्श सत्र आदि कहना सटीक नहीं है -बिल्कुल परिकल्पना ब्लॉगर सम्मान !..किसी ने कहा ब्लागर कम्युनिटी का आस्कर -ठीक भी है -ईश्वर ऐसा ही करें!और इसमें किंचित भी कोई असंगति नहीं ..कोई भी नयी विधा जब पुष्पित पल्लवित होने लगती है तो ऐसे समारोह उत्सव आनुसंगिक हो उठते हैं ..जो इनसे मुंह बिचका रहे हैं वे अपरिपक्व अनुभवहीन लोग हैं,गुड का स्वाद नहीं लिए हैं :-) और इनमें किसी भी कारण से सम्मिलित न हो पाने की खीज मिटा रहे हैं ...
बहरहाल मैं जब ठीक दस बजे पहुंचा तो ज़ाकिर जी काफी ऊपर दीवाल पर स्पाईडर मैंन सरीखा चढ़ कर बैनर टांग रहे थे ..वो तो जब वे कूद कर सम्मुख हुए तो मैंने सहसा पहचाना, अरे ये तो अपने ज़ाकिर मियाँ हैं ...अब हलके फुल्के लोगों से रश्क होता है दन से कहीं भी चढ़ और उतनी ही फुर्ती से उतर भी लेते हैं ..मैंने उन्हें प्यार की झिड़की दी ये स्पाट ब्याय का भी काम? बोले ब्लागिंग के लिए कुछ भी,कभी भी कहीं भी :-) अब ऐसा जज्बा हो तो भला क्या मुश्किल है? :-) हाल में घुसा तो रवि रतलामी जी ,सिद्धेश्वर जी ,अमित श्रीवास्तव जी ,डॉ रूपचन्द्र शास्त्री जी ,अपने आशु काव्य प्रतिभा के धनी और टिप्पणीकार रविकर जी कुछ उन पहलों में से थे जिनसे भर अंकवार मुलाक़ात हुयी .....चेले चीनी तो खैर थे ही ...फिर तो लोग आते गए और हम गलबहियां मिलते गए ..किसी और को भी गलबहियां -घेरे में लेने को मन था और निगाहें हाल में बार बार उसे ढूंढ रही थीं ,बहरहाल उसकी भी उपस्थिति हो आयी तो राहत रूह की अनुभूति हुई . ..मगर तब तक कार्यक्रम शुरू हो गया और हम मंच पर धर दिए गए .....
अब मंच से देखा देखी मंचीय गरिमा के अनुकूल नहीं थी सो हम तटस्थ और प्रत्यक्षतः निर्विकार भी हो लिए ..अडोस पड़ोस के गुरुतर गाम्भीर्य का भी तो हमें ध्यान रखना था ..वामभागी अध्यक्ष जी फिर भी मुझसे डिस्टर्ब होते रहे और बार बार मेरे फोन काल आने पर बुदबुदाते रहे और संतोष त्रिवेदी पर भी काफी कुपित होते रहे कि वे आखिर मेरी ही इतनी फोटो क्यों उतारते जा रहे -चेला हैं न गुरु का ध्यान तो रखेगा ही ..मगर वे गुरु के साथ क्या क्या गुल कैमरे में खिलाये हैं यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा ..हम मंच से ही उन्हें घुड्कियाते भी रहे ..मगर बन्दर बालक एक सुभाऊ ...पूरे चिबिल्ले हैं संतोष त्रिवेदी! अब उन्होंने क्या क्या कैमरे के फोकस में रखा और उसके हवाले किये हम आपसे बता भी नहीं सकते ;-) ....
बाहर कुदरत मेहबान थी -फुहारें थीं ..और भीतर सभागार में भी सम्मान बरस रहा था ...झोलियाँ खुलती गयीं और सम्मान भरते रहे... मैं उदघाटन सत्र का स्थानापन्न डायस अतिथि बना था और पहली बार भाग्य ने साथ दिया अंत तक डटे रहे ...... :-) अच्छा पास पड़ोस -सानिध्य हो तो हटना भी कौन कम्बख्त चाहता है :-) ..मगर मेरे लिए और भी आमंत्रण थे और मुझे उन्हें अटेंड करना ही था ...जैसी कि आशंका थी संचालक महोदय ने मेरी प्रशस्त काया और भारी भरकम मंचीय उपस्थिति को भी नज़र अंदाज कर मुझे वैसे ही पहले बोलने को बुला लिया जैसे कवि सम्मेलनों में सबसे पहले जूनियर कवि को कविता पाठ के लिए बुलाया जाता है . ..
कुछ विषय प्रवर्तन सा करने के मुगालते में मैं रहा ...मूड बना तो वह भी लिखेगें यहीं ....हाँ मुझे पता नहीं क्यों रह रह कर अहसास होता रहा कि मैं ब्लागरों के सम्मलेन के बजाय किसी कवि सम्मलेन में आ फंसा हूँ ... :-) अखंड सम्मान का जो सिलसिला चला तो लंच का समय हो आया और उद्घाटन सत्र ही चलता रहा ... समय कम पडा तो एक चर्चा सत्र ही निरस्त हो गया -कई ब्लॉगर कुछ न कह पाने के कारण मायूस हुए ..कुछ उचित ही नाराज हो गए ....खिसियाये और चलता बने ..बाबा रे कहाँ कहाँ से आये थे लोग -कोई गोआ तो कोई हैदराबाद! आडियेंस सुश्री रचना सिंह जी, यशस्वी ब्लागर (नारी ) की प्रतीक्षा करते रहे,उन्हें भी सम्मानित होना था -वर्षों से ब्लागिंग क्रीज पर बिना हिट विकेट बनी हुई हैं वे -मैं खुद उत्सुकता से उनकी प्रतीक्षा कर रहा था . उनका नाम एक विमर्श सत्र में भी था -मगर वे नहीं आयीं!अपराह्न सत्र में कवितायें भी मंच पर सस्वरित हुईं ...मैं चौका .... कवि सम्मलेन और ब्लॉगर सम्मलेन में फर्क रखना होगा --एक कवयित्री ग़ज़ल सुनाईं और मैं हाल में उसे तरन्नुम में गुनगुनाता रहा और चेले को पकड़ के सुनाता रहा और चेले भी गज़ब ..गज़लकारा ब्लॉगर को ही बोल उठे कि आपसे अच्छा तो मिसिर जी गा रहे थे ..हद हो संतोष .... .
सम्मानित कुछ शिष्ट विशिष्ट
रवीन्द्र प्रभात ने इस समारोह को सफल बनाने में अतिशय / भयंकर मानसिक और शारीरिक श्रम किया और ज़ाकिर ने भी -उन्हें साधुवाद! अब सम्मान पर भी कुछ कह लूं ....सम्मान मिलना अच्छी बात है मगर उसका अतिशय विज्ञापन बौद्धिक जनों में आत्म प्रचार का सन्देश ले जाता है ..आत्मप्रचार निरी बेशर्मी मानी जाती है पढ़े लिखे गुनीजनों में ...
कई सिद्ध प्रसिद्ध ब्लॉगर लखनऊ ब्लागर मीट में आये मगर जितना आये उनसे भी मुलाक़ात वहीं रहकर भी नहीं हो पायी :-( .....कारण हम उनके ब्लॉग से परिचित हैं उनसे जुड़े चेहरों से नहीं... और मजे की बात यह कि जिनके चेहरों से परिचित हैं उनके ब्लॉग से परिचित नहीं .. काश एक परिचय सत्र होता! हाँ बहुत से जो ब्लागर किन्ही भी कारणों से नहीं आये उनकी दबी साध उन्हें रह रह कचोट रही है और वे अपने विचारों से दूसरों को फेसबुक पर चिकोट रहे हैं ..कोई भी एक दिवसी और वह भी बिना सरकारी इमदाद का ब्लॉगर जलसा सारे ब्लागरों को समेट नहीं सकता..मगर एक दिन में ही जितना कुछ अटाया/समाया गया इस समारोह में वह दो दिन का काम था...सूत्रतः यही कह सकता हूँ जो नहीं आये भले रहे ..... और वे सम्मान तोषी नहीं हैं -वैसे भी अब बाकी अगले में सिमट ही जायेगें ...मनवा धीर धर... :-) मगर रवीन्द्र जी, पुरखों बूढों को सम्मान के बजाय क्या ही अच्छा होता हम कोई ऐसी प्रणाली विकसित करें जिससे नयी प्रतिभाएं सम्मानित हों और प्रोत्साहित हों -आने वाल कल उनका है .....बाकी तो मूड बना तो फिर कुछ लिखेगें ....हाँ युगों बाद बहुत संतृप्त होकर लौटने (लुटने न पढ़ें कृपया )की अनुभूति है -देखिये कब तक कायम रहती है :-)
अधिकृत विवरण ,सम्मान सूची आदि आदि के लिए यहाँ जाएँ !
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