सोमवार, 31 दिसंबर 2012

जिस वाहन में थे वे नरपिशाच वही उनकी चलती फिरती टेरिटरी थी!


किसी एक की पीड़ा जब पूरी कायनात की पीड़ा बन जाय ,करोड़ों आँखें नम हो उठें ,लगे कि कोई अपना ही बीच से उठ चला गया हो,जन जन के मन संवेदित हो उठे हों और ह्रदय क्लांत हो तो कैसे कह सकते हैं इंसानियत मर गयी -यही संवेदनशीलता ही तो मनुष्य को पशुओं से पृथक करती है -आज मानवीय संवेदना के उमड़े घहराते समुद्र ने हमें एक अदृश्य बंधन से जोड़ दिया है -जब तक यह मानवीय संवेदना जीवित है मनुष्य को कोई खतरा नहीं है -चंद नराधम कैसे इंसानियत को दागदार कर सकते हैं?

नराधमों के वहशियाना कृत्य के बाद हमने एक इतिहास को आँखों के सामने से गुजरते देखा है। बर्बरता के विरुद्ध जन सैलाब सड़कों पर उतरा -यह दुष्कृत्य मनुष्य की उसी पशुवीय हिंस्र वृत्ति की परिचायक है जो हमारे पशु -अतीत को बयान करती है और रेखांकित करती है कि बिना उचित संस्कार और नैतिकता के आग्रह के कैसे मनुष्य के भेष में आज भी कुछ आदमखोर हमारे साथ ही रह रहे हैं। इसलिए संस्कारयुक्त शिक्षा, आरम्भिक सही सीख,उचित अनुचित का बोध हर बच्चे को दिया जाना हमारी और राज्य की साझा जिम्मेदारी है . हमारे इसी समाज में कितने नर पिशाच रहते आये हैं, इसके हेतु को संस्कृत का कवि पहले ही स्पष्ट कर गया है -

येषाम न विद्या न तपो न दानम ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः
......ते मृत्युलोके भुविभारभूता मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति! 
(जो विद्या, तप , दान ज्ञान शील और गुण धर्म से रहित है वह इस मृत्युलोक में धरती पर भार स्वरुप है और मनुष्य के रूप में पशु ही है!)
ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती ही गयी है -ये संस्कारित लोग नहीं है -हिंस्र पशु है बस मनुष्य होने का धोखा हैं -इनसे सावधान रहने की जरुरत है!और यही आत्मरक्षा (सेफ्टी फर्स्ट) के प्रति सतर्क रहने की जरुरत है ,घोर जंगल में बिना होशियारी निर्द्वन्द्व विचरण कोई बुद्धिमानी नहीं है -सहज विश्वास ही विश्वासघात के मूल में है . आज बड़े बड़े शहर भी जंगल सरीखे हैं क्योंकि किसी का किसी से कोई वास्ता नहीं है -सब अजनबी हैं-इम्पर्सनल! अजनबीपन पशुओं में कबीलाई मानसिकता ,आक्रामकता को पोषित करता है . टेरिटोरियलिज्म को बढ़ावा देता है . हिंस्र पशुओं का मनुष्य रूपी झुण्ड बेख़ौफ़ बड़े शहरों में विचरण कर रहा है -हमारे बच्चे इस बात को क्यों नहीं समझ पा रहे हैं? घृणित घटना में वे नरभक्षी जिस वाहन में थे वही उनकी चलती फिरती  टेरिटरी थी -नहीं लिफ्ट लेना था उन बच्चों को उसमें! माना कि सहज विश्वास और भरोसा मानवीय गुण हैं मगर हमारे पास एक तर्कशील दिमाग भी तो है . बहरहाल आगे हमारे बच्चे सीख लें। 
एक बात और -इस घटना से उमड़े जन आक्रोश में क्या पुरुष क्या नारी सभी समवेत रूप से सम्मिलित थे -जे एन यू के बच्चों ने  इस बड़े जन आन्दोलन की अगुयायी की -उन्हें सलाम! युवाओं के उस भीड़ के आर्तनाद में लड़कियों के साथ लड़कों का भी स्वर बुलंद था। लडके भी उतने ही मर्माहत थे। इसे नारी पुरुष के चश्में से देखा जाना मनुष्यता का अपमान है . दिवंगत हुयी दामिनी एक लडकी ही नहीं बेटी, बहन ,मित्र थी हम सभी की -घोर कष्ट सभी को है . ये घटनाएँ हमारी समूची संवेदना को झकझोरती हैं . मनुष्य की संवेदना को नारी पुरुष के खांचे में बाटने का मतलब है हम अपने अभियान को कमजोर कर रहे हैं। इन दोषियों को तो कैपिटल दंड मिलेगा ही -आगे ऐसे क़ानून बनने का रास्ता भी दिख रहा है जिससे ऐसी भर्त्सनीय प्रवृत्तियों पर प्रभावी अंकुश लग सके . अपराध की गहनता को देखते हुए उम्र कैद या फांसी का प्रावधान ही समीचीन लगता है-रंगा बिल्ला काण्ड में ऐसा ही हुआ था . रासायनिक बंध्याकरण आदि के प्रस्ताव हास्यास्पद हैं-इनकी सफलता संदिग्ध है -आपराधिक प्रवृत्तियाँ कई बार जीनिक होती हैं -अतः अंग विशेष के निर्मूलन से कोई फर्क नहीं पड़ेगा बल्कि रिडाईरेक्टड हिंसकता और भी प्रबल हो सकती है -ऐसे अपराधिक वृत्ति वाले समाज में विचरण न करें तभी बेहतर!
भारत में उमड़े जन सैलाब ने समूचे विश्व में साबित कर दिया है कि मानवीयता जिन्दा है और मनुष्य की कौम सर्वोपरि है -आज साझा सरोकार की हमारी यही खासियत हमें आश्वस्त कर रही है और नए वर्ष में नए आशा और विश्वास के साथ हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रही है -युवाओं निराश न हो -नया वर्ष आप सभी के स्वागत में बाहें पसारे आ पहुंचा है -जीवन भले ही हार गया हो हमारी जिजीविषा बरकरार है -उत्तिष्ठ, जागृत, प्राप्य वरान्निबोधत।' 'उठो, जागो और अपना लक्ष्य प्राप्त करो।' 
स्वाभिमान और शौर्य की प्रतिमूर्ति बन गयी दामिनी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि! 
आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं -नया वर्ष  हमें जीवन के प्रति नयी आशा और विश्वास से भरे, यही कामना है! 


मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

शंख बोली बलाय टली ...

दिल्ली की घटना ने सहसा इतना दुःख संतप्त और दिमाग को कुंद कर रखा था कि कुछ लिखने पढने का मन ही नहीं हुआ -ज्यादातर वक्त टीवी देखते गुजरा ,जिसने मन को निरंतर और भी विक्षुब्ध किया। मानवता को शर्मसार करते  एक घिनौने जघन्य कृत्य की जिम्मेदारी न लेकर उसके विरोध में सहज ही सड़कों पर उतर आये छात्र छात्राओं और अभिभावकों पर पुलिस का निर्मम बल प्रयोग दिल को सालता रहा . अब आशा बंधी है कि यौन अत्याचार पर प्रभावी अंकुश लगाने की दिशा में कुछ ठोस कार्यवाही हो सकेगी .और इस सोच ने मुझे और भी प्रफुल्लता से शंख ध्वनि के लिए प्रेरित किया . मैं प्रति दिन गीता के पांच श्लोकों के पाठ पूरा होने पर शंखनाद करता हूँ। कुछ एक अनुष्ठान की पारम्परिक प्रक्रिया के  तहत तो कुछ फेफड़ों के स्वास्थ्य के लिए .
शंख एक अद्भुत आदि -नैसर्गिक वाद्य यंत्र है . आप सभी जानते ही हैं कि यह वस्तुतः बिना रीढ़ के मोलस्क संघ   का समुद्री प्राणी है जो  इस मजबूत खोल में अपनी रक्षा करता है . हिन्द महासागर में पाया जाने वाला शंख - टरबिनेला पायिरम( Turbinella pyrum )  धार्मिक अनुष्ठानों का शंख है .

शंख वादन को  आदि मानवों ने शुरू किया होगा -अपने आस पास के घने जगंलों से खतरनाक पशुओं को दूर रखने के लिए . आग और शंख ध्वनि ही उन प्राचीनतम उपायों में रहे होंगें जिनसे आदि मानवों ने हिंस्र पशुओं से अपनी रक्षा की होगी -बाद में कई दूर तक मार करने वाले अश्त्र शस्त्र -धनुष ,भाले बरछे भी ईजाद  हुए होंगें . कह सकते हैं मनुष्य की आत्मरक्षा में शंख का योगदान प्राचीनतम है। मनुष्य की कल्पनाशीलता और कला प्रियता ने शंख के कई और भी उपयोग कालांतर में ढूंढ निकाले। धर्मयुद्धों के पूर्व शंखनाद की एक परिपाटी ही बन गयी . भारत वर्ष के सबसे बड़े युद्ध महाभारत की शुरुआत ही महा शंखनाद से हुयी -पांचजन्य हृषीकेशो देवदत्तं धनंजय : पौंनड्रम   दध्मौ महाशंखम भीमकर्मा वृकोदरः मतलब श्रीकृष्ण ने पांचजन्य ,अर्जुन ने देवदत्त ,भीमसेन ने पौण्ड्र नामके शंख बजाकर धर्मयुद्ध की घोषणा कर दी . फिर तो शंखों के नाद की एक श्रृखला ही शुरू हो गयी ...युधिष्ठिर ने अनंत विजय और नकुल सहदेव ने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामके शंख बनाए -फिर तो अनेक योद्धाओं ने अपने अपने शंख बजकर तुमुल घोष किये।
शंखनाद! 

कालान्तर  में यजमानी वाले पुरोहित  पंडितों ने इसे अपना कुल वाद्य यंत्र ही बना लिया और हर कथा वार्ता के अंत में शंखनाद करना आरम्भ किया . सत्यनारायण व्रत कथा के हर अध्याय की सम्पूर्ति पर शंख बजाने का चलन है . हमारे कुल पुरोहित  पंडित जी के पास एक पुश्तैनी शंख हैं,वह कई पीढ़ियों से उनके  पास है .  सत्यनारायण संतोषी माँ सरीखे काफी बाद के अन्वेषित देवता है और विष्णु   के स्वरुप लगते हैं .विष्णु  को शंख बहुत प्रिय है . उनके एक हाथ में शंख है -सशंख चक्रम  सक्रीट  कुण्डलं... हमलोग शंख की आवाज सुनकर  बचपन में भोग- प्रसाद और चरणामृत लेने पूजा स्थल पर पहुँच जाते थे , लोकजीवन में शंखनाद शुभ, कुशल क्षेम के आगत  का प्रतीक है . राबर्ट्सगंज के मेरे नए पड़ोसी 90 वर्षीय वृद्ध मेरे शंख बजने पर खुश होकर बोल पड़ते हैं -शंख बोली बलाय टली ...

मैंने भारत के समुद्र तटीय धार्मिक स्थलों जैसे रामेश्वरम ,कन्याकुमारी,पुरी अदि की यात्रा पर वहां से शंख खरीदे हैं और पंडितों को शंख -दान किये हैं जिन्हें उन्होंने प्रफुल्लित होकर स्वीकार किया है . शंख केरल का राज्य प्रतीक चिह्न ऐसे ही नहीं बनाया गया है . भारत में अब फिर से एक बार तुमुल शंखनाद आरम्भ हो गया है -निहितार्थ आप सुधीजन समझ ही रहे होंगें -इसी तुमुल नाद में एक कोमल स्वर मेरा भी है!  

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

वे उधार लेने वाले :-(

ब्लॉग अपनी पर्सनल डायरी है न ? हाँ भाई हाँ! हाँ, यह बात अलग है लिखने वाला चाहे तो इसे सार्वजनिक कर दे या ना भी करे,मगर ब्लॉग तो अब ज्यादातर सार्वजनिक ही हो चले हैं। वैसे  ज्यादातर होते ये ब्लॉगर के खुद अपने बारे में ,उसकी सनकों के बारे में, उसके स्वभाव और उपलब्धियों के बारे में यानि बहुत कुछ खुद अपने ही बारे में -मैं ऐसा हूँ ,ऐसा ही हूँ, मैं ऐसा क्यों हूँ? मैं वैसा क्यों नहीं हूँ -हम सभी छुपे ,प्रत्यक्ष या बेशर्मी के साथ सेल्फ प्रमोशन भी करते फिरते हैं -देखो देखो मैंने ये बड़ा तीर मार लिया है। मैंने फला को पटा  लिया है ,फला को धूल चटा दिया है आदि आदि। 

आज मैं भी अपनी एक वह बड़ी महारत जो हासिल कर रखी है बताना चाहता हूँ , मैंने अब तक के अपने जीवन में कभी किसी से उधार नहीं माँगा है,भले ही बड़ी ही विषम स्थितियां रही हों मैं उधार मांग ही नहीं सकता -उधार मुझे व्यक्ति की  गरिमा को गिराने वाली बात लगती है -मेरा कान्सेंस अलाऊ ही नहीं करता . मैं बचपन से ही ऐसा हूँ . पैसा नहीं मांग सकता किसी से ..नहीं नहीं मैं बोस्ट  नहीं कर रहा अपनी एक आदत बता रहा हूँ और उस परम शक्ति का आभार भी कि अभी तक तो ऐसे ही निर्वाह होता गया है . मुझे याद है जब नयी नयी नौकरी मिली थी पगार बड़ी कम थी। पत्नी को नौकरी के शुरू शुरू से ही साथ में रखता रहा हूँ। लखनऊ की पहली पोस्टिंग थी ,,बस हैण्ड टू माउथ मामला था ...एक बार घर (जौनपुर ) आना था तो किराए के पैसे ही कम पड़ने की नौबत आ गयी,हमारी आदत शुरू से ही फुटकर पैसे गुल्लक में डालने की है। कोई रास्ता न निकलते देख गुल्लक से फुटकर पैसे गिनने की नौबत आ गयी -तब पांच और दस पैसे भी चलते ही नहीं दौड़ते थे ....गिना गया कुल पच्चीस रुपये निकल गए ....पचास तो पहले से ही था ..अब हम अचानक रईस हो गए थे .शान से बस पकड़ी और कुल पचहतर रुपये में दोनों जने  जौनपुर कुछ मुंह भी हिलाते डुलाते आ पहुंचे।एक दो रुपये बचे भी थे। 

हम भले ही किसी से उधार न मांगते हों मगर मैंने उधार मांगने वालों की एक लम्बी भीड़ अपने आज तक के जीवन में देखी है . एक सज्जन तो मुझे ऐसे मिले जो उधार मांगने के कई गुर में निष्णात थे ,मुझे बताते भी थे और मेरे किसी काम के न होने के बावजूद भी मैं उनके तौर तरीके को हिकारत से सुनता था . एक तो यही कि उधार कभी भी भूमिका बाँध कर नहीं माँगना चाहिए नहीं तो सामने वाला सावधान हो जाता है , उधार हमेशा अचानक ,हडबडी और औचक -बेलौस  माँगना चाहिए जिससे अगले को सेकेंड थाट का मौका ही न मिले और वह इनकार न कर पाए .मतलब यह कि उधार माँगना एक कला है और कुछ लोग इसमें पारंगत होते हैं -वे आपकी मानवता तक को ललकार सकते हैं .और यह भी अहसास दिला सकते हैं कि एक दुखिया की मदद न करके आप परले दर्जे के कमीने बन गए हैं . मेरे पिता जी जी उधार दे देकर थक पक  गए थे,दुनिया छोड़ गए उनके दिए उधार वापस नहीं हुए . मैं उनको कभी कभी बड़ा विवश देखता था -मेरे ही तरह सरल ह्रदय :-) थे और इसका फायदा उठाकर उनसे उधार मांगने वालो का तांता लगा रहता ..लेकिन उन्हें धक्का तब पहुंचता जब ज्यादातर उन्हें उधार वापस न करते, बार बार मांगने के बावजूद . मैं उन्हें बड़ा अपसेट देखता था . और उनके अनुभवों ने मुझे अपना एक सिद्धांत बनाने और उस पर कायम रखने को मजबूर किया ,

चार्वाक नाम के एक दार्शनिक हुए हैं जिन्होंने उधारी को प्रोत्साहित करके एक परम्परा की नींव ही डाल  दी मानो -मगर वह समय सूदखोरों महाजनों का था -लोग सुतही (आन इंटरेस्ट ) पैसे बाटते थे और अनाप शनाप व्याज लगा कर वसूली करते थे -इस काम में तब के पुरोहित पंडित भी ऐसे महाजन के मददगार होते थे -जो पैसा वसूलने के नाम पर तरह तरह के हथकंडे -स्वर्ग नरग और अगले जन्म तक की देनदारी के भय दिखाते थे ...चार्वाक ने ऐसे समय लोगों को सीख दी-यावत्जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत , भस्मा विभूतस्य शरीरस्य पुनरागमनम  कुतः  -अरे, शान से उधार लेकर देशी घी पियो यानि मौज मस्ती करो ..कहाँ पैसे वापस करोगे और यह भी न घबराओ कि अगले जन्म में देना पड़ सकता है-यह शरीर एक बार भस्म हुआ तो फिर  कहाँ लौटना? लगता है उधार मानने वाले इन्ही चार्वाक महाभागा के ही अनुयायी हैं जो आज संदर्भ प्रसंग बदल जाने के बाद भी बेशर्म होकर कारज अकारज उधार मागंते फिरते हैं .

मैं किसी को उधार नहीं देता बल्कि यथाशक्ति मदद करता हूँ . और वह भी अपवादों को छोड़कर केवल पहली बार  की ही मदद .लोग मुझसे  उधार मांगते हैं तो मैं  उन्हें उधार नहीं देता मदद कर देता हूँ जो कर सकता हूँ मगर इस हिदायत के साथ कि मैं जो पैसे दे रहा हूँ वापस नहीं लूँगा और दुबारा  दूंगा भी नहीं . मैंने कुछ दिलदार लोगों को भी देखा है वे इस शर्त के बाद उधार, जो वस्तुतः उधार नहीं रह जाता लेते ही नहीं ....(किसी और से ले लेते होंगे) ..अंतर्जाल के अनुभव भी कुछ अलग नहीं है . एक उधार का ऐसा मामला आया कि उन्हें कुत्ते का पिल्ला /पिल्ली लेना था उधार माँगा दे दिया .....उन्होंने बाद में वापसी की पेशकश की तो मैंने  ठुकरा दिया ...कहा  अब मत मांगिएगा , आप भी अपने अनुभवों से मुझे धन्य करियेगा तो मैं इस विषय पर एक ठोस और संतुलित दृष्टिकोण अपना सकूंगा . कुछ तो हुआ है आज जो यह पोस्ट सहज ही लिखा उठी ....
यह पोस्ट इस लिए भी लिख दी ताकि सनद रहे और हर बार मुझे यह सब तफसील से इक्स्प्लेंन न करना पडा करे -लोग बाग़ यह समझने लगते हैं कि मैं बहाने बना रहा हूँ -मैं उधार नहीं देता ......

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

अखंड प्रेम का एक खंडित प्रतीक - लोरिक पत्थर( सोनभद्र -एक पुनरान्वेषण यात्रा, 2 )

राबर्ट्सगंज से शक्तिनगर मुख्यमार्ग पर मात्र 6 किमी पर एक विशालकाय दो टुकड़ो में खंडित पत्थर जिस पर वीर लोरिक पत्थर लिखा है यात्रियों  -पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर सहज ही आकर्षित करता है। मुझे भी इसके बारे में जिज्ञासा हुयी . जो कुछ जानकारी मिली आपसे अति संक्षेप में साझा कर रहा हूँ क्योकि इस पत्थर से जुड़ा  आख्यान वस्तुतः हजारो पक्तियों की गाथा लोरिकी है जिसे यहाँ के लोक साहित्यकार डॉ अर्जुन दास केसरी ने अपनी पुरस्कृत कृति लोरिकायन में संग्रहीत किया है . उत्तर प्रदेश में आल्हा के साथ ही लोरिकी एक बहुत महत्वपूर्ण लोकगाथा है .कहते हैं संस्कृत की मशहूर कृति मृच्छ्कटिकम  का प्रेरणास्रोत लोरिकी (लोरिकायन) ही है। पंडित जवाहरलाल नेहरु ने डिस्कवरी आफ इंडिया में लोरिकी का उल्लेख किया है।पश्चिमी विद्वानों में बेवर ,बरनाफ ,जार्ज ग्रियर्सन आदि ने भी लोरिकी पर काफी कुछ लिखा है।

लोरिक दरअसल एक लोकविश्रुत नायक हैं जो बहुत बलशाली और आम जन के हितैषी के रूप में इस क्षेत्र में विख्यात हैं . उनका जन्म बलिया जनपद के गऊरा गाँव में होना बताया गया है। उनके काल निर्धारण को लेकर बहुत विवाद है -कोई कोई विद्वान् उन्हें ईसा  के पूर्व का बताते हैं तो कुछ उन्हें मध्ययुगीन  मानते हैं . यह भी कहा जाता है लोरिक की वंशावली राजा भोज से मिलती जुलती है। लोरिकायन पवांरो का काव्य माना जाता है और पवारों के वंश में (1167-1106) ही राजा भोज हुए थे। बहरहाल लोरिक जाति  के अहीर (आभीर ) थे जो एक लड़ाकू जाति(आरकियोलोजिकल  सर्वे आफ इंडिया रिपोर्ट  ,खंड आठ ) रही है। 
जनश्रुतियों के नायक लोरिक की कथा से सोनभद्र के ही एक अगोरी(अघोरी?)  किले का गहरा सम्बन्ध है ,यह किला अपने भग्न रूप में आज भी मौजूद तो है मगर है बहुत प्राचीन और इसके प्रामाणिक इतिहास के बारे में कुछ जानकारी नहीं है ,यह भी ईसा पूर्व का है किन्तु दसवीं शती के आस पास  इसका पुनर्निर्माण खरवार और चन्देल राजाओं ने करवाया। अगोरी दुर्ग के  ही नृशंस अत्याचारी   राजा मोलागत से लोरिक का घोर युद्ध हुआ था . कहीं कहीं ऐसी भी जनश्रुति है कि लोरिक को तांत्रिक शक्तियाँ भी सिद्ध थीं और लोरिक ने अघोरी किले पर अपना वर्चस्व कायम किया . अपने समय का तपा हुआ ,अत्यंत क्रूर राजा मोलागत लोरिक द्वारा पराजित हुआ , और इस युद्ध का हेतु एक प्रेम कथा बनी थी -लोरिक और मंजरी (या चंदा? ) की प्रेम कथा।

अगोरी के राजा मोलागत के अधीन ही महरा नाम का अहीर रहता था . महरा की ही आख़िरी सातवीं संतान थी मंजरी जिस पर मोलागत की बुरी नजर पडी थी और वह उसे महल में ले जाने का दबाव डाल  रहा था। इसी दौरान उसके पिता महरा को लोरिक के बारे में जानकारी हुई और मंजरी की शादी लोरिक से तय कर दी गयी . लोरिक को पता था कि बिना मोलागत को पराजित किये वह मंजरी को विदा नहीं करा पायेगा। युद्ध की तैयारी के  साथ बलिया से बारात सोनभद्र के मौजूदा सोन(शोण)  नदी तट  तक आ गयी । राजा मोलागत ने तमाम उपाय किये कि बारात सोन को न पार कर सके ,किन्तु बारात नदी पार  कर अगोरी किले तक जा पहुँची ,भीषण युद्ध और रक्तपात हुआ -इतना खून बहा कि अगोरी से निलकने वाले नाले का नाम ही रुधिरा नाला पड़ गया और आज भी इसी नाम से जाना जाता है ,पास ही नर मुंडों का ढेर लग गया -आज भी नरगडवा नामक   पहाड़ इस जनश्रुति को जीवंत बनाता खडा है .कहीं  शोण (कालांतर का नामकरण सोन ) का नामकरण भी तो उसके इस युद्ध से रक्तिम हो जाने से तो नहीं हुआ? 
अघोरी किले का एक मौजूदा दृश्य 

मोलागत और उसकी सारी सेना और उसका अपार बलशाली इनराव्त हाथी भी मारा गया -इनरावत हाथी का वध लोरिक करता है और सोंन  नदी में उसके शव को फेंक देता है -आज भी हाथी का एक प्रतीक प्रस्तर किले के सामने सोंन  नदी में दिखता है। लोरिक मोलागत और उसके कई मित्र राजाओं से हुए युद्ध के  प्रतीक चिह्न किले के आस पास मौजूद है .जिसमें  राजा निर्मल की पत्नी जयकुंवर   का उसके पति के लोरिक द्वारा मारे जाने के उपरान्त  उसके  सिर  को लेकर सती होने के प्रसंग से जुड़ा एक बेर का पेड़ सतिया का बेर और युद्ध के दौरान ही बेहद  निराश मंजरी द्वारा कुचिला का फल (जहर ) खाने का उपक्रम करना और उसके हाथ से लोरिक का कुचिला का फल फेक देना और आज भी केवल  अगोरी के इर्द गिर्द ही कुचिला के पेड़ों का मिलना रोचकता लिए है। 

मंजरी की विदाई के बाद डोला मारकुंडी  पहाडी पर पहुँचाने  पर नवविवाहिता मंजरी लोरिक के  आपार बल को एक बार और देखने  के लिए  चुनौती देती है और कहती है कि वे अपने प्रिय हथियार  बिजुलिया खांड (तलवार नुमा हथियार) से एक विशाल  शिलाखंड को एक ही वार में दो भागो में विभक्त कर दें -लोरिक ने ऐसा ही किया और अपनी प्रेम -परीक्षा में पास हो गए -यह खंडित शिला आज उसी अखंड प्रेम की  जीवंत कथा कहती प्रतीत होती है -मंजरी ने खंडित शिला को अपने मांग का  सिन्दूर भी लगाया।  यहाँ गोवर्द्धन पूजा और अन्य अवसरों पर मेला लगता है -लोग कहते हैं कि कुछ अवसरों पर शिला का सिन्दूर  चमकता है -मैं फिर देखने का प्रयास करूंगा और प्रत्यक्ष कारण भी जानने की चेष्टा करूँगा . जब मैंने फोटो लिया तो शाम हो रही थी और मुझे कथित सिंदूरी चमक का  स्थान नहीं दिखा , लौटते वक्त इस पोस्ट का शीर्षक सहसा कौंध गया -अखंड प्रेम का खंडित प्रतीक! 

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

महफ़िल में इस ख़याल से फिर आ गया हूँ मैं :-)


मुझे  निकाल के कहीं पछता  रहे हों  न  आप 
महफ़िल में  इस ख़याल से फिर आ गया हूँ मैं :-)
यह शेर आज तब याद आया जब इस नए स्थान - राबर्ट्सगंज में नेट से कनेक्ट होने पर मुझे सहसा ब्लागिंग की सुधि आयी . इतना लम्बा अंतराल पिछले पांच वर्षों में किन्ही दो  पोस्ट के बीच नहीं हुआ था . जब गत 21 नवम्बर को सारे तामझाम, सर सामान और एक अदद धर्मपत्नी तथा  एक विदेशी नस्ल की कुतिया -पाम-स्पिट्ज(डेजी के साथ यहाँ बनारस से सरे शाम पहुंचा तो अंतर्जाल से लगभग  कट चुका था ..हाँ मोबाईल से/ का एक गर्भनाल सम्बन्ध अवश्य बना था मगर वह नाकाफी था .....लगा किसी सूनसान जनहीन द्वीप पर आ पहुंचा हूँ . कटे होने और गैर जुड़ाव की यह अनुभूति नयी किस्म की थी ....और यह सिलसिला लम्बा चला .नए स्थान पर अनुकूलन और व्यवस्थित होने की प्राथमिकतायें कुछ ऐसी रहीं कि विलासितापूर्ण ब्लागिंग के लिए कई मौका नहीं मिला . आते ही तेल नून लकड़ी के नवीन संस्करणों -गैस कनेक्शन ,आर ओ ,इनवर्टर ,दूधवाले ,अखबारवाले ,महरी की जुगाड़/व्यवस्था फिर डिश  टीवी कनेक्शन , बैंक खाता आदि  में ऐसा जी हलकान रहा कि हम अपना ही नहीं कई अन्य  पसंदीदा ब्लॉग फिलहाल भूल गए और साथ ही कई ब्लागरों को भी  ....मजे की बात वे ब्लॉगर भी मुझे भूल गए -हाँ कुछ फेसबुकिये  मित्र जरुर सम्बन्धों के आशा दीप टिमटिमाये रहे ......और मुझे नेट कनेक्ट करने के  तरीके बताते रहे .....फिलहाल  रिलायंस नेट कनेक्ट डाटाकार्ड एक जगहं से उधारी पर ले यह पोस्ट लिख रहा हूँ . हाँ खुद का अप्लाई कर दिया है ,एक हप्ते का वक्त लगना बताया गया है . 
नए स्थान पर जमने में अभी समय लगेगा ,नए लोग नए मिजाज। मगर लग अच्छा रहा है -पिछड़ा इलाका है तो लोगों की सरलता सहजता संदूषित नहीं हुयी है और खाने पीने के सामान भी अपेक्षया बहुत कम संदूषित  है ....पत्नी यहाँ के दूध और सब्जियों की मुग्ध भाव से प्रशंसा कर रही हैं .उनके विशेषाग्रह पर बचपन से ही दूध से नाक भौ सिकोड़ने वाला मैं भी यहाँ थोडा दूध पीने लगा हूँ -पियो  ग्लास भर दूध की तर्ज पर ......सब्जियों में निश्चय ही ताजगी भरा अलग सा स्वाद है . अब इतना सब इंतजाम होने के बाद बस ब्लागिंग की कमी रह गयी  थी सो वह भी आज से राह पर आ गयी -जिन्दगी की गाडी तेजी से पटरी पर लौटने लगी है . 
इस बीच केवल संतोष त्रिवेदी जी ने फोनियाया और हाल चाल पूछा .....कमाल के ब्लॉगर हैं वर्ना आज की इस भागमभाग की दुनिया में किसे किसकी फ़िक्र रहती है . गहन रिश्तों के वायदे करने वाले भी न जाने कहाँ मुकर  गए ....आप यहाँ तभी तक हैं जब तक हैं और दिख रहे हैं -अन्यथा कोई आपकी सुधि लेने वाला नहीं है .....नए ब्लागरों को यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए ....और अपेक्षाएं नहीं पालनी चाहिए ...अंतर्जाल आंनद के लिए कोई बैकुंठ नहीं है,असली दुनिया से भी इस मामले में गया गुजरा है . कितने मित्रों से इसलिए पहले से भी दुआ सलाम बंद है -और इन पांच साला ब्लागिरी में दुआ सलाम बंद वाली लिस्ट भी बढ़ती गयी है -कभी किसी ने कहा था क़ि आपकी आँखें बहुत गहराई  वाली सुन्दरता लिए हैं,किसी ने मेरी एक प्रोफाईल फोटो जो अब लगभग दस वर्ष पुरानी है मगर कहीं कहीं अब भी दिख जाती है -अरे वही सूट टाई वाली को देखकर मर मिटने का अभिनय किया था  :-) ....तब से सूट पहनना बंद ही कर दिया :-( ....किसी किसी ने  इमरजेंसी का तकाजा देकर कुछ इमदाद भी झटक लिया था ...वे सभी अब तटस्थ हो लिए हैं .....मगर यह सब मैं बनारस की गंगा मैया को समर्पित कर आया हूँ .....
सोनांचल में एक नयी ताजगी के साथ एक नयी ब्लागिंग पारी शुरू करते हुए मुझे एक नौसिखियापन सा लग रहा है :-) मैं वापस लौट आया हूँ ......हो सकता है मेरा यहाँ अनुपस्थित रहना किसी को सचमुच खला ही हो ... :-) यह बात अब तक मुंह से निकल पायी हो तो अब भी कोई देर नहीं हुयी है ...मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा ...सुस्वागतम! 

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