रविवार, 30 नवंबर 2008

एक रायशुमारी -क्या भारत को बिना ऑर समय गवाए पी ओ के के आतंकी ठिकानों पर हमला कर देना चाहिए?

मित्रों ,मैंने यह रायशुमारी केवल आपकी भावनाओं को मुखर करने और आपके सलाह मशवरे के लिए की है .चूंकि इसके लिए जो गजेट ब्लॉग के हाशिये पर है उसमें केवल हां या ना का ही आप्शन है अतः यह सहायक पोस्ट भी इसलिए कि ब्लॉग दुनिया कुछ और भी तफसील से कहना चाहे तो कह सके ताकि एक जनमत बन सके और हमारे आका जो पता नहीं इस समय क्या कर रहे हैं जन भावनाओं से परिचित हो सकें ।
मेरा तो दृढ मत है कि अब तक भारतीय वायुसेना को यह आर्डर मिल जाने चाहिए थे कि वह पाक अधिकृत आतंकी ठिकानों पर बेलौस पूरी शक्ति के साथ आक्रमण कर दे -पर हमारा नेतृत्व फिर नपुंसकता ,क्लैव्यता की राह पकड़ रहा है -हमारे ऊपर आक्रमण हुए कई दिन बीत रहे -आखिर इन सत्ता भोगियों को स्पष्ट राजनीतिक निर्णय लेने में क्या अड़चन आ रही है?
पूरा देश इस समय अपमान की घूँट पिए ,कुछ न कर पाने के आक्रोश में डूबा है -क्या जन भावनाएं हमारे ही चुने हुए नेताओं की समझ में नहीं आतीं .आज याद आ रही है इंदिरा जी की जिन्होंने ऐसे ही मौकों पर तुंरत सटीक निर्णय लिए और अपने देश के शौर्य और प्रतिष्ठा को पूरी दुनिया में बनाए रखा .एक काबिल बाप की काबिल बेटी तो थी हीं वे और उससे बढ़ कर एक लौह महिला ,प्रधानमंत्री भी थीं ! आखिर हमारा वर्तमान नेतृत्व क्यों उनसे कुछ सीख नही लेता ! क्या हमारे प्रधान मंत्री सचमुच ही वही है जो वे दीखते हैं ? यानी ब्रिह्न्नला ? वे आखिर कर क्या रहे हैं ?क्या उन्होंने इस मसले पर फौरन राष्ट्रपति से बात की ? और हमारी श्रद्धेय राष्ट्रपति जी क्या कर रही है ?? मुझे एक नागरिक होने के नाते यह जानने का हक़ है -मगर मुझे कुछ पता नहीं चल रहा है ? क्या आपको पता है ? क्या वे अभी भी अपनी रोजाना की दिनचर्या में ही व्यस्त हैं ? यदि हम राजनीतिक -सरकारी निर्णय में किन्ही कारणों से हो रही देर की बात को इग्नोर भी कर दे तो क्या राष्ट्रपति जी की भी ऐसी ही कोई विवशता है जो यह राष्ट कभी समझ पायेगा ? क्या हमारे राष्ट्रपति जी ने सेना अध्यक्षों को बुलाकर उनसे सलाह मशविरा किया ? और यदि हाँ तो फिर देर क्यों ? क्यों अमूल्य समय गवायाँ जा रहा है ? यह निर्णायक क्षण है -सरकार को जन भावनाओं के अनुरूप कार्यवाही से क्या रोक रहा है ? पूरा देश साथ है -टक टकी बांधे दिल्ली की ओर ताक रहा है -निर्णय में विलंब क्यों ? क्या अमेरिका और ब्रिटेन हमारा युद्ध लडेंगे ? क्या हम आज इतने वेवश और शक्ति हीन हैं -हम शक्ति और तकनालोजी के मामले में पूरी दुनिया में अग्रपंक्ति में आज खड़े हैं .हम इतना दीन हीन क्यों दिख रहे हैं ? हे सोनिया ,हे मनमोहन अगर तुम्हे अपनी लाज ,देश की लाज और अपनी डूबती पार्टी की लुटिया बचानी है तो सामने आकर हमारा नेतृत्व करो नहीं तो दिल्ली को खाली करो ! समय बहुत कम है. कूटनीतिक गतिविधियाँ शुरू हो चुकी हैं -और देरी तुम्हे एक सही निर्णय से रोक देगी और तुम सब इतिहास से सबक न लेने की भूलों की फेहरिस्त में एक और इजाफा कर खुद कालातीत हो जाओगे !
पता तो चले कि देर क्यों हो रही है -क्या इसलिए कि पाकिस्तान जवाबी हमला कर देगा ? क्या इसलिए कि यह युद्ध नाभकीय हो जायेगा ? कि इसलिए कि मुस्लिम वोट बैंक खिसक जायेगा ? ऐसा कौन सा मुस्लिम है जो अपने देश पर हुए हमले के परिताप को सह पा रहा है -यह तुम्हारे नपुंसक सलाहकारों की गलत् राय है -पूरा देश साथ है !
इस समय न हम हिन्दू है ना मुसलमान ,न सिख ना ईसाई -हम एक राष्ट्र है -यह पूरा राष्ट्र अपील कर रहा है मरो या करो !

शनिवार, 29 नवंबर 2008

मुम्बई सदमे से अभी उबर नही पाया हूँ -आपके परिजन ,इष्ट मित्र ठीक तो हैं न ?

मुम्बई हादसे ने सहसा स्तब्ध सा कर दिया -संवेदनाओं को झिझोड़ कर रख दिया -कुछ ना कर पाने के हताशा जनक आक्रोश -पीडा ने गुमसुम और मौन सा कर दिया ! कुछ ऐसी ही स्थितियां कभी कभी मनुष्य में आत्मघाती प्रवृत्तियों को उकसाती हैं -एक तरह के सेल्फ अग्रेसन के भाव को भी ! एक राष्ट्र के रूप में हम कितना नकारा हो गए हैं -चन्द आतंकवादी सारे सुरक्षा स्तरों को सहज ही पार कर हमारी प्रभुसत्ता पर सहसा टूट पड़ते है और हम जग हसाई के पात्र बन जाते हैं !
क्या इतिहास ख़ुद को दुहरा रहा है ? क्या हम अपने अतीत से सबक नही ले पाये और आज तक काहिलियत ,अकर्मण्यता और बेपरवाह से बने हैं -एक समय था जब भारत को जब भी जिस विदेशी आक्रान्ता ने चाहा चन्द अरबी घोडों पे सवार हो अपने छोटे से दल के साथ यहाँ पहुचा और हमारे स्वाभिमान को रौंद, लूट खसोट कर वापस लौट गया ! मुम्बई की घटना में कया कही कुछ अन्तर नजर आता है -हम आज भीवैसे ही असहाय नजर आए और सारी दुनिया हमारी बेबसी को देखती रही ।
यह सब इतना सदमे वाला था कि मेरी सारी दैनिक गतिविधियों पर सहसा ही विराम लग गया .एक अजब सी बेचैनी ,बेकसी तारी हो उठी - यह ऐसा वक्त था जब सहसा लगा कि हम एक साथ हो एक जुट हो अपने दुःख और पीडा को बांटे -तभी वह शोक वाला चिन्ह दिखा और यह अपील की हम इस राष्ट्रीय त्रासदी में एकजुटता का परिचय दें और उस विजेट को अपने अपने ब्लागों पर प्रदर्शित करें .सहसा लगा हम इस घड़ी में अकेले नही हैं !
कई मित्रों ने यही किया और अकेली वैयक्तिक संवेदनाओं को साझा मंच मिल गया -कुछ राहत सी मिली .पर इस गाढे समय में भी कुछ लोग इस पूरे राष्ट्रीय सन्दर्भ से आश्चर्यजनक रूप से कटे , अलग थलग अपनी अपनी ढपली और अपना राग अलाप रहे थे -कुछ वैसी ही तर्ज पर जब प्राचीन भारत को विदेशी आक्रान्ता रौंद रहे थे -बौद्ध भिक्षु बुद्धं शरणं गच्छ का आलाप करते हुए जंगल जंगल घूम रहे थे -निस्पृहऔर निसंग !
कभी कभी मौन ही मुखर हो उठता है -शब्द बेजान हो जाते हैं .मैं उन मित्रों का बहुत आभारी हूँ ,नारी ब्लॉग का भी जिसने एक राष्ट्रीय त्रासदी में हमें यह सकून भरा अहसास दिलाया कि हम एक हैं -अपने आपसी छोटे मोटे आंतरिक विवादों के बाद भी बाहरी हस्तक्षेपों /आक्रमणों के समय हम एक समुदाय हैं ,एक इकाई हैं !
जो भाई बन्धु इस साझी संवेदना से नही जुड़ सके उनके प्रति अफ़सोस ही व्यक्त किया जा सकता है -वे लिखास के रोग से पीड़ित है और आश्चर्यजनक रूप से राष्ट्रीय मुद्दों से अलग थलग अपनी असम्पादित शब्द साधना मे जुटे हैं -
उन्हें साझा सरोकारों से कोई मतलब नही -यही वह कारण है किऐसा ही साहित्य डस्ट बिन में फेक दिया जाता है -हाशिये पर चला जाता है -साहित्य का मूल मकसद ही है जुड़ना ! जो एक राष्ट्रीय त्रासदी में भी ख़ुद को अलग थलग किए रहे -साझे सरोकार से नही जुट सके उन्हें क्या कहा जाय ?
आशा है आपके परिवार के सदस्य ,परिजन, ईष्ट मित्र सभी सकुशल होंगे .आईये हम जो कुछ घटा उस पर एक गंभीर चिंतन मनन करते हुए कुछ संकल्प लें औरऐसी घटना फिर न घटे उसकी अपने अपने ही ताई एक कार्ययोजना तैयार करें !

रविवार, 23 नवंबर 2008

एक कनफेसन !

मुझे अब ऐसे ही लग रहा है कि साईब्लाग पर पुरूष पर्यवेक्षण की इस कथा यात्रा को मैं कुछ वैसी ही विवशता और किसी की सौंपी हुयी प्रतिबद्धता के सहारे घसीट घसीट कर आगे लेकर बढ़ रहा हूँ जैसे कि कभी विक्रम ने वैताल के शव को ठिकाने लगाने का निरंतर और निष्फल प्रयास किया था .मेरी विवशता यह कि ख़ुद को श्रेष्ठ और सत्पुरुष मानने के क्षद्म आत्म गुमान के चलते इस कर्म को मैं छोड़कर उन निम्न पुरुषों की कोटि में नही वर्गीकृत होना चाहता जो किसी काम को शुरू तो बड़े चाव से करते हैं पर आधा अधूरा छोड़ कर चल देते हैं -भला कोई रचनाकर्मी अपनी स्वकीया से ऐसा बर्ताव भी भला कैसे कर सकता है ? भले ही ऐसे लोगों के सिर की विक्रम के सिर की भांति चूर चूर होने की आशंका न भी हो यह तो शर्म से सिर झुकने की बात है कि कोई अपनी ही कृति को आधा अधूरा छोड़ दे -क्या कोई माँ अपने बच्चे को अधूरा जन सकती है ? तो यह है मेरी विवशता ! पर मुझे अपने सिर के शर्म से झुकने से बड़ी चिंता यह है कि मैं इस बोझ को सही ठिकाने पर लगा दूँ ,पटाक्षेप पर ला दूँ ! पर अभी तो कई बार तरह तरह के धयान भंग के चलते वैताल पकड़ से यह छूटा वह छूटा और जाकर एक अगम्य सी डाल पर जा बैठा वाली स्थिति ही चरितार्थ हो रही है -जहाँ से सायास और सश्रम मुझे उसे फिर से खींच कर ब्लाग धारा में लाना पड़ रहा है ।
और उस पर दुश्चिंता यह भी कि कुछ विश्वासी मित्रों के अतिरिक्त सुधी/विद्वान् जनों का भी कोई प्रोत्साहन मुझे इस उपक्रम पर नही मिल रहा है -मेरी स्थिति तो ऐसी ही है -जो बाबा तुलसी दास ने यूँ व्यक्त किया है -
जो प्रबंध बुध नही आदरहीं सो श्रम बादि बाल कवि करहीं
(बुद्धिमान जिस कविता का आदर नही करते ,मूर्ख ही वैसी रचना का व्यर्थ परिश्रम करते हैं )...मुझे दुःख है कि मेरे प्यारे हिन्दी चिट्ठा जगत ने नर नारी के सौन्दर्य विश्लेषण के मेरे इस विज्ञान संचार के 'मनसा वाचा कर्मणा ' अध्यवसन को भी नर - नारी समानता/असमानता विवाद /वितंडा की भेंट चढ़ा दिया .लोगों ने ,ब्लागजगत की कई नारी शख्शियतों ने मुझे बताया कि मेरे इस लेखन में उनकी टिप्पणियों के लिए उनकी लानत मलामत की गयी -उन्हें उलाहने दिए गए -क्या ऐसी प्रवृत्तियों से सहज रचना धर्मिता बनी रह पायेगी ? यह गोल बंदी नही तो क्या है ? पर यह तो लोकतंत्र है और हम संविधानिक रूप से ऐसे माहौल में रहने को आबद्ध हैं !
आज प्रुरुष पर्यवेक्षण की अगली कड़ी भारी मन से लिखने को साईब्लाग पर आया तो सहज ही यह पीडा निसृत हो गयी है -मगर यह चूंकि यह उस ब्लॉग के कलेवर के अनुरूप नही है अतः यहाँ लाया हूँ -एक दुखी दिल लाया हूँ की तर्ज पर -पढ़ें और आनंद उठाएं मेरी दशा पर रहम फरमाएं या ना फरमाएं !

रविवार, 16 नवंबर 2008

आप किसी सम्मलेन में शरीक तो नही होने जा रहे ?

आप किसी सम्मलेन में शरीक तो नही होने जा रहे ? यदि हां तो कृपया गौर फरमाएं ! अभी मुझे एक राष्ट्रीय सम्मेलन -विज्ञान कथा :अतीत ,वर्तमान ऑर भविष्य के आयोजन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जिसमें देश के कोने कोने कोने से १०० से ज्यादा ही प्रतिभागियों ने भाग लिया -अकेले दक्षिण भारत से ही २२ प्रतिभागी आए थे .पूरा कार्यक्रम बनारस में संपन्न हुआ .चूंकि विज्ञान कथा मेरे लिए किसी पैशन से कम नही अतः इस विधा के लिए मैं कोई भी वैयक्तिक असुविधा ,असहजता झेलने को तैयार रहता हूँ .तथापि एक आयोजक के रूप में मुझे ऐसे कुछ ऐसे अनुभव हुए हैं जिन्हें आपसे इसलिए साझा करना चाहता हूँ ताकि यदि आप कभी ख़ुद आयोजक बनें तो ध्यान में रखें ऑर यदि कहीं प्रतिभागी बने तो ऑर भी धयान में रखें -एक समर्पित आयोजक जो अपने सभी प्रतिभागियों के रहने खाने पीने का पूरा इंतजाम रखता है वह भी कुछ ऐसी बातों से क्लांत हो जाता है मसलन -
1-ज़रा मैं कुछ देर के लिए एक वाहन चाहता हूँ -सोच रहा हूँ यहाँ आया हूँ तो फलाने से भी मिल आता .काफी दिनों से उनसे मुलाक़ात नही हुयी ।
२-मैं तो आपके ठहराए स्थान पर नहीं रूकूंगा क्योकि यहाँ तो मेरे रिश्तेदार फलां फलां जगह ,अरे वही बरगद के पास वाली गुमटी के पीछे रहते हैं अतः वहां से मुझे लेने- छोड़ने की व्यवस्था कर दें (अगर ऐसी अपरिहार्यता हो तो पहले से ही बोल कर रखें )
३-जल्दी में मैं अपना पावर पाईंट नही बना सका यह लीजिये यह रहा मैटर ज़रा बना के मंगवा दें प्लीज .
४-भाईआप तो जानते हैं कि मैं गिद्ध भोज (बुफे )नही करता -मेरे लिए कहीं अलग से इंतजाम करा दें (पहले से बोल रखें )
५-मैं तो जहाँ निरामिष भोजन बनता है वहां खाना नही खाता -अगर असुविधा न हो तो मेरे और अपनी भाभी के लिए कचौडी गली से पूडी कचौडी ही मंगा दें !
५.बनारस आया और भोले बाबा का दर्शन नही किया तो जीवन ही निस्सार हो जायेगा -भाई दर्शन का इंतजाम हो जाता तो फिर मजा ही आ जाता -तो ख़ुद न चले जाईये भाई साहब ,आख़िर रोका किसने है ।
६-मैं तो बिना गरम पानी के दाढी नही बनाता अभी तक इंतजाम नही हुआ (नहाने की बात जायज है पर यह दाढी वाली बात .....!)
७-पहले तो मैंने सोचा था कि बाम्बे मेल से चला जाउंगा पर अब ज़रा मैं अपनी एक मौसेरे भाई से मिलने भोपाल होकर जाने का सोच रहा हूँ -सेकंड ऐ सी फेयर तो आप दे ही रहे हैं ,चलिए निरस्तीकरण चार्ज मैं दे दूंगा अंब इस रूट से मेरा टिकट कटवा दीजिये /थोडा किराया अधिक लगेगा .
८-मिश्रा जी दरअसल पराड़कर जी का स्मृति दिवस भी बनारस में १६ से है आपका कार्यक्रम १४ को समाप्त हो रहा है कृपा कर दो दिनों तक और मेरे आवासीय और खाने पीने का खर्चा आयोजन मद से कर दें ।
९-आप मिश्रा जी हैं ? अरे साहब ये मेरे चार स्टुडेंट मान ही नही रहे थे आपके कार्यक्रम मे आने के लिए इतना जिद कर बैठे कि तत्काल कोटे से बंगलौर मेल से टिकट कटा कर आज ही सुबह हम लोग आप पर अहसान करने आ गए हैं बताएं कहाँ रुकना है ? क्षमां करेंमैं आपको पूर्व सूचना नही दे सका {बिना कोई पूर्व सूचना के सदल बल धमक आए लोग ! )
१० .मिश्रा जी मैं प्रोफेस्सर यादव हूँ आपके कार्यक्रम की सूचना देर से मिली मैंने आपको मेल किया था आपका कोई जवाब नही मिला और तत्काल टिकट भी नही मिल सका इसलिए किंग फिशर फ्लाईट से आ गया हूँ मैं वेनूयु भी नही जानता -"पर कार्यक्रम तो १४ को ख़त्म हो गया !" नही मुझे तो मालूम है कि यह १४ से शुरू हो रहा है -बहरहाल आप कहाँ रहते हैं ? वही आ जाता हूँ आपके साथ चाय भी पी लूंगा और टी ए तो आप दे ही देंगे मैंने फलाने से बात कर ली है .
कृपा कर आप किसी आयोजन में शरीक हीन जा रहे हों तो ऐसे आत्याचारियों सरीखे व्यवहार न करें न तो मुझ जैसा समर्पित व्यक्ति भी उन्ही आयोजकों की कतार में जा खडा हो जायेगा जो अपने प्रतिभागियों की तरह तरह से दुर्गति करते है और अपमानित करके विदा करते हैं .मुझे एक राहत है कि मैं कोई पेशेवर आयोजक नही हूँ पर यह पोस्ट इसलिए कि लोग पेशेवर प्रतिभागी बनने से भी बाज आयें !

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